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दोष मत लगाओ

दोष मत लगाओ

संदर्भ: मत्ती 7ः1-6

बाइबिल में मत्ती रचित सुसमाचार के सातवें अध्याय में प्रभु यीशु मसीह अपने पीछे चलने वाले लोगों से कहते हैं “दोष मत लगाओ कि तुम पर भी दोष न लगाया जाए। क्योंकि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जायेगा और जिस नाप से तुम नापते हो उसी नाप से तुम्हें भी नापा जाएगा। तू क्यों अपने भाई की आंख के तिनके को देखता है। और अपनी आंख का लट्ठा तुझे नहीं सूझता। और जब तेरी ही आंख में लट्ठा है तो तू अपने भाई से क्यों कर कह सकता है कि ला मैं तेरी आंख से तिनका निकाल दूं। हे कपटी पहले अपनी आंख में से लट्ठा निकाल ले तब तू अपने भाई की आंख का तिनका भली-भान्ति देख कर निकाल सकेगा” (मत्ती 7ः1-6)।

प्रभु यीशु मसीह के इस कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो वह कह रहे हों कि तुम किसी का विरोध न करो। किसी विवाद में अपनी राय मत दो, कोई निर्णय किसी और के सन्दर्भ में मत करो। परन्तु बाइबिल में हम पाते हैं कि न्यायियों की एक पुस्तक है, इसमें उन लोगों का वर्णन है जो परमेश्वर द्वारा ठहराये गये थे और लोगों का न्याय करते थे। मूसा को एक न्यायी कहा गया। पौलुस भी मसीही विश्वासियों से कहता है कि “क्या तुम नहीं जानते कि पवित्र लोग जगत का न्याय करेंगे। सो जब तुम्हें जगत का न्याय करना है तो क्या तुम छोटे से छोटे झगड़े का न्याय करने के योग्य नहीं। क्या तुम नहीं जानते कि हम स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे” (1 कुरिन्थियों 6ः2-3)।

यदि सांसारिक रूप से देखें तो हम प्रत्येक पल कोई न कोई निर्णय करते हैं। जब हम चुनाव के दौरान वोट डालते हैं, जब हम किसी का इन्टरव्यू लेते हैं, जब हम किसी को नौकरी पर लगाते हैं, जब हम विवाह करते हैं, जब हम अपने बच्चों की शिक्षा की बात सोचते हैं। हर समय हम कोई न कोई फैसला करते हैं। जो बात हमें समझनी है वह यह है कि प्रभु ने फैसला न करने के लिए नहीं कहा है। उनकी इस बात का अर्थ यह है कि हम अपने फैसले किस आधार से करते हैं, वह बात अधिक प्रमुख है।

प्रभु यीशु मसीह का क्या अर्थ है, जब वह कहते हैं कि दोष न लगाओ। वास्तव में प्रभु यीशु मसीह यह बात उन लोगों के सन्दर्भ में कह रहा था जो हमेशा ग़लतियां ढूंढते हैं। जिनके मन और मस्तिष्क में, हृदय और विचारों में नकारात्मकता ही होती है। जो हर बात में बुराई ही ढूंढते हैं। प्रभु यीशु मसीह यह बात उस पति के लिए कह रहा था जो अपनी पत्नी की अच्छाइयां, उसकी मेहनत और उसका त्याग नहीं देखता पर छोटी-छोटी बातों में उसे बुरा कहता है, उसे निराश करता है। यह बात वह उस पत्नी के लिए कह रहा था जो अपने पति की अच्छाइयों की कभी तारीफ नहीं करती पर हमेशा उसकी कमज़ोरियों के लिए बोलती रहती है। यह बात वह उन पालकों के लिए कर रहा था जो हर बात में अपने बच्चों को डांटते और मारते रहते हैं और उनकी प्रशंसा नहीं करते, उन्हें क्षमा नहीं करते। यह बात वह कलीसिया के उन सदस्यों से कह रहा था जो आराधना में बैठकर लोगों की, पासबान की, वक्ता की, प्राचीनों की ग़लतियां ढूंढते रहते हैं।

प्रश्न यह उठता है कि हम एक-दूसरे की आलोचना और बुराई क्यों करते हैं? हम दूसरे पर क्यों दोष लगाते है?

1. इस सन्दर्भ में पहली बात यह है कि हम स्वयं की ग़लतियों को ढांपने के लिए दोष लगाते हैं:- हमें यह मानना कठिन होता है कि स्वयं हमारी आंख में लट्ठा है। मरियम ने जब जटामांसी का बहुमूल्य इत्र यीशु के पैरों पर मला तो यहूदा इस्करियोती ने कहा इतना बहुमूल्य इत्र तीन सौ दीनारों में बेचकर कंगालों में बांटा जा सकता था। परन्तु वचन में लिखा है कि यह बात उसने इसलिए नहीं कही कि उसको कंगालों की चिन्ता थी पर इसलिए क्योंकि वह चोर था। पैसों की थैली उसके पास रहती थी। प्रभु यीशु मसीह की आलोचना की गई जबकि वह निष्पाप था। उसे पापियों का मित्र कहा गया, परमेश्वर की निन्दा करने वाला कहा गया। यह आलोचना करने वाले वे लोग थे जो यीशु से जलन रखते थे क्योंकि यीशु की लोकप्रियता बढ़ रही थी। वह लोगों का भला कर रहा था। वह इन धार्मिक अगुवों के पाखण्ड को उजागर कर रहा था। इसी कारण ये अगुवे जलन और क्रोध में अपनी ग़लती छुपाने के लिए यीशु की आलोचना कर रहे थे।

2. दोष लगाने या आलोचना के सन्दर्भ में दूसरी बात यह है कि अक्सर हम लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए आलोचना करते हैं:- हम सोचते हैं कि दूसरों के विषय में बुरा बोलेंगे तो लोग हमारी ओर आकर्षित हो जाएंगे। हमें सस्ती लोकप्रियता प्राप्त हो सकेगी।

3. तीसरी बात यह है कि हम लोगों को चोट पहुंचाने के लिए आलोचना करते हैं:- किसी ने कहा है “हथियारों से तो शरीर टूटता है पर आलोचना से व्यक्ति का मनोबल और उसका दिल टूटता है”। शब्द कहीं ज्य़ादा चोट पहुंचाते हैं। अपने जीवन में सबसे ज्य़ादा दर्द आपको अपने लोगों के द्वारा कही गई बातों से ही मिला होगा।

परन्तु मसीही जीवन में नकारात्मक आलोचना का कोई स्थान नहीं है क्योंकि जब हम किसी की आलोचना करते हैं तो उसके रास्ते में ठेस, ठोकर का कारण बनते हैं। इस सन्दर्भ में सबसे प्रमुख बात यह है कि ग़लत आलोचना न केवल परिवारों को तोड़ती है, न केवल सम्बन्धों को तोड़ती है वरन् यह कलीसियाओं और मसीह की गवाही को भी तोड़ती है।

इसी कारण आलोचना के गम्भीर परिणाम के विषय में चिताते हुए प्रभु यीशु कहते हैं कि जिस प्रकार तुम दोष लगाते हो उसी प्रकार तुम पर दोष लगाया जाएगा। वे कहते हैं कि यदि क्षमा करोगे तो क्षमा प्राप्त करोगे, यदि क्षमा नहीं करोगे तो परमेश्वर भी क्षमा नहीं करेगा।

आज हमें अपने जीवन को देखना है। हमें यह देखना है कि दूसरों पर दोष लगाने और उनकी आलोचना करने के प्रति हमारा क्या दृृष्टिकोण है। हमारा कैसा व्यवहार है। इस कारण से हमें आलोचना करने से पूर्व, किसी पर दोष लगाने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखना है।

(अ) हमें स्वीकार करना है कि यह एक गम्भीर पाप है:- कुरिन्थियों के नाम अपनी पत्री में पौलुस प्रेरित इस्राएलियों का उदाहरण देते हुए लिखता है “और न हम व्यभिचार करें जैसा उनमें से कितनों ने किया और एक दिन में 23 हज़ार मर गये और न हम प्रभु को परखें जैसा उनमें से कितनों ने किया और सांपों के द्वारा नाश किये गये। और न तुम कुड़कुड़ाओ, जिस रीति से उनमें से कितने कुड़कुड़ाये और नाश करने वाले के द्वारा नाश किये गये” (1 कुरिन्थियों 10ः8-10)। आलोचना भी व्यभिचार, प्रभु को परखने के समान एक ऐसा पाप है जिसका परिणाम अनन्तकाल के लिए नाश किया जाना है।

(ब) हमें दूसरों को प्रोत्साहित करना है:- बुरा न बोलना, आलोचना न करना ही पर्याप्त नहीं। परन्तु आवश्यक है कि हम दूसरों को प्रोत्साहित करें। इफिसियों की पत्री में पौलुस लिखता है कि हर एक व्यक्ति झूठ न बोले परन्तु सच बोले, चोरी न करे वरन् हाथों से अच्छे कार्यों के लिए परिश्रम करे, गन्दी बात न करें पर ऐसा बोलें कि सुनने वालों पर अनुग्रह हो। हमें आलोचना के बदले प्रोत्साहन के शब्द कहना है।

आलोचना करने के बजाय हम स्वयं को दूसरे के स्थान पर रख कर सोचें। इस बात से जुड़ी एक छोटी सी घटना है; एक रेस्टोरेन्ट में एक वृद्ध के साथ चार छोटे बच्चे पहुंचे। वे बच्चे बहुत शोर कर रहे थे। रेस्टोरेन्ट में एक पास्टर भी बैठा हुआ था। उसने देखा कि वह बूढ़ा व्यक्ति इन बच्चों को ऐसा करने से रोक नहीं रहा है। वह काफी देर तक उस शोर को सुनता रहा। जब उससे रहा नहीं गया तो वह उस वृद्ध व्यक्ति के पास गया और उससे कहा तुम इन्हें मना क्यों नहीं करते, इन्हें अनुशासित क्यों नहीं करते। वृद्ध व्यक्ति ने कहा, क्षमा करें, मैं इनका नाना हूं। इन बच्चों की मां की मृत्यु एक दुर्घटना में हो गई और हम लोग अभी ही उसका अन्तिम संस्कार करके लौटे हैं।

हम दूसरों की स्थिति में स्वयं को रखकर देखें। हम जिसकी आलोचना कर रहे हैं, वह इस समय किन परिस्थितियों से होकर गुज़र रहा है इस बात को ध्यान में रखें। इसी कारण वचन में लिखा है कि “हर एक अपने ही हित की नहीं वरन् दूसरे के भी हित की चिन्ता करे” (फिलिप्पियों 2ः4)।

(स) आलोचना के सन्दर्भ में सबसे प्रमुख बात यह है कि दूसरे की आंख का तिनका निकालने से पहले अपनी आंख का लट्ठा निकाल लें:- प्रभु आंख से तिनका निकालने के लिए मना नहीं करते परन्तु उससे पहले उनकी एक शर्त है कि हमें स्वयं की आंख का लट्ठा निकालना है। हमें अपनी खुद की कमियों को दूर करना है। हमें दूसरे की सकारात्मक आलोचना तो करना चाहिए क्योंकि सकारात्मक आलोचना के लिए परमेश्वर कभी भी मना नहीं करता। परन्तु हमें दूसरे की कमी उसे ऐसे बताना है जैसे कि आंख से तिनका निकालते हैं। रूमाल से या सुई से, बहुत हल्के हाथ से ताकि दूसरे को दर्द न हो। उसी प्रकार से आलोचना भी ऐसी हो जो कि दूसरे की उन्नति का कारण बने, उसे पीड़ा न पहुंचे वरन् उसके द्वारा वह आशीषित हो।

परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है कि हम दोष लगाने वाले न बनें किन्तु जीवन की कमज़ोरियों को दूर करते हुए दूसरों की कमियां प्रेम से, प्रोत्साहन से, सहयोग से दूर करने का प्रयास करें। परमेश्वर आप सब को अपने ज्ञान से परिपूर्ण करे।

परमेश्वर आपको आशीष दे।