संदर्भ: भजन संहिता 34ः12-16
जीवन में बहुत-सी बातों पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। मौसम पर, समय पर, आने वाले कल पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। प्राकृतिक विपदाएं कहां-कैसे घट जाएं हम नहीं जानते क्योंकि उस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। यहां तक कि दूसरों की प्रतिक्रियाओं पर हमारा नियंत्रण नहीं होता, आने वाली अप्रत्याशित घटनाओं पर हमारा नियंत्रण नहीं होता। एक और बात जिस पर हमारा नियंत्रण नहीं होता, चाहे भले ही उसके लिए कितने प्रयास करते रहें और वह है उम्र। उम्र समय से जुड़ी बात है। समय में एक रफ़्तार है। कितनी रफ़्तार है इसमें, कितनी तेज़ धार है, इस बात का अहसास नहीं होता। समय तेज़ी से बीतता जाता है और जब कहीं रुककर पीछे मुड़कर हम देखते हैं तो लगता है कि अरे! यह तो कल ही की बात है। समय, पता ही नहीं चलता है कि कब, कहां और कैसे चला गया। व्यक्तिगत रूप से मैं कहूं तो मेरे पिता की मृत्यु को 19 वर्ष हो गए। खेल की दुनिया बात करें तो भारत ने पहली बार क्रिकेट का विश्व कप 1983 में कपिल देव के नेतृत्व में जीता था और उस बात को 30 वर्ष बीत गए। इन्दिरा गांधी पर जब आक्रमण हुआ और उनकी हत्या कर दी गई इस बात को 29 वर्ष बीत गए, राजीव गांधी की हत्या को 22 वर्ष बीत गए। जब मसीही विरोधी त्यागी बिल प्रस्तुत किया गया और मसीही लोग उसके विरोध में सड़कों पर उतर आए और ऐतिहासिक जुलूस निकाले गए तो वह 1978 की घटना थी और उसे घटित हुए 35 वर्ष बीत गए। समय कब, कहां और कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। व्यक्तिगत रूप से आज सोचें तो अभी कुछ ही दिन पहले की बात लगती है कि जब काॅलेज में थे, जब साइकिल चलाया करते थे। अभी-अभी कुछ समय ही बीता लगता है, जब जाॅब प्रारम्भ किया। लगता है कुछ ही समय तो हुआ जब प्रेम हुआ और फिर विवाह हो गया। और हां, थोड़े समय पहले की ही तो बात है जब अपने बेटे को, अपनी बेटी को पैदा होते साथ गोद में उठाया था। परन्तु अब उम्र तेज़ी से बीत रही है, ज़िन्दगी मानो बहुत रफ्तार से बीत रही है। किसी ने बहुत ख़ूबसूरती से लिखा है:- उम्र यूं न बूंद-बूंद ढल, सांस यूं न ज़ोर-ज़ोर चल इतने गीत गाए अभी, एक और गाने दे एक बार और लहर-लहर चली आने दे एक आस और दे, एक प्यास और दे उम्र किनारा न कर, एक सांस और दे। कि अभी एक राह और है, एक चाह और है दर्द के पड़ाव पर, एक आह और है। समय की रफ़्तार ने उम्र की रफ़्तार को कुछ तेज़ी से ढकेल दिया है और इस पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दिया। यदि हम देखें तो उम्र बढ़ने के साथ-साथ कुछ असामान्य-सी प्रतिक्रियाएं होती हैं। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं कि हम बहुत कमज़ोर हो गए हैं, हम कुछ कर नहीं सकते, खाट पर से उठ नहीं सकते। हमारी अपेक्षाएं दूसरों से, अपने बच्चों से, अपने पड़ोसियों से बढ़ती जाती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि अब तो हम बुज़ुर्ग हैं, हमारे बाल सफेद हो गए हैं, लोगों को हमारा आदर करना चाहिए। पके हुए बालों का लिहाज़ लोग करें बाकी हमारा जीवन चाहे कैसा भी हो। पिता के बाल तो पक गए परन्तु 8 वर्षों तक अपनी बेटी को कैद में रखकर उसका बलात्कार करते रहे और फिर मीडिया ने पोल खोल दी। बाल सफेद तो हो गए परन्तु कैसे इन सफेद बालों का वह बेटी सम्मान करे, आदर करे, लिहाज़ करे? कुछ कहते हैं कि हमारी उम्र बहुत है, तुम होते कौन हो हमें समझाने वाले? अभी तो तुम्हारे दूध के दांत नहीं टूटे। अरे! हम सब जानते हैं। बाइबिल काॅलेज नहीं गए तो क्या हुआ, हमें मालूम है कि कौन-सी बात ठीक है, कौन सी बात ग़लत है। कैसे प्रचार करना है, कैसे गीत गाना है। कुछ की प्रतिक्रिया होती है कि मृत्यु पास है और क़ब्र का बड़ा भय है। क़ब्र ख़ाली है, गहरी है, अन्धेरी है, परिवार के लोग आएंगे, बाॅक्स में बन्द कर देंगे और उसके बाद क़ब्र को पाटकर चले जाएंगे। परन्तु वास्तव में मसीहियों के लिए मृत्यु का भय तथा इस प्रकार की भावना उचित नहीं है। ये शैतान की ओर से आई र्हुइं बातें हैं। यह शैतान के द्वारा हमारी मानसिकता को दूषित करने का प्रयास है। आइये, हम कुछ देर इस बात पर विचार करें कि इस बढ़ती हुई उम्र पर, उम्र के इस चढ़ाव पर, वक्त की इस रफ़्तार पर हमारी प्रतिक्रिया क्या होना चाहिए? इस विषय पर वचन पर आधारित चार बातों को हम देखेंगे। 1. जीवन का हर पड़ाव, उम्र का हर चढ़ाव परमेश्वर की योजना है:- आवश्यकता है कि इसे हम धन्यवाद सहित स्वीकार करें। हमारी उम्र हो गई, हमारे बाल पक गए, शारीरिक रूप से हम कमज़ोर हो गए; यह परमेश्वर की योजना का भाग है। इसे परमेश्वर ने तय किया है; यह परमेश्वर की इच्छा है और अगर ऐसा है तो फिर स्वीकार्य है। परमेश्वर हम से बेहतर जानता है, परमेश्वर की बुद्धि हम से कहीं अधिक तेज़ है। परमेश्वर की योजना हमारी योजना से कहीं अधिक सुनियोजित, उत्तम, सर्वोत्कृष्ट है और इसीलिए हम इसे स्वीकार करें। अय्यूब 14ः5 में लिखा है, मनुष्य के दिन नियुक्त किए गए हैं, और उसके महीनों की गिनती तेरे पास लिखी है, और तू ने उसके लिए ऐसा सिवाना बान्धा है जिसे वह पार नहीं कर सकता। जब हमने अपने जीवन को उस परमेश्वर के हाथ में दिया है जिसने हमारी योजना बनाई है, जिसने हमको मां के गर्भ में रचा है। जिसके द्वारा हम इस संसार में आए। जिसने उम्र का सिवाना बांधा है, जिसने दिन, वर्ष, माह नियुक्त किए हैं तो फिर हमें इस योजना को स्वीकार करना है। इसीलिए पौलुस प्रेरित अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव में अपने आत्मिक पुत्र तीमुथियुस को लिखता है, “पर सन्तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है” (1 तीमुथियुस 6ः6)। भजन संहिता 18ः28-29 - हां, तू ही मेरे दीपक को जलाता है; मेरा परमेश्वर यहोवा मेरे अन्धियारे को उजियाला कर देता है। क्योंकि तेरी सहायता से मैं सेना पर धावा करता हूं; और अपने परमेश्वर की सहायता से शहरपनाह को लांघ जाता हूं। हमें स्वीकार करना है कि यह सामर्थ्य मेरी नहीं परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य है क्योंकि मैंने अपना जीवन उसकी योजना के लिए समर्पित कर दिया है। इसलिए उसकी योजना को धन्यवाद से मैं स्वीकार करता हूं । अतः पहली बात कि उम्र के जिस पड़ाव पर हम हैं, जिस स्थिति में हम हैं, इस पकी उम्र की जो बातें हैं, उन सब को हमें स्वीकार करना है क्योंकि यह परमेश्वर की योजना है। हम उसकी इच्छा को स्वीकार करते हैं कि उसकी सामर्थ्य से आज भी सब कुछ सम्भव है। 2. किसी विश्वासी के जीवन का समय वर्षों से नहीं नापा जा सकता:- यूहन्ना 11ः25-26- यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा। प्रभु यीशु कहते हैं कि जो मुझ पर विश्वास करता है उसने अनन्त जीवन में पदार्पण कर लिया है। उसे अनन्त जीवन की निश्चितता, अनन्त जीवन की आशीष प्राप्त हो गई है। अब क़ब्र की तरफ क्या देखना, क़ब्र से क्या भय खाना क्योंकि वह क़ब्र नहीं अनन्त जीवन है। वह देश है जिसकी ओर हम विश्वास से देख सकते हैं। प्रभु यीशु कहते हैं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह अनन्तकाल तक न मरेगा। इसीलिए पौलुस कहता है, “क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है” (फिलिप्पियों 1ः21)। डाॅ. बिली ग्राहम की एक पुस्तक के अन्तिम भाग में उन्होंने एक बात लिखी है कि एक दिन आएगा जब आप सुनेंगे कि मैं मर गया। परन्तु उस पर विश्वास मत करना क्योंकि उस दिन मैं इस जीवन से कहीं अधिक जीवन्त होऊंगा। कैसे नाप सकते हैं एक विश्वासी की उम्र? उत्पत्ति 5ः23-24- और हनोक की कुल अवस्था तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई। और हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया। किसी टीकाकार ने बहुत अच्छा लिखा है कि हनोक परमेश्वर के साथ चलता रहा और 50 वर्ष बीत गए, फिर भी वह चलता रहा और 100 वर्ष बीत गए, और फिर 200 वर्ष बीत गए और फिर 300 वर्ष बीत गए। तब भी वह चलता रहा और फिर 350 वर्ष बीते और 365 वर्ष बीते और तब परमेश्वर ने उस से कहा; हनोक, तेरा घर तो अब बहुत पीछे छूट गया। मेरा घर बहुत पास है, आ, अब मेरे घर में ही चला चल। यही बात विश्वासियों के साथ होती है। यदि हम परमेश्वर के साथ चलते हैं और जब हमारा समय पूरा होता है तो परमेश्वर हमको अपने हाथ से उठाकर अपनी गोद में ले लेता है। मेरे प्रियो, किसी विश्वासी के जीवन का समय, वर्षों से नहीं नापा जा सकता। 3. परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए जीएं:- नीतिवचन में लिखा है, जहां दर्शन नहीं होता वहां लोग निरकुंश हो जाते हैं। अंग्रेज़ी बाइबिल में लिखा है, people parish अर्थात् जहां दर्शन नहीं होता वहां लोग पीड़ित होते हैं। स्वप्न के विषय में मैं पढ़ रहा था और किसी ने बहुत अच्छा लिखा है कि जीवन के वास्तविक स्वप्न वे नहीं होते जो नींद में दिखाई देते हैं। जीवन के वास्तविक स्वप्न तो वे होते हैं जो नींदें उड़ा देते हैं। क्या मैं और आप किसी उद्देश्य के लिए जी रहे हैं? किसी दर्शन के लिए जी रहे हैं? कोई स्वप्न है जीवन में? किसी ने कहा है कि एक उद्देश्य के लिए जिओ, चाहे उसके लिए जीवन समर्पित करना पड़े, मृत्यु को भी स्वीकारना पड़े तो कर सकें। इसीलिए पौलुस प्रेरित अपनी मृत्यु से पहले तीमुथियुस को अपने अन्तिम पत्र में लिखता है - “मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है” (2 तीमुथियुस 4ः7)। परमेश्वर ने जिस उद्देश्य के लिए भेजा था, उस दिशा में मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली है। मैंने अच्छी कुश्ती लड़ ली है और मैंने अपने विश्वास की रखवाली की है। एस्तेर रानी का उदाहरण हम देखते हैं कि यहूदी लोग ख़तरे में हैं। यहूदी लोगों को बर्बाद करने के लिए षड़यंत्र रचा जा चुका है, राजा तक बात पहुंच चुकी है। राजा ने उस बात पर अपनी सहमति दे दी है। तब एस्तेर रानी यहूदी कौम को बचाना चाहती है और वह यहूदियों को इकट्ठा करती है। वह कहती है; “तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम सब मिलकर मेरे निमित्त उपवास करो, तीन दिन-रात न तो कुछ खाओ, और न कुछ पीओ। और मैं भी अपनी सहेलियों सहित उसी रीति उपवास करूंगी। और ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊंगी। और यदि नाश हो गई तो हो गई” (एस्तेर 4ः16)। एस्तेर कहती है कि उपवास करो, प्रार्थना करो और ऐसी दशा में नियम के विरुद्ध, संविधान के विरुद्ध मैं राजा के पास जाऊंगी। क्यों? क्योंकि मुझे अपने लोगों को बचाना है, मुझे अपनी कौम के लिए पीड़ा है। मुझे अपने समाज को बचाना है। मैं राजा के पास नियम के विरुद्ध जाऊंगी और नाश हो गई तो हो गई। पतरस और यूहन्ना को रोमी राज्य के लोग रोेक रहे हैं और कह रहे हैं कि प्रचार मत करो, प्रभु यीशु मसीह की बात मत करो और तब प्रेरितों के काम 4ः18-20 में लिखा है - तब उन्हें बुलाया और चितौनी देकर यह कहा, कि यीशु के नाम से कुछ भी न बोलना और न सिखलाना। परन्तु पतरस और यूहन्ना ने उन को उत्तर दिया, तुम ही न्याय करो, कि क्या यह परमेश्वर के निकट भला है, कि हम परमेश्वर की बात से बढ़कर तुम्हारी बात मानें। क्योंकि यह तो हम से हो नहीं सकता, कि जो हम ने देखा और सुना है, वह न कहें। क्या ऐसा कोई स्वप्न जीवन में है जिसके लिए हम मरने मिटने को तैयार हैं? क्या ऐसा कोई उद्देश्य है? क्या ऐसा कोई दर्शन है कि फिर चाहे कुछ भी हो, यदि नाश हो जाएं तो हो जाएं परन्तु यीशु का नाम न लें, यह तो हो ही नहीं सकता कि हमने जो देखा है और सुना है, उसको न कहें। 4. संगति रखना न छोड़ें:- जीवन के इस पड़ाव में और विशेषकर उस समय, जब हमें लगे कि हमारी मृत्यु निकट है तो आवश्यक बात यह है कि हम संगति रखना न छोड़ें। अपने लोगों से मिलना जुलना न छोड़ें, अपने प्रियो, विश्वासियों की संगति में हम बने रहें। इब्रानियों 10ः25- और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो। जब तुम्हें लगे कि संसार के जीवन का अन्त निकट है तो यह और भी अधिक किया करो। क्यों? क्या होगा इससे? जब हम अपने लोगों से मिलेंगे, जब हम संगति रखेंगे, जब हम विश्वासियों के साथ सहभागिता करेंगे तो हमको दृढ़ता मिलेगी, हम मज़बूत होंगे। इससे परमेश्वर की देह मज़बूत होगी, परमेश्वर की गवाही होगी। परमेश्वर ने कलीसिया से कहा है कि यह प्रभु यीशु मसीह की देह है और हम सब उसके अंग हैं। यदि उसके अंग एक साथ न हों तो कलीसिया टूट जाएगी, बिखर जाएगी। इसीलिए संगति रखना न छोड़ो, मिलते रहो। जो लोग अलग-थलग रहते हैं, किसी से मिलना-जुलना नहीं पसन्द करते, किसी से बात नहीं करते उनका जीवन बड़ा ही नीरस होता है। परन्तु वे लोग जो मिलते जुलते रहते हैं, बातचीत करते रहते हैं, दूसरों के सुख-दुख में साथ देते हैं, संगति रखते हैं, उन जैसों के लिए लिखा है- “जैसा लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है” (नीतिवचन 27ः17)। भजन संहिता 92ः12-24 - धर्मी लोग खजूर की नाईं फूले फलेंगे, और लबानोन के देवदार की नाईं बढ़ते रहेंगे। वे यहोवा के भवन में रोपे जाकर, हमारे परमेश्वर के आंगनों में फूले फलेंगे। वे पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे। किसी लेखक ने उम्र बढ़ने के विषय में लिखा है कि उम्र बढ़ती है तो तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए; कुछ करने को हो, कोई प्रेम करने वाला हो और किसी की बाट जोहने की बात जीवन में हो। हम मसीहियों के लिए ये बड़ी अर्थपूर्ण बातें हैं। हमारे लिए बहुत कुछ करने को है। परमेश्वर ने हम से इतना प्रेम किया कि उसने अपना सब कुछ हमको दे दिया। और जहां तक बात है बाट जोहने की, तो हम तो उस स्वर्ग की बाट जोहते हैं, अनन्त जीवन की बाट जोहते हैं जहां न धूप है, जहां न तपन है, जहां न भूख है, जहां न पीड़ा है और ऐसी बातें हैं जो कभी मनुष्य के चित्त में कभी नहीं चढ़ीं। वे बातें परमेश्वर ने अपने विश्वासियों के लिए ठहराई हैं। उस मीरास को हम प्राप्त कर सकेंगे, उस भवन में हमेशा-हमेशा के लिए रह सकेंगे। मेरे एक मित्र जब भारत आए तो एक सेमीनार के दौरान पढ़ाते समय उन्होंने कहा कि मैं जब मर जाऊं तो मेरी क़ब्र पर 2 कुरिन्थियों 5ः8 लिखा जाए। जहां लिखा है, इसलिये हम ढाढ़स बान्धे रहते हैं, और देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं। उम्र के बढ़ने से, शारीरिक समस्याओं से जूझने से हम निराश न हों, हम हताश न हों क्योंकि हमने अपना जीवन उसके हाथ में दे दिया है, जिसके हाथ में सारी सृष्टि है, जिसने हमें बनाया है, जिसके हाथ में सब बातों का नियंत्रण है। जो हमें इस जीवन के बाद अपने हाथ से उठाकर अपनी गोद में उठा लेता है और उसके बाद हमें उस भवन में ले जाएगा जिसे उसने अपने हाथों से, अपने परिश्रम से और अपने बेटे के लहू से तैयार किया है। परमेश्वर आपको आशीष दे।