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इसहाक - ज़िन्दगी की प्रमुख शिक्षाएं

इसहाक - ज़िन्दगी की प्रमुख शिक्षाएं

संदर्भ: इब्रानियों 11ः17-19; उत्पत्ति 22ः1-14

इब्रानियों 11ः17-19 “विश्वास ही से इब्राहीम ने, परखे जाने के समय में, इसहाक को बलिदान चढ़ाया, और जिस ने प्रतिज्ञाओं को सच माना था। और जिस से यह कहा गया था, कि इसहाक से तेरा वंश कहलाएगा; वह अपने एकलौते को चढ़ाने लगा। क्योंकि उस ने विचार किया, कि परमेश्वर सामर्थी है, कि मरे हुओं में से जिलाए, सो उन्हीं में से दृष्टान्त की रीति पर वह उसे फिर मिला”।

उत्पत्ति की पुस्तक के 22 वें अध्याय के 1 से 14 पदों में इस घटना का वर्णन है जब परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार इब्राहीम इसहाक को मोरिय्याह पर्वत पर बलिदान करने के लिए ले गया और परमेश्वर ने उसके विश्वास को आशीषित करते हुए इसहाक को बचाया। इस घटना में हमारे जीवनों के लिए एक बहुत प्रभावशाली सन्देश है। किसी पिता को परमेश्वर आज्ञा दे कि जाकर मेरे लिए अपने पुत्र को अपने हाथों से बलिदान कर दे और वह पिता इस कार्य को करने के लिए तैयार हो जाए, इस कार्य को करने में पीछे न हटे तो यह बात बहुत प्रभावशाली है। अक्सर जब हम इस घटना की बात करते हैं तो हम इब्राहीम के बारे में बात करते हैं। हम पाते हैं कि उसका विश्वास परमेश्वर पर था और वह अपने परिवार से बढ़कर परमेश्वर से प्रेम करता था। जब परमेश्वर ने इब्राहीम से अपने बेटे का बलिदान करने को कहा तो उसने कोई प्रश्न नहीं किया। इब्राहीम के इस त्याग और आज्ञाकारिता पर हमने कई सन्देश सुने हैं। परन्तु क्या कभी आपने यह सोचा है कि इस दिन जो भी घटनाएं घटीं, जिस प्रकार से सारी बातें सम्पन्न हुईं, उन बातों के परिप्रेक्ष्य में इसहाक के लिए भी यह दिन बहुत महत्वपूर्ण रहा होगा। इस घटना से इसहाक ने अपने जीवन में बहुत कुछ सीखा होगा।

न सिर्फ यह दिन इब्राहीम और इसहाक के लिए महत्वपूर्ण था बल्कि परमेश्वर के लिए भी यह दिन बहुत प्रमुख था। परमेश्वर अपने दास की परीक्षा करना चाहता था और जब परमेश्वर ने देखा कि इब्राहीम इस परीक्षा में खरा उतरा है तो परमेश्वर निश्चित रूप से आनन्दित हुआ होगा। उत्पत्ति 22ः16-18 में लिखा है - “यहोवा की यह वाणी है कि मैं अपनी ही यह शपथ खाता हूं कि तू ने जो यह काम किया है कि अपने पुत्र, वरन अपने इकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूंगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनित करूंगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगाः और पृथ्वी की सारी जातियां अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगीः क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है”।

उस महत्वपूर्ण दिन इसहाक ने कुछ बातें अपने पिता के जीवन से सीखीं; जिन पर हम ग़ौर करेंगे ।

1. इसहाक ने सीखा कि उसके पिता के जीवन में परमेश्वर का पहला स्थान है:- वह इब्राहीम का एक मात्र बेटा था, और निश्चित रूप से इब्राहीम उस से बहुत प्रेम रखता था। बहुत वर्षों के इन्तज़ार के बाद परमेश्वर ने इब्राहीम और सारा को यह पुत्र दिया था। इब्राहीम ने बचपन से अपने बेटे को सम्भाला होगा, उसकी देख-रेख की होगी, उससे प्रेम किया होगा, उसको अपने दिल से लगाया होगा। उसको सिखाया होगा, उसको आगे बढ़ाया होगा, उसको परमेश्वर के विषय में बताया होगा। इसहाक जानता था कि उसका पिता उससे कितना प्रेम करता है। टीकाकारों का कहना है कि उस समय इब्राहीम की उम्र लगभग 120 वर्ष और इसहाक की उम्र 20 वर्ष रही होगी। इस 120 वर्ष की उम्र में पिता अपने जवान पुत्र के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं कर सकता, कि ज़बरदस्ती उसके हाथों और पैरों को बान्धकर बलिदान करने के लिए वेदी पर लिटा दे। परन्तु हम पाते हैं कि इसहाक ने अपनी इच्छा से अपने पिता के सामने अपना समर्पण किया और ऐसा इस कारण हुआ क्योंकि इसहाक ने इस बात को देखा कि उसके पिता के जीवन में परमेश्वर का पहला स्थान है। उसका पिता उससे जितना प्रेम रखता है, उससे कहीं ज्य़ादा वह परमेश्वर से प्रेम रखता है।

हमारा परमेश्वर, हमारे जीवनों में पहला स्थान चाहता है। इसीलिए जब उसने निर्गमन 20 में मूसा को आज्ञा दी तो पहली आज्ञा यह थी कि मुझे छोड़ और किसी दूसरे को ईश्वर कर के न मानना। परमेश्वर हमारे जीवनों में दूसरा स्थान नहीं चाहता। उसने हमारी सृष्टि की है, उसने सारी सृष्टि को मेरे और आप के लिए सृजा है। उसने अपने बेटे को हमारे लिए बलिदान कर दिया, उसने सारी आशीषें हमारे जीवनों में दी हैं और इसलिए वह चाहता है कि हम अपने जीवनों में उसे पहला स्थान दें।

मत्ती 10ः37 में लिखा है - “जो अपने माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं और जो अपने बेटे या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य नहीं”।

प्रभु यीशु मसीह यहां पर शिष्यता की शर्तों का वर्णन कर रहे हैं। उसके आगे वह कहते हैं कि जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे न चले वह मेरे योग्य नहीं। प्रभु यीशु मसीह यहां पर बड़े स्पष्ट रूप से कहते हैं कि जो अपने माता या पिता को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, जो अपने बेटे या बेटी को मुझ से अधिक प्रिय जानता है, वह मेरे योग्य हो नहीं सकता; यह शिष्यता की शर्त है। जब हम कहते हैं कि परमेश्वर का हमारे जीवनों में पहला स्थान है, हमारे परिवारों में पहला स्थान है तो इसका अर्थ यह है कि प्रतिदिन परमेश्वर से प्रार्थना के साथ हम अपनी दिनचर्या को प्रारम्भ करें। अपनी दिनचर्या में परमेश्वर को पहला स्थान दें, सप्ताह के पहले दिन हम उसकी कलीसिया में, उसकी आराधना में, उसके वचन के अनुसार उसकी स्तुति और महिमा करें। परमेश्वर को यदि प्रार्थना के साथ अपनी दिनचर्या में पहला स्थान देंगे, सप्ताह में पहले दिन उसके सन्तों की संगति में उसके आराधनालय में, उसकी आराधना करने के द्वारा उसको पहला स्थान देंगे। माह में अपनी कमाई में से एक प्रमुख अंश यदि हम परमेश्वर को देंगे तो इससे यह स्पष्ट होगा कि हमारे जीवनों में परमेश्वर का पहला स्थान है।

हमें विचार करना है कि हमारे जीवनों में पहले स्थान पर कौन है? क्या पैसा, पद, कोई सम्बन्ध? कौन-सी ऐसी बात है जो हमें परमेश्वर से दूर किए हुए है? प्रभु यीशु मसीह कहते हैं जो मुझसे अधिक किसी बात को, किसी वस्तु को, किसी भी सम्बन्ध को प्राथमिकता देता है, वह मेरे योग्य नहीं। उस दिन इसहाक ने सीखा कि उसके पिता के जीवन में जो पहला स्थान है, जो पहला प्रेम है, जो पहली बात है वह परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और समर्पण है। उसने सीखा कि उसके पिता के जीवन में परमेश्वर का स्थान प्रथम है।

2. इसहाक ने सीखा कि उसके पिता का जीवन कपट रहित है:- उस दिन इसहाक ने अपने पिता के जीवन से सीखा कि उसके पिता का जीवन कपट रहित है। उसके पिता के जीवन में कोई दोहरापन नहीं है।

आज हमारे परिवारों और मसीही जगत में बहुत-सी समस्याएं हैं। मैं कलीसियाओं की यात्रा करता हूं और पासबानों से चर्चा करता हूं तो वे कहते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी टेलीविजन के प्रति इतनी आकर्षित है कि चर्च के प्रति उनकी किसी प्रकार से कोई रुचि नहीं बची है, कोई लगाव नहीं बचा है। उनके लिए मानो चर्च ने अपना आकर्षण खो दिया है। परन्तु इससे पहले कि हम उन युवाओं को दोष दें शायद आवश्यकता इस बात की है कि हम जो माता-पिता हैं, हम जो परिवार के बुज़ुर्ग हैं, हम जो कलीसिया के अगुवे हैं, हम जो चर्च काउंसिल के सदस्य हैं, हम जो मसीही संस्थाओं के अगुवे हैं; हमको अपने जीवनों में देखना है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जब ये जवान, हमको देखते हैं तो उनको हमारे जीवन में दोहरापन दिखाई देता है। हमारे बोलने और हमारे करने में इन्हें कुछ अन्तर दिखाई देता है। बाहर जैसा हम बोलते हैं घर में हमारी भाषा फर्क हो जाती है, कार्यक्षेत्र में हमारी भाषा फर्क हो जाती है। जब युवा यह बात देखते हैं कि इनकी कथनी और करनी में फर्क है, तो वे परमेश्वर से दूर चले जाते हैं।

मत्ती 15ः7 में लिखा है- “हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यवाणी ठीक की, कि यह लोग ओठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझसे दूर रहता है”।

यशायाह 1ः12-17 में हम पाते हैं कि परमेश्वर कहता है- तुम जब अपने मुंह दिखाने के लिए आते हो, तब यह कौन चाहता है कि तुम मेरे आंगनों को पांव से रौंदो।

यदि तुम परम्परा पूरी करने के लिए कलीसिया के भवन में आते हो, और तुम्हारा हृदय मुझसे दूर है, तो कौन चाहता है कि तुम मेरे आंगनों को अपने पांव से रौंदो- व्यर्थ अन्नबलि फिर मत लाओ, धूप से मुझे घृणा है। नये चांद और विश्राम का दिन मानना और सभाओं का प्रचार करना यह मुझे बुरा लगता है- जो परम्पराएं हैं, जो त्योहारों को मनाने की बात है, यहां तक लिखा है कि उनका सभाओं में प्रचार करना मुझे बुरा लगता है। और लिखा है- महासभा के साथ ही साथ अनर्थ काम करना मुझसे सहा नहीं जाता। तुम्हारे नये चांदों और नियत पर्वों के मनाने से मैं जी से बैर रखता हूं-दिल से मुझे इनसे बैर है। जो पर्व तुम मनाते हो, जो त्योहार, जो उत्सव तुम मनाते हो, इनसे मुझे बैर है। वे सब मुझे बोझ जान पड़ते हैं। मैं उनको सहते-सहते उकता गया हूं-थक गया हूं। यह सब बोझ है, यह सब ढोंग है, ये सब परम्पराएं हैं। जब तुम मेरी ओर हाथ फैलाओ तब मैं तुमसे मुख फेर लूंगा। तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूंगा क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं। अपने को धोकर पवित्र करो, मेरी आंखों के सामने से अपने बुरे कामों को दूर करो। भविष्य में बुराई करना छोड़ दो, भलाई करना सीखो। यत्न से न्याय करो, उपद्रवी को सुधारो, अनाथ का न्याय चुकाओ। विधवा का मुकद्मा लड़ो तुम पर्व तो मनाते हो, तुम त्योहार तो मनाते हो, तुम्हारे कार्यक्रम तो होते हैं पर इन सब बातों से मैं थक गया हूं। जो बात है वह यह कि तुम अपने व्यवहार में मुझे लाओ, अपने दिल में मुझे स्थान दो।

हमको अपने जीवनों का पुनर्मूल्यांकन करना है कि हम कैसे माता-पिता हैं, हम कैसा आदर्श अपने बच्चों के सामने रखते हैं? क्या हम उनके लिए आशीष का कारण हैं? क्या हमारे बच्चे यह कह सकते हैं कि हम अपने माता और पिता के समान बनेंगे? क्या हमारे बच्चे यह कह सकते हैं कि हम अपनी कलीसिया के अमुक अगुवे के समान बनना चाहते हैं? या हम अपने बच्चों और अपने युवाओं या अपने समाज के लिए ठोकर का कारण हैं?

प्रभु यीशु मसीह ने बड़े कटु वचन इस विषय में कहे हैं। वे कहते हैं “जो कोई इन छोटों में से जो मुझ पर विश्वास करते हैं एक को ठोकर खिलाए, उसके लिए भला होता कि बड़ी चक्की का पाट उसके गले में लटकाया जाता, और वह गहिरे समुद्र में डुबाया जाता। ठोकरों के कारण संसार पर हाय! ठोकरों का लगना अवश्य है; पर हाय उस मनुष्य पर जिस के द्वारा ठोकर लगती है” (मत्ती 18ः6-7)। मसीही माता-पिता होकर, बड़े भाई-बहन होकर और कलीसिया के अगुवे होकर क्या हम दूसरों के लिए ठोकर का कारण बन रहे हैं? प्रभु यीशु मसीह कहते हैं ऐसे लोग जो ठोकर का कारण हैं उनके लिए अच्छा होता कि बड़ी चक्की का पाट उनके गले में लटकाया जाता और गहरे समुद्र में उनको डुबो दिया जाता। इसहाक ने उस दिन देखा होगा कि मेरे पिता के जीवन में कोई दोहरापन नहीं है। मेरा पिता जो कहता है वह करता है। जिस पर विश्वास करता है उसकी आज्ञा मानता है, किसी प्रकार की भ्रष्टता उसके जीवन में नहीं है।

3. इसहाक ने उस दिन सीखा कि उसके पिता का परमेश्वर सच्चा परमेश्वर है:- यदि थोड़ा सा पीछे जाएं तो उत्पत्ति के 17 वें अध्याय में परमेश्वर की प्रतिज्ञा का वर्णन है- इस कारण निश्चय मैं तुझे आशीष दूंगा और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण और समुद्र तीर की बालू के किनकों के समान अनगिनत करूंगा और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा। और पृथ्वी की सारी जातियां अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी, क्योंकि तूने मेरी बात मानी है।

यह इसहाक के बलिदान की घटना से पहले की बात है और परमेश्वर इसहाक के सम्बन्ध में दो बातें कहता है, पहली बात यह कि वह इसहाक के विषय में इब्राहीम के साथ वाचा बांधता है और दूसरी बात वह कहता है, जो बात यहां स्पष्ट है कि इसहाक का वंश होगा। बड़ी अजीब-सी बात लगती होगी इब्राहीम की। इब्राहीम के मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि परमेश्वर कह रहा है कि इसको बलिदान चढ़ा दे और उससे पहले परमेश्वर ने कहा था कि मैं इसहाक के वंश को आशीषित करूंगा और समुद्र के किनारे की बालू के किनकों के समान उसके वंश को बढ़ाऊंगा और अब यही परमेश्वर कह रहा है कि इसको समाप्त कर दे।

इसहाक को इब्राहीम ने यह बात अवश्य बताई होगी कि तू परमेश्वर की प्रतिज्ञा से उत्पन्न हुआ बेटा है। तू ऐसा बेटा है जिसके विषय में परमेश्वर ने कहा कि मैं तेरे वंश को समुद्र के किनारे की बालू के किनकों की नाईं बढ़ाऊंगा। इसके बाद हम पाते हैं कि मोरिय्याह पर्वत की ओर यात्रा के दौरान इब्राहीम से इसहाक पूछता है कि हे मेरे पिता आग और लकड़ी तो है पर होमबलि के लिए भेड़ कहां है और इब्राहीम उत्तर देता है; हे मेरे पुत्र, परमेश्वर होमबलि की भेड़ का उपाय आप ही करेगा। इसके बाद इसहाक ने देखा होगा कि किस प्रकार से उसके पिता ने मोरिय्याह पर्वत पर चढ़कर वेदी बनाई, किस प्रकार से उसके पिता ने उस पर लकड़ियां डाल दीं, किस प्रकार उसके पिता ने उसको उस वेदी के ऊपर लिटा दिया, और किस प्रकार वह उसे मारने के लिए तैयार हो गया। और तब उसको एक आवाज़ स्वर्ग से सुनाई देती है- इब्राहीम, हे इब्राहीम, लड़के पर हाथ मत बढ़ा, तूने मेरे लिए अपने पुत्र को भी न रख छोड़ा, अब मैं जान गया हूं कि तू परमेश्वर का भय मानता है।

इसहाक ने उस दिन जो देखा और सुना, उसके दिल में यह बात पक्की तरह से उतर गई होगी कि मेरे पिता का परमेश्वर, सच्चा परमेश्वर है। इसकी एक-एक बात, एक-एक प्रतिज्ञा, एक-एक वायदा सच्चा वायदा है। क्या हम उस परमेश्वर पर अटूट, अडिग और अटल विश्वास रखते हैं। वह परमेश्वर जो नहीं चाहता कि इस संसार की सांसारिकता से हम समझौता करें। वह परमेश्वर जो नहीं चाहता कि इस संसार के पाप में हम पड़ें। वह परमेश्वर जो नहीं चाहता कि हम शैतान के अन्धकार की शक्तियों में पड़ें। वह परमेश्वर जो प्रतिज्ञा करता है, वह परमेश्वर जो क्षमा करता है, वह परमेश्वर जो हम पर अनुग्रह करता है, वह परमेश्वर जो हमको आशीष देता है, वह परमेश्वर जो हमको चंगाई देता है, वह परमेश्वर जिसने हमें अनन्त जीवन की आशा दी है; वह सच्चा परमेश्वर है। आकाश और पृथ्वी टल जाएं परन्तु उसकी बातें नहीं टलेंगी।

4. इसहाक ने उस दिन सीखा कि परमेश्वर हमको जांचने वाला परमेश्वर है:- इस घटना से इसहाक ने उस दिन सीखा कि उसका पिता जिस परमेश्वर की उपासना करता है वह परमेश्वर हमको जांचता है। इस कारण हर जांच में हमको खरा उतरना है।

परमेश्वर अपने लोगों को जांचता है। परमेश्वर ने इब्राहीम को जांचा और उसके विश्वास की परीक्षा ली। पोतीफर के घर में परमेश्वर ने यूसुफ को जांचा। शरदक, मेशक और अबेद-नगो को परमेश्वर ने जांचा उस आग के भट्ठे में। दानिय्येल की जांच की परमेश्वर ने सिंहों की मांद में। एलिय्याह की जांच हुई जब वह करीत के नाले के पास गया और ढाई वर्षों तक करीत के नाले के पास ठहरा रहा क्योंकि परमेश्वर ने उससे कहा था। यहां तक कि नाले का पानी भी सूख गया मगर एलिय्याह वहीं ठहरा रहा। परमेश्वर ने पौलुस की जांच की पत्थरवाह किए जाने के समय, परमेश्वर ने उसकी जांच की जब वह बन्दीगृह में था। यहां तक कि लिखा है कि प्रभु यीशु मसीह भी मेरे और आपके समान परखा गया।

जब हमारी जांच होती है और उसमें हम खरे उतरते हैं तो हमारे जीवन की गवाही बड़ी सशक्त होती है और इससे परमेश्वर की महिमा होती है। इससे वास्तव में लोग इस बात को जानते हैं कि जो कुछ हम कह रहे हैं, हमारा जो विश्वास है, जो हमारा परमेश्वर है, वह सच्चा है।

मैं हमेशा अपने पिता के विषय में यह कहता हूं कि उन्होंने वर्षों प्रचार किया, बहुत-सी कलीसियाओं की स्थापना की, परन्तु जो कुछ उन्होंने प्रचारा था, उनकी मृत्यु से छः माह के समय में जिस प्रकार का जीवन उन्होंने जिया, उनकी सेवकाई पर वह उसकी मुहर थी। उस जीवन के कारण जो अन्त के छः माह उन्होंने जिया और जिस प्रकार मृत्यु को उन्होंने स्वीकार किया। जब हमारे जीवन में हमारी जांच होती है तो इस जांच से हमारी गवाही प्रखर होती है। वह जांच हमारे जीवन की गवाही पर, हमारे विश्वास पर मुहर लगाती है और हमें इस बात का अहसास होता है कि वास्तव में हम परमेश्वर के बेटे और बेटियां हैं।

5. इसहाक ने उस दिन सीखा कि जो हमें मिलता है वह नहीं परन्तु जो कुछ हम देते हैं वह हमारी गवाही बन जाता है:- जो हमें प्राप्त होता है वह नहीं परन्तु जो कुछ हम देते हैं वह हमारी गवाही बन जाता है। उसके पिता ने इतना त्याग किया कि अपने बेटे की मृत्यु के परीक्षण की सीमा तक वह विश्वासयोग्य रहा। अपने बेटे को देने के लिए भी वह तैयार था और इसलिए वह विश्वासियों का पिता कहलाया। परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने इकलौते पुत्र को इस संसार में हमारे लिए दे दिया, बलिदान कर दिया। मत्ती 16ः24-25 में प्रभु यीशु कहते हैं- यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए और मेरे पीछे हो ले। जो कोई अपना प्राण बचाना चाहेगा उसे खोएगा और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा वह उसे प्राप्त करेगा। लूका 14ः33 में इस प्रकार लिखा है- इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता।

वास्तव में परमेश्वर नहीं चाहता कि हमें जो कुछ उसने दिया है हम वह सब कुछ त्याग दें परन्तु वह यह चाहता है कि जब वह चाहे, तो उस बात को त्यागने के लिए हम तैयार हैं कि नहीं! परमेश्वर ने हमको धन दिया है, सम्पत्ति दी है, घर दिया है, स्त्रोत दिए हैं; क्या हम परमेश्वर के लिए उनको छोड़ने को तैयार हैं? अपने हृदय से क्या हम इस बात के लिए तैयार हैं कि अगर आज हमको सब कुछ छोड़ना पड़े तो हम उसके लिए छोड़ सकते हैं। जो कुछ हम लेते हैं वह नहीं परन्तु जो कुछ हम देते हैं, वह हमारी गवाही बन जाता है। उसी गवाही से लोग प्रभु यीशु मसीह के त्याग और उसके बलिदान को जानते हैं।

इसहाक ने सीखा कि उसके पिता के जीवन में पहला स्थान परमेश्वर का है। क्या हमारे जीवन में, हमारे परिवारों में पहला स्थान परमेश्वर का है?

इसहाक ने सीखा कि उसके पिता के जीवन में दोहरापन नहीं है। उसके पिता का विश्वास निष्कपट है। क्या हमारे बच्चे और हमारे लोग जब हमको देखते हैं तो उनको हमारे जीवन में दोहरापन दिखाई देता है? या वे देखते हैं कि हमारी कथनी और करनी में, हमारे विश्वास में, प्रभु यीशु मसीह के जीवन से हमारे जीवनों में कोई समानता है?

इसहाक ने सीखा कि उसके पिता का परमेश्वर सच्चा परमेश्वर है, वही मेरा और आपका भी परमेश्वर है। वह मुझसे और आपसे भी वायदे करता है, प्रतिज्ञाएं करता है, अपने पास बुलाता है, क्षमा देता है, अनन्त जीवन की आशा देता है। क्या हम उस सच्चे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं?

इसहाक ने सीखा कि परमेश्वर जांचने वाला परेश्वर है। जब सब कुछ सामान्य है तो हो सकता है कि हमारा मसीही जीवन बड़ा अच्छा दिखाई देता हो परन्तु जब हमारी नींव की परख होती है, जब तूफान आते हैं, जब समस्याओं से हम गुज़रते हैं। जब तनाव से हम गुज़रते हैं, जब मृत्यु की छाया से हम गुज़रते हैं, जब हमारी जांच होती है तब क्या हम परमेश्वर के सामने खरे और सच्चे हैं?

इसहाक ने सीखा कि जो मिलता है वह प्रमुख नहीं परन्तु जो हम देते हैं, वह परमेश्वर के लिए हमारी गवाही बन जाता है।

इसहाक अपने पिता के प्रति और इब्राहीम अपने स्वर्गीय पिता के प्रति विश्वासयोग्य रहा परन्तु क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर ने जब मेरे और आपके लिए इस संसार में उद्धार की योजना बनाई तो यह यहोवा परमेश्वर इब्राहीम से कहीं आगे तक चला गया। इब्राहीम ने तो उस छुरी को उठा लिया था और उसको मारने ही वाला था कि इब्राहीम को रोक दिया गया। परन्तु हमारे परमेश्वर ने तो प्रभु यीशु मसीह को मेरे और आपके कारण बलिदान कर दिया, अपने हाथ को रोका नहीं। क्रूस पर उस प्रभु यीशु मसीह ने मेरे और आपके लिए पीड़ा को सहा, मृत्यु को सहा, उसने मृत्यु का बपतिस्मा लिया। वह नर्क को देखकर आया और मृत्यु के बन्धनों को तोड़कर वह जीवित हो गया कि मैं और आप उसके साथ अनन्त निवास में रह सकें।

इब्राहीम से कहीं अधिक परमेश्वर ने मेरे और आपके लिए किया कि अपने इकलौते पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा। क्या उस प्रभु यीशु मसीह के बलिदान के योग्य हमारा जीवन है? क्या उस प्रभु यीशु मसीह के बलिदान के योग्य हमारी कलीसिया है? इन बातों पर हमें विचार करना है। हम जो माता-पिता हैं, हम जो कलीसिया के अगुवे हैं, हम जो मसीही सेवा में लगे हुए हैं; हमारे जीवनों को देखकर ही ये युवा अपने जीवन की दिशा निर्धारित करेंगे। काश! हमारे जीवनों में प्रभु यीशु मसीह की शोभा और उसका प्रेम दिखाई दे।

परमेश्वर आपको आशीष दे।