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मूसा का जीवन: तीन प्रमुख आयाम

मूसा का जीवन: तीन प्रमुख आयाम

संदर्भ: इब्रानियों 11ः23-29

पुराने नियम के चरित्रों में मूसा का नाम सबसे प्रमुखतम है। उन दिनों दुनिया के सबसे शक्तिशाली राजा से उसने टक्कर ली। उसने इतिहास में सबसे बड़े दल का नेतृत्व किया जिसमें बीस लाख इस्राएली थे। सीनै पर्वत पर परमेश्वर के नियमों का प्रकाशन मूसा को हुआ। परमेश्वर ने व्यवस्था के रूप में उसे दस आज्ञाएं दीं। एक नये राष्ट्र के निर्माण में उसने अगुवाई की और लगभग एक हज़ार वर्ष आगे की ओर वह देख सका। सबसे लम्बे समय तक वह बीस लाख इस्राएलियों के दल का नेतृत्व करता रहा। परमेश्वर की अगुवाई में बाइबिल की पहली पांच पुस्तकों का लेखन उसने किया। दुनिया के इतिहास में परमेश्वर की इतनी निकटता में कोई व्यक्ति नहीं रहा जितना कि मूसा। मूसा के जीवन में ऐसी कौन-सी बात थी, मूसा में ऐसे कौन से विशेष गुण थे।

हमें मूसा के जीवन में बहुत से आयाम देखने को मिल सकते हैं परन्तु बाइबिल में इब्रानियों की कलीसिया के नाम अपने पत्र में लेखक मूसा के जीवन के कुछ गुणों के विषय में बताता है। हम इनमें से तीन बातों पर ग़ौर करें कि हम भी अपने जीवन में इन बातों को ला सकें।

1. उसमें चुनौती को स्वीकार करने की हिम्मत थी:- इब्रानियों का लेखक अपनी पत्री के ग्यारहवें अध्याय के 24 से 26 पदों में लिखता है “विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया। इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुख भोगना और उत्तम लगा। और मसीह के कारण निन्दित होने को मिसर के भण्डार से बड़ा धन समझा क्योंकि उसकी आंखें फल पाने की ओर लगीं थी”।

हम सरल और आसान रास्ते ढूंढते हैं। जीवन में कठिनाइयों से बचने की कोशिश करते हैं। परन्तु प्रभु यीशु कहते हैं “चौंड़ा है वह मार्ग और चाकल है वह फाटक जो विनाश को जाता है और बहुतेरे हैं जो उस पर चलते हैं, संकरा है वह मार्ग जो अनन्त जीवन को जाता है और थोड़े हैं जो उस पर चलते हैं”। पौलुस कहता है “जितने भक्ति का जीवन जीना चाहते हैं वे सब सताए जावेंगे”। यीशु ने कहा दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं हो सकता। मैंने दुःख उठाया है, क्रूस उठाया है- जो मेरे पीछे चलना चाहे वह अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।

हमें भय है कि कल क्या होगा? मसीहियों का क्या होगा? जब अधर्मियों का राज्य आएगा, नये हेरोदेस गद्दी पर बैठेंगे, नये गोलियत चुनौती देंगे, जब बीमारी, महामारी, दुर्घटनाएं आएंगी; तब हमारा क्या होगा? परन्तु अगर हम ईश्वर के लोग हैं, हमारा उस पर अटल विश्वास है तब हम मूसा के समान चुनौतियों को स्वीकारेंगे। मूसा में चुनौतियों को स्वीकार करने की हिम्मत थी। कठिन राह को चुनने की हिम्मत थी। हम मसीहियों को उसके जीवन से यही सीखना है कि हम भी चुनौतियों को स्वीकारें।

2. उसके पास अदृश्य को देखने वाली नज़र थी:- सत्ताइसवें पद में लिखा है “विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उसने मिसर को छोड़ दिया क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा”। लोगों को फिरौन की सेना उसका प्रभाव और शक्ति दिखाई देती थी। परन्तु मूसा परमेश्वर की अनदेखी सामर्थ्य को देखता था। बाइबिल में निर्गमन की पुस्तक के तीसरे अध्याय में वर्णन है जब परमेश्वर ने मूसा को बुलाया। मूसा को जलती झाड़ी दिखाई दे रही थी परन्तु उस झाड़ी में वह परमेश्वर के दर्शन और उसकी बुलाहट को देख सका। निर्गमन की पुस्तक के उन्नीसवें अध्याय में वर्णन है कि लोगों ने बादल गरजने की आवाज़ सुनी, बिजली की चमक को देखा, नरसिंगे का बड़ा शब्द सुना, परन्तु मूसा जान गया कि यह ईश्वर की ओर से संकेत है। वह जान गया कि परमेश्वर बात करना चाहता है, दिशा-निर्देश देना चाहता है, चेतावनी देना चाहता है।

बाइबिल में दूसरा राजा की पुस्तक में एक घटना का वर्णन है। जब आराम के राजा को पता चलता है कि इस्राएलियों को बचाने में एलीशा के आश्चर्यकर्मों का हाथ है। उस समय एलीशा दोतान नगर में था। उस घटना के सन्दर्भ में लिखा है “तब उसने वहां घोड़ों और रथों समेत एक भारी दल भेजा, और उन्होंने रात को आकर नगर को घेर लिया। भोर को परमेश्वर के भक्त का टहलुआ उठा और निकलकर क्या देखता है कि घोड़ों और रथों समेत एक दल नगर को घेरे हुए पड़ा है। और उसके सेवक ने उससे कहा, हाय! मेरे स्वामी, हम क्या करें? उसने कहा मत डर; क्योंकि जो हमारी ओर हैं; वह उनसे अधिक हैं; जो उनकी ओर हैं। तब एलीशा ने यह प्रार्थना की, हे यहोवा, इसकी आंखें खोल दे कि यह देख सके। तब यहोवा ने सेवक की आंखे खोल दीं, और जब वह देख सका, तब क्या देखा, कि एलीशा के चारों ओर का पहाड़ अग्निमय घोड़ों और रथों से भरा हुआ है” (2 राजा 6ः14-17)। सेवक ने शक्तिशाली सेना को देखा। परन्तु एलीशा ने परमेश्वर की अनदेखी सामर्थ्य को देखा और उस पर विश्वास किया।

पौलुस प्रेरित कुरिन्थ की कलीसिया के नाम अपने पत्र में लिखता है “हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं वरन् अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं”।

आज हमारे जीवन में क्या प्रमुख है? देखा हुआ सच या अनदेखा सच। हम लोगों को कैसे देखते हैं? यीशु ने अपनी अन्तर्दृष्टि के द्वारा साधारण लोगों में छिपी सम्भावनाओं को देखा। उसने साधारण मछुवों, पापिनी स्त्री, महसूल लेने वाले मत्ती और मसीहियों के संहारक शाऊल में देखा कि ये लोग परमेश्वर की योजना के महत्वपूर्ण अंग बन सकते हैं। हम अपने जीवन की समस्याओं को कैसे देखते हैं? आवश्यकता है कि हम जीवन के देखे हुए सच के साथ अनन्त जीवन के अनदेखे सच को भी देखें। हम परमेश्वर की अनदेखी सामर्थ्य को देखें। मूसा के समान हमारी दृष्टि अनदेखे की ओर लगी रहे क्योंकि “देखी हुई वस्तुएं तो थोड़े दिन की हैं परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं”।

3. उसमें असम्भव को सम्भव करने का विश्वास था:- अठ्ठाइसवें और उन्तीसवें पद में लिखा है “विश्वास से ही उसने फसह और लोहू छिड़कने की विधि मानी, कि पहिलौठों का नाश करने वाला इस्राएलियों पर हाथ न डाले। विश्वास ही से वे लाल समुद्र के पार ऐसे उतर गए, जैसे सूखी भूमि पर से, और जब मिस्त्रियों ने वैसा ही करना चाहा, तो सब डूब मरे”। मूसा एक साधारण मनुष्य था। जब परमेश्वर ने उसे दर्शन दिया, उस समय वह अपने ससुर की भेड़ बकरियां चरा रहा था। वह बोलने में हकलाता था। परमेश्वर ने उसे उसकी क्षमताओं से अधिक करने के लिए कहा। ऐसा कार्य सौंपा जो उसकी योग्यताओं की सीमा से अधिक बड़ा था। मूसा ने उसे स्वीकार कर लिया।

जब परमेश्वर हमें बुलाता है, हमें अपना कार्य देता है तब हम स्वयं को देखते हैं। हम अपनी योग्यताओं और अयोग्यताओं को देखते हैं। हम अपने स्त्रोतों और सामर्थ्य को देखते हैं। इस कारण बहुधा हम पीछे हट जाते हैं। परन्तु यदि परमेश्वर बुलाता है तो सामर्थ्य भी देता है। अगर वह एक द्वार खोलता है तो गुज़रने की सामर्थ्य भी देता है।

अक्सर हम परमेश्वर के लिए कुछ नहीं कर पाते क्योंकि हमारी नज़र परमेश्वर पर कम और स्वयं पर ज्य़ादा जाती है।

एक हकलाने वाला आदमी जब परमेश्वर की बुलाहट को स्वीकार करता है तब वह शक्तिशाली फिरौन के आगे पुकारता है “मेरे लोगों को जाने दे”। जब लाल समुद्र आता है तब उसमें अपने दल के साथ ऐसे उतर जाता है मानो सूखी भूमि हो। हमें तो बेजान लाठी दिखाई देती है पर उसमें परमेश्वर की सामर्थ्य है। शिमशोन के पास गदहे के जबड़े की सूखी हड्डी थी जिससे उसने हज़ारों पलिश्तियों को मार दिया।

लाल समुद्र बंट जाता है, मन्ना बरसने लगता है, चट्टान से पानी का सोता फूट निकलता है, विरोधियों पर आकाश से आग बरसती है। ऐसा असम्भव कार्य मूसा के विश्वास से सम्भव हुआ। उसकी आज्ञाकारिता से सम्भव हुआ। परमेश्वर की बुलाहट पर उसकी उपलब्धता के कारण सम्भव हुआ।

हमने देखा कि मूसा में चुनौतियों को स्वीकार करने की हिम्मत थी। उसमें अदृश्य को देखने की दृष्टि थी। उसमें असम्भव को सम्भव करने का विश्वास था। हम भी परमेश्वर पर विश्वास रखें। उसकी बुलाहट को सुनें, उसकी आज्ञाओं को मानें। निश्चित रूप से परमेश्वर हमारे जीवनों में और जीवनों से आश्चर्यकर्म करेगा।

परमेश्वर आपको आशीष दे।