Background

मृत्यु और हमारा सन्देह

मृत्यु और हमारा सन्देह

संदर्भ: 1 कुरिन्थियों 15ः51-56

“देखो, मैं तुम से भेद की बात कहता हूं; कि हम सब तो नहीं सोएंगे, परन्तु सब बदल जाएंगे। और यह क्षण भर में, पलक मारते ही पिछली तुरही फूंकते ही होगा: क्योंकि तुरही फूंकी जाएगी और मुर्दे अविनाशी दशा में उठाए जाएंगे, और हम बदल जाएंगे। क्योंकि अवश्य है, कि यह नाशमान देह अविनाश को पहिन ले, और यह मरनहार देह अमरता को पहिन ले। और जब यह नाशमान अविनाश को पहिन लेगा, और यह मरनहार अमरता को पहिन लेगा, तब वह वचन जो लिखा है, पूरा हो जाएगा, कि जय ने मृत्यु को निगल लिया। हे मृत्यु तेरी जय कहां रही? हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्यवस्था है” (1 कुरिन्थियों 15ः51-56)।

अपने जीवन में मृत्यु की बात हम सब सोचते हैं, जब हमारे किसी प्रिय की मृत्यु होती है तो हम विचलित होते हैं। मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि किसी के विवाह में भले ही न जा पाएं परन्तु जब किसी अपने की मृत्यु हो तो वहां अवश्य उपस्थित होना चाहिए। जब हम वहां उपस्थित होते हैं तो अक्सर हमारे मनों में भी यह विचार आता है कि एक दिन आने वाला है, जब हमारी भी मृत्यु होगी। जब हमारी मृत देह के इर्द-गिर्द हमारे प्रिय लोग जमा होंगे, जब हमारे अपने लोग, हमारी कलीसिया के लोग यह स्मरण करेंगे कि हमने अपने जीवन में क्या किया? यह प्रश्न मन में आना बड़ा स्वाभाविक है क्योंकि प्रत्येक मनुष्य को मृत्यु से होकर गुज़रना अवश्य है। मनुष्य जन्म को तो टाल सकता है परन्तु मृत्यु को नहीं।

बाइबिल में दो ऐसे लोगों का वर्णन है, जिन्हें सशरीर उठा लिया गया और जिन्होंने मृत्यु का स्वाद नहीं चखा। इनमें से एक हनोक है और दूसरा एलिय्याह। 2 राजा 2ः1-12 में इस घटना का वर्णन है कि एलिय्याह के उठाए जाने का समय आ गया था। उसके साथ उसका आत्मिक पुत्र एलीशा भी था। ऐसा लगता है कि जैसे एलिय्याह को इस बात का अहसास था कि यह उसकी ज़िन्दगी का अन्तिम दिन है। तब एलिय्याह गिलगाल से अपनी यात्रा प्रारम्भ करता है। जब वह यात्रा प्रारम्भ करता है तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे एलिय्याह चाहता है कि वह अकेला इस परिस्थिति से गुज़रे, अकेला इस अनुभव से गुज़रे। ऐसा प्रतीत होता है कि वह चाहता है कि अकेला किसी अन्जान जगह में चला जाए और वहां से उसे उठा लिया जाए, किसी को उसकी मृत्यु का पता भी न चले। परन्तु एलीशा उससे कहता है कि मैं अपने जीवन की सौगन्ध खाकर कहता हूं कि मैं तुझे नहीं छोड़ूंगा, मैं तेरे साथ-साथ चलूंगा। वे दोनों गिलगाल से अपनी यात्रा प्रारम्भ करके बेतेल में आते हैं। बेतेल के भविष्यवक्ता एलीशा से कहते हैं कि क्या तू नहीं जानता कि एलिय्याह आज उठा लिया जावेगा। उसके बाद वे दोनों यरीहो आते हैं और यरीहो में रहने वाले भविष्यवक्ता भी एलीशा से कहते हैं कि क्या तू नहीं जानता कि एलिय्याह के उठा लिए जाने का समय हो गया है। एलीशा उनसे कहता है कि शान्त रहो, मुझे यह मालूम है। इसके बाद वे दोनों यरदन नदी के किनारे पर पहुंचते हैं। जब यरदन नदी सामने आती है तो एलिय्याह अपनी चादर निकालता है, और यरदन के पानी पर मारता है। यरदन नदी का जल दो भागों में विभाजित हो जाता है और वे दोनों नदी पार करके चले जाते हैं।

एलीशा अभी भी एलिय्याह के साथ था। उसके बाद हम पाते हैं कि जैसे ही वे यरदन को पार करते हैं, अग्निमय घोड़ों के साथ एक अग्निमय रथ स्वर्ग से उतरता है और एक बवण्डर के साथ एलिय्याह को अपने साथ लेकर और एलीशा को अलग करके स्वर्ग चला जाता है। हम पाते हैं कि जैसा एक पुत्र को अपने पिता के जाने पर शोक होता है वैसा ही शोक एलीशा को होता है।

ऐसा ओजस्वी, आकर्षक, भव्यता और दिव्यता से भरा हुआ दृश्य। जो कुछ घटित हुआ वह मानो पलक झपकते ही हो गया। एक क्षण में एलिय्याह धरती पर था, दूसरे ही क्षण वह स्वर्ग में पहुंच गया। एक क्षण एलिय्याह एलीशा के साथ था, दूसरे ही क्षण वह परमेश्वर के पास पहुंच गया।

परमेश्वर को क्या आवश्यकता थी कि यह घटना एलिय्याह के जीवन में घटित हो? आज हज़ारों वर्षों के बाद मुझे और आपको परमेश्वर इस घटना से क्या सन्देश देना चाहता है? इस सम्बन्ध में तीन बातों को हम देखेंगे।

1. यह घटना एलिय्याह के विश्वासयोग्य जीवन का परिणाम है। अग्निमय घोड़ों और अग्निमय रथ पर सवार एलिय्याह बवण्डर के साथ स्वर्ग में उठा लिया गया। यह घटना एलिय्याह के विश्वासयोग्य जीवन का परिणाम है। वह परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य था। मसीही जीवन में विश्वासयोग्यता एक आधारभूत बात है अर्थात् हम यह कह सकें कि परमेश्वर मेरी इच्छा यह है कि चाहे मैं तेरी आज्ञाओं को समझूं या न समझूं, तेरी योजना को समझूं या न समझूं, मेरे जीवन में जो परिस्थिति आए उसका विश्लेषण कर सकूं या न कर सकूं, जो त्रासदियां, जो समस्याएं आएं, जो अनापेक्षित आए; उसका हल मुझे सूझे या न सूझे परन्तु मैं हर परिस्थिति में, हर पल, हर क़दम में तुझ पर अटूट विश्वास रख सकूं। मैं अपनी इच्छा नहीं परन्तु तेरी इच्छा पूरी कर सकूं, मैं अपने जीवन में अपने हित के लिए नहीं परन्तु तेरे राज्य की बढ़ती के लिए सही निर्णय कर सकूं। एलिय्याह के जीवन में यह बात हमें दिखाई पड़ती है कि वह विश्वासयोग्यता का जीवन जीता रहा। परमेश्वर का आदेश, परमेश्वर की आज्ञाएं भले ही उसकी समझ से परे थीं फिर भी परमेश्वर ने जैसा उससे कहा, वैसा ही उसने पालन किया।

परमेश्वर ने एलिय्याह से कहा कि आहाब राजा के पास जा और उससे कह कि तेरे देश में अकाल पड़ने वाला है। एलिय्याह सोचता होगा कि मान लो अगर परमेश्वर की इच्छा बदल गई या लोग बदल गए और अकाल न पड़ा तो मेरी क्या हालत होगी? मेरी क्या हैसियत कि मैं राजा आहाब के सामने खड़ा हो सकूं, उसे चुनौती दे सकूं? उसे परमेश्वर का वचन सुना सकूं? मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं? परन्तु एलिय्याह ने वैसा ही किया जैसा परमेश्वर ने उससे कहा था। उसने अपनी स्थिति को, अपनी अक्षमता को, अपनी सीमाओं को नहीं देखा परन्तु जैसा परमेश्वर ने कहा था उसने वैसा ही किया।

उसके बाद हम पाते हैं कि एलिय्याह दो वर्ष तक करीत नाले के पास छिपा रहा। उस दौरान उसे परमेश्वर का कोई आदेश प्राप्त नहीं हुआ। एलिय्याह उस बियाबान में अकेलेपन की स्थिति में, नाले के पास प्रतीक्षा करता रहा। उसके बाद फिर करीत का नाला भी सूख गया। जब करीत का नाला सूख गया तब कौओं ने एलिय्याह को रोटी खिलाई, ऐसे समय में भी एलिय्याह ने कहा कि परमेश्वर मेरी नहीं परन्तु तेरी इच्छा पूरी हो। फिर दो वर्ष की प्रतीक्षा के बाद परमेश्वर की आवाज़ उस तक पहुंची। एलिय्याह आनन्द और उत्साह से भर गया होगा कि परमेश्वर आज मुझसे बातें कर रहा है, आज मुझे निर्देश दे रहा है, बता रहा है कि कहां जाना है; मैं इस नाले से, इस बियाबान से, इस अकेलेपन की अवस्था से निराश हो चुका हूं। परन्तु परमेश्वर का निर्देश उसे मिलता है कि सारपत नगर को जा (1 राजा 17)। वहां जाकर एक गरीब विधवा से भोजन मांग। एलिय्याह को लगा होगा कि यह कैसी अजीब सी बात है, भला इसमें क्या आश्चर्यकर्म हो सकता है कि परमेश्वर मुझे एक गरीब विधवा से भोजन मांगने का आदेश दे रहा है।

परन्तु परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार एलिय्याह उस विधवा के पास जाता है और उससे भोजन मांगता है। जब वह विधवा एलिय्याह को भोजन कराती है, तब उसके बाद न उसके घड़े का मैदा घटता है और न कुप्पी का तेल कम होता है। वहां परमेश्वर का आश्चर्यकर्म होता है। उसके बाद हम पाते हैं कि उस विधवा के पुत्र की मृत्यु हो जाती है। उस परिस्थिति में एलिय्याह परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार फिर वहां जाता है। विश्वास के साथ वह प्रार्थना करता है और वह जवान जीवित हो जाता है। उस परिवार में एक आश्चर्यकर्म होता है।

उसके बाद फिर परमेश्वर आदेश देता है कि पर्वत के ऊपर जा और बाल देवता के जो 450 उपासक हैं, उनको चुनौती दे। यहां पर एलिय्याह के रूप में सिर्फ़ एक व्यक्ति है जो परमेश्वर के नियमों को लेकर ईमानदारी से और सच्चाई से परमेश्वर की सामर्थ्य पर विश्वास करते हुए 450 झूठे उपासकों के सामने खड़ा हुआ है। परमेश्वर आश्चर्यकर्म करता है और 450 झूठे उपासक पराजित हो जाते हैं, यहां तक कि उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।

हम पाते हैं कि ऐसे समय में मानो उसका जीवन दांव पर लग गया था। सांसारिक दृष्टिकोण से देखें तो उसके साथ कुछ भी अनिष्ट घटित हो सकता था परन्तु जैसा परमेश्वर ने कहा था उसने वैसा ही किया। इसके बाद हम पाते हैं कि इज़ेबेल रानी एलिय्याह के पीछे पड़ जाती है। तब एलिय्याह घबरा जाता है क्योंकि वह एक साधारण मनुष्य भी था। वह इतनी घोर निराशा की स्थिति में पहुंच जाता है कि परमेश्वर से अपने लिए मृत्यु मांग लेता है।

कई बार हम ऐसे अनुभव से गुज़रते हैं और हमें लगता है कि ऐसे जीवन से तो मर जाना बेहतर है। उस घोर निराशा की स्थिति में परमेश्वर एलिय्याह को कार्य देता है कि जा और मेरे सेवकों और भविष्यवक्ताओं को प्रशिक्षित करने का कार्य आरम्भ कर। उस घोर निराशा की स्थिति से उठकर एलिय्याह एक नया कार्य शुरू करता है। वह परमेश्वर के लोगों, उपदेशकों और उसके भविष्यवक्ताओं को प्रशिक्षण देने का काम प्रारम्भ करता है। उसके बाद परमेश्वर उससे कहता है कि जा और आहाब राजा से कह दे कि वह कैसी भयानक मौत से मरने वाला है क्योंकि उसने ऐसा घृणित काम किया है। यद्यपि एलिय्याह ने सोचा होगा कि यह कैसा आदेश है परन्तु फिर भी वह राजा के सामने परमेश्वर का सन्देश लेकर जाता है।

इन सब परिस्थितियों से गुज़रते हुए भी एलिय्याह परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बना रहा। धैर्य से 2 साल तक एक-एक दिन इन्तज़ार करके, विनम्रता से, सहनशीलता से, परमेश्वर के लिए अकेला खड़ा होकर संघर्ष करता हुआ वह जीवन के अन्त तक विश्वासयोग्य बना रहा। परमेश्वर ने उसकी विश्वासयोग्यता का फल उसे दिया कि स्वर्ग से अग्निमय रथ और अग्निमय घोड़े आकर बवण्डर के साथ एलिय्याह को उठाकर ले गए।

हमारे साथ जब तक सब कुछ ठीक है, तब तक हम भी विश्वासयोग्य रहते हैं। जब तक सब कुछ अच्छा हो, तब तक हम भी परमेश्वर से प्रेम कर रहे होते हैं। जब तक हमारी इच्छा पूरी हो रही हो, तब तक हम भी विश्वास में बने रहते हैं। जब तब सब कुछ सुखद हो, जब तब सब तरफ सम्पन्नता हो, जब पर्याप्त धन हो, जब अच्छा स्वास्थ्य हो; तो हम विश्वासयोग्य बने रहते हैं। परन्तु हमारी विश्वासयोग्यता की परख तब होती है जब जीवन में असाध्य रोग आ जाता है, जब किसी प्रिय की मृत्यु हो जाती है, जब हम किसी त्रासदी से गुज़रते हैं, जब हम असफल हो जाते हैं, जब हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होता। जब हमारे अपने बच्चे हमारे साथ विश्वासघात कर जाते हैं, जब मसीह के सेवक कहलाने वाले लोग, परमेश्वर के बड़े-बड़े लोग हमें निराश कर देते हैं। क्या उस समय भी हम परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रह पाते हैं?

प्रकाशितवाक्य 2ः10 ब में लिखा है - “प्राण देने तक विश्वासयोग्य रह तो तुझे जीवन का मुकुट मिलेगा”।

अर्थात् जीवन के अन्तिम क्षण तक विश्वासयोग्य रह तो मैं स्वर्ग में तेरा सम्मान करूंगा, तुझे जीवन का मुकुट दूंगा।

2. यह घटना आज भी विश्वासियों के लिए एक गवाही का कारण है। यह घटना जब घटी तो एलीशा वहां उपस्थित था और तब से लेकर आज तक यह घटना हम सब विश्वासियों के लिए एक गवाही का कारण बनी है। किस बात की गवाही? गवाही इस बात की कि किसी विश्वासी के लिए मृत्यु हानि की नहीं परन्तु लाभ की बात है। गवाही इस बात की कि यह ज़िन्दगी ही सब कुछ नहीं है, इस ज़िन्दगी के उस पार भी एक बेहतर ज़िन्दगी है, एक बेहतर जीवन है, एक बेहतर स्थान है, एक बेहतर संसार है। गवाही इस बात की कि पलक झपकते ही हम उस संसार में होंगे जो परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए, मेरे और आपके लिए तैयार किया है। एक दिन ऐसा आएगा कि जब परमेश्वर अपना हाथ बढ़ाकर, अपनी बड़ी दया से, अपने बड़े प्रेम से, अपने बड़े अनुग्रह से हमको अपने आगोश में ले लेगा और यह मृत्यु हमारे लिए आशीष का कारण ठहरेगी।

वचन में हम पाते हैं:

“इसलिये हम ढाढ़स बान्धे रहते हैं, और देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं” (2 कुरिन्थियों 5ः8)।

“यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है, वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा” (यूहन्ना 11ः25-26)।

“और मैं ने स्वर्ग से यह शब्द सुना; कि लिख; जो मुरदे प्रभु में मरते हैं, वे अब से धन्य हैं, आत्मा कहता है, हां, क्योंकि वे अपने परिश्रमों से विश्राम पाएंगे, और उन के कार्य उन के साथ हो लेते हैं” (प्रकाशित वाक्य 14ः13)।

“यहोवा के भक्तों की मृत्यु, उसकी दृष्टि में अनमोल है” (भजन संहिता 116ः15)।

“क्योंकि हम जानते हैं, कि जब हमारा पृथ्वी पर डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा, जो हाथों से बना हुआ घर नहीं, परन्तु चिरस्थाई है” (2 कुरिन्थियों 5ः1)।

अपने सारे बेटे-बेटियों की त्रासदीपूर्ण मृत्यु, अपनी सारी सम्पत्ति के चले जाने, अपने शरीर के टूट जाने के बाद भी अय्यूब ने गवाही दी -

“मुझे तो निश्चय है कि मेरा छुड़ाने वाला जीवित है, और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा। और अपनी खाल के इस प्रकार नाश हो जाने के बाद भी, मैं शरीर में होकर ईश्वर का दर्शन पाऊंगा” (अय्यूब 19ः25-26)।

“मृत्यु का दिन जन्म के दिन से उत्तम है” (सभोपदेशक 7ः1)।

एलिय्याह अग्निमय रथ, अग्निमय घोड़ों और बवण्डर के साथ उठा लिया गया और यही आशा मेरे और आपके लिए भी है। यही निश्चितता मेरे और आपके लिए भी है। परमेश्वर की यही प्रतिज्ञा मेरे और आपके लिए भी है।

3. यह घटना हमें बताती है कि हम अपना ध्यान अनन्त की ओर लगाए रखे। एलीशा ने जब यह दृश्य देखा होगा तो वह इस बात को कभी भूल नहीं सका होगा! वह सोचता होगा कि एलिय्याह का अन्त ऐसा महिमामय हुआ, ऐसा दिव्यतापूर्ण हुआ, इतने आलोक से, इतनी ज्योतियों से परिपूर्ण! तो मेरा अन्त कैसा होगा?

पौलुस स्वर्ग को देखता है और कहता है कि मैं जानता हूं कि यह मेरा डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा और वह महिमामय भवन मिलेगा। यूहन्ना ने स्वर्ग को देखा और वह अनन्त जीवन की, स्वर्ग की निश्चितता की बातें करता है। प्रकाशितवाक्य में वह स्वर्ग की बात करता है; जहां न धूप है, न तपन है, न शोक है, न मृत्य है, न विलाप है, न विछोह है, न आंसू हैं।

वह स्थान जहां हमें अपना अनन्त गुज़ारना है। जहां हमारी यात्रा समाप्त होगी, जो हमारी मंज़िल है, जो हमारे जीवन की नियति है, जो स्थान परमेश्वर ने अपने हाथों से तैयार किया है, जिस पर प्रभु यीशु मसीह ने अपना रक्त बहाकर निश्चितता की मुहर लगा दी है। प्रभु यीशु मसीह ने अपने बलिदान के द्वारा हमारे लिए वहां जाने का द्वार खोल दिया है, जहां हमारे प्रिय हैं, जहां हमारा परमेश्वर है। क्या यह ज़रूरी नहीं है कि हम अपना ध्यान उस स्थान अर्थात् स्वर्ग पर लगाएं?

वचन में लिखा है:-

“सो जब तुम मसीह के साथ जिलाए गए, तो स्वर्गीय वस्तुओं की खोज में रहो, जहां मसीह वर्तमान है और परमेश्वर के दाहिनी ओर बैठा है। पृथ्वी पर की नहीं परन्तु स्वर्गीय वस्तुओं पर ध्यान लगाओ” (कुलुस्सियों 3ः1-2)।

“और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं” (2 कुरिन्थियों 4ः18)।

आगे वचन में लिखा है - “इन बातों के कोई आठ दिन बाद वह पतरस और यूहन्ना और याकूब को साथ लेकर प्रार्थना करने के लिए पहाड़ पर गया। जब वह प्रार्थना कर ही रहा था, तो उसके चेहरे का रूप बदल गया: और उसका वस्त्र श्वेत होकर चमकने लगा। और देखो, मूसा और एलिय्याह, ये दो पुरुष उसके साथ बातें कर रहे थे। वे महिमा सहित दिखाई दिए; और उसके मरने की चर्चा कर रहे थे, जो यरूशलेम में होने वाला था” (लूका 9ः28-31)।

अग्निमय रथ में एलिय्याह के उठाए जाने के बाद 800 वर्ष बीत गए और इन 800 वर्षों के बाद प्रभु यीशु मसीह के रूपान्तरण की इस अद्भुत घटना के समय स्वर्ग में एलिय्याह उस समय भी है। परमेश्वर की योजना को पूरा करने में एलिय्याह लगा हुआ है। प्रभु यीशु मसीह के साथ एलिय्याह धरती पर उतर आया है। प्रभु यीशु मसीह के सामने उस पर्वत पर एलिय्याह खड़ा हुआ है। महिमामय स्वरूप में प्रभु यीशु मसीह से बातें कर रहा है। मूसा भी साथ में खड़ा है, यहां तक कि चेलों ने भी पहचान लिया कि ये एलिय्याह और मूसा हैं जो प्रभु यीशु के साथ खड़े हैं।

अक्सर हम आश्चर्य करते हैं कि क्या हम स्वर्ग में एक-दूसरे को पहचान पाएंगे? हां, हम एक-दूसरे को पहचान पाएंगे। हम उन्हें भी पहचान पाएंगे जिनको हमने कभी नहीं देखा। इन चेलों ने एलिय्याह और मूसा को कभी नहीं देखा था परन्तु वे उन्हें पहचान गए। स्वर्ग में हमारा अनन्तकाल का जीवन होगा, स्वर्ग में हम अपनों को, इन विशेष लोगों को और परमेश्वर को देख सकेंगे। उनसे बातें कर सकेंगे। स्वर्ग निष्क्रियता का स्थान नहीं है, स्वर्ग सक्रियता का स्थान है।

लिखा हुआ है कि मूसा और एलिय्याह प्रभु यीशु के साथ उन बातों की चर्चा कर रहे थे जो कि शीघ्र ही यरूशलेम में घटित होने वाली थीं। लूका 9ः31 में लिखा है कि वे उसके “मरने की” चर्चा कर रहे थे। (बाइबिल में इस अध्याय के नीचे फुटनोट में लिखा है... “विदा होने की”)। विदा होकर व्यक्ति अपने घर जाता है, विदा होकर व्यक्ति परदेश से स्वदेश लौटता है, विदा होकर अपने धाम को, अपने देश को लौटता है।

स्वर्ग में हमारे लिए पुरस्कार एवं सम्मान है। हम प्रतिदिन टेलीविजन में, अखबारों में बड़े-बड़े अवाॅर्ड समारोहों के बारे में पढ़ते हैं। हम निश्चय ही सोचते होंगे कि यहां तो बड़े-बड़े लोग हैं, बड़े-बड़े नाम हैं, बड़े-बड़े पद हैं, बड़े-बड़े हीरो-हीरोइन्स हैं, कहीं फिल्मों के अवाॅर्ड हैं, कहीं नोबेल पुरस्कार हैं, बड़ी-बड़ी मैग्ज़ीन्स हैं, बड़ा मान-सम्मान है, बड़ी चमक-दमक है, बड़ा ग्लैमर है, बड़ी-बड़ी बातें हैं। परन्तु क्या होगा अनन्त? कैसा होगा उनका अनन्त?

वचन में प्रतिज्ञा है कि अब जो प्रभु यीशु मसीह में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। विश्वासी की मृत्यु परमेश्वर की दृष्टि में अनमोल है। परमेश्वर ने तैयारी कर ली है, उसने हमारे लिए भवन तैयार कर दिया है।

क्या होगा जब हमारी मृत्यु होगी? क्या होगा जब हम विदा होंगे? स्वर्ग के दूत होंगे, परमेश्वर का हाथ होगा, प्रभु यीशु मसीह की बांहें होंगी, और उसका खूबसूरत रथ होगा। मृत्यु का नहीं परन्तु जीवन का संगीत होगा, दुःख का नहीं परन्तु खुशी का गीत होगा। मेरी प्रार्थना है कि हम ऐसे स्थान में जाने के लिए अपनी तैयारी अवश्य कर लें। हमारे जीवन में कोई सन्देह न हो।

परमेश्वर आपको आशीष दे।