संदर्भ: नहेमायाह 4ः4-9
“हे, हमारे परमेश्वर सुन ले, कि हमारा अपमान हो रहा है; और उनका किया हुआ अपमान उन्हीं के सिर पर लौटा दे, और उन्हें बन्धुवाई के देश में लुटवा दे। और उनका अधर्म तू न ढांप, और न उनका पाप तेरे सम्मुख से मिटाया जाए; क्योंकि उन्होंने तुझे शहरपनाह बनाने वालों के साम्हने क्रोध दिलाया है। और हम लोगों ने शहरपनाह को बनाया; और सारी शहरपनाह आधी ऊंचाई तक जुड़ गई। क्योंकि लोगों का मन उस काम में नित लगा रहा। जब सम्बल्लत और तोबियाह और अरबियों, अम्मोनियों और अशदोदियों ने सुना, कि यरूशलेम की शहरपनाह की मरम्मत होती जाती है, और उस में के नाके बन्द होने लगे हैं, तब उन्होंने बहुत ही बुरा माना; और सभों ने एक मन से गोष्ठी की, कि जाकर यरूशलेम से लड़ें, और उस में गड़बड़ी डालें। परन्तु हम लोगों ने अपने परमेश्वर से प्रार्थना की, और उनके डर के मारे उनके विरुद्ध दिन रात के पहरुए ठहरा दिए” (नहेमायाह 4ः4-9)। बाइबिल की इस पुस्तक में हम पाते हैं कि नहेमायाह सम्भवतः अपने जीवन के मध्यकाल में है। वह आराम से राजमहल में रहता है। राजा की सेवा करता है, राजा का विश्वासपात्र और अपने परिवार के साथ परमेश्वर की निकटता में चलने वाला व्यक्ति है। सब कुछ निर्बाध गति से चल रहा है परन्तु फिर कुछ घटता है, कुछ लोग यहूदा प्रान्त से नहेमायाह से मिलने के लिए आते हैं, जो यरूशलेम की स्थिति से परिचित हैं। नहेमायाह समय निकालकर उनसे राजमहल में मिलता है और उनसे पूछता है कि हमारे देश का, हमारे गांव का क्या हाल है। वे लोग बताते हैं कि जो लोग बन्धुवाई में ले जाए गए, उनकी दुर्दशा हो रही है। फाटक जले हुए हैं और शहरपनाह टूट गई है। नहेमायाह का हृदय टूट जाता है, वह घुटनों पर जाता है, प्रार्थना करता है, आंसू बहाता है और मानो परमेश्वर उससे बातें करता है। तब नहेमायाह राजा के पास जाकर मिलता है, उससे अधिकार पत्र लेकर वहां से यरूशलेम की शहरपनाह को बनाने के मिशन पर, एक बड़ी योजना को पूरी करने के लिए निकल जाता है। उसके बाद हम जानते हैं कि यरूशलेम की शहरपनाह के निर्माण में लोग उसके साथ जुड़ने लगे और उसकी मदद करने लगे। बड़े-बड़े लोग भी जुड़े और सामान्य लोग भी जुड़ गए और निर्माण के सब प्रकार के कामों को करने लगे। लोग अपने हाथों से परिश्रम करने लगे, परमेश्वर के उस कार्य को जो उसने ठहराया था, पूरा करने लगे। परन्तु बात निर्माण कार्य में साथ देने वालों तक ही सीमित नहीं थी किन्तु वहां कुछ लोग ऐसे भी थे जो उसका विरोध करते हैं। नहेमायाह को समस्याओं का सामना करना पड़ा, आलोचनाओं से गुज़रना पड़ा। उसके खिलाफ षड़यंत्र रचे गए, उसकी हत्या करने की साज़िश की गई। आज भी इस प्रकार की बुराइयां हम संसार में देखते हैं। मसीही लोगों को विरोध की परिस्थितियों से होकर गुज़रना पड़ रहा है। मसीही विरोधी ताकतों से सामना करना पड़ रहा है। आज मसीही लोग जिन परिस्थितियों में जी रहे हैं, वैसी ही परिस्थितियों में नहेमायाह जिया। परन्तु उसने किस प्रकार लोगों की अगुवाई की, चुनौतियों का सामना किया, परमेश्वर का कार्य पूर्ण करने के लिए लोगों को किस प्रकार जोड़ा, यह आज हमारे लिए एक मिसाल है। इसी परिप्रेक्ष्य में परमेश्वर का वचन हमसे व्यक्तिगत रूप से क्या कहना चाहता है, इन बातों को हम देखेंगे। 1. परमेश्वर की योजना बिना संघर्ष के पूर्ण नहीं होती:- अक्सर हमारे मन में यह बात आती है कि परमेश्वर तो सर्वज्ञानी, सर्वव्यापक और सर्वसामर्थी है और यदि कोई काम परमेश्वर को करना है तो वह हो क्यों नहीं जाता? मन में प्रश्न उठता है कि क्या परमेश्वर हमारे इस कार्य को करना नहीं चाहता या फिर यह परमेश्वर की योजना नहीं है? परमेश्वर अधर्मियों का नाश क्यों नहीं कर देता? षड़यंत्रकारियों के षड़यंत्र सफल क्यों हो जाते हैं? सब प्रकार की समस्याएं क्यों आती हैं? मसीही विरोधी शासनतंत्र क्यों फलते-फूलते हैं? परन्तु वचन में यह स्पष्ट है कि परमेश्वर की योजना बिना संघर्ष के न कभी पूरी हुई है और न कभी पूरी होगी। ऐसा नहीं होता कि परमेश्वर ने अपनी योजना पूरी करने के लिए कुछ लोगों को चुन लिया, अपनी सामर्थ्य दे दी, आश्चर्यकर्म कर दिए और सब काम हो गया। यह इतना आसान नहीं होता, यहां तक कि परमेश्वर के पुत्र प्रभु यीशु के लिए भी यह आसान नहीं था। इस सन्दर्भ में हम पाते हैं कि परमेश्वर की योजना को पूरी करने में, यरूशलेम की शहरपनाह बनाने में कुछ लोग भी विरोध करते हैं, कुछ लोग उपहास करते हैं और षड़यंत्र रचने वाले लोग वहां पर हैं। इन लोगों में सम्बल्लत का नाम है और उसके साथ तोबियाह का भी नाम है। इनके साथ अरबियों, अम्मोनियों और अशदोदियों के समूह भी जुड़ गए, उनकी एक टीम बन गई और वे षड़यंत्र रचने लगे। लिखा हुआ है कि उन्होंने बहुत बुरा माना। बड़ी अजीब-सी बात लगती है कि कोई व्यक्ति उनके शहर की शहरपनाह बनाने आ रहा है, जले हुए फाटकों का नवीनीकरण करने आ रहा है, कोई व्यक्ति निर्माण करने के लिए आ रहा है और लिखा हुआ है कि इन लोगों ने बहुत बुरा माना, इन्होंने विरोध किया, आलोचना की। इन्होंने टठ्ठों में उड़ाया, षड़यंत्र किया। इन लोगों ने गोष्ठी की और विचार-विमर्श करके योजना बनाई कि यह कार्य न हो सके। परमेश्वर मूसा को आज्ञा देता है कि बन्धुवाई में पड़े इस्राएलियों के क्लेशों को मैंने देखा है, मैंने उनकी पीड़ा पर चित्त लगाया है, मैंने उनके रोने और विलाप को सुना है और मेरे दिल में पीड़ा है। इसलिए मैं तुझे भेजता हूं कि तू जाकर उनकी अगुवाई कर और उन्हें बन्धुवाई से छुड़ा कर ला। परन्तु वह काम मूसा के लिए आसान नहीं था। उसके सामने फिरौन राजा की ताकत थी। दस विपत्तियों के बावजूद मूसा और इस्राएलियों को फिरौन और उसकी सेना का सामना करना पड़ा। जब वे मिस्र से निकले तौभी उनका रास्ता आसान नहीं था। कहीं लाल समुद्र था, कहीं बयाबान था, कहीं अपनों का विरोध था, कहीं लोगों का बड़बड़ाना था, कहीं लोगों की आलोचनाएं थीं; सब प्रकार के पाप थे परन्तु यह परमेश्वर की योजना थी कि इस्राएलियों को मिस्र से छुड़ाया जाए और यह आसान काम नहीं था। इसी प्रकार यरूशलेम की शहरपनाह के निर्माण का काम भी आसान नहीं, इसमें भी सब परिस्थितियों से, सब पीड़ाओं से होकर गुज़रना पड़ेगा क्योंकि न सिर्फ़ लोग विरोधी हैं वरन् परिस्थितियां भी विपरीत हैं। नहेमायाह 4ः10 में लिखा है - “और यहूदी कहने लगे, ढोने वालों का बल घट गया, और मिट्टी बहुत थोड़ी है, इसलिए शहरपनाह हमसे नहीं बन सकती”। जब व्यक्ति बहुत थक जाता है और उसके ऊपर काम का बोझ बहुत ज्य़ादा हो जाता है तो उसके साथ पहली बात यह होती है कि वह निराश हो जाता है। उसका दिल टूट जाता है और यह सबसे बड़ी पराजय होती है। यहूदी कहने लगे कि मिट्टी बहुत पड़ी है, इस काम को हम कैसे करेंगे? शहरपनाह हमसे नहीं बन सकती क्योंकि बड़ा भारी काम है और हमारा बल घट गया है। बाहर से विरोध है, षड़यंत्र है और उसके साथ आन्तरिक विरोध भी है। साथ ही साथ जान का ख़तरा भी बना हुआ है। नहेमायाह 4ः11 में हम देखते हैं कि शत्रु कह रहे हैं कि ख़ामोशी से उन पर वार कर दें, उनकी हत्या कर दें। हत्या का षड़यंत्र रच दिया गया है कि किसी भी प्रकार, येन-केन प्रकारेण इस काम को रोकना है। परमेश्वर की योजना में ये पीड़ाएं, सताव, खून, प्राणों की आहुति; सब कुछ शामिल है। हम प्रभु यीशु मसीह को देखते हैं। परमेश्वर का एकमात्र पुत्र जिसके वचन मात्र से सारी सृष्टि की सृजना हुई, जब वह इस संसार में आता है तो अपने जीवन के प्रारम्भ से अन्तिम समय तक वह विपरीत परिस्थितियों से गुज़रता है, मृत्यु की छाया से गुज़रता है। उसके जन्म का समाचार सुनकर राजा घबरा जाता है। वह आदेश देता है कि दो साल से छोटे बच्चों को मार डाला जाए क्योंकि उसे प्रभु यीशु की तलाश है कि कब उसकी हत्या कर दी जाए। अभी प्रभु यीशु का जन्म ही हुआ है कि उसके माता-पिता को भागना पड़ता है। लम्बी यात्रा करना है, कोई हवाई जहाज़, रेल, मोटर-गाड़ियां नहीं हैं। कठिन यात्रा करना है, दूसरे देश नवजात शिशु को लेकर जाना है। अपनी सेवकाई के दौरान प्रभु यीशु मसीह को न सिर्फ़ विरोधों का सामना करना पड़ा बल्कि उसे मारने की साज़िश भी की गई। “वे बातें सुनते ही जितने आराधनालय में थे, सब क्रोध से भर गए। और उठकर उसे नगर से बाहर निकाला, और जिस पहाड़ पर उन का नगर बसा हुआ था, उस की चोटी पर ले चले, कि उसे वहां से नीचे गिरा दें” (लूका 4ः28-29)। लूका 13ः31 - “उस घड़ी कितने फरीसियों ने आकर उस से कहा, यहां से निकलकर चला जा; क्योंकि हेरोदेस तुझे मार डालना चाहता है”। हम जानते हैं कि बार-बार प्रभु यीशु ने विपरीत परिस्थितियों का सामना किया। परमेश्वर की योजना पूरी करने के लिए उसने क्या कुछ नहीं सहा; यहां तक कि उसने क्रूस की मृत्यु भी सह ली। हमें अपने जीवन में, कलीसिया में, समाज में, इस देश में यदि परमेश्वर की योजना पूरी करना है तो हमें आगे बढ़ते जाना है। हमें यह मान लेना है कि इस राह पर विषमताएं आएंगी, चुनौतियां, पीड़ाएं आएंगी। हमें मानना है कि षड़यंत्र रचे जाएंगे, निराशाएं आएंगी और न सिर्फ़ आन्तरिक वरन् बाह्य घात भी हमारे साथ होगा। प्रभु यीशु ने कहा, जो कोई मेरे पीछे आना चाहे तो वह अपना क्रूस उठाए और मेरे पीछे हो ले। पैदल चलना तो आसान है पर क्रूस उठाकर उस अपमान को, उस पीड़ा को, उस तिरस्कार को, मृत्यु की छाया को सहते हुए उसके पीछे-पीछे चलना आसान नहीं है। यदि हमें परमेश्वर की योजना को पूरी करना है तो परिस्थितियां चाहे कैसी भी क्यों न हों, हमें प्रतिबद्धता, निडरता और साहस के साथ प्रभु यीशु के साथ-साथ चलते जाना है। 2 तीमुथियुस 3ः12 - “जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे”। नहेमायाह 4ः4-5 में, नहेमायाह की एक बड़ी विचित्र-सी प्रार्थना का वर्णन है। वास्तव में उसकी प्रार्थना मसीहियत और परमेश्वर की प्रेरणा से ओतप्रोत नहीं लगती। वह कहता है, “हे हमारे परमेश्वर सुन ले, कि हमारा अपमान हो रहा है; और उनको किया हुआ अपमान उन्हीं के सिर पर लौटा दे, और उन्हें बन्धुवाई के देश में लुटवा दे। और उनका अधर्म तू न ढांप, और न उनका पाप तेरे सम्मुख से मिटाया जाए; क्योंकि उन्होंने तुझे शहरपनाह बनाने वालों के साम्हने क्रोध दिलाया है”। यह प्रार्थना प्रभु यीशु मसीह की उस प्रार्थना से बिल्कुल विपरीत लगती है जो उसने क्रूस पर की थी कि हे पिता, इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या करते हैं। परन्तु नहेमायाह की प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर अपने वचन के द्वारा हमें और हमारी कलीसिया को यह बताना चाहता है कि; 2. हम परमेश्वर के द्वारा ठहराई गई सीमाओं को समझें और उनका आदर करें:- परमेश्वर ने अपने वचन में सीमाएं ठहराई हैं और हमें उन्हें नहीं लांघना है। कोई बात सही है तो क्यों है, कोई बात अनुचित है तो क्यों है, कोई बात पापमय है तो क्यों है; इसके लिए परमेश्वर के वचन में मापदण्ड है। परमेश्वर ने अपने वचन में सीमाएं ठहरा दी हैं। हम अपने मन में यह धारणा बना लेते हैं कि हमारा परमेश्वर क्षमा करने वाला परमेश्वर है, वह अनुग्रह करने वाला परमेश्वर है और इस कारण यदि हम कुछ भी करते रहें, कैसा भी जीवन जीते रहें हमें तो क्षमा मिल जाएगी, हमें तो उद्धार की निश्चितता मिल जाएगी। अपनी प्रार्थना के बाद नहेमायाह चौथे अध्याय की 14 वीं आयत में कहता है कि अब हमें अपने भाइयों, बेटे-बेटियों, स्त्रियों और अपने परिवारों के लिए युद्ध करना है। क्यों? क्योंकि यदि अब युद्ध न करेंगे तो हम अपनी पहचान खो देंगे। हमें अपने विश्वास की गवाही को बचाकर रखना है और युद्ध करना है, नहीं तो आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देंगे। मत्ती 18ः15-17 में प्रभु यीशु कहते हैं - “यदि तेरा भाई तेरा अपराध करे, तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा; यदि वह तेरी सुने तो तू ने अपने भाई को पा लिया। और यदि वह न सुने, तो और एक दो जन को अपने साथ ले जा, कि हर एक बात दो या तीन गवाहों के मुंह से ठहराई जाए। यदि वह उन की भी न माने, तो कलीसिया से कह दे, परन्तु यदि वह कलीसिया की भी न माने, तो तू उसे अन्यजाति और महसूल लेनेवाले के ऐसा जान”। हमें मतभेद की स्थिति में अपने भाई से बात करना है, संवाद करना है। उसे समझाना है, गवाहों के साथ समझाना है। उसके बाद कलीसिया से बात करना है। अगुवों के साथ बात करना है और यदि इसके बाद भी वह न माने तो फिर उसने सीमा को पार कर दिया। प्रभु यीशु कहते हैं कि फिर उसे अन्यजाति जैसा मान। परमेश्वर ने अपने प्रेम, दया और अनुग्रह की एक सीमा बांधी है और यदि हम उस सीमा के पार जाते हैं तो यह बात ख़तरनाक है। 1 कुरिन्थियों 5ः11 में लिखा है - “मेरा कहना यह है, कि यदि कोई भाई कहलाकर, व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या अन्धेर करनेवाला हो, तो उस की संगति मत करना, वरन् ऐसे मनुष्य के साथ खाना भी न खाना”। जो व्यक्ति भाई कहलाकर इन बातों में पड़ गया है, उसके लिए परमेश्वर के वचन में स्पष्ट कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति के साथ कोई सहभागिता मत रखो, वरन् ऐसे मनुष्य के साथ भोजन भी मत करो। इब्रानियों 10ः26, 27,31 में लिखा है - “क्योंकि सच्चाई की पहिचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हां, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा। जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है”। सच्चाई की पहचान प्राप्त करने के बाद, यह मालूम होने के बाद कि प्रभु क्या चाहता है अगर हम जानबूझकर पाप करते रहते हैं तो फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है। यदि यह जानने के बाद भी कि सही क्या है, उचित क्या है, परमेश्वर की क्या योजना है, यदि हम बार-बार पाप करते रहें तो फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। प्रकाशितवाक्य 2ः19-20 में लिखा है - “मैं तेरे कामों, और प्रेम, और विश्वास, और सेवा, और धीरज को जानता हूं, और यह भी कि तेरे पिछले काम पहिलों से बढ़कर हैं। पर मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है, कि तू उस स्त्री इज़ेबेल को रहने देता है जो अपने आप को भविष्यद्वक्तिन कहती है, और मेरे दासों को व्यभिचार करने, और मूरतों के आगे के बलिदान खाने को सिखलाकर भरमाती है”। परमेश्वर कहता है कि मैं तेरे कामों को जानता हूं, मैं तेरे प्रेम को जानता हूं। मैं तेरे विश्वास को जानता हूं, तेरी सेवा को जानता हूं परन्तु मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तू ऐसे व्यक्ति को अपने बीच में रहने देता है। नहेमायाह की इस विचित्र प्रार्थना का महत्व इसलिए है क्योंकि यह प्रार्थना परमेश्वर की योजना को पूर्ण करने की दिशा में की गई। परमेश्वर के विरोध में हम प्रार्थना नहीं कर सकते। यदि हम प्रार्थना करने लगें कि परमेश्वर तू शैतान को क्षमा कर दे, तो क्या हमारी प्रार्थना सुनी जाएगी? नहीं! क्योंकि यह परमेश्वर की योजना के विपरीत बात है। यदि हम कहें कि प्रभु तू सारे अधर्मियों को स्वर्ग में स्थान दे दे, तो क्या हमारी प्रार्थना सुनी जाएगी? यदि हम प्रार्थना करें कि हम बहुत आंसू बहा कर उपवास के साथ प्रार्थना कर रहे हैं कि हे प्रभु मानवजाति पर कभी मृत्यु न आए, तो कभी ऐसा होगा? यह परमेश्वर की योजना के विरोध में की गई प्रार्थना है। यदि हम कहें कि हे प्रभु तेरा क्रोध मनुष्य जाति पर कभी न भड़के, तेरा न्याय मनुष्यों पर कभी न हो। हे प्रभु हम जैसे रह रहे हैं हमें वैसे ही रहने दे। तेरी आशीष हम पर बनी रहे, तो क्या यह प्रार्थना कभी स्वीकार की जाएगी? नहीं! क्योंकि ऐसी प्रार्थना परमेश्वर के वचन के विरोध में की गई प्रार्थना है। नहेमायाह की प्रार्थना की प्रमुखता इसलिए है क्योंकि उसकी प्रार्थना उन लोगों के विनाश के लिए है जो परमेश्वर की योजना में बाधक हैं। जब प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना करना सिखाया तो यह सिखाया कि तेरा राज्य आवे, तेरी इच्छा पूरी हो। जैसे स्वर्ग में तेरी इच्छा पूरी होती है, वैसे ही पृथ्वी पर भी पूरी हो। हम सीमा के पार न जाएं। हम प्रभु यीशु मसीह के द्वारा ठहराए गए मापदण्डों से बाहर न जाएं और ऐसों के साथ समझौता न करें जो सीमा के बाहर चले गए। इसी परिप्रेक्ष्य में अगली बात यह है कि; 3. शैतान जीवित है और हमें उसका सामना करना है:- नहेमायाह 4ः8 में लिखा है - “और सभों ने एक मन से गोष्ठी की, कि जाकर यरूशलेम से लड़ें और उस में गड़बड़ी डालें”। उसके बाद 13-14 पद में लिखा है - “इस कारण मैं ने लोगों को तलवारें, बर्छियां और धनुष देकर शहरपनाह के पीछे सब से नीचे के खुले स्थानों में घराने-घराने के अनुसार बैठा दिया। तब मैं देखकर उठा, और रईसों और हाकिमों और सब लोगों से कहा, उन से मत डरो; प्रभु जो महान और भययोग्य है, उसी को स्मरण करके, अपने भाइयों, बेटों, बेटियों, स्त्रियों और घरों के लिये युद्ध करना”। नहेम्याह और उसके साथियों के खिलाफ षड़यंत्र रचे जा रहे हैं। ये षड़यंत्र ख़तरनाक होते हैं, कुछ छोटे होते हैं, तो कुछ बड़े। कुछ षड़यंत्र योजनाओं को असफल करने के लिए होते हैं। कुछ षड़यंत्र चरित्र हत्या करने के लिए होते हैं तो कुछ षड़यंत्र व्यक्ति की हत्या के लिए होते हैं। 1994 में ओलम्पिक्स के दौरान नैन्सी कैरिगन के खिलाफ उसकी सहधाविका के द्वारा षड़यंत्र रचा गया। यह प्रयास किया गया कि ट्रैक प्रैक्टिस के दौरान नैन्सी गिर जाए और उसके पैर में चोट लग जाए ताकि वह ओलम्पिक रेस में भाग न ले सके और उसे मैडल न मिले। परन्तु हुआ यह कि जिसने नैन्सी को गिराने का षड़यंत्र रचा था, वह खुद गिर गई। जो चोट नैन्सी को लगना थी वह उस षड़यंत्र करने वाली महिला को लग गई। किसी ने कहानी लिखी है कि शैतान की दुकान लगी हुई थी और वहां बहुत से शस्त्र रखे हुए थे। उस दुकान में एक छोटा-सा शस्त्र भी रखा हुआ था लेकिन वह सबसे महंगा था। एक व्यक्ति ने पूछा कि यह तो बहुत छोटी-सी चीज़ है और सबसे महंगा है, इसे तो सस्ता होना चाहिए। शैतान ने कहा यह सबसे कारगर और सबसे सफल अस्त्र है। सबसे आसानी से इससे मैं लोगों पर चोट कर सकता हूं। यह सबसे प्रभावशाली अस्त्र है और यह उपयोगी अस्त्र है, निराशा। शैतान जीवित है और उसका सामना हमें करना है। षड़यंत्र तो रचे जाएंगे, निराशाएं तो आएंगी। हमें बाहर से-भीतर से तोड़ने का प्रयास किया जाएगा। हमें कचहरियों में घसीटा जाएगा परन्तु सबसे बड़ा न्यायालय परमेश्वर का है। परमेश्वर का विरोध करने वाले उसके न्याय से बच नहीं पाएंगे। इसीलिए लिखा है कि परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयंकर बात है। जैसा नहेम्याह कहता है, वैसा ही हम भी परमेश्वर की ओर देखते रहें। डरें नहीं, हमें निराश नहीं होना है, हमें आगे बढ़ना है। ऐसी शक्तियों के सामने हमें हथियार नहीं डालना है। हमें इनका मुकाबला करना है क्योंकि हमारी ओर परमेश्वर है और वह दुनिया की हर एक शक्ति से कहीं अधिक शक्तिशाली है। डाॅ. विक्टर फ्राॅन्कोल एक मसीही विश्वासी थे। हिटलर के शासनकाल में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नाज़ी कैम्प में ले जाया गया। वहां उन्हें भयंकर पीड़ाओं से गुज़रना पड़ा, उनके शरीर को गरम सलाखों से दागा गया, कई सप्ताह तक उन्हें भोजन नहीं मिला, मृत्यु की निकटता तक वे पहुंच गए। परन्तु वे कहते हैं कि मैं प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करता हूं और यह जानता हूं कि जो पीड़ाएं आज मुझे मिल रही हैं, इनसे मुझे निराश नहीं होना है। मुझे परमेश्वर के मार्ग पर बढ़ते जाना है क्योंकि ये पीड़ाएं एक दिन मेरे जीवन की गवाही बन जाएंगी। यातना शिविर से बाहर आने के बाद विक्टर फ्राॅन्कोल ने न सिर्फ़ अनेक पुस्तकें लिखीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में जाकर इस बात की गवाही भी दी कि किस प्रकार परमेश्वर ने उन्हें बचाया। यह बहुत आसान बात है कि हम निराश हो जाएं। बाइबिल में उन महान लोगों का वर्णन है जिन्होंने परमेश्वर के लिए बड़े-बड़े कार्य किए परन्तु उनके जीवन में भी एक ऐसा अवसर आया जब उन्होंने अपनी मौत मांगी क्योंकि वे बहुत निराश हो गए थे। मूसा कहता है - “मुझ पर इतना अनुग्रह कर कि तू मेरे प्राण एक दम ले ले” (गिनती 11ः15)। एलिय्याह प्रार्थना करता है - “हे यहोवा अब बस मेरा प्राण ले ले” (1 राजा 19ः4)। योना कहता है - “सो अब हे यहोवा मेरा प्राण ले ले क्योंकि मेरे लिये जीवित रहने से मरना ही भला है” (योना 4ः3)। ये परमेश्वर के महान लोग थे जिन्होंने अद्भुत काम किए परन्तु वे निराश हो गए थे और परमेश्वर से अपने लिए मृत्यु मांग रहे थे। तब परमेश्वर कहता है - हे एलिय्याह तेरा यहां क्या काम, इस पर्वत से उठ, इस निराशा की स्थिति से उठ। तुझे तो बहुत कुछ करना है, तुझे जाकर मेरे दास एलीशा का अभिषेक करना है। तुझे बहुत से मील के पत्थर स्थापित करना है। हे एलिय्याह तेरा यहां क्या काम? आगे बढ़ जा, क्योंकि मेरी योजना में अभी बहुत कुछ है जो तुझे करना है। इसीलिए परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि - “वह थके हुए को बल देता है और शक्तिहीन को बहुत सामर्थ्य देता है। तरुण तो थकते और श्रमित हो जाते हैं, और जवान ठोकर खाकर गिरते हैं; परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे, वे उकाबों की नाईं उड़ेंगे, वे दौ़ड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे” (यशायाह 40ः29-31)। परमेश्वर आपको आशीष दे।