संदर्भ: व्यवस्था विवरण 6ः4-9
बाइबिल के प्रथम भाग को “पुराना नियम” कहा जाता है। इसमें व्यवस्था विवरण की पुस्तक के छठे अध्याय के चार से नौवें पदों में लिखा है “हे इस्राएल सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है। तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और सारे जीवन, और सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना। और ये आज्ञाएं जो मैं आज तुझको सुनाता हूं वे तेरे मन में बनी रहें। और तू इन्हें अपने बाल-बच्चों को समझाकर सिखाया करना और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते इनकी चर्चा किया करना। और इन्हें अपने हाथ पर चिन्हानी करके बान्धना और ये तेरी आंखों के बीच टीके का काम दें। और इन्हें अपने-अपने घर के चैखट की बाजुओं और अपने फाटकों पर लिखना”। ये पद मसीही परिवार के निर्माण में परमेश्वर की इच्छा को प्रगट करते हैं। एक मसीही परिवार के निर्माण को इन वचनों के सन्दर्भ में देखें तो प्रतीत होता है- मानो परमेश्वर एक घर के समान परिवार के निर्माण की बात कर रहा है। वास्तव में मसीही परिवार के निर्माण की बात घर बनाने से किन्हीं मायनों में समान है। वचन के सन्दर्भ में आज हम इन्हीं बातों पर विचार करें। 1. मसीही परिवार के निर्माण के सम्बन्ध में पहली बात यह है कि किसी भी घर की एक बुनियाद अथवा नींव होती है:- इसी प्रकार मसीही परिवार की नींव परमेश्वर है। हमारे जीवन में, परिवार और कलीसिया में परमेश्वर का पहला स्थान होना ज़रूरी है। परमेश्वर दूसरे स्थान का समझौता नहीं करता। सीनै पर्वत पर जब परमेश्वर ने मूसा को दस आज्ञाएं दीं - तब उन में से पहली आज्ञा यह थी कि मुझे छोड़ और किसी को ईश्वर करके न मानना (निर्गमन 20ः3)। मसीही परिवार का आधार परमेश्वर हो। सुलैमान राजा सभोपदेशक की पुस्तक में लिखता है “जो डोरी तीन तागे से बटी हो वह जल्दी नहीं टूटती”। परिवार की रस्सी में ये तीन तागे हैं-परमेश्वर, पति एवं पत्नी। जब तीनों का सम्बन्ध एक-दूसरे से गहरा होता है तो शैतान की युक्तियां असफल हो जाती हैं। मसीही परिवार की नींव परमेश्वर हो। प्रत्येक बात में परमेश्वर को प्रथम स्थान दें। प्रथम स्थान देने का अर्थ है; प्रतिदिन सुबह, प्रार्थना के द्वारा उसे पहला स्थान देना। प्रति सप्ताह के प्रथम दिन, कलीसिया के साथ सहभागिता करना। परमेश्वर को प्राथमिकता देने का अर्थ है कि उसे हर बात में, हर निर्णय में, हरेक मोड़ पर प्रथम स्थान दें। 2. किसी भी घर की दीवारों की मज़बूती के लिए उस पर लेप लगाया जाता है:- जब घर की बुनियाद बन जाती है तो दीवारें खड़ी होती हैं। दीवारें पत्थर की हों या ईंट की, इनकी मज़बूती के लिए ज़रूरी होता है सीमेन्ट। इसी प्रकार मसीही परिवार की दीवारों की मज़बूती के लिए ज़रूरी होता है प्रेम। प्रेम ही व्यक्ति को जोड़ता है। प्रेम ही व्यक्ति को बढ़ाता है। प्रेम ही उसे सम्भालता, संवारता और टूटने से बचाता है। घर की दीवार में ईंट में हर एक तरफ सीमेन्ट लगता है, ठीक वैसे ही मसीही परिवार में हर एक तरफ प्रेम होना चाहिए। न केवल प्रेम वरन् परिवार में क्षमा भी आवश्यक है। क्षमा पानी के समान है जो सीमेन्ट को मज़बूत करता है। क्षमा के बिना कोई भी सम्बन्ध कोई प्रेम मज़बूत नहीं हो सकता। 3. बुनियाद और दीवालों के बाद छत की आवश्यकता होती है:- घर में छत सुरक्षा के लिए बनायी जाती है। छत धूप से बचाती है। बारिश और आन्धी तूफान से बचाती है। व्यवस्थाविवरण की पुस्तक से लिया गया हमारा यह सन्दर्भ वचन के महत्व को बताता है। परमेश्वर का वचन ही है जो मसीही परिवार रूपी घर की छत है। ये वह सुरक्षा है जो हमें विरोधी शैतान से बचाता है। परिवार में प्रतिदिन वचन का पठन हो। जीवन में कठिनाई, दुख, पीड़ा, विरोध, आलोचना के द्वारा शैतान हम पर वार करता है। परन्तु वचन हमें उसके प्रहारों से बचाता है। यीशु पर शैतान ने वार किया। उसने यीशु की परीक्षा ली पर वचन के द्वारा यीशु ने खुद को बचाव किया। नीतिवचन का लेखक लिखता है “जो वचन को तुच्छ जानता है वह नाश हो जाता है”। 4. घर की दीवारों पर रंग-रोगन किया जाता है:- दीवारों पर पेन्ट या रंग लगाया जाता है ताकि घर खूबसूरत लगे। मसीही परिवार रूपी घर की दीवारों की सुन्दरता आत्मा के फलों से आती है। प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, क्षमा, भलाई, विश्वास, नम्रता, संयम आत्मा के वे फल हैं जो मसीही परिवार को सुन्दर बनाते हैं। ये वे हैं जो मसीही परिवार को अनोखा रंग देते हैं। पौलुस प्रेरित लिखता है “जो-जो बातें उचित हैं, जो-जो बातें आदरणीय, सद्गुण, प्रशंसा, सत्य और पवित्र हैं, उन्हीं पर ध्यान लगाया करो”। सब अच्छी बातें, अच्छे विचार और अच्छे कार्य ही वे खूबसूरत रंग हैं, जो मसीही परिवार को सुन्दर बनाते हैं”। 5. मसीही परिवार के निर्माण में पांचवी बात यह है कि घर में दरवाज़े होते हैं:- घर में दरवाजे़ होते हैं, जिन्हें रात को बन्द कर दिया जाता है। दरवाज़े कमरों और घर की सीमा होते हैं। दरवाजे़े सीमाओं को दर्शाते हैं। परमेश्वर ने मसीही परिवार के लिए सीमाएं बनाई हैं। पति-पत्नी के सम्बन्धों की सीमाएं हैं। बच्चों के लिए सीमाएं हैं। दूसरों से सम्बन्धों के लिए सीमाएं हैं। मसीही परिवार में इन सीमाओं की पहचान होना ज़रूरी है। मसीही परिवार में इन सीमाओं के भीतर रहकर, जीने का प्रयास होना चाहिए। नीतिवचन में लिखा है “भली स्त्री अपने पति का मुकुट है, परन्तु जो लज्जा के काम करती है वह मानो उसकी हड्डियों के सड़ने का कारण होती है”। इसी प्रकार पुरुषों के लिए नीतिवचन का लेखक लिखता है “क्या हो सकता है कि कोई अपनी छाती पर आग रख ले और उसके कपड़े न जलें? क्या हो सकता है कि कोई अंगारे पर चले और उसके पांव न झुलसें? जो पराई स्त्री के पास जाता है, उसकी दशा ऐसी है वरन् जो कोई उसको छुएगा वह दण्ड से न बचेगा”। पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति वफ़ादार रहें, यही वह सीमा है, जिसका पालन मसीही परिवार में होना आवश्यक है। यही वह सीमा है, वह दरवाज़ा है जिसके पार जाने पर भटकन है। जिसके पार जाने पर दण्ड है। हो सकता है आपका विवाह शीघ्र होने वाला हो। आप अपने परिवार को एक अच्छा और आदर्श परिवार बनाना चाहते हों। इस दिशा में वचन के आइने में अपने परिवार की तुलना घर से करें। एक मसीही परिवार के निर्माण के लिए ज़रूरी है कि- उसकी नींव परमेश्वर हो। उसकी दीवारों पर प्रेम और क्षमा की मज़बूत परत हो। उसकी छत, वचन पर पूर्ण निर्भरता हो। उसकी दीवारों पर आत्मा के फलों, अच्छे विचारों, अच्छे कार्यों का खूबसूरत रंग हो। उसके दरवाज़े एक दूसरे के प्रति वफ़ादारी हो। परमेश्वर इन बातों को अपने परिवार में लाने के द्वारा आपको एक सुन्दर मसीही परिवार के निर्माण की अगुवाई दे, ऐसी मेरी प्रार्थना है। परमेश्वर आपको आशीष दे।