संदर्भ: व्यवस्थाविवरण 6ः4-7; नीतिवचन 22ः6
बाइबिल इस बात को बताती है कि शैतान गरजने वाले सिंह और सांप के समान चालाक है। शैतान का सबसे प्रमुख शत्रु कलीसिया है और शैतान का निरन्तर प्रयास है कि किस प्रकार से कलीसिया को तोड़े जो प्रभु यीशु मसीह की देह है। विभिन्न तरीकों से शैतान आज कलीसिया पर प्रहार करता है। कलीसिया प्रभु यीशु मसीह की देह है, कलीसिया प्रभु यीशु की दुल्हन है, जिसके लिए उसने अपने प्राण दिये। कलीसिया परमेश्वर की दृष्टि में सबसे बहुमूल्य है। कलीसिया की इकाई परिवार है, इसीलिए अक्सर शैतान परिवारों पर प्रहार करता है। शायद ही ऐसा कोई परिवार हो जिस पर शैतान ने आक्रमण न किया हो। यदि शरीर का एक भाग, कलीसिया का एक अंग प्रभावित होता है तो सारी देह प्रभावित होती है। अगर एक अंग को कैंसर का इन्फेक्शन हो जाता है तो उससे सारी देह प्रभावित होती है। यदि दूषित पदार्थ या ज़हर पेट में जाता है तो उससे सारा शरीर प्रभावित होता है और इसलिए शैतान का प्रयास है कि परिवार के माध्यम से कलीसिया को तोड़े। इसीलिए आज परिवारों में समस्याएं पाईं जाती हैं और हम भूल जाते हैं कि शैतान निरन्तर गरजने वाले सिंह के समान विश्वासियों को फाड़ खाने के लिए तैयार है। आज किसी न किसी रूप में शैतान का प्रहार हर एक मसीही परिवार पर है और जब मसीही परिवार पर प्रहार होता है तो हम उन बातों को व्यक्त नहीं करते, किसी दूसरे के साथ बांटते नहीं। परिवारों में पति-पत्नी के बीच में तनाव होता है, विवाद होता है, कई बार हाथापाई भी हो जाती है परन्तु दूसरों के सामने हम बहुत अच्छे दिखते हैं, मुस्कराते हुए दिखते हैं और उस मुस्कराहट के पीछे समस्याएं छुपाने की कोशिश करते हैं। परिवारों में और भी बहुत-सी समस्याएं होती हैं; बच्चों के साथ, जवानों के साथ समस्या होती है और हमें यह लगता है कि हम इसे दूसरों को कैसे बताएं। हमें लगता है कि इससे हमारी बदनामी होगी। परन्तु होता यह है कि शैतान के प्रहार से प्रभावित पति-पत्नी का सम्बन्ध, माता-पिता का बच्चों से सम्बन्ध; दूषित होता जाता है और उससे सारी कलीसिया और सारा समाज प्रभावित होता है। इससे समाज की बदनामी होती है, प्रभु यीशु मसीह और उसकी देह यानि कलीसिया की बदनामी होती है। हम एक ऐसे संसार में रहते हैं जहां पर ग़लत आदर्श प्रस्तुत किये जाते हैं। जहां पर टेलीविजन, सिनेमा, उपन्यासों, कहानियों के माध्यम से ग़लत मापदण्ड चर्चित होते हैं, उनका प्रचार किया जाता है। आज जिस प्रकार ये मापदण्ड प्रचारित किये जा रहे हैं, उनमें नायक और खलनायक में कोई अन्तर नहीं दिखाई देता है। पहले जो नायक होता था वह सत्यवादी होता था, ईमानदार होता था, अच्छा होता था। परन्तु आज समझ में नहीं आता कि नायक कौन है और खलनायक कौन? नायिका कौन है और खलनायिका कौन है? पिछले दशक में एक वीडियो गेम बहुत प्रचलित हुआ - जिसका प्रमुख पात्र बहुत तेज़ी के साथ अपने अवरोधों को तोड़ता हुआ, विरोधियों को मारता हुआ आगे बढ़ता जाता था। परन्तु इस गेम में नायक को जो गेट-अप दिया गया था वह शैतान की तरह दिखाई देता था और उसके विरोधियों का गेट-अप मासूम बच्चों के समान था। आज जो मापदण्ड प्रचारित किये जा रहे हैं, वे सिखाते हैं कि मंज़िल तक पहुंचना ज़रूरी है और इस के लिए नायक को चाहे खलनायक भी बनना पड़े तौभी उचित है। आज इस बात की बहुत ज्य़ादा आवश्यकता है कि मसीही परिवारों से जुड़ी हुई समस्याओं की चर्चा कलीसिया में की जाए। अगर आज कलीसिया में इस बात पर हम ख़ामोश रहें तो टेलीविजन से सीखेंगे, मीडिया से सीखेंगे, इन्टरनेट से सीखेंगे और ये सारी विधाएं ग़लत आदर्शों को प्रभावी बनाने में लगी हुई हैं। आज कलीसिया में इन बातों की चर्चा होना आवश्यक है क्योंकि हमें अपने परिवारों को बचाना है। अक्सर हम चर्चा करते हैं कि हम अपने बच्चों को डाॅक्टर, इंजीनियर या कलेक्टर बनाएंगे, मगर क्या हम यह चर्चा करते हैं कि हमारा प्राथमिक उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम उन्हें परमेश्वर का भय मानना वाला बनाएं। क्या हम इस बात की चर्चा करते हैं कि हमारा बच्चा प्रभु यीशु मसीह से प्रेम करने वाला हो, पवित्र आत्मा की अगुवाई में चलने वाला हो। बिली ग्राहम की पत्नी रूत ग्राहम ने कहा कि आज कलीसिया की सबसे प्रमुख आवश्यकताओं में से एक प्रमुख आवश्यकता ऐसे माता-पिताओं की है जो बच्चों को परमेश्वर के मार्ग पर चलाने के लिए प्रतिबद्ध हों। नीतिवचन 22ः6 में लिखा है कि लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिसमें उसे चलना चाहिये और वह बुढ़ापे में भी उससे न हटेगा। यहां पर हम यह न समझें कि यह बात सिर्फ़ लड़कों के लिए है बल्कि वास्तव में यह बात सन्तानों के विषय में कही गई है जिसमें लड़कियां भी शामिल हैं। आज हमारी कलीसियाओं के परिवारों में बहुत-सी समस्याएं पाई जाती हैं। जवानों में शराब, ड्रग्स और अश्लील मूवीज़ की समस्या है, माता-पिता की आज्ञा के उल्लघंन की समस्या है, ग़ैर-मसीहियों से विवाह की समस्या है और ये समस्याएं तेज़ी से फैलती जा रही हैं। हमें इस बात का अहसास करना है कि कलीसियाओं को सिर्फ़ अच्छे अगुवों, पासबानों और सण्डे स्कूल शिक्षकों की ही आवश्यकता नहीं है। सिर्फ़ अच्छे वक्ताओं की ही आवश्यकता नहीं है, इनसे बढ़कर हमें परमेश्वर का भय मानने वाले माता-पिता, दादा-दादी चाहिए, नाना-नानी की आवश्यकता है जो बच्चों को सही रास्ते पर ले जा सकें। एक सर्वे के अनुसार सप्ताह के 168 घण्टों में से बच्चा अगर चर्च नियमित रूप से जाता है तो 2 घण्टे चर्च में बिताता है। डेढ़ घण्टा सण्डे स्कूल में, डेढ़ घण्टा सी.वाई.एफ. की मीटिंग में बिताता है। 40 घण्टे स्कूल या काॅलेज में बिताता है। 21 घण्टे अपने मित्रों के साथ बाहर घूमने-फिरने में बिताता है। परन्तु बाकी के 102 घण्टे का समय यह युवा या बालक अपने परिवार में बिताता है। इन 102 घण्टों में माता-पिता के रूप में हम अपने बच्चों पर कैसा प्रभाव छोड़ रहे हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए तीन बातों पर हम विचार करेंगे कि अपनी सन्तानों के लिए, अपनी कलीसिया के लिए हम एक अच्छे माता-पिता और परिवार के अच्छे अगुवे कैसे बन सकते हैं। ये आधारभूत बातें नई पीढ़ी के हित से जुड़ी हैं। हमारे परिवारों, कलीसिया और हमारे समाज के साथ-साथ राष्ट्र के हित से भी जुड़ी हैं। 1. बच्चों को अनुशासित करने और उन्हें सही दिशा देने में माता-पिता के रूप में पहली बात हमें समझना है कि मनुष्य का आधारभूत स्वभाव पापमय है। यिर्मयाह 17ः9 में लिखा हुआ है कि - “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?” नीतिवचन 22ः15 - “लड़के के मन में मूढ़ता बन्धी रहती है, परन्तु छड़ी की ताड़ना के द्वारा वह उस से दूर की जाती है”। रोमियों 7ः18 - “क्योंकि मैं जानता हूं, कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते”। यह बात स्वयं पौलुस प्रेरित कहता है। बच्चों को परमेश्वर ने अपनी समानता में सृजा है। इसीलिए उसमें अच्छाई की सम्भावनाएं हैं। उसमें कर्मठता की सम्भावना है, उसमें सृजन की सम्भावना है। परन्तु इसके साथ-साथ हमें यह भी समझना है कि बच्चा आदम के पाप से भी प्रभावित है। आदम के पाप का प्रभाव उस बच्चे के जीवन पर है और इसलिए उस बच्चे को नियंत्रित करना आवश्यक है। प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक डाॅ. सीगल अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि हर एक बच्चे में स्वार्थ होता है। बच्चे आत्मकेन्द्रित होते हैं, बच्चों में युवाओं से भी ज़्यादा क्रोध और जलन की भावना होती है। डाॅ. सीगल लिखते हैं कि यदि बच्चों को नियंत्रित न किया जाए, उनकी सीमाएं निर्धारित न की जाएं तो 15 से 20 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते बच्चा एक ख़तरनाक अपराधी भी बन सकता है। हमें यह समझना है कि हमारा मूलभूत स्वभाव पापमय है। जब बच्चों को नियंत्रित करने की बात आती है तो हमारे लिए कठिनाई हो जाती है। हम अपने बच्चों को क्या नियंत्रित कर पाएंगे जब शायद हम स्वयं ही नियंत्रित नहीं हैं। हम अपने बच्चों की सीमाएं कैसे निर्धारित करेंगे जब हमारी ही सीमाएं निर्धारित नहीं हैं। हम अपने बच्चों को अनुशासित कैसे करेंगे जब स्वयं हमारे ही जीवनों में अनुशासन नहीं है। हम अपने बच्चों को सिखाते हैं कि झूठ मत बोलो परन्तु अपने स्वार्थ के लिए हम झूठ बोलते हैं। जब किसी ऐसे व्यक्ति का फोन आता है जिससे हम बात नहीं करना चाहते तो अपने बच्चों से कह देते हैं कि बोल दो कि पापा घर पर नहीं हैं। हमें यह बड़ी सामान्य-सी बात प्रतीत होती है परन्तु बच्चे के मानस पटल पर इसका भयंकर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जिन मापदण्डों को हम अपने बच्चों के लिए निर्धारित करते हैं उन्हें हम स्वयं पूरा नहीं कर पाते। हम अपने बच्चों से प्रेम और एकता की बात करते हैं परन्तु बच्चे देखते हैं कि माता-पिता तो स्वयं अक्सर झगड़ते रहते हैं। बच्चे जब इन विरोधाभासों को हमारे जीवनों में देखते हैं तो ये बातें उनके जीवन को खोखला कर देती हैं। उनके हृदय पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। बच्चा परमेश्वर की समानता में सृजा गया है, उसमें ऊंचाइयों की छूने की सम्भावनाएं हैं परन्तु उस पर आदम के पाप का प्रभाव भी पड़ा है। इस कारण, अच्छाई को प्रोत्साहित करना है और बुराई को नियंत्रित करना है। हम सभी में सम्भावनाएं हैं अच्छा करने की भी और बुरा करने की भी, अच्छाई की भी और बुराई की भी, बात यह है कि किस बात को हम ज्य़ादा प्रबल बनाते हैं। किस बात की तरफ हमारा ज्य़ादा ध्यान जाता है। यह बहुत स्पष्ट है कि हम जिस पक्ष को ज्य़ादा समय देंगे, जिस पक्ष पर ध्यान ज्य़ादा लगाएंगे वह पक्ष दूसरे पक्ष को प्रभावित करेगा और वह पक्ष आगे बढ़ता जाएगा। इसलिए यह बार-बार कहा जाता है कि बच्चे अच्छी संगति में रहें, उन्हें अच्छी शिक्षा मिले, उन्हें अच्छा वातावरण मिले। मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि जब वह छोटे थे तो उनके पिता ने उन्हें यह सिखाया कि चाहे कैसा भी मौसम हो, आंधी या तूफान आए, तुम्हें सण्डे स्कूल जाना है, तुम्हें चर्च की आराधना में जाना है। मेरे मित्र ने कहा कि यह बात मेरे जीवन में घर कर गई और अब यही बात मैं अपने बच्चों को भी सिखाता हूं। नीतिवचन 23ः13-14 में लिखा हुआ है कि - “लड़के की ताड़ना न छोड़ना; क्योंकि यदि तू उसको छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा”। हमारे साथ अक्सर इसके विपरीत होता है। हम सोचते हैं कि अपने बच्चों को प्यार करना है और हमारे लिए इस प्यार का अर्थ यह हो जाता है कि अपनी ज़िम्मेदारियों और व्यस्तताओं के बीच बच्चे नज़रअन्दाज़ न हों इसलिए जब हम घर आते हैं तो बच्चों को प्रेम दिखाने के लिए हम उनकी ग़लत बातों को सह लेते हैं। मेरे एक परिचित मुझे बताने लगे कि मेरा बेटा बहुत तेज़ है। अगर मैं शाम को उसे घुमाने के लिए बाहर नहीं ले जाता हूं तो मेरे सिर पर आकर किताब से मारता है। मैंने उनसे पूछा - तो आप क्या करते हैं। वह कहने लगे कि मैं हंसने लगता हूं । जब हमारे भीतर यह भावना आ जाती है कि हम अपने बच्चों के साथ समय नहीं बिता रहे तो हम उनकी ग़लतियों को भी सहते जाते हैं। नीतिवचन 29ः15 -“छड़ी और डांट से बुद्धि प्राप्त होती है, परन्तु जो लड़का योंही छोड़ा जाता है वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है”। हमें अपने बच्चे को अनुशासित करना है, उस पर नियंत्रण करना है। परन्तु इससे पहले कि हम अपने जवानों और बच्चों की सीमाएं निर्धारित करें, हमें स्वयं का मूल्यांकन करना है कि क्या हम सीमाओं में चल रहे हैं? क्या हमारा जीवन नियंत्रित है? क्या हमारा जीवन अनुशासित है? 2. हमें न सिर्फ़ यह समझना है कि मनुष्य का आधारभूत स्वभाव पापमय है परन्तु दूसरी बात यह समझना है कि आदर करने वाले व्यवहार की अनिवार्यता को लागू करना है। आज का संसार अनादर करना सिखाता है। टेलीविजन के सीरियल्स में बच्चे अपने पिता का मज़ाक उड़ाते दिखाए जाते हैं और मां उस मज़ाक में आनन्दित होती है। सीरियल्स और मूवीज़ में जो छात्र शिक्षक का अपमान करता है वही सबका हीरो बन जाता है। अधिकांश सीरियल्स में टीचर और पिता को जोकर के समान दिखाया जा रहा है और बच्चे सोचते हैं कि जब वे भी ऐसा ही करेंगे तो बहुत अच्छा लगेगा। जब बच्चों के अचेतन मन में कोई व्यक्ति आदर्श बन जाता है तो फिर जो वह व्यक्ति या नायक करता है, बच्चे के लिए वह सब कुछ जायज़ हो जाता है। जब नायक समस्या में होता है और शराब पीता है तो बच्चे के लिए भी यह बात जायज़ हो जाती है। जब नायक खलनायकी करता है, षड़यंत्र रचता है तो वह भी जायज़ हो जाता है। जब नायक हिंसा करता है तो वह भी जायज़ हो जाता है क्योंकि उस नायक का जीवन बच्चों की मानसिकता को प्रभावित करता है। इसीलिए नायक का सिगरेट पीना, शराब पीना सब कुछ बच्चे के लिए जायज़ बन जाता है क्योंकि उसका आदर्श नायक भी वही कर रहा है और तब बच्चे के हृदय से माता-पिता का आदर सामाप्त हो जाता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डाॅ. जेम्स डाॅबसन का कहना है कि यदि बच्चा माता- पिता का आदर नहीं करता तो सम्भावना यह है कि वह परमेश्वर का आदर भी नहीं करेगा। बच्चा परमेश्वर के विषय में अपने पिता से सीखता है, वह अपने पिता में परमेश्वर की प्रतिच्छाया देखना चाहता है और जब वह उसे दिखाई नहीं देती तो वह भीतर से टूट जाता है। इसलिए डाॅ. जेम्स डाॅबसन कहते हैं कि यदि बच्चा माता- पिता का आदर नहीं करेगा तो वह परमेश्वर का आदर भी नहीं करेगा। आगे वह कहते हैं कि बच्चा यदि आपका आदर नहीं करेगा तो वह आपको प्यार भी नहीं करेगा। यह माता-पिता के लिए एक चुनौती है। यह हम सब के लिए एक चुनौती है कि क्या हमने अपने आप को अपने बच्चों की निगाह में आदर के योग्य बनाया है? संसार के सामने हम अपने पद, डिग्रियों और नाम के मुखौटे लगा सकते हैं परन्तु अपने बच्चों से हम अपनी कमज़ोरियां नहीं छुपा सकते। क्या हम अपने बच्चों के सामने आदर के पात्र बन सके हैं? क्या हम घर में शराब पीकर आते हैं? पत्नी से बुरा व्यवहार करते हैं? कोई रिश्वत देता है तो हम ले लेते हैं? अपशब्द कहते हैं? यदि हम ऐसा करते हैं और उसके बाद अपने बच्चों को ऐसा करने से मना करते हैं तो निश्चित रूप से हम उनके आदर के पात्र नहीं बन सकेंगे। इफिसियों 6ः1-4 - “हे बालको, प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि यह उचित है। अपनी माता और पिता का आदर कर कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे। और हे बच्चेवालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन-पोषण करो”। 1 तीमुथियुस 3ः4-5 - “अपने घर का अच्छा प्रबन्ध करता हो, और लड़के बालों को सारी गम्भीरता से आधीन रखता हो। जब कोई अपने घर ही का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली क्योंकर करेगा”। यह बात उनके लिए कही गई है जो कलीसिया के अगुवे हैं, प्राचीन हैं, पासबान हैं। उन्हें देखना है कि क्या उनके बच्चे अनुशासित हैं? क्या उनके बच्चे उनका आदर करते हैं? क्या उन्होंने अपने बच्चों के सामने अपने जीवन का अच्छा उदाहरण रखा है? रोमियों 13ः1 में लिखा हुआ है कि - “हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के आधीन रहे; क्योंकि कोई अधिकारी ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो; और जो अधिकार हैं वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं”। हमें स्वयं अपने बुजुर्गों का आदर करना सीखना है और शिक्षकों तथा माता-पिता का आदर करना अपने बच्चों को सिखाना है। क्योंकि आदर करने वाले व्यवहार की अनिवार्यता बहुत आवश्यक है। माता-पिता की यह एक सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। 3. इस सम्बन्ध में तीसरी बात यह है कि बिना सम्बन्ध के आदर और प्रेम सम्भव नहीं है। हमारे साथ समस्या यह होती है कि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे हमसे प्रेम करें, हमारा आदर करें परन्तु वास्तव में क्या अपने बच्चों से हमारा सही सम्बन्ध है? क्या हम अपने बच्चों को समय निकालकर उन्हें प्रेम देते हैं? क्या हम उत्साह के साथ उनके लिए कुछ करने को तैयार होते हैं? जब ऐसा होगा तभी हमारा सम्बन्ध अपने बच्चों के साथ बनेगा। बिना सम्बन्ध के अपने बच्चों से आदर और प्रेम की कामना करना हमारी भूल है। क्या हम अपने बच्चों के मित्रों के बारे में जानते हैं कि उनके मित्र कैसे हैं? क्या हमें मालूम है कि हमारे बच्चे कौन-से गीत सुनते हैं, कौन-से सीरियल्स देखते हैं? क्या हम उनके साथ समय बिताते हैं? क्या हम बच्चों के साथ खेलने का प्रयास करते हैं? क्या हम बच्चों के साथ हंसते हैं? कई बार किसी परिवार में जाइए तो ऐसा लगता है हंसी यहां से दूर चली गई है। हंसी नहीं है जीवन में, आलोचना है, कुड़कुड़ाना है, शिकायत है, बड़ा सूखा-सा वातावरण है। कहां गई वह हंसी? क्या हम अपने बच्चों के अच्छे और कठिन समयों में उनके साथ हैं? क्या उनके जीवन के प्रमुख समयों में हम उनके साथ हैं? हो सकता है कि हमारी दृष्टि में वह समय प्रमुख न हो परन्तु बच्चों के जीवन का वह प्रमुख समय हो सकता है। क्या हम साल में एक बार भी अपने बच्चे के स्कूल जाकर उसके शिक्षकों से उसके बारे में बातचीत करते हैं? मुझे याद है कि मेरी बेटी लाशी जब छोटी थी तो वह बहुत अस्वस्थ हो गई। इलाज के लिए उसे जबलपुर ले जाना पड़ा। वह मुझसे हमेशा कहती है कि डैडी मुझे वह समय आज भी याद है, जब मैं बीमार थी और आप मुझे गोद में उठाकर अस्पताल में सीढ़ी पर दूसरी मंज़िल तक ले गए थे। क्या हम ने अपने बच्चों से सम्बन्ध बनाया है? व्यवस्थाविवरण 6ः6-8 - “और ये आज्ञाएं जो मैं आज तुझ को सुनाता हूं वे तेरे मन में बनी रहें; और तू इन्हें अपने बालबच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, उनकी चर्चा किया करना। और इन्हें अपने हाथ पर चिन्हानी करके बान्धना, और ये तेरी आंखों के बीच टीके का काम दें”। परमेश्वर कहता है कि ये आज्ञाएं तेरे पालन के लिए हैं। परन्तु सिर्फ़ इतना ही पर्याप्त नहीं है कि तू इनका पालन करे। परन्तु इससे बढ़कर तेरी ज़िम्मेदारी यह है कि तू इन आज्ञाओं को अपने बच्चों को सिखाए और चलते-फिरते, उठते-बैठते इनकी चर्चा किया करे। तेरे जीवन में इन आज्ञाओं का प्रकाश तेरे बच्चे देख सकें। कभी-कभी हम सोचते हैं कि अगर हमने बच्चे की शारीरिक और भौतिक आवश्यकता पूरी कर दी तो हमारा अपने बच्चे से बड़ा अच्छा सम्बन्ध है। अगर हम अपने बच्चे के लिए कोई अच्छी ड्रेस खरीदकर दे देते हैं, उसके लिए कोई अच्छा खिलौना या क्रिकेट बैट खरीदकर दे देते हैं तो हम बड़े सन्तुष्ट हो जाते हैं। परन्तु बच्चों को हमारा प्यार चाहिए, समय चाहिए, ध्यान चाहिए। क्या हम यह देते हैं? व्यवस्थाविवरण 21ः18-21 में लिखा है - “यदि किसी के हठीला और दंगैत बेटा हो, जो अपने माता-पिता की बात न माने, किन्तु ताड़ना देने पर भी उनकी न सुने, तो इसके माता-पिता उसे पकड़ कर अपने नगर से बाहर फाटक के निकट नगर के सियानों के पास ले जाएं, और वे नगर के सियानों से कहें, कि हमारा यह बेटा हठीला और दंगैत है, यह हमारी नहीं सुनता; यह उड़ाऊ और पियक्कड़ है। तब उस नगर के सब पुरुष उसको पत्थरवाह करके मार डालें, यों तू अपने मध्य में से ऐसी बुराई को दूर करना, तब सारे इस्राएली सुनकर भय खाएंगे”। आज हम इस व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं जी रहे हैं। आज हम परमेश्वर के अनुग्रह में जी रहे हैं। बात यह नहीं कि बेटे पर पत्थरवाह भी किया जा सकता है परन्तु बात यह है कि हम माता-पिता बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी से, अपने हाथ धोकर अलग नहीं हो सकते। अपने बच्चे के जीवन से उस बुराई को दूर करने के लिए हम ज़िम्मेदार हैं। ये बच्चे परमेश्वर का दान हैं, एक दिन हमें इनके विषय परमेश्वर को लेखा देना होगा। हम मित्रों के साथ तो हंस के बोलते हैं परन्तु क्या बच्चों के साथ हम हंसते हैं? कलीसिया की आराधना में तो हम प्रार्थना करते हैं परन्तु क्या बच्चों के साथ हम प्रार्थना करते हैं? क्या हमने अपने जीवन के लिए दिशा निर्देश निर्धारित किए हैं? क्या हमारा व्यवहार सही है? हमारे लिए अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा ज़रूरी है, जब बच्चे बीमार पड़ जाएं तो अच्छे से अच्छे डाॅक्टर के पास ले जाना ज़रूरी है। परन्तु बच्चे के आत्मिक स्वास्थ्य के लिए हम क्या कर रहे हैं? क्या हमने उनके लिए यह नियम बनाया है कि सण्डे स्कूल और चर्च जाना ज़रूरी है। जो बच्चे इस लेख को पढ़ रहे हैं उनसे मैं कहना चाहूंगा कि हो सकता है कि आपके मित्र आपसे दूर हो जाएं, आपके विरोधी बन जाएं परन्तु माता-पिता हमेशा आपके साथ हैं। वे हमेशा आपके लिए भला सोचते हैं। उनका आशीर्वाद, प्रेम और निकटता आपके जीवन में है। इसलिए जब माता-पिता नियम बनाते हैं, सीमाएं निर्धारित करते हैं तो उन्हें आप अपना दुश्मन न समझें। मुझे एक फोटो सबसे अधिक प्रिय है। अमेरिका के राष्ट्रपति जाॅन एफ. कैनेडी के फ्यूनरल की यह फोटो है। जाॅन एफ. कैनेडी अमेरिका के राष्ट्रपति थे और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वे युवा थे और उनका एक सुन्दर परिवार था। जब जाॅन एफ. कैनेडी का फ्यूनरल हो रहा था तो उस समय यह फोटो ली गई थी। इस फोटो में उनका तीन साल का बेटा ठिठुरती ठण्ड में अपने पिता के कफन के पास खड़ा है और उन्हें सलामी दे रहा है। आज हम जो माता-पिता हैं, हमें यह सुनिश्चित करना है कि जिस दिन हमारा बेटा या हमारी बेटी हमें अन्तिम विदा दें, जब अपने हाथों से हमारे कफन के ऊपर मिट्टी डालें तो न सिर्फ़ उनकी आंखों में आंसू हों परन्तु उनके दिल में हमारे प्रति सम्मान हो। परमेश्वर आपको आशीष दे।