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क्रूस से स्वर्गलोक तक

क्रूस से स्वर्गलोक तक

संदर्भ: लूका 23ः32-45

यीशु के जीवन का अधिकांश भाग ऐसे लोगों के बीच कटा जो तिरस्कृत थे, अपमानित, घृणित, निम्न और अछूत थे। जिनका समाज में कोई स्थान न था। यीशु की अक्सर आलोचना की जाती थी कि वह पापियों और बदनाम लोगों के साथ रहता है। उसके अपने चेलों में ही मत्ती था, जो महसूल लेने वाला था। उन दिनों में महसूल लेने वालों को कोई पसन्द नहीं करता था, लोग उन्हें घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे। यहूदी इन से घृणा करते थे क्योंकि ये महसूल लेने वाले रोमी लोगों के प्रभाव में थे और यहूदी रोमियों से घृणा रखते थे।

महसूल लेने वाले प्रमुख रूप से घूसखोर होते थे और प्रभु यीशु मसीह ऐसे ही एक महसूल लेने वाले व्यक्ति मत्ती के घर गया, जहां उसने अपने मित्रों के साथ यीशु को भोज पर बुलाया था और प्रभु यीशु मसीह ने मत्ती को अपना चेला होने के लिए लिया। फरीसी इस घटना को देखकर यीशु के चेलों से उसकी आलोचना करके कहते हैं कि क्यों तुम्हारा गुरु महसूल लेने वाले और घृणित लोगों के साथ भोजन करता है? तब यीशु उन्हें जवाब देता है “वैद्य की आवश्यकता भले चंगों को नहीं परन्तु बीमारों की होती है। तुम जाकर इस का अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं” (मत्ती 9ः12,13)। यीशु मसीह प्रतिदिन उन लोगों के सम्पर्क में रहा जो निम्न समझे जाते थे, जो अछूत थे, जिनकी समाज में कोई गिनती नहीं थी। सामरिया में यीशु कुंए के पास बैठकर सामरी स्त्री से बात करता है, जो चरित्रहीन है और पांच पति कर चुकी है। उसके बाद वह एक कोढ़ी को छूता और उसे चंगाई देता है। कोढ़ी, जिसे देखकर लोग घृणा से चिल्लाते थे “अशुद्ध ....अशुद्ध”, उसके पास प्रभु न सिर्फ जाता है पर उसे स्पर्श करता है, उसे स्वीकार करता है; उस पर अपना प्रेम प्रकट करता है।

इसके बाद हम पाते हैं कि एक बड़ी भीड़ एक स्त्री को जो व्यभिचार में पकड़ी गई थी, यीशु के पास लाती है। यीशु उसके जीवन को बचाता है। जिसे पत्थरवाह किया जाना था, उस पर अनुग्रह कर उसको पापों से क्षमा देता है।

प्रभु यीशु मसीह जक्कई के घर आता है। उसके घर में भोजन करता है, और जहां अधर्म था, वहां उद्धार आता है। जहां मात्र शोषण था, वहां अनुग्रह समा जाता है। जहां स्वार्थ था, वहां उदारता आ जाती है।

यह प्रभु यीशु मसीह की आदत थी, यह उसका मिशन था, यह उसका तरीका था कि पापियों, घृणितों, पतितों और तिरस्कृतों को वह स्पर्श करता था, उन्हें परिवर्तित करता था और उन्हें क्षमादान देकर अनन्त जीवन देता था।

हम पाते हैं कि इसी प्रकार क्रूस के ऊपर अपने प्राण देते समय भी वह डाकुओं के बीच लटका और उनका सहभागी हुआ। सैकड़ों वर्षों पूर्व यशायाह ने इस विषय में भविष्यवाणी की थी “और उसकी क़ब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई” (यशायाह 53ः9)।

क्रूस पर लटके यीशु के दोनों तरफ दो डाकू लटके थे। वचन में कहीं भी इन डाकुओं के विषय में कोई वर्णन नहीं मिलता है, यहां तक कि उनके नाम का भी उल्लेख नहीं है। वरन् जो विवरण है, वह यीशु और इन डाकुओं के बीच हुए संक्षिप्त संवादों का है।

लिखा है “जो कुकर्मी लटकाए गये थे, उन में से एक ने उस की निन्दा करके कहा; क्या तू मसीह नहीं? तो फिर अपने आप को और हमें बचा। इस पर दूसरे ने उसे डांटकर कहा, क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता? तू भी तो वही दण्ड पा रहा है और हम तो न्यायानुसार दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं; पर इस ने कोई अनुचित काम नहीं किया। तब उस ने कहा; हे यीशु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना। उस ने उस से कहा; मैं तुझ से सच कहता हूं; कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्ग लोेक में होगा” (लूका 23ः39-43)।

आज यीशु की पीड़ा, उसके हमारे पापों की ख़ातिर बलिदान होने के समय को स्मरण करते समय हम इस दूसरे डाकू की प्रतिक्रिया पर विचार करें। उस मरते हुए डाकू को आश्वासन मिला, स्वर्ग लोक में यीशु की सहभागिता का। आज हमें भी आश्वासन है अनन्त जीवन का, परन्तु उस से पहले हमें अपने जीवन में उन बातों को लाना है, जो इस डाकू के जीवन से परिलक्षित होती हैं। आइये, इन्हें देखें।

1. उसने अपनी ग़लतियों को स्वीकार किया:- पहले डाकू ने तो निन्दा की परन्तु दूसरे की प्रतिक्रिया भिन्न थी। उसने शायद यीशु को पहले नहीं देखा था मगर उसने क्रूस पर लटके यीशु को देखा, उसकी वाणियों को सुना। उसने यीशु के ख़ामोश मेम्ने के स्वरूप को देखा। जैसे वध किये जाने के पहले मेम्ना ख़ामोश रहता है, वैसे ही यीशु चुपचाप रहा, सब सहता रहा। उसने देखा प्रभु यीशु ने अपने हत्यारों को क्षमा किया, उनकी क्षमा के लिए पिता से प्रार्थना की। उसने देखा कि भरी दोपहर में आकाश कैसा अन्धकारपूर्ण हो गया। इन सब बातों से डाकू के हृदय में परिवर्तन हुआ और तब इस बदले हुए डाकू ने पहले डाकू को डांटा “क्या तू परमेश्वर से भी नहीं डरता? और हम तो न्यायानुसार दण्ड पा रहे हैं, क्योंकि हम अपने कामों का ठीक फल पा रहे हैं; पर इसने कोई अनुचित काम नहीं किया” (लूका 39ः40,41)।

उस डाकू ने अपने पापों को माना, पापमय दशा को अंगीकार किया और वचन में लिखा है “यदि हम कहें कि हम में कुछ पाप नहीं, तो अपने आप को धोखा देते हैंः और हम में सत्य नहीं। यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वास योग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1ः8,9)।

क्रूस पर लटके इस डाकू ने जान लिया था कि ईश्वर तक पहुंचने का पहला कदम है कि हम स्वयं के पापों का अंगीकार करें।

आज के संसार में अपने पापों को स्वीकार करना कठिन है। हम ऐसे वातावरण में रहते हैं, जहां यह स्वीकार करना आसान हो गया है कि हमने जो भी ग़लत किया है, उस में दोष किसी दूसरे का है। बंगलौर में प्रचारकों की एक अन्तर्राष्ट्रीय सभा में एक प्रचारक ने कहा “स्वयं की दृष्टि में धर्मी लोगों को बदलना लगभग असम्भव है, जो अपने आपको अच्छा, धर्मी, पूर्ण, सिद्ध समझते हैं, ज्ञानवान मानते हैं; उन्हें बदलना सम्भव नहीं”।

ऐसे लोगों के लिए कहा जा सकता है “जो सो रहा है, उसे तो जगाया जा सकता है; पर जो नींद का बहाना करके लेटा है, उसे कैसे जगाएं”।

आज ऐसे लोग मिलेंगे, जो यह कहेंगे कि मैं जो ग़लत कार्य करता हूं, उसका दोषी समाज है। मैं बेवफाई करता हूं और लड़कियों को धोखा देता हूं क्योंकि 20 वर्ष पहले जिस से मैं प्यार करता था, उसने मुझे धोखा दिया। भूख ने मजबूर किया कि चोरी करूं, बेरोज़गारी ने मजबूर किया कि डाका डालूं। यह हमारी एक आदत बन गई है कि हम दूसरों पर उंगली उठाकर अपने आप को निर्दोष साबित करना चाहते हैं। यह तरीका ग़लत है, परन्तु यहां हम पाते हैं कि डाकू कहता है “हम तो अपने कामों के अनुसार मृत्यु दण्ड पा रहे हैं”।

यीशु ने जब फरीसी और महसूल लेने वाले का दृष्टान्त बताया तो कहा कि घमण्डी फरीसी नहीं वरन् वह दूसरा विनम्र व्यक्ति, जिसने अपनी पापमय दशा का अंगीकार किया, परमेश्वर की दृष्टि में उचित ठहरा। इस प्रकार हम पाते हैं कि डाकू ने भी अपनी ग़लतियों को स्वीकार किया और अपने पापों को अंगीकार किया।

2. उसने अपने विश्वास को प्रकट किया:- उस डाकू ने कहा “हे यीशु जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी सुधि लेना” (लूका 23ः42)।

ज़रा विचार कीजिए, यह कितना प्रमुख कथन था। आज हम ईस्टर की घटना के इस तरफ रह रहे हैं, जहां हम जानते हैं ख़ाली क़ब्र के बारे में। हम जानते हैं यीशु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बारे में। हम जानते हैं पिन्तेकुस्त के दिन के विषय में, जब कलीसिया की स्थापना हुई, तीन हज़ार बपतिस्मे हुए। हम जानते हैं कि चेलों ने कैसे कैसे आश्चर्य कर्म किये। हमारे पास आज परमेश्वर का जीवित वचन है, हमारे हाथ में है। हमने परमेश्वर की कलीसिया, उसके राज्य को बढ़ते हुए देखा है।

परन्तु वह डाकू पुनरुत्थान के उस तरफ था, अन्तिम सांसे गिन रहा था; मृत्यु के बेहद पास वे दोनों थे। चेलों ने जो तीन साल में देखकर नहीं पहचाना, और भाग गए, यह सोच लिया कि इसकी मृत्यु के साथ इसका राज्य समाप्त हो जाएगा; यह डाकू सिर्फ तीन घण्टे में जान गया। जो चेले तीन साल में न जान पाए कि इसका राज्य इसकी मृत्यु के बाद आएगा। मृत्यु इसे पराजित न कर पाएगी, यह अनन्त का राजा है।

चेले नहीं समझे। रोमी सिपाही, संसद, धार्मिक अगुवों, राजनीतिज्ञों, न्यायाधीशों ने नहीं समझा पर डाकू ने समझ लिया। वह विश्वास करता है, अपनी टूटी हुई दशा में भी उसे पहचानता है, पापों को स्वीकारता है और अपने विश्वास की गवाही देता है। अपना दिल उलट देता है यीशु के चरणों में, अपनी आत्मा का समर्पण करता है। अपना टूटा हुआ शरीर और पापमय जीवन लाता है, कलवरी के सामने।

वह देख तो नहीं सकता, न समझ सकता है परन्तु वह जानता है कि यह क्रूस यीशु को नहीं रोक नहीं सकता। ये कीलें इसके हाथों को कार्य करने से नहीं रोक सकती। ये ठुके हुए पांव इसकी यात्रा का अन्त नहीं, प्रारम्भ हैं।

इस डाकू की तरह मुझे और आपको भी क्रूस की ओर देखना है और विश्वास करना है। हमें मानना है कि क्रूस और अवरोध परमेश्वर की योजना को रोक नहीं सकते परन्तु बनाते हैं। क्रूस हमें बताता है कि यीशु कैसा राजा है, उसका राज्य कैसा है। उसकी कोई सीमाएं नहीं, वह अनन्त का राजा है। बिना विश्वास के हम परमेश्वर के राज्य के भागीदार नहीं हो सकते। इस डाकू ने अपने विश्वास को प्रकट किया।

3. डाकू ने यीशु की क्षमा प्राप्त की:- लिखा है “यीशु ने उससे कहा मैं तुझ से सच कहता हूं तू आज ही मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।” अंग्रेज़ी में स्वर्गलोक का अर्थ “पैराडाइज़” (Paradise) है, और यह शब्द पर्शिया से आया है। इस शब्द का प्रारम्भ तब हुआ, जब पार्शिया के राजा के बगीचे का नाम पैराडाइज़ पड़ा। यह दुनिया का सबसे खूबसूरत बगीचा था, जिसमें सारी दुनिया के सुन्दर फूल पाए जाते थे, जिसमें बीच में पानी था और यह संसार की सबसे सुन्दर जगह मानी जाती थी।

प्रकाशितवाक्य के 21 और 22 में अध्याय में स्वर्ग का चित्रण करते हुए उसे पैराडाइज़ कहा गया है, जहां खूबसूरत बाग है, जहां जीवन के वृक्ष हैं। जहां जीवन के सोते हैं, जहां परमेश्वर के सिंहासन से जीवन की नदी का उद्गम है। जहां फूल भरे हैं, हरियाली है, सुगन्ध है।

पर्शिया के राजा जिसे बहुत सम्मान देना चाहते थे, जिस पर अपनीकृक्षमा और प्रेम दिखाना चाहते थे; उन्हें पैराडाइज़ में बुलाते थे और वहां उनके साथ भोजन करते थे, घूमते थे।

तो, जब यीशु उस क्रूस पर मरने वाले डाकू से कहता है कि तू आज ही मेरे साथ स्वर्गलोक “पैराडाइज़” में होगा, तो वह वास्तव में उससे कहता है कि आज ही तू मेरे साथ, अपने राजा के साथ, सम्मान से, प्यार से, मेरे राज्य में होगा, मेरी महिमा में होगा।

प्रभु यीशु ने कहा “तू आज ही मेरे साथ”। सबसे अधिक शान्ति देने वाले, सामर्थ्य देने वाले शब्द, सबसे अधिक सामर्थ्य के वचन। भजनकार लिखता है “चाहे मैं घोर अन्धकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं तो भी हानि से न डरूंगा क्योंकि तू मेरे साथ रहता है” (भजन संहिता 23ः4)। यीशु ने अपनी अन्तिम आज्ञा में कहा “और देखो, जगत के अन्त तक मैं तुम्हारे साथ हूं” (मत्ती 28ः20)।

आज हमारी स्थिति भी डाकू के समान है, परन्तु विचार करें कि किस डाकू के समान? वे दोनों यीशु से समान दूरी पर थे, पर हम उन में से कौन हैं? उसके समान, जिसने कोसा, बकवाद किया और मौका खो दिया या फिर दूसरे डाकू के समान हैं, जिसने अपने पापों को स्वीकारा, अपने विश्वास की गवाही दी और प्रभु की क्षमा प्राप्त की। प्रभु की प्रतिज्ञा प्राप्त की, स्वर्गलोक में सहभागिता प्राप्त की।

यीशु का आमंत्रण आज हमारे लिए भी है, उसकी प्रतिज्ञा है स्वर्ग का अनन्त जीवन देने की। हमारा क्या निर्णय है? यीशु आज बुलाता है, ठहरा है, प्यासा है। यीशु, जो वेश्या को प्रचारिका बना सकता है, मत्ती को चेला बना सकता है, डाकू को स्वर्गलोक ले जा सकता है। आज उसका निमंत्रण हमारे लिए भी है। हमारे लिए भी आशा है।

परमेश्वर आपको आशीष दे।