संदर्भ: यशायाह 53:3-9; इब्रानियों 11:36-39
वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दुःखी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उस से मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया और हम ने उसका मूल्य न जाना। निश्चय उस ने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दुःखों को उठा लिया; तौभी हम ने उसे परमेश्वर का मारा-कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा। परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएं। हम तो सब के सब भेड़ों की नाईं भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना-अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सब के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया। वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुंह न खोला; जिस प्रकार भेड़ बध होने के समय वा भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप शान्त रहती है, वैसे ही उस ने भी अपना मुंह न खोला। अत्याचार करके और दोष लगाकर वे उसे ले गए; उस समय के लोगों में से किस ने इस पर ध्यान दिया कि वह जीवतों के बीच में से उठा लिया गया? मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी। और उसकी क़ब्र भी दुष्टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उस ने किसी प्रकार का उपद्रव न किया था और उसके मुंह से कभी छल की बात नहीं निकली थी (यशायाह 53:3-9; इब्रानियों 11:36-39 भी पढ़ें)। अपने जीवन में जब हम पीड़ाओं से, दुर्घटनाओं से, बीमारियों से, विश्वासघात से गुज़रते हैं तो हम कहते हैं कि परमेश्वर ऐसा क्यों होता है? यह एक बहुत अहम प्रश्न है जिसे हम में से हर किसी ने कभी न कभी किया है। यह प्रश्न हमारे दिमाग में कभी न कभी बना रहता है कि परमेश्वर ऐसा क्यों? क्यों अच्छे लोगों के साथ बुरा होता है, और बुरे लोगों के साथ अच्छा क्यों होता है? क्यों धर्मी लोग सताव से गुज़रते हैं, और अधर्मी ऐशो-आराम का जीवन जीते हैं? क्यों परमेश्वर के चुने हुए जन, उसके सेवक, अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं और कुकर्मी, भ्रष्टाचारी दीर्घायु प्राप्त करते हैं? क्यों मसीही सेवकों की हत्या कर दी जाती है और हत्या करने वाले न्यायालयों से बरी हो जाते हैं? क्यों बच्चे अपंग पैदा होते हैं? ऐसा क्यों होता है कि परमेश्वर के पीछे चलने वाले लोगों, उसका भय मानने वाले लोगों के परिवारों में लाइलाज बीमारियां होती हैं और वे अल्पायु में मृत्यु को प्राप्त होते हैं? यदि परमेश्वर सर्वज्ञानी, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है तो फिर - अन्याय को रोकता क्यों नहीं? बीमारियों को हटाता क्यों नहीं? अन्याय करने वालों, हत्यारों, बलात्कारियों और अपराधियों को समाप्त क्यों नहीं कर देता परमेश्वर? ऐसा क्यों होता है कि वे बढ़ते और पनपते जाते हैं। अक्सर हम प्रश्न करते हैं कि लगातार प्रार्थनाओं के बावजूद वही समस्याएं बार-बार क्यों आती हैं। क्यों बच्चों के जीवन में अस्वस्थता आती है, क्यों बच्चे ग़लत राह पर चले जाते हैं, क्यों बच्चे ग़लत निर्णय कर लेते हैं? हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर हां में क्यों नहीं मिलता? ऐसा क्यों होता है कि जो लोग परमेश्वर के पीछे चलते हैं वे पीड़ा से, अन्याय से, निन्दा से और अकेलेपन से गुज़रते हैं? ऐसा क्यों परमेश्वर, ऐसा क्यों? जीवन के इन प्रश्नों और इन विरोधाभास के लिए यदि हम प्रभु यीशु मसीह के इस संसार में गुज़ारे 33 वर्षों के अन्तिम दिनों को देखें तो इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर हमें मिल सकता है। उदाहरण के लिए, यदि हम केवल उस दिन को देखें जिस दिन प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया था तो बहुत से विरोधाभास दिखाई देते हैं। बरअब्बा जैसे अपराधी को स्वतंत्र कर दिया जाता है और प्रभु यीशु जो निष्पाप है, उसको मृत्यु-दण्ड दे दिया जाता है। यहूदा जो प्रभु यीशु मसीह के पीछे - पीछे चलता था, वह विश्वासघात करके उसे पकड़वा देता है। चुम्बन जो प्रेम और अपनत्व का प्रतीक है, वह धोखे का चिन्ह बन जाता है। दूसरी ओर, जो डाकू है, वह स्वर्गलोक का वारिस हो जाता है। प्रभु यीशु मसीह का प्रिय चेला पतरस उसका इन्कार कर देता है, वह उसे नकार देता है और यहां तक कि ऐसा लगता है कि वह प्रभु यीशु मसीह के लिए अपशब्द कह देता है। दूसरी ओर, सूबेदार, जो प्रभु यीशु को क्रूस पर चढ़ाए जाने में शामिल था, वह उसकी गवाही देता है और कहता है “निश्चय यह परमेश्वर का पुत्र था”। क्रूस के पास जहां पुरुषों को, चेलों को खड़े होना था, वहां महिलाएं खड़ी थीं। चेले जिन्होंने आश्चर्यकर्म देखे थे, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह को मृतकों को जिलाते हुए देखा था, भूखों को खिलाते हुए देखा था। जिन्होंने उसकी आवाज़ पर तूफानी लहरों को थमते हुए देखा था, जिन्होंने उसे सृष्टि को डांटते हुए सुना था; वे भाग जाते हैं, डर जाते हैं - ख़ामोश हो जाते हैं और बेजु़बान पत्थर पुकार उठते हैं। कहीं चट्टानें तड़कती हैं, कहीं मन्दिर का पर्दा फटता है, कहीं सूर्य अपना मुंह छुपा लेता है। मानो ये कह रहे हों - कि सृष्टिकत्र्ता अपनी अनमोल सृष्टि को बचाने के लिये अपना प्राण दे रहा है। मानो यह परदा, चट्टानें, पत्थर, सूर्य और सम्पूर्ण सृष्टि प्रभु यीशु मसीह की पीड़ा का अहसास करते हुए अपने दुख को व्यक्त कर रहे हों। इन सारी बातों का, हमारे जीवन के विरोधाभासों, विषमताओं से क्या सम्बन्ध है? निश्चित रूप से प्रभु यीशु मसीह के जीवन के इन विरोधाभासों का सम्बन्ध हम से भी है क्योंकि जीवन के सभी अहम प्रश्नों के उत्तर हमें सिर्फ़ प्रभु यीशु मसीह में मिलते हैं। 1. अकेलेपन की चरम सीमा/ पराकाष्ठा:- जब प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर थे और उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में जब यह दुख सहे तो वह अकेलेपन की पराकाष्ठा से, पीड़ा से, उसकी चरम सीमा से गुज़रे। बाइबिल के पुराने नियम में अन्य दूसरे लोगों के उदाहरण भी पाए जाते हैं। अय्यूब अकेलेपन की पीड़ा से होकर गुज़रा। जब उसके परिवार के सब सदस्य मृत्यु को प्राप्त हो गए, तब उसकी पत्नी धिक्कारकर कहती है कि तू मर क्यों नहीं जाता, परमेश्वर को श्राप दे और मर जा। तब इस अकेलेपन की पीड़ा में वह कहता है - “मैं गर्भ ही में क्यों न मर गया? पेट से निकलते ही मेरा प्राण क्यों न छूटा?” (अय्यूब 3ः11) रूत 1:20-21 में लिखा है - “उस ने उन से कहा, मुझे नाओमी न कहो, मुझे मारा कहो, क्योंकि सर्वशक्तिमान ने मुझ को बड़ा दुःख दिया है। मैं भरी पूरी चली गई थी, परन्तु यहोवा ने मुझे छूछी करके लौटाया है। सो जब कि यहोवा ही ने मेरे विरुद्ध साक्षी दी, और सर्वशक्तिमान ने मुझे दुःख दिया है, फिर तुम मुझे क्यों नाओमी कहती हो?” नाओमी ने अपने पुत्रों और अपने पति की मृत्यु के बाद अकेलेपन का अहसास किया था। हम पाते हैं कि एलिय्याह को अकेलेपन का अहसास हुआ। उसके सेवक उसे छोड़कर चले गए। वह अपने प्राण बचाता हुआ यहूदा के बेर्शेबा को भागता है और फिर वह अपने सेवक को वहां छोड़ देता है। इसके बाद एलिय्याह के विषय में लिखा है - “और आप जंगल में एक दिन के मार्ग पर जाकर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहां उस ने यह कह कर अपनी मृत्यु मांगी कि हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूं” (1 राजा 19ः3-4)। प्रभु यीशु ने इस अकेलेपन की चरम सीमा को अपने अन्तिम दिनों में सहा। उसके कुटुम्बी और परिवार के लोग, उसके भाई-बहन, उसके लिए कहने लगे कि इसका तो चित्त ठिकाने पर नहीं है और वे उसको पकड़ने के लिए निकल गए (मरकुस 3:21)। उसके अपने कुटुम्ब के लोगों ने कहा, कि इसका चित्त ठिकाने पर नहीं है। जब हमारे परिवार के लोग हम पर आक्षेप लगाते हैं; जब जिनसे हमें प्रेम की अपेक्षा होती है वे हमारे लिए पीड़ा पैदा करते हैं तो इससे बहुत ज़्यादा तकलीफ होती है। उसका शिष्य यहूदा इस्करियोती जो उसका परम मित्र था, जो उसकी रोटी में से खाता था, उसके विषय में लिखा है कि - “मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, जो मेरी रोटी खाता था, उस ने भी मेरे विरुद्ध लात उठाई है” (भजन संहिता 41:9)। जब ऐसी पीड़ा हो कि हमारा कोई विश्वासपात्र, हमारा परम मित्र हमारे खिलाफ यदि लात उठा ले तो हमारी कैसी प्रतिक्रिया होगी। इसके साथ-साथ हम पाते हैं कि जब प्रभु यीशु को अपने साथियों, अपने चेलों की सबसे ज्य़ादा आवश्यकता थी कि वे उसके साथ रहते, उसके साथ प्रार्थना करते तो लिखा हुआ है - “तब सब चेले उसे छोड़कर भाग गए” (मत्ती 26:56)। पतरस जो कि प्रभु यीशु मसीह का प्रिय चेला था, जो उसके साथ जीने और मरने का दावा करता था, उसके विषय में हम पाते हैं कि वह दूरी बनाकर चलने लगा, विरोधियों के साथ बैठकर आग तापने लगा और फिर उसका धिक्कार करने लगा। वह प्रभु यीशु के लिए अपशब्द कहने लगा और यहां तक कहने लगा कि मैं तो इसको जानता ही नहीं और उसने प्रभु यीशु का इन्कार कर दिया। कोई आपका ऐसा आत्मिक मित्र जो आपके साथ रहा हो, वह आपको धिक्कार दे, आपके लिए अपशब्द कहे और यह कह दे कि मैं तो इसे जानता ही नहीं; ऐसे समय में उस पीड़ा से गुज़रते हुए आपकी क्या स्थिति होगी। परन्तु प्रभु यीशु मसीह के लिए सबसे पीड़ादायक वह समय था, जब उसे इस बात का अहसास हुआ कि परमेश्वर ने उसे छोड़ दिया है। यह अनिवार्य था कि परमेश्वर उसको छोड़ दे, क्योंकि जो निष्पाप था वह सारे जगत के लोगों के पापों का बोझ अपने ऊपर उठाए हुए था। लिखा है कि - “तीसरे पहर यीशु ने बडे़ शब्द से पुकार कर कहा, इलोई, इलोई, लमा शबकतनी? जिस का अर्थ यह है; हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मरकुस 15:34) प्रभु यीशु पुकार उठते हैं कि इस चरम पीड़ा के समय, इस मृत्यु की निकटता के समय, इन टूटती सांसों के समय हे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया। अकेलेपन की चरम सीमा को परमेश्वर के लोगों ने सहा, हमारे प्रभु यीशु मसीह ने सहा; हमारे अकेलेपन की व्यथा की तुलना तो हम प्रभु यीशु मसीह के साथ करने के योग्य भी नहीं। 2. अन्याय की चरम सीमा / पराकाष्ठा:- प्रभु यीशु मसीह ने न सिर्फ़ अकेलेपन की पीड़ा की पराकाष्ठा को सहा परन्तु अन्याय की चरम सीमा का अहसास भी उसने किया। बाइबिल में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जब परमेश्वर के लोगों ने अन्याय का अहसास किया। यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला - जो प्रभु यीशु मसीह का मार्ग तैयार करने आया था, जो पवित्रात्मा से परिपूर्ण था, जिसे गर्भ से ही एक विशेष प्रयोजन के लिए रचा गया था, उस यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को सच बोलने का परिणाम यह मिला कि - “राजा ने तुरन्त एक सिपाही को आज्ञा देकर भेजा, कि उसका सिर काट लाए। उस ने जेलखाने में जाकर उसका सिर काटा, और एक थाल में रखकर लाया और लड़की को दिया, और लड़की ने अपनी मां को दिया” (मरकुस 6ः26-28)। पुराने नियम में हम पाते हैं कि परमेश्वर के चुने हुए लोगों को जो उसके सशक्त गवाह थे; उन्हें अन्याय की चरम सीमा का अहसास हुआ। शद्रक, मेशक, अबेद-नगो को परमेश्वर की गवाही देने पर, समझौता करने से मना कर देने पर आग के भट्ठे में डाल दिया गया और उन्होंने उस अन्याय का अहसास किया। दानिय्येल ने जब समझौता करने से, परमेश्वर के बजाय राजा के सामने प्रार्थना करने से मना कर दिया तो उसे सिंहों की मांद में डाल दिया गया। “तब वे पुरुष राजा के पास उतावली से आकर कहने लगे, हे राजा, यह जान रख, कि मादियों और फारसियों में यह व्यवस्था है कि जो-जो मनाही वा आज्ञा राजा ठहराए, वह नहीं बदल सकती। तब राजा ने आज्ञा दी, और दानिय्येल लाकर सिंहों की मान्द में डाल दिया गया” (दानिय्येल 6ः15,16)। हम पाते हैं कि लोग प्रभु यीशु मसीह के कार्यों को देखकर उसकी प्रशंसा करते थे। अपनी सेवकाई के प्रारम्भ में जब प्रभु यीशु मसीह सूर और सैदा के देशों को गया तो लिखा है कि - उस क्षेत्र में प्रभु यीशु मसीह ने बहुत से कार्य किए। अशुद्ध आत्मा को निकाला, दुष्टात्मा को निकाला और एक व्यक्ति जो हकला और बहरा था, उसे चंगाई दी और वह स्पष्ट बोलने लगा और सुनने लगा। तब दिकापुलिस, सूर और सैदा में प्रभु यीशु मसीह की प्रशंसा होने लगी और - “वे बहुत ही आश्चर्य में होकर कहने लगे, उस ने जो कुछ किया सब अच्छा किया है; वह बहिरों को सुनने की, और गूंगों को बोलने की शक्ति देता है” (मरकुस 7ः37)। किन्तु आज वही भीड़ उसे क्रूस पर चढ़ाओ के नारे बुलन्दी से लगा रही थी और कह रही थी कि बरअब्बा को हमारे लिए छोड़ दो। मत्ती 27ः22 में लिखा है - “पीलातुस ने उन से पूछा; फिर यीशु को, जो मसीह कहलाता है, क्या करूं? सब ने उस से कहा, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए”। लोगों से प्रभु यीशु को अन्याय मिला। भीड़ से, कचहरी से उसको अन्याय मिला। उसे सनहैड्रीन के सामने खड़ा करके उस पर झूठे आरोप लगाए गये कि यह परमेश्वर की निन्दा करता है और यहूदी धर्म महासभा ने उसको मृत्यु-दण्ड के योग्य ठहरा दिया। उसे न्यायपालिका से अन्याय प्राप्त हुआ। उसे शासन से भी अन्याय मिला। हम पाते हैं कि पीलातुस ने बहुत सावधानी से जांच की और उसने तीन बार सबके सामने इस बात का इज़हार किया था कि यीशु निर्दोष है, मैं इसमें कोई भी दोष नहीं पाता। यह बात यूहन्ना 18ः38; 19ः6 में पाई जाती है। परन्तु इसके बावजूद पीलातुस ने यीशु के बदले बरअब्बा को जेल से रिहा कर दिया और यीशु को कोड़े लगवाकर उसको क्रूस पर चढ़ाए जाने का आदेश सुना दिया। प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी कलीसिया में, अपने अधिकारियों से या प्रशासन से; कभी अन्याय की ऐसी पराकाष्ठा से होकर गुज़रते हैैं? 3. निन्दा की चरम सीमा / पराकाष्ठा:- प्रभु यीशु मसीह ने निन्दा की जो अधिकतम सीमा हो सकती थी, जो पराकाष्ठा हो सकती थी; उसका अहसास किया। पौलुस प्रेरित ने भी अपने जीवन में इस निन्दा का अहसास किया, वह लिखता है - “मेरी समझ में परमेश्वर ने हम प्रेरितों को सब के बाद उन लोगों की नाईं ठहराया है, जिन की मृत्यु की आज्ञा हो चुकी हो; क्योंकि हम जगत और स्वर्गदूतों और मनुष्यों के लिये एक तमाशा ठहरे है” (1 कुरिन्थियों 4ः9)। 1 कुरिन्थियों 4ः11-13 में पौलुस अपने साथी तीमुथियुस और तीतुस से कहता है - “हम इस घड़ी तक भूखे-प्यासे और नंगे हैं, और घूंसे खाते हैं और मारे-मारे फिरते हैं; और अपने ही हाथों से काम करके परिश्रम करते हैं। लोग बुरा कहते हैं, हम आशीष देते हैं; वे सताते हैं, हम सहते हैं। वे बदनाम करते हैं, हम बिनती करते हैं: हम आज तक जगत के कूड़े और सब वस्तुओं की खुरचन की नाईं ठहरे है”। ऐसी निन्दा से प्रेरित होकर गुज़रे परन्तु प्रभु यीशु मसीह उससे भी कहीं अधिक निन्दा की स्थिति से गुज़रे। यदि हमें कोई गाली दे देता है तो हम तिलमिला जाते हैं। हमसे यह बात बर्दाश्त नहीं होती और हम कहते हैं कि जिसने मुझे गाली दी उसे मैं ज़रूर सबक सिखाऊंगा। परन्तु कल्पना कीजिए कि लोग प्रभु यीशु मसीह के मुंह पर थूक रहे हैं और सरकंडा लेकर उसके सिर पर मार रहे हैं - “और उस पर थूका; और वही सरकण्डा लेकर उसके सिर पर मारने लगे” (मत्ती 27ः30)। जिसने लोगों को चंगाई दी, मृतकों को ज़िन्दा किया। कभी गाली नहीं दी, बुराई के बदले बुराई नहीं की, उसके मुंह पर लोग थूक रहे थे। लोगों ने उसकी आंखों पर पट्टी बान्धी और उसको थप्पड़ मारकर कहा कि भविष्यवाणी कर कि किसने तुझे मारा है। उसे कांटो का मुकुट पहनाया गया। उसके सिर से पसीने की जगह खून बह रहा था और कांटे उसकी मांसपेशियों में घुस रहे थे। लोग उसका उपहास, मज़ाक उड़ा रहे थे, वे कह रहे थे कि इसने दूसरों को तो बचाया है पर यह अपने आपको नहीं बचा सकता। मत्ती 27ः41-42 में और यूहन्ना 19ः24 में लिखा है - “यह इसलिये हुआ, कि पवित्र शास्त्र की बात पूरी हो कि उन्होंने मेरे कपड़े आपस में बांट लिए और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डालीः सो सिपाहियों ने ऐसा ही किया”। उसके बाद उसे एक डाकू-हत्यारे की नाईं क्रूूस पर लटका दिया गया। आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रभु यीशु मसीह कैसी निन्दा और अपमान की स्थिति से गुज़रा? वह निष्पाप था, वह परमेश्वर का पुत्र था। वह चाहता तो स्वर्गदूतों की सेना बुलाकर विरोधियों को समाप्त कर देता, वह चाहता तो स्वर्ग से आग और गन्धक गिरती और ये लोग भस्म हो जाते। परन्तु वह प्रभु यीशु मसीह सह रहा है थूक और थप्पड़ों को, अपमान को, निर्वस्त्र होने की स्थिति को। सब उसका मखौल बनाए हुए हैं और वह ख़ामोशी से वध किये जाने वाली भेड़ के समान इस निन्दा और अपमान को सह रहा है। प्रश्न यह है कि हम कितनी निन्दा को सह सकते हैं? कितनी निन्दा सहने की हम में क्षमता है? 4. असहनीय पीड़ा की पराकाष्ठा:- प्रभु यीशु मसीह ऐसी असहनीय पीड़ा से गुज़रा जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। बाइबिल में बहुत से ऐसे उदाहरण हैं जब लोग असहनीय पीड़ा से होकर गुज़रे। यूसुफ पीड़ा से होकर गुज़रा। उसके भाइयों ने उसे बेच दिया, परिवार के लोगों ने छोड़ दिया, मालिक ने अविश्वास किया, मालकिन ने उस पर बलात्कार करने का आरोप लगाया, दोस्तों ने धोखा दिया और समय आने पर दोस्त भूल गए। अय्यूब की पीड़ा के विषय में हम जानते हैं कि किस प्रकार की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक पीड़ा से वह गुज़रा। पौलुस, जिसने प्रभु यीशु मसीह के लिए महान कार्य किए, वह लिखता है - “(मैं पागल की नाईं कहता हूं) मैं उन से बढ़कर हूं! अधिक परिश्रम करने में; बार बार कैद होने में; कोड़े खाने में; बार बार मृत्यु के जोखिमों में। पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए। तीन बार मैं ने बेंतें खाईं; एक बार पत्थरवाह किया गया; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा। मैं बार-बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; अपने जातिवालों से जोखिमों में; अन्यजातियों से जोखिमों में; नगरों के जोखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जोखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में। परिश्रम और कष्ट में; बार बार जागते रहने में; भूख-पियास में; बार बार उपवास करने में; जाड़े में उघाड़े रहने मे” (2 कुरिन्थियों 11ः23-27)। प्रभु यीशु मसीह ने जिस पीड़ा को सहा, उस शारीरिक पीड़ा की तो हम बात कर सकते हैं परन्तु उसकी आत्मिक पीड़ा शारीरिक पीड़ा से कहीं ज्य़ादा थी। इस संसार में जितने लोग थे और जितने लोग होने वाले थे उन सब के अपराधों की ग्लानि का बोझ प्रभु यीशु मसीह अपनी निर्दोष और निष्कलंक आत्मा में सह रहा था। जितने बलात्कारी, हत्यारे, अपराधी और कुकर्मी हुए थे और जो होने वाले थे, उन सब के अपराधबोध का अहसास वह अपनी आत्मा में, इन उखड़ती सांसों में कर रहा था; जिसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। नरक की भूख, प्यास, दर्द और पीड़ा, प्रताड़ना और अन्धकार व परमेश्वर से अलगाव की उस स्थिति को प्रभु यीशु ने सहा, जिसकी कल्पना करने में भी हम कभी सक्षम नहीं हो सकते। क्या हम ऐसी असहनीय पीड़ा व प्रताड़ना से गुज़रते हैं? प्रभु यीशु मसीह जिस अकेलेपन, अन्याय, निन्दा और पीड़ा की पराकाष्ठा से होकर गुज़रा, आज यदि हम खुद को कुछ वैसी ही परिस्थितियों में पाते हैं तो परमेश्वर की सहायता प्राप्त करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? अ. विषमताओं से गुज़रते हुए हम उन्हें स्वीकार करें:- इन पीड़ाओं से गुज़रते हुए, अपमान, निन्दा, सताव और विषमताओं से गुज़रते हुए; हम उन्हें स्वीकार करें। क्योंकि जब हमारा प्रभु, हमारा स्वामी, हमारा सृष्टिकत्र्ता इतना कुछ सह सकता है ताकि हमारी सबसे बड़ी समस्या, पाप की समस्या का समाधान हो सके और हम सब अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकें - तो फिर हम जैसे निम्न, नीच, निकम्मे और साधारण मनुष्य जो अधर्मी और पापी हैं, जब इन विषमताओं से, संघर्षों से गुज़रते हैं तो हमें उन्हें स्वीकार करना है। हमें यह जानना है कि इन पीड़ाओं में भी परमेश्वर की कोई न कोई योजना है। चेलों की यातनाओं में, प्रभु यीशु मसीह की यातनाओं में हमें परमेश्वर की योजना दिखाई देती है। ब. हम हर एक विषमता को अनन्त के परिप्रेक्ष्य में देखें:- 1 कुरिन्थियों 15ः19 में लिखा हुआ है - “यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे है”। यह जीवन तो बहुत क्षणिक है, हमें इस जीवन में ही मसीह से आशा नहीं रखना है। प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जब तुम इस परिस्थिति से गुज़रो तो आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा फल है। तब तुम भविष्यद्वक्ताओं की श्रेणी में आ जाओगे, तुम्हें अनन्त में प्रतिफल प्राप्त होगा। स. इस बात को सदैव स्मरण रखें कि अन्तिम विजय हमारी है:- हमारी विजय स्थगित तो हो सकती है, हमें कुछ समय अपमानित तो होना पड़ सकता है। इस संसार की शक्तियों से पराजित होने का अहसास तो होने लग सकता है परन्तु जो परमेश्वर के लोग हैं, जो प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलने वाले लोग हैं; अन्तिम विजय उनकी है। हमारी विजय स्थगित हो सकती है परन्तु इसे कोई रोक नहीं सकता, क्योंकि मसीही जीवन जय का जीवन है। बात विश्वासयोग्यता की है, आज्ञाकारिता की है क्योंकि प्रभु यीशु कहते हैं कि अन्तिम समय तक विश्वासयोग्य रह, तो मैं तुझे अनन्त जीवन का मुकुट दूंगा। पौलुस कहता है कि हमारा पल भर का क्लेश हमारे लिए अनन्त महिमा पैदा करेगा। यदि सब कुछ स्पष्ट दिखने लगे, सब बातों का उत्तर मिलने लगे, सब बातें स्पष्ट हो जाएं, सब बातें हमें समझ में आ जाएं, सब बातों की व्याख्या हम कर सकें तो विश्वास कहां है? विश्वास तो आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है। हमारे जीवन में वह प्रमाण है उस अनदेखी बात का, उस अनन्त जीवन का, उस आत्मा के सच का, उस प्रभु यीशु मसीह के द्वारा दिए गए उद्धार का, उस अनन्त विजय का, उस मृत्यु के पार आशा का, उस महिमामय देश का, उस स्वर्गधाम का। क्या हमारे जीवन में उन अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण दिखाई देता है? यह प्रमाण तभी दिखाई देगा जब हम इन विषमताओं से गुज़रेंगे। जब हम इन विपरीत परिस्थितियों से गुज़रेंगे। तभी हमारे जीवनों से वे चिन्ह दिखाई देंगे, तभी हमारे जीवनों में वह गवाही होगी। हर एक जो प्रभु यीशु मसीह में भक्ति का जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, वे सब सताए जाएंगे; यह परमेश्वर के वचन में कहा गया है। हमको अपना क्रूस उठाकर प्रतिदिन चलना है यह वचन में कहा गया है। क्या ये बातें हमारे जीवन में कोई मायने रखती हैं? इसी विरोधाभास के कारण क्रूस महिमामय बन जाता है क्योंकि मेरे और आपकी ख़ातिर, हमको बचाने की ख़ातिर, हमारी आत्माओं की अनन्त सुरक्षा की ख़ातिर हमारे प्रभु यीशु मसीह ने क्रूस पर पीड़ा की उस चरम सीमा को सह लिया और वह क्रूस महिमामय बन गया। रोमी लोगों ने क्रूस को ईजाद किया था। गुलामों से वे जंगलों में सड़कें बनवाते थे। बीच जंगल में से पेड़ काटे जाते थे और सड़कें बनाई जाती थीं। गुलामों को कोड़े मार-मारकर, 24 में से 20 घण्टे काम कराया जाता था। यदि जंगल में गुलाम ढ़ीलापन करते थे और अपने मालिकों की आज्ञा नहीं मानते थे और 20 घण्टे काम नहीं कर पाते थे तो जंगल के पेड़ों की दो लकड़ियों को काटकर क्रूस बना दिया जाता था और उस पर क्रूस पर रोमी लोग उन गुलामों को चढ़ा देते थे। क्रूस जिस पर मृत्यु-दण्ड दिया गया, वह शापित था, वह अनन्त पीड़ा का स्थान था । क्रूस के विषय में गलातियों 3ः13 में लिखा है - “जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है”। क्रूस पर लोगों को लटका दिया जाता था और उन्हें छोड़ दिया जाता था। उनका खून बह जाता था और तड़प-तड़पकर वे मर जाते थे। इसके बाद उनकी हड्डियां तोड़ दी जाती थीं, बर्छी बेध दी जाती थी और उनकी लाशें सड़ जाती थीं। लिखा है कि गिद्ध और पक्षी नोंच-नोंचकर उनके मांस को खाते थे और जो टुकड़े सड़ जाते थे वे नीचे गिर जाते थे और उनमें आग लगा दी जाती थी। कभी फांसी का फन्दा महिमामय बन नहीं सकता। कभी वह इलैक्ट्रिक चेयर जिसमें लोगों को दूसरे देशों में मृत्यु-दण्ड दिया जाता है, मौत का यह उपकरण कभी महिमा का कारण नहीं बन सकता। आज उस क्रूस पर प्रभु यीशु मसीह ने हमारे लिए अपने प्रेम की चरम सीमा को और परमेश्वर के प्रेम को परिभाषित करने के लिए, उसकी व्याख्या करने के लिए, उसको जीकर दिखाने के लिए अपने प्राण दे दिए। अकेलेपन की, निन्दा की, पीड़ा की और अन्याय की पराकाष्ठा को सह लिया और इसीलिए हम गाते हैं - क्रूस के पास तू मुझे रख, यीशु प्यारे त्राता पापी वहां सोते से, मुफ्त में मुक्ति पाता क्रूस की मैं, क्रूस की मैं नित्य बड़ाई करूंगा जब तक मैं आनन्दित हो, पार न पहुंचूंगा। इस क्रूस की ओर जब हम दृष्टि लगाएंगे तो हमारे जीवन की पीड़ाएं, हमारे जीवन के अन्याय सब धूमिल हो जाएंगे और हम उत्साह से क्रूस की महिमा के गीत गा सकेंगे क्योंकि इसी क्रूस के रास्ते से पार होकर हमें प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन तक पहुंचने की निश्चित्ता मिलती है। परमेश्वर आपको आशीष दे।