संदर्भ: मत्ती 27ः27-31
क्रूस की यात्रा से पहले प्रभु यीशु असहनीय पीड़ाओं से गुज़रा। उसका अपमान किया गया, उस पर थूका गया, उसको मारा और पीटा गया, उसके कपड़े उतार लिए गए और फिर कांटों का ताज गूंथकर उसके सिर पर पहना दिया गया। प्रभु यीशु मसीह के दुखों को जब हम स्मरण करते हैं तो हम स्मरण करते हैं कि किस प्रकार वह आत्मिक पीड़ा से गुज़रा। हम इस बात को समझ नहीं सकते। हम कल्पना नहीं कर सकते, चित्रित नहीं कर सकते, शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते कि वह किस आत्मिक पीड़ा से गुज़रा होगा। उसकी आत्मिक पीड़ा उसकी मानसिक और शारीरिक पीड़ा से कहीं ज्य़ादा थी। क्योंकि वह अपनी निर्दोष, निष्कलंक और निष्पाप आत्मा में संसार में जितने लोग अब तक हुए थे, जितने उस समय थे और संसार के अन्त से पहले जितने लोग होने वाले थे; वह उन सबके पापों की ग्लानि का बोझ अपने ऊपर लेकर मर रहा था। हम उस आत्मिक पीड़ा का अहसास नहीं कर सकते। अगर हमसे कोई छोटी-सी भी ग़लती हो जाती है तो उसकी ग्लानि का बोझ हमारे हृदय में बना रहता है परन्तु प्रभु यीशु तो सारे संसार के पाप की ग्लानि का बोझ अपने ऊपर लिए हुए था। हम उसकी शारीरिक पीड़ाओं की व्यथा की चर्चा करते हैं, कि किस प्रकार से उसको मारा, कुचला गया और भयानक यातनाओं से होकर उसे गुज़रना पड़ा परन्तु इसी के साथ उसे मानसिक पीड़ा से भी गुज़रना पड़ा। जो मानसिक पीड़ा थी वह यह कि उसका अपमान किया गया। जब किसी व्यक्ति का अपमान हो तो वह भीतर से टूट जाता है क्योंकि यह अपमान उसकी भावनाओं और दिल पर प्रहार करता है। प्रभु यीशु मसीह के लिए दुख की बात यह थी कि उसका सार्वजनिक अपमान हुआ था। हज़ारों लोगों की भीड़ के सामने, शासक और न्यायी के सामने उसका अपमान हुआ था। हम जानते हैं कि जब सार्वजनिक अपमान होता है तो बहुत पीड़ा होती है। बहुत से लोगों के सामने यदि आपसे कोई कटु शब्द बोल दे, भीड़ के सामने अपमान कर दे तो वह चोट बहुत भयंकर होती है। सार्वजनिक अपमान बहुत शर्मनाक होता है क्योंकि यह सीधा भावनाओं और हृदय पर चोट करता है। इससे व्यक्ति बागी हो जाता है और बदले की भावना उसमें भड़क उठती है। प्रभु यीशु मसीह को हज़ारों के सामने मारा गया, लोगों के सामने पीटा गया, उसे नंगा किया गया। उसके मुंह पर थूका गया, उसका मज़ाक उड़ाया गया। मैं और आप उसकी मानसिक पीड़ा की कल्पना नहीं कर सकते। जब सारी पलटन के सामने उसे निर्वस्त्र किया गया तो न सिर्फ यह उसको अपमानित करने के लिए था बल्कि इस लिए भी कि लोग उसके घावों को देख सकें। “तब हाकिम के सिपाहियों ने यीशु को किले में ले जाकर सारी पलटन उसके चहुं ओर इकट्ठी की। और उसके कपड़े उतारकर उसे किरमिजी बागा पहनाया। और कांटों का मुकुट गूंथ कर उसके सिर पर रखा। और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेक कर उसे ठट्ठे में उड़ाने लगे, कि हे यहूदियों के राजा नमस्कार। और उस पर थूका; और वही सरकण्डा लेकर उसके सिर पर मारने लगे, जब वे उसका ठट्ठा कर चुके तो वह बागा उस पर से उतार कर फिर उसी के कपड़े उसे पहनाए और क्रूस पर चढ़ाने के लिए ले चले” (मत्ती 27ः27-31)। इस घटना से पहले पीलातुस ने उसे कोड़े लगवाने का आदेश दिया था और उसे वहां लाने से पहले कोड़े लगाए गए थे। ये कोड़े चमड़े के बने होते थे और बहुत लम्बे होते थे। कोड़े का अगला भाग जो शरीर पर लगता था उसमें लोहे की नुकीली कीलें लगाई जाती थीं। एक-एक कील तीन इंच की होती थी, उनमें चाकुओं के समान पैनापन होता था और कोड़े के इस भाग में हड्डियों के टुकड़े भी लगाए जाते थे। जोसेफस इतिहासकार ने लिखा है कि जब वह कोड़ा मारा जाता था तो उसमें लगी कीलें मांसपेशियों में गहराई तक घुस जाती थीं। उसके बाद जब कोड़े को खींचा जाता था तो वे कीलें चाकू की तरह मांसपेशियों को काट देती थीं और मांसपेशियां कट कर बाहर आ जाती थीं। इस प्रकार घण्टों कोड़ों से मारकर शरीर को तोड़ दिया जाता था। जोसेफस लिखता है कि कई लोग इन कोड़ों की मार खाने के दौरान ही मर जाते थे। प्रभु यीशु मसीह को ऐसी लहूलुहान स्थिति में लाकर पलटन के सामने नग्न किया गया और उसके बाद उसे बैंजनी बागा पहनाया गया। बैंजनी वस्त्र राजाओं का रंग होता है जिसे राज घराने के लोग पहनते हैं। प्रभु यीशु को यह बैंजनी बागा इसलिए नहीं पहनाया गया कि उसका सम्मान हो परन्तु इसलिए पहिनाया गया कि उसका अपमान हो, कि उसे अहसास दिलाया जाय कि तू कैसा राजा है, तेरा शरीर तो टूटा हुआ है, खून बह रहा है, मांसपेशियां कट गई हैं। इसके बाद प्रभु यीशु को कांटों का ताज गूंथ कर सिर में पहना दिया गया। उन दिनों में फिलिस्तीन देश में बहुत से प्रकार की कंटीली झाड़ियां हुआ करती थीं। जो सूखे हुए कांटे हुआ करते थे वे बहुत लम्बे होते थे। उन झाड़ियों को गूंथ कर सिपाही मुकुट बनाते थे और उसे इस प्रकार पहनाया जाता था कि कांटे सिर की त्वचा में घुस जाते थे। इतिहासकार लिखते हैं कि सामने की तरफ मुकुट में दो बहुत बड़े सूखे कांटे होते थे और जब वह ताज सिर में पहनाया जाता था तो वे कांटे माथे के बाजू में जो कोमल भाग होते हैं उनमें करीब दो-ढाई इंच तक घुस जाते थे और मस्तिष्क की परत तक पहुंच कर मस्तिष्क को क्षत-विक्षत कर देते थे। प्रभु यीशु मसीह को यह कांटों का ताज इस कारण पहनाया गया। लिखा है, जब उसे कांटों का ताज पहनाया गया तो उसका रक्त बहने लगा क्योंकि सिर पर लगी चोट में बहुत ज्य़ादा रक्तस्राव होता है। वैसे भी उसका बहुत खून बह चुका था, उसकी मांसपेशियां कट चुकी थीं परन्तु उसकी पीड़ा को बढ़ाने के लिए, उसके रक्तस्राव को बढ़ाने के लिए यह कांटों का ताज उसे पहनाया गया। प्रभु यीशु मसीह को कांटों का ताज जो पहनाया गया, उसका क्या महत्व है? आज के सन्दर्भ में मेरे और आपके लिए इस कांटों के ताज से क्या शिक्षा है? 1. कांटों का ताज परमेश्वर के श्राप का प्रतीक है:- अदन की वाटिका में आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ा, वे शैतान के बहकावे में आ गए और वहां पर पाप का जन्म हुआ। परमेश्वर की आज्ञा को जब उन्होंने तोड़ा तो वहां पर पाप आ गया और तब परमेश्वर नाराज़ हुआ। बाइबिल में उत्पत्ति की पुस्तक में देखें तो वहां से कांटों के ताज के तार जुड़े हुए हैं। “और आदम से उस (परमेश्वर) ने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय में मैंने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना, उसको तू ने खाया है, इसलिए भूमि तेरे कारण श्रापित है; तू उसकी उपज जीवन भर दुख के साथ खाया करेगा: और वह तेरे लिए कांटे और ऊंट कटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा” (उत्पत्ति 3ः17-18)। “पर यदि वह झाड़ी और ऊंट कटारे उगाती है, तो निकम्मी और स्रापित होने पर है, और उसका अन्त जलाया जाना है” (इब्रानियों 6ः8)। आदम और हव्वा के पाप के कारण भूमि स्रापित है और इस स्राप का परिणाम यह होगा कि भूमि कांटे और ऊंट कटारे उगाएगी। आदम और हव्वा के पाप का प्रभाव सारी मानव जाति पर पड़ा, सारी सृष्टि पर पड़ा और आज भी हमें देखने को मिलता है। जो झाड़ी ऊंट कटारे उगाती है, उसका जलाया जाना निश्चित है। इसलिए रोमियों 8ः22 में लिखा है, “क्योंकि हम जानते हैं कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कहरती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है”। इसी कारण आज भुईंडोल होते हैं, ज्वालामुखी फटते हैं, प्राकृतिक विपदाएं होती हैं क्योंकि परमेश्वर के स्राप का असर इस पृथ्वी और मनुष्यों पर पड़ा। जब प्रभु यीशु मसीह को यह कांटों का ताज पहनाया गया तो वह इस बात का प्रतीक था कि जो परमेश्वर का शाप था, और जिसका प्रभाव मनुष्यों पर होना था। परमेश्वर के जिस शाप से मनुष्यों की नियति निश्चित थी कि वे अनन्त विनाश को जाएंगे, उसे प्रभु यीशु मसीह ने स्वीकार कर लिया। उस शाप को प्रभु यीशु मसीह ने स्वीकार कर लिया, अपने सिर पर संजो लिया ताकि यह शाप मानवजाति पर से हट जाए। मुझे और आपको बचाने के लिए प्रभु यीशु मसीह ने इन कांटों के ताज को स्वीकार कर लिया। इसीलिए रोमियों 8ः1 में लिखा है “सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं”। यह अच्छी खबर है कि अब जो मसीह में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। यूहन्ना 1ः29 में लिखा है कि जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला इस प्रभु यीशु मसीह को निकट आते देखता है तो कहता है “देखो, यह परमेश्वर का मेम्ना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है”। यह वह मेम्ना है जो बलिदान होने के लिए आया है। जो अपने सिर पर, कांधे पर जगत का पाप उठा कर ले जाता है। प्रभु यीशु मसीह जब उस शाप को, उस प्रभाव को अपने सिर पर ले लेता है, तो फिर अनन्त मृत्यु का असर समाप्त हो जाता है। इसीलिए 1 कुरिन्थियों 15ः55 में पौलुस प्रेरित कहता है “मृत्यु तेरा डंक कहां रहा?” डंक में ज़हर होता है जो समाप्त कर देता है परन्तु उस ज़हर को प्रभु यीशु मसीह ने स्वीकार कर लिया। यीशु के साथ मृत्यु समाप्त हो गई और अनन्त जीवन का द्वार बन गई, अब मृत्यु का ज़हर समाप्त हो गया। प्रभु यीशु ने कांटों का ताज जो परमेश्वर के शाप का प्रतीक है उसे अपने सिर पर उठा लिया कि मानव-जाति के पाप उठा लिए जाएं। प्रश्न मेरे और आपके लिए यह है कि क्या वह शाप हमारे जीवनों से उठ गया है? वह शाप हमारे जीवनों से उठ गया है, यदि हम यीशु मसीह में बने हुए हैं। यदि नये जन्म का अनुभव हमने किया है और प्रभु हमारे हृदय में है, यदि प्रभु यीशु मसीह से हमारी बातचीत प्रार्थना के रूप में होती है, यदि उसके वचनों को हम पढ़ते हैं, यदि उसके पीछे चलने का हम प्रयास करते हैं, यदि हम उसकी देह अर्थात् कलीसिया से लिपटे रहते हैं। यदि हम प्रभु यीशु मसीह में हैं तो फिर वह शाप हम पर से उठ गया है क्योंकि जो मसीह यीशु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। कांटों का ताज परमेश्वर के शाप का प्रतीक है। 2. कांटों का ताज इस बात को प्रकट करता है कि परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य बहुमूल्य है:- यदि हम प्रश्न करें कि प्रभु यीशु मसीह ने इस पीड़ा को क्यों सहा? क्यों उसने कांटों का ताज पहना? तो उत्तर यह मिलेगा कि वह हमें बचाने के लिए आया। वह चाहता तो सारे दुश्मनों का तुरन्त नाश कर देता। स्वर्ग का अधिकार उसके हाथ में था, वह चाहता तो स्वर्गदूतों की सेना बुलाकर रोमी सम्राट की ताकत रोक सकता था, भीड़ को रोक सकता था, परन्तु उसने स्वयं अपनी इच्छा से बलिदान को स्वीकार कर लिया। लिखा हुआ है कि “मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूंढने और उनका उद्धार करने आया है” (लूका 19ः10)। यही उसके जीवन का उद्देश्य था। वह हमें बचाने के लिए आया था, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में बहुमूल्य है। यूहन्ना 10ः17-18 में प्रभु यीशु कहते हैं, “पिता इसलिए मुझसे प्रेम रखता है, कि मैं अपना प्राण देता हूंः मुझे उसके देने का भी अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है”। प्रभु यीशु अपनी इच्छा से अपना प्राण देता है क्योंकि मनुष्य उसकी दृष्टि में बहुमूल्य है। भजन संहिता 103ः3-4 में लिखा है “वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता और तेरे सब रोगों को चंगा करता है। वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करुणा और दया का मुकुट बांधता है”। आप इस चित्र की कल्पना करें कि प्रभु यीशु मसीह के सिर पर कांटों का ताज पहना दिया गया है, उसके सिर से खून निकल रहा है और वह आपके पास बैठकर आपके सिर पर करुणा और दया का मुकुट बांध रहा है। क्या ज़रूरत थी कि वह हमारे सिर पर करुणा और दया का मुकुट बांधे? क्या ज़रूरत थी कि वह अपने चेलों के गन्दे पैरों को धोए? क्या ज़रूरत थी कि वह अपमान सहे? क्योंकि वह मुझसे और आपसे प्रेम करता है। हो सकता है हम संसार की दृष्टि में कोई मूल्य न रखते हों। हो सकता है कि हम शासन की दृष्टि में कोई मूल्य न रखते हों, हो सकता है हम अपने अधिकारियों और पड़ोसियों की दृष्टि में कोई मूल्य न रखते हों; परन्तु जो बात है वह यह कि संसार के रचने वाले, सर्वज्ञानी, सर्वव्यापक, सर्वसामर्थी परमेश्वर की दृष्टि में मैं और आप बहुमूल्य हैं। हम इतने बहुमूल्य हैं कि हमारी ख़ातिर वह कांटों का ताज पहन लेता है। 3. कांटों का ताज हमारे लिए आशा का प्रतीक है:- प्रभु यीशु मसीह ने कांटो का ताज पहन लिया ताकि हमें जीवन का मुकुट मिल जाए। प्रभु यीशु मसीह ने इस अपमान को सह लिया ताकि स्वर्ग में हमारा सम्मान हो जाए। 2 तीमुथियुस 4ः8 में पौलुस प्रेरित कहता है कि “भविष्य में मेरे लिए धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु जो धर्मी, और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन् उन सबको भी जो उसके प्रकट होने को प्रिय जानते हैं”। पौलुस प्रेरित जिसने स्वर्ग का दर्शन देखा, वह कहता है कि भविष्य में मेरे लिए धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है जिसे प्रभु मुझे देगा। प्रभु यीशु मसीह ने कांटों का ताज पहन लिया ताकि हमको वह महिमा का मुकुट मिल सके। परन्तु इसी के साथ-साथ इस मुकुट के सम्बन्ध में एक बात और है। प्रकाशितवाक्य 2ः10 में लिखा है “जो दुख तुझको झेलने होंगे, उनसे मत डरः क्योंकि देखो, शैतान तुम में से कितनों को जेलखाने में डालने पर है, ताकि तुम परखे जाओ; और तुम्हें दस दिन तक क्लेश उठाना होगाः प्राण देने तक विश्वासी रह; तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा”। वे जो जीवन के अन्त की तैयारी कर चुके हैं, जो प्रभु यीशु मसीह से मिलने को तैयार हैं, जो इस बात के लिए तैयार हैं कि चाहे मृत्यु हो, पृथ्वी का अन्त आ जाए या प्रभु का दूसरा आगमन हो जाए; उन सबके लिए प्रतिज्ञा है कि परमेश्वर उनको जीवन का मुकुट देगा परन्तु शर्त यही है कि प्राण देने तक विश्वासी रहना है। इस क्रूस की यात्रा में हम किसके समान हैं? कहीं हम शिमौन कुरैनी के समान तो नहीं जो कुछ देर के लिए प्रभु यीशु मसीह का क्रूस उठाता है और उसके बाद उसका कोई ज़िक्र नहीं। कहीं हम उसके समान तो नहीं कि बस थोड़ी देर के लिए प्रभु के साथ हैं परन्तु हमारा जीवन सतही है, हम सिर्फ नाम के मसीही हैं। कहीं हम लूका 23ः27 में वर्णित उन स्त्रियों के समान तो नहीं जो विलाप कर रहीं थीं। जिन्हें प्रभु के साथ सहानुभूति तो है परन्तु क्रूस के उस क़ाफिले में शामिल होने का समर्पण नहीं है। हम में से कितने लोग हैं कि जब पीड़ा आती है, कोई गम्भीर बीमारी आती है तो हम प्रभु की ओर देखते हैं, उसे पुकारते हैं परन्तु जब समस्या समाप्त हो जाती है तो हम लोप हो जाते हैं। या फिर हम उस डाकू के समान हैं जिसने अपने जीवन के अन्तिम समय में यीशु को पहचान लिया। जो पहचान गया कि इसका राज्य तो इसकी मृत्यु के बाद प्रारम्भ होगा। यह अनन्त का प्रभु है, यह मृत्यु तो इसका राज्याभिषेक है, यह मृत्यु तो उसे वह सिंहासन देगी जो स्वर्ग में सबसे ऊंचा सिंहासन है। वह कहता है- हे प्रभु, जब तू अपने राज्य में आए, तो मेरी सुधि लेना। क्या हम जानते हैं कि वह अनन्त का प्रभु है? क्या हमने उसकी पीड़ा को पहचाना है? क्रूस की यात्रा में क्या वास्तव में हमने अपना जीवन उसे दिया है? किसी शहर के पास एक कस्बे में एक छोटा-सा बच्चा अपने मां-बाप के साथ मेले में गया हुआ था। चार-पांच साल की उम्र रही होगी उसकी। अचानक वह अपने मां-बाप से बिछड़ गया। काफी देर तक वह रोता और चिल्लाता रहा और अपने मां-बाप को ढूंढता रहा। तब कुछ पुलिस वाले उसके पास आते हैं। उससे उसका नाम और पता पूछते हैं। उसे अपने शहर का नाम तो मालूम है परन्तु अपने घर का पता नहीं मालूम। पुलिस वाले परेशान हैं कि ऐसे में किस तरह उसके घर तक उसे पहुंचाएंगे। वे उससे पूछते हैं कि यह तो बड़ा मुश्किल है कि न तुम्हें अपने घर का पता मालूम है और न उस जगह पर तुम हमें ले जा सकते हो, हम कैसे ढूंढेंगे। तब वह बच्चा कहता है कि मेरे शहर में एक बड़ा चर्च है जिसके कंगूरे पर बहुत बड़ा क्रूस लगा हुआ है, मुझे उस क्रूस के पास ले चलो क्योंकि वहां से मुझे अपना घर दिखाई देता है। यदि इस सप्ताह में हम भी यीशु के क्रूस के पास आ गए तो फिर उस अनन्त घर तक भी हम पहुंच जाएंगे। प्रभु यीशु ने कांटों का ताज पहना ताकि परमेश्वर का शाप हमारे जीवनों से हटा दे, हमें यह अहसास दिलाए कि हम उसकी दृष्टि में बहुमूल्य हैं और यह कांटों का ताज इसलिए पहना ताकि हमें महिमा का मुकुट पहना सके। परमेश्वर हमें समझ दे कि हम उसके क्रूस की छाया में आकर अपने आपको उसे समर्पित करें और प्राण देने तक विश्वासी ठहर सकें। परमेश्वर आपको आशीष दे।