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संदर्भ: मत्ती 21ः1-11

खजूर के रविवार की घटना के बारे में हम सब जानते हैं। इस घटना में एक विशेष बात है कि यह घटना चारों सुसमाचारों में पाई जाती है जबकि प्रभु यीशु के जन्म की घटना का वर्णन मरकुस और यूहन्ना में नहीं पाया जाता। यह बड़ी अजीब-सी बात लगती है कि जब प्रभु यीशु का जन्म होता है, वह इस संसार में आता है तो इस घटना का वर्णन मरकुस, यूहन्ना नहीं करते। परन्तु चारों सुसमाचार में इस खजूर के रविवार की घटना का वर्णन है।

इस घटना के परिप्रेक्ष्य को यदि हम देखें तो यह फसह के पर्व का समय था। जब इस्राएली मिस्र की गु़लामी में थे तो उन्हें बन्धुवाई से छुड़ाने के लिए परमेश्वर ने मिस्रियों पर दस विपत्तियां भेजीं। इन दस विपत्तियों में से एक विपत्ति पहिलौठों के मारे जाने की थी। इसके लिए परमेश्वर की ओर से एक व्यवस्था की गयी कि जब पहिलौठों को मारने के लिए मृत्यु का दूत आया तो जिन इस्राएलियों के घरों की चैखटों पर मेम्ने का लहू लगा था, वहां से वह आगे बढ़ जाता था। इसलिए इसे अंग्रेज़ी में Pass over कहते हैं अर्थात् वह वहां से गुज़र जाता था। उस घर के पहिलौठे को नहीं मारा जाता था और इसीलिए इसे फसह का पर्व कहते हैं।

यह इतना बड़ा पर्व था कि इसे मनाने देश-विदेश से लोग आते थे और लगभग 30 लाख यहूदी यरूशलेम में जमा होते थे। कल्पना कीजिए, कि यरूशलेम नगर का मन्दिर सारी घटनाओं का केन्द्र है और फसह का पर्व मनाने के लिए वहां 30 लाख यहूदी जमा हुए हैं।

फसह के पर्व की केन्द्रीय बात यह है कि परमेश्वर बचाने वाला है। परमेश्वर ने जिस प्रकार लहू के द्वारा इस्राएलियों के पहिलौठों को बचाया था उसी प्रकार परमेश्वर ने यहां पर एक और व्यवस्था की। यह व्यवस्था परमेश्वर ने सिर्फ इस्राएलियों के लिए ही नहीं बल्कि संसार के सारे लोगों, जातियों और हर एक व्यक्ति के लिए की, कि प्रभु यीशु इस संसार में फसह का मेम्ना बनकर बलिदान होने के लिए आया। फसह के पर्व में एक और मेम्ना बलिदान होने के लिए तैयार हुआ। इस घटना की केन्द्रीय बात यही है कि परमेश्वर बचाने वाला है।

जब प्रभु यीशु ने इस यात्रा को प्रारम्भ किया तो लिखा हुआ है कि- उसने दृढ़ता से अपना मुख यरूशलेम की ओर कर लिया। उसने दृढ़ता से अपना मुख क्रूस की ओर कर लिया। उसने दृढ़ता से अपना मुख उस रास्ते पर कर लिया जो कलवरी का रास्ता था। इस सप्ताह मेें, यह प्रभु यीशु कोई विचित्र सा, भिन्न-सा व्यक्ति था। अब वह किसी से यह नहीं कहता कि जाकर किसी से न कहना। अब वह विजय के साथ, एक बड़े जुलूस के साथ, लगभग 30 लाख लोगों की भीड़ के साथ; यरूशलेम की सड़कों पर जाता है।

प्रभु यीशु की चाल में कुछ भिन्नता है, उसके व्यवहार में कुछ भिन्नता है। इस संसार में अपने स्वर्गारोहण के पहले, अपनी मृत्यु के पहले, अपने जीवन के अन्तिम सप्ताह में जब वह यरूशलेम में प्रवेश करता है तो लोग उसकी होशन्ना के नारे लगाते हैं। होशन्ना जिसका अर्थ है -Save us now अर्थात् हमें अभी बचा।

यहां पर जो बचाने की बात है उसकी पृष्ठभूमि में देखें तो पुराने और नये नियम के बीच में 400 वर्षों का अन्तराल है। यह ख़ामोशी का समय है। इस समय के बारे में इतिहासकार कुछ नहीं लिखते, बाइबिल के विद्वान कोई टीका-टिप्पणी नहीं करते। इस्राएल पर रोम का शासन है परन्तु रोमी सम्राट और शासन तंत्र पंगु हो गया है। अर्थ व्यवस्था असफल हो गई है। कानून व्यवस्था समाप्त हो चुकी है, हर तरफ भ्रष्टाचार फैला हुआ है। लोग रोमी सम्राट से, रोमी शासन से त्रस्त हो चुके हैं, और इसलिए वे कह रहे हैं कि हमें अभी बचा। हमें कोई ऐसा राजा चाहिए जो हमें बचाए। इसलिए वे होशन्ना के नारे लगाते हैं क्योंकि वे चाहते थे कि प्रभु यीशु उनका राजा बन जाए।

एक और बात यहां पर देखने को मिलती है कि प्रभु यीशु के आने पर लोग खजूर की डालियां लेकर आते हैं और उन्हें बिछाते हैं। उन दिनों जब कोई राजा विजय प्राप्त करके नगर में प्रवेश करता था तो उसके देश में बड़ा जश्न मनाया जाता था और लोग खजूर की डालियां लेकर उसका स्वागत करते थे क्योंकि ये खजूर की डालियां जीत का प्रतीक होती थीं।

प्रकाशितवाक्य 7ः9-10 में लिखा है -“इस के बाद मैं ने दृष्टि की, और देखो, हर एक जाति, और कुल और भाषा में से एक ऐसी बड़ी भीड़, जिसे कोई गिन नहीं सकता था, श्वेत वस्त्र पहिने और अपने हाथों में खजूर की डालियां लिए हुए सिंहासन के सामने और मेम्ने के सामने खड़ी है, और बड़े शब्द से पुकारकर कहती है, उद्धार के लिए हमारे परमेश्वर का, जो सिंहासन पर बैठा है, और मेम्ने का जय-जयकार हो!” यह स्वर्ग में बचाए हुए लोगों की भीड़ है। यह प्रभु यीशु के पीछे चलने वालों की भीड़ है। लिखा है- ये मेम्ने के सामने खड़े थे। ये सिंहासन के सामने खड़े थे और इनके हाथों में खजूर की डालियां थीं क्योंकि ये विजय पाए हुए लोग थे जो जीत का जश्न मना रहे थे।

प्रश्न यह उठता है कि आज मेरे और आपके लिए लगभग 2000 साल पुरानी इस घटना का क्या महत्व है? इस घटना का हमारे जीवन के लिए क्या अर्थ हो सकता है, कौन-सी शिक्षा हमें मिल सकती है? यदि इस विजय के जुलूस की, यरूशलेम में प्रभु यीशु के इस प्रवेश की इस घटना को देखें तो तीन बातें दिखाई देती हैं।

1. जो भी प्रभु यीशु के सम्पर्क में आता है, चाहे वह कितना ही महत्वहीन हो, वह महत्वपूर्ण हो जाता है:- हम पाते हैं कि प्रभु यीशु गदही के बच्चे पर बैठकर नगर में प्रवेश करता है। बड़ी अजीब-सी बात लगती है कि जो राजाओं का राजा है, जो प्रभुओं का प्रभु है, स्वर्ग जिसका सिंहासन और पृथ्वी जिसकी चैकी है; वह प्रभु यीशु जब अपने जीवन के अन्तिम सप्ताह में यरूशलेम में प्रवेश करता है, तो गदही के बच्चे पर बैठकर प्रवेश करता है। प्रभु यीशु यदि चाहता तो घोड़े पर सवार होकर आ सकता था, न्यायी के समान आ सकता था, एक बड़े पराक्रमी राजा के रूप में आ सकता था। उन दिनों जब राजा युद्ध के लिए जाता था या युद्ध से लौटता था तो घोड़े पर बैठकर आता था। परन्तु प्रभु यीशु तलवार चलाने के लिए नहीं आया था। वह एक ऐसा राजा था जो सेवा करने के लिए आया। वह एक ऐसा राजा था जो अपने आपको बलिदान करने के लिए आया। वह एक ऐसा राजा था जो आत्मिक राजा था, जो लोगों को बचाने के लिए आया।

वह यरूशलेम में गदही के बच्चे पर बैठ कर आता है। उस समय में भी गदहे का कोई बहुत बड़ा महत्व नहीं था परन्तु प्रभु यीशु उस गदही के बच्चे को चुनता है और उस पर बैठकर अपने जीवन के सबसे बड़े जुलूस का नेतृत्व करता है। जो राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है, वह गदहे को चुनता है और वह महत्वहीन जानवर महत्वपूर्ण हो जाता है।

4 दिसम्बर 1977 को मध्य अफ्रीका में एक बहुत विराट जुलूस निकला। इस जुलूस की चर्चा आज भी इतिहास में की जाती है। यह जुलूस बोकासा द फर्स्ट नामक व्यक्ति के राज्याभिषेक का जुलूस था। जब उसे राजा बनाया गया तो एक बहुत बड़ा जश्न मनाया गया। शासन ने उस जुलूस और जश्न पर 25 करोड़ रुपये खर्च किए। 4 दिसम्बर 1977 को सुबह 10 बजकर 10 मिनिट पर 2000 बिगुलें एक साथ बजीं। 500 ड्रम्स की आवाज़, धमाकों और आतिशबाज़ी के साथ राजा बोकासा द फस्र्ट के जुलूस ने नगर में प्रवेश किया। लिखा है- उस जुलूस में सबसे पहले उसके 29 वैधानिक बच्चे थे, उसके बाद उसकी 9 पत्नियां थीं। उसकी हर एक पत्नी की पोशाक 4 लाख रुपये की थी। अपनी पत्नियों और बच्चों के बाद बोकासा आया और अपनी राजगद्दी पर बैठा। उसके सिंहासन की कीमत 2 करोड़ रुपये थी। उसके बाद उसका राज्याभिषेक किया गया। उसे जो मुकुट पहनाया गया उस मुकुट की कीमत सवा करोड़ रुपये थी। इस सोने के मुकुट पर हीरे-मोती जड़े हुए थे।

परन्तु इस जुलूस और प्रभु यीशु के जुलूस में एक बड़ा अन्तर देखने को मिलता है। प्रभु यीशु कांटों का ताज पहनने के लिए, अपना रक्त बहाने के लिए, संसार के पापों की कीमत चुकाने के लिए और परमेश्वर के मेम्ने के रूप में अपने आपको बलिदान करने के लिए आया। यह प्रभु यीशु गदही के बच्चे पर सवार होकर जाता है। आज उस गदही के बच्चे की चर्चा दुनिया के कोने-कोने में होती है क्योंकि जो महत्वहीन है जब प्रभु यीशु के सम्पर्क में आता है तो महत्वपूर्ण बन जाता है।

एक और जगह है, जहां हज़ारों लोगों की भीड़ है। एक छोटा-सा बालक है, जिसके पास 5 रोटियां और 2 मछलियां हैं। सवाल था कि उस हज़ारों की भीड़ की भूख को कैसे तृप्त किया जाएगा, जिसमें 5 हज़ार पुरुष थे। टीकाकारों का कहना है कि सब लोगों को मिलाकर वहां 18 से 20 हज़ार लोग थे। परन्तु वह छोटा-सा बालक, उसकी 5 रोटियां और 2 मछलियां जब प्रभु यीशु के हाथ में आती हैं तो इतनी आशीषित हो जातीं हैं कि 20 हज़ार लोगों की भूख तृप्त हो जाती है। यहां तक कि चेले बची हुई रोटियों के 12 टोकरे उठाते हैं। हम जानते हैं कि मिट्टी और थूक की क्या क़ीमत होती है परन्तु जब यह मिट्टी प्रभु यीशु के हाथ में आती है, वह उस मिट्टी को अपने थूक से सान कर एक अन्धे की आंख पर लगाता है तो उसकी आंखों में ज्योति आ जाती है। थोड़ी-सी मिट्टी है, थोड़ा-सा थूक है परन्तु प्रभु यीशु का हाथ जब उसमें लग जाता है तो वह जो महत्वहीन है, महत्वपूर्ण हो जाता है।

नासरत नगर महत्वहीन है, कलुषित है, भ्रष्टता से भरा हुआ है। यह नगर समुद्र के किनारे पर था। यहां व्यापारी व्यापार करने के लिए आते थे। वहां पर वेश्यावृत्ति होती थी, जुआ खेला जाता था और सब प्रकार की बुराइयां मौजूद थीं। मरियम इसी नगर की रहने वाली थी।

यूहन्ना 1ः46 में नतनएल कहता है - “क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है?” यह जो भ्रष्टता का शहर है, जो अन्धकार से भरा शहर है, जहां जुआ घर हैं, जहां देह व्यापार होता है उस नगर से क्या कोई भली और अच्छी वस्तु निकल सकती है? परन्तु जब प्रभु यीशु आता है तो उसे यीशु नासरी के नाम से जाना जाता है। नासरत नगर प्रसिद्ध हो जाता है। आज इस नगर की चर्चा दुनिया के कोने-कोने में होती है क्योंकि प्रभु यीशु उस नासरत नगर का रहने वाला था। जो नासरत नगर महत्वहीन था, वह महत्वपूर्ण हो जाता है।

बाहरी वस्तुएं हमें महत्वपूर्ण नहीं बना सकतीं, चाहे हमारे पास शानदार गाड़ी हो, लोगों की दृष्टि में हम बहुत महत्वपूर्ण हों परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में हमारा कोई महत्व नहीं। हम चाहे ताजमहल जैसा घर बना लें, चाहे हम दुनिया घूम लें, संसार का ज्ञान हमें भरपूरी से हो, हम स्वर्गदूतों की बोलियां बोलने लगें परन्तु प्रभु यीशु मसीह अगर जीवन में नहीं तो हमारा जीवन और उसकी नियति सिर्फ़ मिट्टी और राख है। व्यक्ति महत्वपूर्ण तब होता है जब प्रभु यीशु उसके जीवन में आता है। जब प्रभु यीशु से उसका सम्पर्क होता है तो वह व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाता है।

हो सकता है, आज हम में से कितने ऐसे हों जो उदास हों, निराश हों। हमें ऐसा लगता हो कि हमारा तो कोई महत्व ही नहीं, हमें तो इस संसार में कोई नहीं जानता। हो सकता है हम में से कुछ ऐसे हों जिनकी उम्र ढल गई और उन्हें लगता है कि अब तो हम किसी काम के नहीं रह गए, बस मृत्यु का इन्तज़ार कर रहे हैं। बहुतों को ऐसा लगता हो कि हमारे अधिकारी हमसे खुश नहीं हैं, या फिर हम खुद अपने काम से संतुष्ट नहीं हैं, हमारा कोई मित्र नहीं है, इस संसार में हमारी कोई अहमियत नहीं है। परन्तु प्रियो, व्यक्ति तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब प्रभु यीशु उसके जीवन में आ जाता है क्योंकि यह प्रभु यीशु हमें स्वर्ग की नागरिकता देता है। यह प्रभु यीशु मसीह हमें स्वर्ग का सिंहासन देता है। वह हमारे लिए स्वर्ग में भवन तैयार करता है। इसलिए यदि संसार की दृष्टि में हम महत्वहीन हों, लोग हमारा तिरस्कार करते हों, हमारा अपमान करते हों परन्तु प्रभु यीशु अगर हमारे दिलों में है तो हम परमेश्वर की दृष्टि में महत्वपूर्ण हैं। बाइबिल में हमारे लिए लिखा है- तुम चुने हुए लोग, राजपदधारी, याजकों का समाज हो। तुम चुने हुए लोग हो, मेरे पुत्र के लोहू से मैंने तुम्हारा अभिषेक किया है। तुम महत्वपूर्ण लोग हो।

2. जब प्रभु यीशु हमारे जीवनों में आता है तो नकारात्मक परिस्थितियां भी सकारात्मक हो जाती हैं:- पुराने और नये नियम के बीच में जो 400 वर्षों का अन्तराल था, वह अन्धकार से भरा हुआ समय था, वह आशा-रहित समय था। तब लोग कहते हैं- कौन है हमें बचाने वाला? उसके बाद हम जानते हैं कि स्वर्गदूत उतरते हैं और सन्देश देते हैं और एक कुंवारी गर्भवती होती है। एक पुत्र उत्पन्न होता है और स्वर्गदूत उस युवती से कहते हैं - तू इसका नाम इम्मानुएल रखना अर्थात् परमेश्वर हमारे साथ। इसका नाम यीशु रखना क्योंकि यह अपने लोगों का उद्धार करेगा। यह सब में जीवन की लहर फूंकेगा। जब प्रभु यीशु संसार में जन्म लेता है तब एक नई आशा जागती है। लोग कहते हैं इसे राजा बनाना चाहिए, क्योंकि यदि यह राजा बन गया तो कोई भी भूखा नहीं होगा, क्योंकि यह तो पांच रोटी और दो मछली से हज़ारों की भूख तृप्त कर देता है। यह राजा बन जाएगा तो कोई रोगी नहीं होगा क्योंकि इसके कहने मात्र से चंगाई मिल जाती है, इसके वस्त्र की कोर के स्पर्श से लोग चंगे हो जाते हैं। यह राजा बन जाएगा तो कोई मरेगा नहीं क्योंकि जब यह मृतकों को छूता है तो उनमें जीवन आ जाता है।

उसके बाद हम पाते हैं कि यीशु मसीह यरूशलेम में प्रवेश करता है। लोग कहते हैं, होशन्ना, होशन्ना, हमें बचा। परन्तु प्रभु यीशु को पकड़ लिया जाता है। उसे 30 चान्दी के सिक्कों में बेच दिया जाता है। उसे क्रूस पर चढ़ा कर मृत्युदण्ड दे दिया जाता है। लगता है, सब कुछ समाप्त हो गया। अब चेलों के पास कोई आशा नहीं रही। वे वापस अपने पुराने धन्धे की ओर लौट जाते हैं, मछली पकड़ने लगते हैं।

पतरस कहता है - मैं इस व्यक्ति को जानता भी नहीं। मन्दिर का पर्दा फट जाता है; चट्टानें तड़क जाती हैं। एक र्भुइंडोल होता है, क्योंकि जो सृष्टिकत्र्ता था वह अपनी सृष्टि के लिए मर रहा है। सब तरफ अन्धकार छा गया। परन्तु प्रभु यीशु परिस्थितियों को बदलता है। यह प्रभु यीशु है जो थूक, कोड़ों की मार, अपमान, तिरस्कार, धोखे और क्रूस को लेकर; मृत्यु को अनन्त जीवन के द्वार में परिणित कर देता है।

जब हम अपने जीवन के पापों को, कुण्ठाओं को, ग्लानि को, अपने जीवन में जो ग़लत काम हमने किए हैं, उन्हें लेकर प्रभु यीशु के पास आते हैं तो वह कहता है - तुम एक नई सृष्टि हो, पुरानी बातें बीत गईं। देखो अब वे सब नई हो गईं। यह प्रभु यीशु हमारे पापों को लेकर उन्हें गहरे समुद्र में दफ़न कर देता है और उनका स्मरण भी नहीं करता। प्रभु यीशु नकारात्मक परिस्थिति को सकारात्मक परिस्थिति में बदल देता है।

सुसमाचारों में वर्णन है कि प्रभु यीशु के मित्र लाजर की मृत्यु को चार दिन हो चुके थे और उसे दफ़न कर दिया गया था । तब प्रभु यीशु आता है। मारथा उससे कहती है - हे प्रभु, अब तो उसके शरीर में से दुर्गंध आती है परन्तु तब प्रभु यीशु लाजर को आवाज़ देता है - हे लाजर निकल आ। वह मुर्दा लाजर प्रभु यीशु की आवाज़ सुनकर जीवित हो जाता है और उसकी गवाही प्रभु यीशु के मसीहा होने की गवाही बन जाती है।

प्रभु यीशु नाईन नगर को जाता है और नगर के द्वार पर उसको एक विधवा दिखाई देती है जो अपने जवान बेटे की लाश लेकर जा रही है। प्रभु यीशु उस विधवा के आंसुओं को देखता है और उस जवान की अर्थी के पास जाकर कहता है- हे जवान, मैं तुझसे कहता हूं कि उठ। तब लिखा हुआ है- वह जो मर गया था वह जीवित हो गया। जो शव यात्रा थी वह विजय के जुलूस में परिणित हो जाती है क्योंकि प्रभु यीशु वहां पर मौज़ूद है, जो नकारात्मक परिस्थितियों को लेकर सकारात्मक में बदल देता है।

हो सकता है, आज आप किसी नकारात्मक परिस्थिति से गुज़र रहे हों। दिल में कुछ ऐसे दर्द हों, जिन्हें व्यक्त नहीं किया जा सकता। मन में कुछ ऐसी बातें हों जिन्हें होठों पर नहीं लाया जा सकता। कुछ ग्लानि, पीड़ाओं का बोध हो, हमें कोई रास्ता नहीं दिखाई देता हो, हमें समझ में नहीं आता हो कि इस परिस्थिति से कैसे निपटेंगे। परन्तु मेरे प्रियो, अगर हम प्रभु को अवसर देंगे कि वह हमारे जीवनों में काम करे, अगर हम उस पर विश्वास करेंगे तो यह नकारात्मक परिस्थिति हमारे जीवन की गवाही बन जाएगी। क्योंकि जब प्रभु यीशु से सम्पर्क होता है, उसका स्पर्श होता है तो नकारात्मक सकारात्मक बन जाता है।

प्रभु यीशु क्रूस की मृत्यु को लेकर अनन्त जीवन का द्वार मेरे और आपके लिए खोल देता है। इसीलिए किसी ने कहा है कि - प्रभु यीशु की मृत्यु में, मृत्यु की मृत्यु हो गई।

3. प्रभु यीशु के सम्पर्क में आकर निकृष्ट उत्कृष्ट हो जाता है:- इस्राएल में उन दिनों जब कोई राजा युद्ध करने के लिए जाता था या युद्ध से लौटता था तो वह घोड़े पर सवार होकर जाता था। परन्तु जब राजा मेल कराने या शान्ति का सन्देश लेकर आता था तो वह गदहे पर सवार होकर आता था। प्रभु यीशु गदहे पर बैठकर आता है और जो निकृष्ट जानवर है, वह उत्कृष्ट बन जाता है।

क्रूस पर डाकू प्रभु यीशु के दांयी तरफ लटका हुआ है। वह डाकू जिसने बलात्कार किए होंगे, डाके डाले होंगे, उसे मृत्युदण्ड मिला। क्रूस पर लटका हुआ यह व्यक्ति जो संसार की दृष्टि में निकृष्ट और तिरस्कृत है, प्रभु यीशु के सम्पर्क में आता है। उसे यह अहसास होता है कि प्रभु यीशु मुक्तिदाता है, त्राणकत्र्ता है, पापों से क्षमा देने वाला है और यह डाकू कहता है- जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी सुधि लेना। प्रभु यीशु इस डाकू से कहता है - मैं तुझ से सच-सच कहता हूं कि तू आज ही मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा। निकृष्ट उत्कृष्ट बन जाता है। जो संसार की दृष्टि में तिरस्कृत और अपमानित है वह स्वर्ग के राज्य में गौरवान्वित हो जाता है। सामरी स्त्री, जिसके जीवन में पाप भरा हुआ है, जब प्रभु यीशु के सम्पर्क में आती है तो प्रचारिका बन जाती है। लूटने वाला जक्कई जब प्रभु यीशु के सम्पर्क में आता है तो बांटने वाला बन जाता है। वेश्या जो लोगों की दृष्टि में निकृष्ट है, जब प्रभु यीशु के सम्पर्क में आती है, उसके उद्धार को स्वीकार करती है तो उत्कृष्ट बन जाती है, प्रभु यीशु की आराधिका बन जाती है।

वह पतरस जो प्रभु यीशु को जानने से भी मुकर गया था, प्रभु यीशु पुनरुत्थान के बाद उसके पास आता है और प्रभु यीशु उससे कहता है - जा मेरी भेड़ों को चरा। तब यह इन्कार कर देनेवाला पतरस पिन्तेकुस्त के दिन यरूशलेम में लाखों लोगों के सामने सन्देश देता है, और कहता है कि तुमने जिसकी हत्या कर दी उसको परमेश्वर की सामर्थ्य ने फिर से जिला उठाया। उसके बाद लिखा है - लोगों के हृदय छिद गए। यह पतरस प्रभु यीशु की गवाही दृढ़ता से देता है क्योंकि उसके पुनरुत्थान का प्रभाव पतरस पर पड़ा था। वह प्रभु यीशु के सम्पर्क में आ गया था।

मरकुस रचित सुसमाचार में एक व्यक्ति का वर्णन है जो दुष्टात्मा से ग्रसित था, जो क़ब्रों में रहा करता था। जो नग्न रहा करता था, लोग जिसे ज़ंजीरों से बांधते थे। वह व्यक्ति एक दिन प्रभु यीशु के सम्पर्क में आता है, उसे पहचानता है, उसकी आज्ञा को मानता है और दुष्टात्माओं से मुक्त हो जाता है। मरकुस 5ः20 में, इस व्यक्ति के लिए लिखा है - वह जाकर दिकापुलिस में इस बात का प्रचार करने लगा कि यीशु ने मेरे लिए कैसे बड़े-बड़े काम किए; और सब लोग अचम्भा करते थे।

1 कुरिन्थियों 1ः27 में पौलुस लिखता है - परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया कि ज्ञानवानों को लज्जित करे, और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है कि बलवानों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन्! जो हैं भी नहीं उनको भी चुन लिया कि उन्हें जो हैं, व्यर्थ ठहराए।

यूहन्ना 12ः19 में लिखा है - तब फरीसियों ने आपस में कहा, “सोचो तो सही कि तुम से कुछ नहीं बन पड़ता। देखो, संसार उसके पीछे हो चला है”।

आज प्रभु यीशु का वचन संसार के कोने-कोने में पहुंच रहा है। आज संसार में सबसे अधिक लोग प्रभु यीशु के पीछे चल रहे हैं। क्यों? क्योंकि जो महत्वहीन हैं, वे महत्वपूर्ण हो जाते हैं। नकारात्मक परिस्थितियां सकारात्मक में बदल जाती हैं। जो संसार की दृष्टि में निकृष्ट हैं वह उत्कृष्ट हो जाते हैं।

डाॅ. पाॅल ब्राइन्ट एक बहुत विख्यात सर्जन हुए, जिन्होंने कोढ़ियों के बीच काम किया। अपनी लेखनी में, वह दक्षिण अफ्रीका की एक घटना का वर्णन करते हैं। एक बार कुछ शिकारी शिकार करने निकले। घूमते-घूमते सुबह हो गई परन्तु कुछ भी नहीं मिला। तब उन्होंने देखा कि एक पहाड़ी पर गुफ़ा के पास एक बोरे में कुछ बन्धा हुआ पड़ा है और उसमें कुछ हलचल है। उन्होंने उस बोरे को खोला तो देखा कि तीन वर्ष की उम्र का एक बच्चा था, जिसे किसी ने बोरे में बांधकर उस जंगल में मरने के लिए फेंक दिया था। उन शिकारियों ने पाया कि उस बच्चे में जान थी लेकिन वह कोढ़ से ग्रसित था। उसकी नाक गली हुई थी, उसके गालों में छेद था, उसकी एक आंख ख़राब थी और तालू फटे हुए थे। उसके हाथ की उंगलियां भी गली हुईं थीं। उसकी ऐसी स्थिति थी कि उसे छूने में भी घिन आए। ये शिकारी किसी प्रकार उस बच्चे को डाॅक्टर पाॅल ब्राइन्ट के पास लेकर आए। डाॅ. ब्राइन्ट ने उस बच्चे को स्वीकार किया, उसे शहर के अस्पताल लेकर आए और उसका नाम सैमुएल जाॅन्सन ब्राइन्ट रखा। उन्होंने उसकी प्लास्टिक सर्जरी की। उसका हाथ बनाया, उसका तालू ठीक किया और उसे अपने घर में रखा। उन्होंने उसे प्रभु यीशु के बारे में शिक्षा दी।

उसके कुछ वर्षों बाद दक्षिण अफ्रीका में एक नाम बहुत चर्चित होने लगा। लोग पूछने लगे कि यह कौन सा प्रचारक है जो बीहड़ जंगलों में जा कर प्रचार कर रहा है। जिसने पांच वर्ष में 20 कलीसियाएं स्थापित की हैं। जिसने हज़ारों लोगों को बपतिस्मा दिया है। तब पता चलता है कि इसका नाम सैमुएल जाॅन्सन ब्राइन्ट है। यह वही बालक है जिसे बोरे में भरकर, गले हाथ-पैरों के साथ आशारहित स्थिति में फेंक दिया गया था। परन्तु किसी ने उसे अपनाया, गले से लगाया। उसे प्रभु यीशु का सुसमाचार सुनाया और यह बालक बड़ा होकर विश्व विख्यात प्रचारक बन गया। जो हज़ारों लोगों को प्रभु के पास लेकर आया है।

मेरे प्रियो, प्रभु यीशु के सम्पर्क में आने से संसार की दृष्टि में जो महत्वहीन है, वह परमेश्वर की दृष्टि में महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रभु यीशु के सम्पर्क में आने से नकारात्मक परिस्थिति सकारात्मक बन जाती है। जो क्रूस है, जो दण्ड देने का यंत्र है वह महिमामय बन जाता है।

आज हम गाते हैं - क्रूस की मैं, क्रूस की मैं, नित्य बड़ाई करूंगा। जब तक मैं आनन्दित हो, स्वर्ग न पहुंचूंगा।

प्रभु यीशु के सम्पर्क में आने से जो निकृष्ट है वह उत्कृष्ट हो जाता है। आज हमारे लिए भी यही आशा है, यदि हम प्रभु यीशु को अपने दिल में जगह देते हैं।

परमेश्वर आपको आशीष दे।