संदर्भ: लूका 4ः1-13
दक्षिणी अमेरिका के जंगलों में एक लता पाई जाती है जो बहुत खूबसूरत होती है। जिसकी पत्तियां बहुत हरी-भरी और चैड़ी होती हैं। इसके फूल रंग-बिरंगे होते हैं। इस लता को मेटाडोर कहा जाता है। इस लता की यह विशेषता होती है कि जैसे ही यह अंकुरित होती है इसमें फूल लगने शुरू हो जाते हैं। मेटाडोर शब्द का अर्थ होता है, हत्यारा (किलर)। यह लता परजीवी होती है और जिस पेड़ पर यह लता चढ़ती है उस पेड़ को सुखा देती है। उस पेड़ को खोखला करके समाप्त कर देती है। इसी प्रकार अमेज़न नदी के किनारे पर कुछ रंग-बिरंगे मकड़े पाए जाते हैं जो लाल, हरे और नीले रंगों के होते हैं। जब ये मकड़े पेड़ों पर बैठे होते हैं तो फूल के समान दिखाई देते हैं, बहुत आकर्षक दिखाई देते हैं। किन्हीं-किन्हीं मकड़ों में तो दो से अधिक रंग होते हैं परन्तु यदि ये मकड़े किसी को डस लें तो दस सेकेण्ड के भीतर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है क्योंकि इनमें बहुत ज़हर होता है। हमारे जीवनों में भी अक्सर ऐसा ही होता है। चाहे हम कितने भी धार्मिक क्यों न हों, चाहे हम कितने भी मज़बूत विश्वासी क्यों न हों परन्तु एक बात निर्धारित है कि शैतान हमारी परीक्षा लेगा। कोई भी व्यक्ति अपने आत्मिक जीवन में इतनी अधिक ऊंचाइयों तक नहीं उठता कि परीक्षाओं में न पड़े। डाॅ. बिली ग्राहम का कहना है कि हर एक मसीही को प्रतिदिन शैतान का सामना करना पड़ता है और किसी भी समय परीक्षाओं में गिरने पर हमारी आत्मा के लिए बड़ी विनाश की बात हो सकती है। अपने प्रत्येक दिन के जीवन में हम निर्णय करते हैं। कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जो दिखने में बहुत आकर्षक लगते हैं, ऐसा लगता है जैसे इन निर्णयों को करने के बाद हमारे जीवन में चारों तरफ फूल ही फूल लग गए हैं परन्तु वास्तव में ये ऐसी लताएं होती हैं जो व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती हैं, उसे बर्बाद कर देती हैं। डाॅ. बिली ग्राहम ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जब व्यक्ति के जीवन में परीक्षा आती है तो शैतान व्यक्ति के सामने तीन बातें रखता है। Move quickly. Think slowly. Invest deeply. Move quickly.अर्थात् बहुत जल्दी बढ़ना है, बहुत ज्य़ादा बढ़ना है। किसी ने टेम्पटेशन अर्थात् परीक्षा को परिभाषित करते हुए कहा कि ये जीवन के शाॅर्टकट्स होते हैं। हम जीवन में छोटा रास्ता अपना कर जल्दी से आगे बढ़ना चाहते हैं और अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमारा शरीर, हमारी शारीरिक इच्छाएं, संसार के लोग और आडम्बर हमारे लिए प्रमुख हो जाते हैं। परीक्षाओं के सम्बन्ध में दूसरी बात डाॅ. बिली ग्राहम कहते हैं कि Think slowly. शैतान चाहता है कि हम बहुत ज्य़ादा विचार न करें। हमें बहुत जल्दी आगे बढ़ना है इसलिए तुरन्त कार्य करना है, प्रतिक्रिया व्यक्त करना है और इस जल्दबाज़ी के निर्णय के चक्कर में हम पाते हैं कि बहुत जल्दी हम पाप की गहराई में, उस दल-दल में लिप्त हो गए। यहां पर यह तीसरी बात, Invest deeply सामने आती है। जब सोचना कम है और तेज़ी से आगे बढ़ना है तो आत्मा की और आत्मिकता की अवहेलना हो जाती है, हम पाप के प्रति निश्चिन्त हो जाते हैं। बाइबिल में लिखा है कि यदि हम पाप के प्रति निश्चिन्त हो जाएंगे तो उद्धार से वंचित रह जाएंगे। बहुधा हम जान- बूझकर पाप नहीं करते, हम जान- बूझकर पाप में गिरने की योजना नहीं बनाते परन्तु जब हम पाप के प्रति निश्चिन्त हो जाते हैं तो आत्मा एवं आत्मिकता के प्रति हमारी सोच कम हो जाती है और हम पाप में आसानी से पड़ जाते हैं। परीक्षाओं के विषय में यह भी लिखा हुआ है कि ये बड़ी आकर्षक, लुभावनी, आसान, सुखद और लाभदायक दिखाई देती हैं। ये ऐसी दृश्य एवं अदृश्य वस्तुएं होती हैं जो हमारे मनों में बनी रहती हैं। जब निर्णय लेने का समय आता है तो हम जल्दी और ज्य़ादा बढ़ने के प्रयास में सोचते कम हैं और पाप में लिप्त हो जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम अपनी आत्मा के अनन्त विनाश को चुन लेते हैं। हमारे सामने आदम और हव्वा का उदाहरण है। उनके पास वह सब कुछ था जो एक व्यक्ति की चाहत हो सकती है। परमेश्वर ने उनकी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति की थी, एक सुन्दर वाटिका में उनको ठहराया था, उनके पास सारा अधिकार था परन्तु फिर हम पाते हैं कि आंखों की अभिलाषा की परीक्षा में पड़कर उन्होंने अपने लिए विनाश का मार्ग चुन लिया। कई बार हम यह सोचने लगते हैं कि हम तो अपने विश्वास में बहुत मज़बूत हैं, हमने कलीसिया के विकास में बहुत योगदान दिया है, हमने प्रचार किया है, मसीही सेवकाई में हम संलग्न हैं; इस कारण, हम पर परीक्षा नहीं आ सकती। इफिसियों 6ः11-12 में लिखा हुआ है - “परमेश्वर के सारे हथियार बान्ध लो; कि तुम शैतान की युक्तियों के साम्हने खड़े रह सको। क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं”। हमारा विरोधी शैतान हमेशा इस प्रयास में रहता है कि हमें बर्बाद कर दे और इसलिए इस संसार में रहते हुए हम निरन्तर एक युद्ध की स्थिति में हैं। जहां पर शरीर और आत्मा का युद्ध है, जहां पर आत्मिकता और भौतिकता का युद्ध है, जहां पर परमेश्वर की सामर्थ्य और शैतान की शक्तियों के बीच में युद्ध है और हमें इस युद्ध से होकर गुज़रना है। पुराने नियम में राजाओं के ऊपर परीक्षाएं आईं, दाऊद और सुलैमान को परीक्षाओं का सामना करना पड़ा। भविष्यवक्ताओं के सामने परीक्षाएं आईं। शिमशोन जैसे लोगों के सामने परीक्षाएं आईं। यूसुफ और दानिय्येल जैसे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के सामने परीक्षाएं आईं और इनसे बढ़कर प्रभु यीशु मसीह के सामने परीक्षाएं आईं। लूका रचित सुसमाचार के चौथे अध्याय में वर्णन है कि प्रभु यीशु मसीह की परीक्षा शैतान द्वारा ली गई। इसी सन्दर्भ से, हम देखेंगे कि किस प्रकार से आज शैतान हम पर प्रहार करता है और हमारी परीक्षा लेता है। 1. शैतान का सीधा आक्रमण:- हमारे जीवनों में शैतान का प्रत्यक्ष प्रहार होता है। लूका 4ः2-3 में लिखा हुआ है - “उन दिनों में उस ने कुछ न खाया और जब वे दिन पूरे हो गए, तो उसे भूख लगी”। प्रभु यीशु मसीह चालीस दिन निराहार रहा और क्योंकि वह मनुष्य था, इसलिए चालीस दिन के बाद उसे भूख लगी, “और शैतान ने उस से कहा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इस पत्थर से कह, कि रोटी बन जाए”। शारीरिक भूख है, मन की अभिलाषाएं हैं और शैतान का सीधा प्रहार है कि इन पत्थरों से कह दे कि रोटियां बन जाएं। तब यीशु ने उत्तर दिया - लिखा है कि मनुष्य केवल रोटी से जीवित न रहेगा। शैतान हमारी शारीरिक आवश्यकताओं को जानता है, वह हमारी शारीरिक कमज़ोरियों को जानता है और सीधा-सीधा हम पर प्रहार करता है। 1 यूहन्ना 2ः16 में लिखा हुआ है - “क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा, और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। और संसार और उसकी अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा”। शरीर की अभिलाषा, आंखों की अभिलाषा, जीविका का घमण्ड; यह शैतान की ओर से है। संसार और सब अभिलाषाएं तो मिट जाती हैं परन्तु जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा। एक रास्ता है जो अनन्त जीवन की ओर ले जाता है और दूसरा रास्ता है जो मिटा देता है। बीज बोने वाले के दृष्टान्त में, मरकुस 4ः18-19 में बहुत ही खूबसूरती से लिखा गया है - “और जो झाड़ियों में बोए गए, ये वे हैं जिन्होंने वचन सुना। और संसार की चिन्ता, और धन का धोखा, और वस्तुओं का लोभ उनमें समाकर वचन को दबा देता है, और वह निष्फल रह जाता है”। हमारे जीवन में, वे कौन सी बातें हैं जो परमेश्वर के वचन को, परमेश्वर की सामर्थ्य को निष्फल कर देती हैं। 1. संसार की चिन्ता 2. धन का धोखा 3. वस्तुओं का लोभ ये तीन बातें परमेश्वर के प्रभाव को निष्क्रिय कर देती हैं। 1 तीमुथियुस 6ः6-10 में लिखा हुआ है - “पर सन्तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं, और न कुछ ले जा सकते हैं। और यदि हमारे पास खाने और पहिनने को हो, तो इन्हीं पर सन्तोष करना चाहिए। पर जो धनी होना चाहते हैं, वे ऐसी परीक्षा, और फंदे और बहुतेरे व्यर्थ और हानिकारक लालसाओं में फंसते हैं, जो मनुष्यों को बिगाड़ देती हैं और विनाश के समुद्र में डूबा देती हैं। क्योंकि रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटककर अपने आप को नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है”। रुपयों का लोभ, संसार के आकर्षण, संसार की आंखों की अभिलाषाएं, ये सब तो समाप्त हो जाएगा, पर जो परमेश्वर पर बना है वह सर्वदा बना रहेगा। 2. शैतान का अप्रत्यक्ष प्रहार:- इसके बाद प्रभु यीशु मसीह की दूसरी परीक्षा जो ली गई, उसमें लिखा है कि - तब शैतान उसे ले गया और उस को पल भर में जगत के सारे राज्य दिखाए। और उस से कहा; मैं यह सब अधिकार, और इन का विभव तुझे दूंगा, क्योंकि वह मुझे सौंपा गया है: और जिसे चाहता हूं, उसी को दे देता हूं। इसलिये, यदि तू मुझे प्रणाम करे, तो यह सब तेरा हो जाएगा। (लूका 4ः5-7) इसी परीक्षा का वर्णन मत्ती 4ः8-9 में है, जहां लिखा हुआ है - फिर शैतान उसे एक बहुत ऊंचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका विभव दिखाकर उस से कहा, कि यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूंगा। कभी कभी शैतान भी ऊंचाइयों पर ले जाता है, शिखरों पर ले जाता है। जैसा कि यहां लिखा हुआ है कि शैतान यीशु को एक ऊंचे पहाड़ पर ले गया और उसे संसार का वैभव दिखाया, और उससे कहा कि यह वैभव तेरा हो जाएगा। इफिसियों 6ः11-12 में, यह स्पष्ट है कि हमारा यह मल्लयुद्ध शैतान की सेना से है, ये हम पर इस प्रकार से प्रहार करते हैं कि हमें वैभव दिखाते हैं, सफलता दिखाते हैं, उपलब्धियां दिखाई जाती हैं, आदर और सम्मान दिखाया जाता है, धन-दौलत और अधिकार दिखाया जाता है, और इन सब बातों से व्यक्ति के मन में घमण्ड आ जाता है। बस मेरे सामने झुक जा और यह सब तेरा हो जाएगा। सांसारिक दबाव है, भीड़ का दबाव है, भीड़ के साथ चलने की बात है और कितने लोग इस दबाव के आगे झुक जाते हैं। कितने नामी नेता इस दबाव के सामने झुक जाते हैं, ग़लत बातों और ग़लत मापदण्डों के सामने झुक कर दण्डवत् करते हैं। यह शैतान का प्रहार है कि झुककर दण्डवत् कर लो तो सारे वोट्स तुम्हारे हो जाएंगे, बहुत से लोग तुम्हारे पक्ष में हो जाएंगे, ये सारा वैभव, सफलता, उपलब्धियां, आदर, अधिकार, ऊंचा पद; सब कुछ तुम्हारा हो जाएगा, बस झुककर प्रणाम तो कर लो। कितनी बार शैतान हमें ऐसे ही ऊंचाइयों पर ले जाता है, हमें संसार का वैभव दिखाता है, हम से कहता है कि संसार के अधिकार को, वैभव को, उपलब्धियों को देखो; यह सब कुछ तुम्हारा हो जाएगा, बस थोड़ा सा झुकना है, थोड़ा सा समझौता करना है। अक्सर यह होता है कि अपने जीवन और कॅरियर की चरम सीमा में हमारी परीक्षा होती है। दाऊद की कठिनतम परीक्षा तब हुई जब वह अपने राज्यकाल में सबसे अधिक ऊंचाई पर था और शैतान ने उसको सबसे नीचे गिरा दिया। मूसा परीक्षा में कब गिरा? जब सारे आश्चर्यकर्म हो चुके थे, जब परमेश्वर की सामर्थ्य से वह लाखों इस्राएलियों को मिस्र की बंधुवाई से निकाल लाया था, जब लाल समुद्र पार कर लिया था, जब वह अपने जीवन के सर्वोच्च शिखर पर था; वहां पर शैतान ने उसकी परीक्षा ली और मूसा परीक्षा में गिर गया। हम पाते हैं कि मूसा को परमेश्वर ने उसके बाद प्रतिज्ञा किए हुए देश में जाने का अवसर नहीं दिया। शैतान का दूसरा प्रहार होता है; वैभव का, उपलब्धियों का, प्रशंसा का, सम्मान का; जब वह हमें ऊंचाइयों पर ले जाता है। 3. शैतान का ख़ामोशी भरा प्रहार:- शैतान का ख़ामोशी भरा प्रहार बहुत ख़तरनाक होता है। लूका 4ः9-13 में लिखा है - “तब उस ने उसे यरूशलेम में ले जाकर मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उस से कहा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को यहां से नीचे गिरा दे। क्योंकि लिखा है, कि वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, कि वे तेरी रक्षा करें। और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे ऐसा न हो कि तेरे पांव में पत्थर से ठेस लगे। यीशु ने उस को उत्तर दिया; यह भी कहा गया है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न करना। जब शैतान सब परीक्षा कर चुका, तब कुछ समय के लिये उसके पास से चला गया”। यहां यह बात सामने आती है कि शैतान परमेश्वर की सामर्थ्य पर प्रश्न चिन्ह लगाने से, हमारे मन में परमेश्वर की परीक्षा करने की भावना डालने के द्वारा प्रहार करता है। कितनी बार शैतान हमारे जीवन में इस प्रकार की परिस्थितियां पैदा कर देता है कि हम परमेश्वर पर शंका करने लगते हैं कि यह कैसा परमेश्वर है? मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? परमेश्वर ने मेरे साथ ऐसा अन्याय क्यों किया? दूसरे लोग जो अधर्मी, पापी और ढोंगी हैं वे तो फलते-फूलते जाते परन्तु मेरे जीवन में दर्द क्यों? मेरी प्रार्थना क्यों नहीं सुनी जाती? बीमारी और दर्द हमारे जीवनों में हावी हो जाता है और यह हमें परमेश्वर से दूर ले जाता है। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के जीवन में शैतान ने ऐसा ख़ामोशी से भरा हुआ प्रहार किया था कि उसके मन में यह बात आ गई और उसने अपने चेलों को पूछने के लिए भेजा कि क्या वास्तव में यही मसीहा है या हम किसी और की बाट जोहें? हबक्कूक ने भी परमेश्वर से प्रश्न किया - “हे यहोवा मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूंगा और तू न सुनेगा? मैं कब तक तेरे सम्मुख उपद्रव-उपद्रव चिल्लाता रहूंगा? क्या तू उद्धार नहीं करेगा? तू मुझे अनर्थ काम क्यों दिखाता है? और क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है? मेरे साम्हने लूट-पाट और उपद्रव होते रहते हैं; और झगड़ा हुआ करता है और वादविवाद बढ़ता जाता है। इसलिये व्यवस्था ढीली हो गई और न्याय कभी नहीं प्रगट होता। दुष्ट लोग धर्मी को घेर लेते हैं; सो न्याय का खून हो रहा है” (हबक्कूक 1ः2-4)। यहूदा पर भी शैतान ने ख़ामोशी से प्रहार किया और तब यहूदा को शंका हुई परमेश्वर की क्षमा पर। यहूदा को शंका हुई प्रभु यीशु मसीह के कलवरी से बहते हुए रक्त की धार पर और यहूदा ने अपने जीवन को समाप्त कर लिया। कितनी बार शैतान हमारे जीवनों पर प्रहार करता है कि हम परमेश्वर से प्रश्न करने लगें कि कैसा परमेश्वर है? मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ? कैसा परमेश्वर है जो प्रार्थनाओं को सुनता नहीं? परमेश्वर पर अविश्वास की बात बढ़ती जाती है और अन्त में यह होता है कि हमारी आत्मा विनाश की ओर चली जाती है। जब हम परीक्षा में पड़ें तो कुछ बातें हमें याद रखना है। 1. परमेश्वर के वचन पर विश्वास करें और वचन को अपने हृदय में रखें:- हमें वचन पर बड़ी दृढ़ता से विश्वास करना है। हमें परमेश्वर के वचन को अपने हृदय में रखना है। जब प्रभु यीशु मसीह ने शैतान की परीक्षा का सामना किया तो उसने हर बार वचन को सामने रखते हुए जवाब दिया- “क्योंकि लिखा है।” शैतान भी परमेश्वर के वचन को ठुकरा नहीं सकता। भजन संहिता 119ः9 और 11 में लिखा है - “जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से” तथा “मैंने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है कि तेरे विरुद्ध पाप न करूं”। परीक्षा तो हर दिन आएगी परन्तु परमेश्वर के वचन को हमें अपने हृदय में रखना है। 2. परीक्षाओं में स्थिर रहकर हम मज़बूत हो जाते हैं:- याकूब 1ः2-4 में लिखा है, “हे मेरे भाइयो जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इस को पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे”। जब परीक्षाएं आएं और उनमें स्थिर रहें तो धीरज आएगा और हम सिद्ध बनेंगे। इन परीक्षाओं को सिद्धता तक पहुंचने की सीढ़ी बना लें। हमें निर्णय करना है। यदि शैतान के प्रभाव में आकर निर्णय करेंगे तो विनाश की ओर चले जाएंगे परन्तु यदि परमेश्वर की दिशा में आगे बढ़ते हुए निर्णय करेंगे और परीक्षाओं में स्थिर रहेंगे तो ये परीक्षाएं ही सिद्धता तक पहुंचने की सीढ़ियां बन जाएंगी। 3. परीक्षाओं में हमें परमेश्वर के साथ बने रहना है:- वचन में यह प्रतिज्ञा है कि “तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर हैः और परमेश्वर सच्चा हैः वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10ः13)। जब परमेश्वर में बने रहेंगे तो परमेश्वर हमारे साथ रहेगा और उस परीक्षा से गुज़रने की सामर्थ्य देगा। उस सामर्थ्य के द्वारा वह उस परीक्षा में से हमें निकालेगा। 4. परीक्षा में हमें शारीरिक या भौतिक हानि उठाने को तैयार रहना चाहिए:- जब परीक्षाएं हमारे सामने आती हैं तो हमें यह प्रश्न करना है कि क्या ज़रूरी है? अनन्त जीवन या अनन्त विनाश! इसलिए लूका 9ः25 में प्रभु यीशु मसीह प्रश्न करते हैं कि “यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपनी आत्मा की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ होगा?” यह तो घाटे का सौदा होगा कि सारे जगत को प्राप्त कर लें परन्तु अपनी आत्मा की हानि उठाएं। मत्ती 5ः29-30 में लिखा है “यदि तेरी दाहिनी आंख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकाल कर अपने पास से फेंक दे; क्योंकि तेरे लिए यही भला है कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उसको काटकर अपने पास से फेंक दे, क्योंकि तेरे लिए यही भला है, कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए”। शरीर तो नाश हो जाएगा परन्तु शरीर से बढ़कर आत्मा है। शरीर के लिए कुछ सहना भी पड़े, कुछ त्यागना भी पड़े तो यह बेहतर है कि शरीर का एक अंग नाश हो जाए पर हमारी आत्मा बच जाए। इसलिए शरीर का कोई अंग हमारी आत्मा से प्रमुख नहीं है। 5. परीक्षाएं हमें अनन्त जीवन की ओर ले जाती हैं:- याकूब 1ः12 में लिखा है “धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है; क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा, जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है”। यह परीक्षा ही सिद्धता के लिए सीढ़ी बन जाएगी और उन सीढ़ियों से होकर हम अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे। हमें वह मुकुट मिलेगा जो परमेश्वर ने हमारे लिए रखा है। परीक्षाएं तो जीवन में अवश्य आएंगी, परन्तु यह हमारा स्वयं का निर्णय है कि जिस दिशा में हम मुड़ेंगे, उसी दिशा में हमारे जीवन का अन्त और नियति निर्धारित होगी। परमेश्वर हमें ऐसी समझ दे कि शैतान की परीक्षाओं से जूझते हुए, उनका सामना करते हुए हम इन परीक्षाओं में स्थिर रह सकें। अपने जीवन में ऐसे निर्णय लें जिनसे हमारी आत्मा का उद्धार हो, जिससे हम अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकें। क्योंकि मनुष्य यदि सारे जगत को प्राप्त कर ले और अपनी आत्मा की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ होगा। परमेश्वर आपको आशीष दे।