संदर्भ: उत्पत्ति 3ः1-6
“यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था, और उस ने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना? स्त्री ने सर्प से कहा, इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं। पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे। तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे, वरन् परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे। सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उस ने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उस ने भी खाया” (उत्पत्ति 3ः1-6)। कभी आपने सोचा है कि अच्छे लोग क्यों पाप में पड़ जाते हैं? एक खूबसूरत पत्नी का पति और मासूम बच्चों का पिता एक अनैतिक सम्बन्ध के कारण अपने आप को और अपने परिवार को क्यों बरबाद कर देता है? एक होशियार छात्र क्यों परीक्षा में नकल करता है? एक विश्वासपात्र मित्र क्यों विश्वासघात करता है? एक ज़िम्मेदार और कर्मठ व्यक्ति कैसे नशे का गुलाम हो जाता है? एक आदरयोग्य शिक्षक अपनी छात्रा के साथ क्यों बलात्कार कर देता है? एक पढ़ा-लिखा, कलीसिया का समझदार सदस्य शैतान का घातक उपकरण बन जाता है और कलीसिया को तोड़ने पर तुल जाता है? एक समझदार और अनुभवी अधिकारी क्रोध में अपना आपा खो देता है और बात यहां तक पहुंच जाती है कि कर्मचारी की पिटाई भी हो जाती है? किसी कलीसिया का एक योग्य अगुवा अपशब्दों का प्रयोग करता है, गाली देता है? यह समझना तो सरल है कि कोई बुरा व्यक्ति बुराई करे। यह समझना तो आसान है कि कोई अपराधी अपराध करे परन्तु अच्छे परिपक्व, समझदार और परमेश्वर की निकटता में चलने वाले लोग कैसे बुराइयों में पड़ जाते हैं? पाप के दलदल में फंसकर अपना, अपने परिवार और अपनी कलीसिया का जीवन नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। क्यों नशा करने की इच्छा होती है? क्यों आमदनी से ज्य़ादा खर्च हो जाता है और ब्याज पर पैसा लिया जाता है? ब्याज मूलधन से ज्य़ादा हो जाता है और ब्याज चुकाते-चुकाते, सब कुछ चुक जाता है। यहां तक कि पाप से, शैतान से समझौता करने को लोग तैयार हो जाते हैं। पैसा जितना लिया था, कर्ज़ जितना था उससे कहीं ज्य़ादा हर माह ब्याज चुकाना पड़ता है। इसके तनाव में, इसकी परेशानी में परिवार बर्बाद हो जाते हैं, यहां तक कि कई बार व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेते हैं। क्यों ऐसा होता है कि लोगों के पीठ पीछे झूठी अफवाहें उड़ाई जाती हैं? जिनसे बदला लेना है, जिनके प्रति हृदय में प्रतिशोध की भावना है, उनके चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है। ग़लत को ग़लत जानते हुए भी, पाप की गम्भीरता को समझते हुए भी क्यों व्यक्ति ग़लती करता जाता है? क्यों ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति क्षमा भी मांग ले फिर भी उसके प्रति दिल में जो कटुता है, जो दुर्भावना है, वह हृदय से जाती नहीं। वास्तव में इन बातों से कोई नहीं बचा। ये बातें, ये मुद्दे कहीं हमारी आदत न बन जाएं, ये बातें कहीं हमारे आत्मिक जीवन को बर्बाद न कर दें; इससे पहले इन बातों को हमें गम्भीरता से लेना है। इन बातों पर हमें विचार करना है और इन बातों को छोड़कर परमेश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ना है। अक्सर हम पाप को गम्भीरता से नहीं लेते। हम बड़ी आसानी से कह देते हैं कि हम तो मनुष्य हैं, अगर हम पाप नहीं करेंगे तो ईश्वर बन जाएंगे। हम से भी खराब लोग हैं दुनिया में। सब तरफ माहौल ख़राब है। इन ग़लत बातों के बिना तो दुनिया में आगे बढ़ नहीं सकते। ये समझौते तो करने पड़ेंगे, तभी तरक्की मिलेगी। ये सब तो सामान्य बातें हैं। परन्तु हमें समझना है कि यह बहुत ख़तरनाक बात है। यही वे छोटी-छोटी लोमड़ियां हैं जो दाख की बारियों को उजाड़ देती हैं। यही छोटी-छोटी बातें, हमारी आत्मा को विनाश की ओर ले जाती हैं। यही छोटी-छोटी बातें हैं जिनसे हमारी सम्वेदना चली जाती है और हमारी आत्मा का अन्त विनाश और नरक की आग में हो जाता है। अक्सर लोगों को हम ऊपर से तो बहुत भले, आकर्षक, मिलनसार, विनम्र और मृदुभाषी दिखाई देते हैं परन्तु भीतर से ये बातें हमारे दिल और आत्मा को बर्बाद कर देती हैं, हमें नर्क की गर्त में पहुंचा देती हैं। कितनी बार हम अपने घरौंदों में, अपने कार्य क्षेत्रों में, अपने मनों में ऐसे पापों को पाल लेते हैं जो ख़ामोशी से बने रहकर भीतर-ही-भीतर हमारी आत्मा को समाप्त करते जाते हैं। उत्पत्ति की पुस्तक के तीसरे अध्याय में इसी सन्दर्भ में कुछ बातें हमारी चेतावनी के लिए कही गई हैं। 1.पाप प्रारम्भ में बहुत सामान्य और आकर्षक दिखाई देता है:- इस सन्दर्भ में हम पाते हैं कि पाप का प्रारम्भ कैसे हुआ। एक फल खाने की बात थी। बहुत सहज-सी बात थी कि यह फल जो ज्ञान का फल है, उसे खा लेना कौन-सी बुराई की बात है। हम जानते हैं कि फल खाना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक नहीं बल्कि लाभदायक होता है। डाॅक्टर्स सुझाव देते हैं कि अगर शरीर में कमज़ोरी है तो फल खाइये। किसी ने कहा है कि an apple a day, keeps doctor away.बात तो बहुत छोटी है कि सिर्फ़ एक फल है जिसे खाना है। परन्तु उसके पीछे जो बात है वह परमेश्वर की आज्ञा की बात है। परमेश्वर की सीमाओं के निर्धारण की बात है, परमेश्वर की योजना की बात है। उस फल को हमें नहीं खाना है, फिर चाहे वह कितनी छोटी-सी बात क्यों न दिखाई दे। यह एक ऐसी बात है कि जिसकी नियति मृत्यु होगी, जिसकी नियति अनन्त विनाश होगी और जिसकी नियति मात्र आदम और हव्वा को प्रभावित नहीं करेगी परन्तु सम्पूर्ण मानव-जाति और आने वाली पीढ़ियां उस बात से श्रापित होंगी। दक्षिण अफ्रीका में एक मक्खी पाई जाती है जिसे टाईसिंग फ्लाई कहा जाता है। यह एक छोटी-सी नीले रंग की मक्खी होती है। यह मक्खी अगर काट ले तो दो मिनिट से कम समय में व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। बड़ी छोटी सी बात लगती है कि मक्खी ने काट लिया! कोई ज़हरीला सांप नहीं है, कोई विशालकाय ज़हरीला प्राणी नहीं है, एक छोटी सी मक्खी है परन्तु इस टाईसिंग फ्लाई के काटने से 2 मिनिट में व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। आज कुछ बातें बहुत सामान्य सी दिखाई देती हैं। इन्टरनेट के बारे में बात करें तो यह बहुत सामान्य सी बात है। घर-घर में कम्प्यूटर और इन्टरनेट आम हो गया है। कहा जाता है कि इन्टरनेट जानकारी का भण्डार है, ज्ञान का स्रोत है। इससे सारी दुनिया से जुड़ सकते हैं, सारी दुनिया के विषयों की जानकारी ले सकते हैं। परन्तु गन्दगी का उद्गम बन गया है आज इन्टरनेट। पोर्नोग्राफी से करोड़ों लोग ग्रसित हैं। यूरोप में सायकाॅलजी टुडे में एक सर्वेक्षण में यह पता चला कि यूरोप के 72 प्रतिशत किशोर पोर्नोग्राफी का शिकार हैं। अधिकांश युवाओं की इच्छा हो सकती है कि अश्लील चित्रों को देख लें। इच्छा होती है कि जो चीज़ छिपी हुई है, जिसे माता-पिता ने, समाज के लोगों ने कहा है कि इसे देखना ग़लत है। जिसके लिये कहा गया है कि यह अनैतिक है, उसे छुपकर देखें तो! क्या होता है! एक जिज्ञासा होती है, और जो बात पोर्नोग्राफी या अश्लील चित्रों के साथ है वह यह कि यह एक घातक मानसिक बीमारी की बात है जिसे लोग समझ नहीं पाते। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पोर्नोग्राफी में समस्या यह है कि इन्टरनेट पर अश्लील चित्रों को देखने की इच्छा बढ़ती जाती है। जो कुछ आज आप देखते हैं उससे कुछ ज्य़ादा देखने की इच्छा होती है और तब आप ऐसी सीमा पर पहुंच जाते हैं जहां पर देखने से कोई असर नहीं होता और उसे करने की इच्छा होती है। उसके बाद यही इच्छा ग़लत काम करने के बाद विनाश और हत्या तक करने की भावना को, प्रवृत्ति को जन्म देती है। जो लोग इस इन्टरनेट में बंध जाते हैं, इस पोर्नोग्राफी का शिकार हो जाते हैं, उनमें मात्र अश्लील चित्र देखने तक बात सीमित नहीं रह जाती बल्कि उसके साथ गम्भीर से गम्भीर अपराध करने की प्रवृत्ति का जन्म होता है। यह बात सिर्फ़ बच्चों के लिए नहीं है, यह सिर्फ़ टीनएजर्स तक ही सीमित नहीं है। यह बात उन माता-पिताओं के लिए भी है, जिनके घर में प्रार्थना होती है। यह बात उनके लिए भी है जो पासबान हैं। अमेरिका में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक पासबानों की संख्या का एक बड़ा प्रतिशत भाग इस समस्या से जूझ रहा है। इस कारण, एक उपकरण बनाया गया है जिसे नैनी कहा जाता है। अगर आप अपने कम्प्यूटर में उस छोटे से उपकरण को लगा लें तो वह सारे अश्लील चित्रों का आना रोक देता है। परन्तु फिर दूसरी तरफ वीडियो गेम्स भी हैं। जब हमारे बच्चे वीडियो गेम्स खेलते हैं तो हमें बड़ी खुशी होती है परन्तु आज ऐसे वीडियो गेम्स बाज़ार में आ गए हैं जिनसे गम्भीर अपराध करने की प्रवृत्ति जन्म लेती है। जिनसे बच्चों में हत्या करने के लिए भी उनका मस्तिष्क तैयार हो जाता है। उत्पत्ति के तीसरे अध्याय में हम पाते हैं कि जो पाप की शुरुआत है वह मात्र एक फल खाने की बात है, वह मात्र साधारण-सी बात है परन्तु इन साधारण बातों के प्रति, यदि हम सजग नहीं रहेंगे तो ये हमारे जीवनों, हमारे परिवारों, हमारी कलीसिया, हमारी नई पीढ़ी और हमारे अनन्त को बर्बाद कर देंगी। किसी ने लिखा है - आज पाप आकर्षक बन गया है, फैशन बन गया है; न सिर्फ़ भावनात्मक रूप से, न सिर्फ़ आत्मिक रूप से, न सिर्फ़ शारीरिक रूप से परन्तु तकनीकी के माध्यम से भी पाप आकर्षक बन गया है। (Sin has become physically, emotionally, spiritually and now technologically attractive and fashionable). 2. शैतान का प्रहार अचानक से होता है:- शैतान का प्रहार अप्रत्याशित होता है। जब हम सोच नहीं रहे होते, जब हम इसकी अपेक्षा नहीं कर रहे होते, जब हम सतर्क नहीं होते, उस समय अचानक से शैतान वार करता है। उत्पत्ति के पहले अध्याय में हम पाते हैं कि सब कुछ बहुत अच्छा था। परमेश्वर ने उजियाले को बनाया, दिन-रात को बनाया, आकाश को बनाया, पेड़-पौधों को बनाया, पशु-पक्षियों को बनाया, मानव को बनाया। उसके बाद उत्पत्ति 1ः31 में लिखा हुआ हैः “तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया था, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है”। दूसरे अध्याय में हम पाते हैं कि परमेश्वर ने स्वयं अदन देश में एक वाटिका लगाई। एक महानदी बनाई, जिसकी चार-चार धाराएं थीं और वहां सोना, मोती और सुलेमानी पत्थरों का वर्णन है। सब कुछ बहुत खूबसूरत, सुहावना, मनभावना था। उसके बाद परमेश्वर ने कहा कि आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं और फिर परमेश्वर ने स्त्री को बनाया। वहां सब कुछ आश्चर्यजनक था। सब बातों में परमेश्वर की महानता और उसकी सामर्थ्य झलकती है। सब बातों में खूबसूरती है, सब बातों में भरपूरी है। सारा वातावरण निर्दोष है। आदम और हव्वा निर्दोष हैं, उन्हें पाप का अहसास नहीं। यहां तक कि वे अपनी नग्नावस्था पर भी ध्यान नहीं देते क्योंकि उनमें निर्दोषिता की भावना है। सब कुछ बहुत सुखद है, परिपूर्ण है। परमेश्वर की सहभागिता अदन की वाटिका में आदम और हव्वा के साथ-साथ है। सब कुछ बहुत ही अच्छा है परन्तु जैसे ही तीसरा अध्याय शुरू होता है, हम पाते हैं कि वहां सर्प है, वहां फल की बात है, वहां पाप है, वहां शैतान है, वहां श्राप है, वहां परमेश्वर से अलगाव है। जब सब कुछ बहुत अच्छा है, जब सब तरफ परमेश्वर की आशीषें हैं, जब सब कुछ निर्बाध गति से चल रहा है तभी वहां अचानक से शैतान का प्रहार होता है। राजा दाऊद एक साधारण चरवाहे से राजा बना। वह परमेश्वर का विशिष्ट जन था, उसे परमेश्वर ने बहुत आशीषें दी थीं। हम पाते हैं कि वह खूबसूरत गीत लिख रहा है, आराधना की विधि तैयार कर रहा है। उसके बाद राजगद्दी मिलती है तो एक स्त्री पर नज़र जाती है, उसके बाद व्यभिचार का पाप होता है और फिर उसी क्रम में हत्या हो जाती है। इसीलिये 1 कुरिन्थियों 10ः12 में बहुत प्रमुख बात लिखी है - इसलिये जो समझता है कि मैं स्थिर हूं, वह चैकस रहे कि कहीं गिर न पड़े। उससे पहले 11वें पद में लिखा है - परन्तु ये सब बातें, जो उन पर पड़ीं, दृष्टान्त की रीति पर थींः और वे हमारी चेतावनी के लिये जो जगत के अन्तिम समय में रहते हैं, लिखी गई हैं। पुराने नियम में जो घटनाएं घटीं, जो घटना आदम-हव्वा के साथ घटी, जो घटना राजा दाऊद के साथ घटी; ये हमारे लिये लिखी गई हैं। ये हमारे लिए दृष्टान्त के स्वरूप में हैं कि कहीं ऐसा न हो कि जो व्यक्ति अपने आप को सिद्ध समझने लगे, जो समझने लगे कि अब तो मैं स्थिर हो गया हूं; वही चैकस रहे कि कहीं गिर न पड़े। इसीलिये बात है सतर्कता की, जागृत रहने की, प्रार्थना करने की। विशेषकर उस समय जब आप सफलता के शिखर पर हों, जब आप समृद्ध हों, जब आप उपलब्धियों के निकट हों। ऐसी परिस्थितियों में आसान होता है कि हम अपनी आत्मा के प्रति निश्चिन्त हो जाएं। ऐसे ही समय में शैतान हम पर, हमारी आत्मा पर प्रहार करता है। ऐसी ही समयों में हमारे परिवार पर, संस्थाओं पर, कलीसियाओं पर शैतान का आक्रमण होता है। इसलिये यदि हम समझते हैं कि हम परिपक्व हो गए हैं तो वचन कहता है कि जो ऐसा समझता है वह सतर्क रहे कि कहीं गिर न पड़े क्योंकि शैतान का प्रहार अचानक से होता है। 3. जहां वचन के प्रति गम्भीरता और प्राथमिकता नहीं होती, वहां शैतान सफल हो जाता है:- जहां वचन को गम्भीरता से नहीं लिया जाता, वहां शैतान सफल हो जाता है। उत्पत्ति 3ः1 में हम पाते हैं; शैतान सर्प के रूप में आता है और कहता है कि क्या सच है कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना? जहां वचन के प्रति गम्भीरता नहीं रह जाती, वहां शैतान सफल हो जाता है। कई बार हम सोचते हैं कि वचन में ऐसी बातें लिखी हैं जिन्हें कर पाना हमारे लिए सम्भव नहीं है। इस कारण से इन बातों को शायद गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। बाइबिल में लिखा हुआ तो है परन्तु आज के संसार में व्यवहारिक रूप में ये बातें कैसे सम्भव हैं? वचन में लिखा है कि पवित्र बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गीय पिता पवित्र है, यह कैसे सम्भव हो सकता है? यह कैसे सम्भव हो सकता है कि हम अपने दुश्मनों के लिए प्रार्थना करें। जो हमें अपशब्द कहते हैं, हम उन्हें आशीर्वाद दें, यह कैसे सम्भव है। वचन में लिखा है - हर एक निकम्मी बात जो हमारे मुख से निकलेगी उसका हमें लेखा देना होगा। उसी बात के आधार पर हम धर्मी या अधर्मी ठहराए जाएंगे। उसी बात के आधार पर हमारे स्वर्ग और नरक जाने का निर्णय होगा। परन्तु कहां तक जुबान पर नियंत्रण करेंगे? कहां तक सम्भव है कि कोई निकम्मी बात मुंह से न निकले। वचन में लिखा है कि कोई दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी फेर दें। यह बात कैसे सम्भव है? जबकि आज के संसार का सिद्धान्त तो यह है कि कोई एक थप्पड़ मारता है तो हम उसको धराशायी कर दें। तभी सिद्ध होगा कि हम भी कुछ हैं, हमारी भी कोई अहमियत है। ये बातें आज के संसार में कहां तक व्यवहारिक रूप से सम्भव हैं। प्रभु यीशु मसीह ने कहा कि यदि कोई अपने भाई को मूर्ख कहे तो वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा। परन्तु यह बात कैसे सम्भव है कि भाई से विरोध न हो। कई बार हमें अपने भाई से ही समस्या हो जाती है और हम कह बैठते हैं कि हमारे भाई ने बड़ा मूर्खतापूर्ण निर्णय लिया। परन्तु प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि ऐसा करोगे तो नरक की आग के दण्ड के योग्य तुम ठहरोगे। ये बातें व्यवहारिक रूप में कहां सम्भव हैं? ये बातें अच्छी हैं परन्तु कहां तक नियंत्रण करें, कहां तक इस रास्ते पर चलें। ये सारी बातें प्रभु यीशु मसीह ने उस समय के लोगों के लिए कही होंगी परन्तु अब हम क्या कर सकते हैं। हम तो कमज़ोर मनुष्य हैं; इसी कारण हम तो ग़लती करने के बाद क्षमा मांग लेते हैं और बार-बार यही क्रम दोहराते रहते हैं परन्तु वचन की जहां गम्भीरता नहीं, जहां परमेश्वर के द्वारा दिये गए मापदण्ड के प्रति गम्भीरता नहीं, वहां शैतान सफल हो जाता है। इसी सन्दर्भ में दूसरी बात वचन की प्राथमिकता की है। हम में से कितने हैं जो प्रतिदिन बाइबिल पढ़ते हैं। हम में से कितने ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवन या अपने परिवार से जुड़ा कोई प्रमुख निर्णय लेने से पहले इस बात पर विचार किया कि इस सन्दर्भ में परमेश्वर का वचन क्या कहता है। इसके विपरीत हम यह कहते हैं कि क्या ज़रूरी है कि प्रतिदिन वचन का अध्ययन किया जाए? मैं आप से प्रश्न करूंगा कि क्या ज़रूरी है कि हम प्रतिदिन भोजन करें? क्या भोजन से बढ़कर वचन नहीं है? क्या शरीर से बढ़कर हमें अपनी आत्मा की चिन्ता नहीं करनी चाहिए? क्या इस संसार से बढ़कर हमारा अनन्त जीवन नहीं है? 1 कुरिन्थियों 6ः1-3 में पौलुस एक बहुत कटु बात कहता है - “क्या तुम में से किसी को यह हियाव है, कि जब दूसरे के साथ झगड़ा हो, तो फैसले के लिये अधर्मियों के पास जाए; और पवित्र लोगों के पास न जाए? क्या तुम नहीं जानते, कि पवित्र लोग जगत का न्याय करेंगे? सोे जब तुम्हें जगत का न्याय करना है, तो क्या तुम छोटे से छोटे झगड़ों का भी निर्णय करने के योग्य नहीं? क्या तुम नहीं जानते, कि हम स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे? तो क्या सांसारिक बातों का निर्णय न करें?” परन्तु हम कहते हैं कि ये बातें तो बस लिखी हुई हैं, अगर झगड़ा है तो कचहरी तो जाना ही पड़ेगा, फैसले के लिए हाईकोर्ट में, और फिर सुप्रीम कोर्ट में जाना ही पड़ेगा। पौलुस ने कुरिन्थ की कलीसिया के झगड़ों के विषय में उस समय ये बातें लिख दीं, आज इनकी प्रासंगिकता नहीं। जब ऐसी सोच हमारी हो जाती है तो फिर वचन की प्राथमिकता समाप्त हो जाती है। यदि हमारे जीवनों में वचन की प्राथमिकता नहीं होगी तो शैतान बहुत आसानी से आ जाएगा। हमें पता भी न चलेगा और हमारी भी स्थिति शिमशोन के समान हो जाएगी, जिसके लिए लिखा है - वह तो न जानता था, कि यहोवा उसके पास से चला गया है (न्यायियों 16ः20)। यह कितनी दुखद और गम्भीर बात होगी कि हमारे सिर से परमेश्वर का हाथ उठ जाए। 4. पाप परमेश्वर से हमारा अलगाव कर देता है:- स्मरण करें अपने बचपन को, कई बार ऐसा होता था जब हमसे कोई ग़लती हो जाती थी, जब माता-पिता की आज्ञा तोड़ देते थे तो फिर मुंह छुपाते फिरते थे। मन में यह भाव होता था कि हम से तो यह ग़लती हो गई अब पापा को क्या जवाब देंगे। ठीक ऐसा ही आत्मिक जीवन में भी हमारे साथ होता है। जब हम परमेश्वर की आज्ञाओं को तोड़ते जाते हैं तो परमेश्वर से हमारा अलगाव हो जाता है। उत्पत्ति 3ः23 में एक बहुत प्रमुख बात लिखी है और मैं समझता हूं कि मानव-जाति के लिए यह एक काला दिन था। वहां पर लिखा है - “तब यहोवा परमेश्वर ने उसको (आदम-हव्वा) अदन की वाटिका से निकाल दिया”। परमेश्वर ने आदम और हव्वा को अपनी आशीषों से वंचित कर दिया। उन पर परमेश्वर का श्राप आ गया। इस घटना का परिणाम सारी मानव-जाति पर अनन्त के लिए पड़ा। यशायाह 59ः1,2 में लिखा है - “सुनो, यहोवा का हाथ ऐसा छोटा नहीं हो गया कि उद्धार न कर सके, न वह ऐसा बहिरा हो गया है कि सुन न सके; परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उसका मुंह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता”। परन्तु परमेश्वर के वचन में जो सन्देश है, जो निष्कर्ष है, वह अच्छा समाचार है। वह आशा, आनन्द और अवसर की बात है। उत्पत्ति 3ः15 में परमेश्वर शैतान से कहता है; “और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा”। यह परमेश्वर की योजना है। किसी ने कहा कि यह पहला सुसमाचार है। सुसमाचार यह कि शैतान, तू मनुष्य की एड़ी को तो डसेगा, तू उसको हानि तो पहुंचाएगा, तू अपना विष तो उसमें भर देगा, परन्तु कोई आने वाला है, जो तेरे सिर को कुचलेगा। यह प्रभु यीशु मसीह है, जो आज भी जीवित है। उत्पत्ति 3ः21 में हम पाते हैं - “यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अंगरखे बनाकर उनको पहना दिये”। आदम और हव्वा ने पत्तियों से अपने शरीरों को ढांप लिया था। परन्तु परमेश्वर ने उनके बदले चमड़े का वस्त्र बना दिया और उन्हें पहना दिया। यह परमेश्वर का प्रेम है। जब परमेश्वर ने चमड़े का वस्त्र पहनाया होगा तो किसी पशु का लहू तो अवश्य बहा होगा। इसी प्रकार यदि पाप की क़ीमत चुकाना है, तो फिर लहू बहना ज़रूरी है। परमेश्वर कहता है मैं तेरी नग्नता को, तेरे पापों को ढांप दूंगा, एक आने वाला है जो अपना लहू बहाएगा और शैतान के सिर को कुचलेगा। रोमियों 8ः1 में लिखा है; “सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं”। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि वह हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है। चाहे हमारे पाप लाही रंग के क्यों न हों, प्रभु यीशु मसीह के पास आने से, उसे ग्रहण करने से, वह उन्हें हिम से भी अधिक सफेद कर देगा। वह हमारे सारे पापों को लेकर उन्हें गहरे समुद्र में दफना देगा। शैतान तो अपनी योजना के साथ कार्यरत है परन्तु उससे बढ़कर परमेश्वर की योजना है। एक बिगाड़ने वाला, बर्बाद करने वाला है परन्तु एक बचाने वाला भी है। स्वतंत्र इच्छा का आदम और हव्वा ने दुरुपयोग तो किया परन्तु उसके बाद भी परमेश्वर का प्रेम है, परमेश्वर का स्पर्श है, परमेश्वर के द्वारा एक आशा है। क्या हम प्रभु यीशु मसीह में हैं? यदि हम प्रभु यीशु मसीह में हैं तब भी निरन्तर सजग रहने की, सतर्क रहने की आवश्यकता है क्योंकि हमारा विरोधी शैतान गरजने वाले सिंह की नाईं तैयार है कि कब किसको फाड़ खाए। इसलिये सदैव सचेत एवं सतर्क रहें। परमेश्वर के वचन को अपने जीवन में गम्भीरता के साथ प्राथमिकता दें। परमेश्वर आपको आशीष दे।