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मसीही जीवन में ख़तरे

संदर्भ: भजन संहिता 1:1-3

भजन संहिता 1:1-3 में लिखा है - “क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता और न पापियों के मार्ग में खड़ा होता; और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है। परन्तु वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात-दिन ध्यान करता रहता है। वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नालियों के किनारे लगाया गया है, और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिए जो कुछ वह पुरुष करे वह सफल होता है”।

जब इस संसार में हम आते हैं और अपने जीवन में जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाते हैं तो कई ख़तरों का हमें सामना करना पड़ता है। बीमारियों के ख़तरे होते हैं, दुश्मनों के ख़तरे होते हैं, यात्रा में दुर्घटनाओं के ख़तरे होते हैं। उन लोगों से ख़तरे होते हैं जो हमसे बैर रखते हैं। हमारे दैनिक कार्यों के दौरान बहुत से ख़तरे होते हैं। हो सकता है कभी हमारे अधिकारी हमसे नाराज़ हों, हो सकता है हमारे साथ कार्य करने वाले सहकर्मी हमसे जलन, घृणा और बैर रखते हों। इस प्रकार से बहुत से ख़तरे हमारे जीवनों में आ सकते हैं। परन्तु इससे भी प्रमुख बात यह है कि मसीही जीवन में भी बहुत से ख़तरे होते हैं। जब हम प्रभु यीशु मसीह की राह पर चलते हैं, मसीही जीवन यात्रा में आगे बढ़ते हैं तो बहुत से ख़तरों का सामना हमें करना पड़ता है। अतः हम मसीहियों को सतर्क रहने की आवश्यकता है। परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि सावधान रहो! क्योंकि हमारा बैरी शैतान इस फिराक में रहता है कि कब हमको फाड़ खाए।

इफिसियों 6:12 में पौलुस प्रेरित लिखता है - “क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध लहू और मांस से नहीं परन्तु प्रधानों से, और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में है”।

पौलुस लिखता है कि अपने जीवन में हम निरन्तर एक युद्ध से गुज़रते हैं। इस संसार का राजा शैतान है और उसका जाल सब तरफ फैला हुआ है। हम पाते हैं कि बुराई का साम्राज्य है, हर तरफ अन्धकार फैला हुआ है। सब तरफ घृणा है, भेदभाव है, जलन है और ऐसी परिस्थितियों में हम थोड़े से मसीही लोग निरन्तर शैतान की शक्तियों से युद्ध करते रहते हैं। अक्सर बड़ा आसान होता है यह सोच लेना कि हमने तो इतने साल पहले बपतिस्मा लिया था, हम तो इतने वर्षों से कलीसिया में हैं, हम तो इतने वर्षों से कलीसिया की सेवा कर रहे हैं, हम पासबान हैं, हमारा बड़ा नाम है; अब हमको उतना सचेत रहने की आवश्यकता नहीं है। परन्तु परमेश्वर का वचन बार-बार हमसे कहता है कि इस संसार में हमें निरन्तर इस युद्ध में आगे बढ़ते जाना है, सजग रहना है, सचेत रहना है।

1 तीमुथियुस 6:12 में लिखा है - “विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़”। जब इस संसार में तू सेवा करेगा तो तुझे एक कुश्ती लड़ना है। 2 तीमुथियुस 2:4 में लिखा है - “जब कोई योद्धा लड़ाई पर जाता है, तो इसलिये कि अपनी भरती करने वाले को प्रसन्न करे, अपने आप को संसार के कामों में नहीं फंसाता”।

गलतियों 6:7-8 में लिखा है - “धोखा न खाओ; परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है वही काटेगा। क्योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा”।

मसीही जीवन में बहुत से ख़तरे होते हैं लेकिन हम तीन प्रकार के प्रमुख ख़तरों के विषय में देखेंगे, जिनसे होकर हम मसीही जीवन में गुज़रते हैं।

पहला ख़तरा - अनुचित वातावरण, ग़लत वातावरण का ख़तरा:- हम ऐसे वातावरण में रहते हैं, जहां सब प्रकार का अधर्म है, जहां शैतान का जाल फैला हुआ है। भजन संहिता 1:1 में लिखा हुआ है, “क्या ही धन्य है वह पुरुष जो दुष्टों की युक्ति पर नहीं चलता”। इस संसार में दुष्टों की युक्तियों का ख़तरा है क्योंकि संसार में दुष्ट लोग फैले हुए हैं और वे अपनी युक्ति बताने में, अपनी सलाह देने में पीछे नहीं हटते। हम दुष्ट लोगों से घिरे हुए हैं। कई बार हम दुष्टों की युक्तियों पर चल कर, उनकी सलाह मान कर ग़लत बातों में फंस जाते हैं। ग़लत विचारों, ग़लत कार्यों में फंस जाते हैं। बाइबिल के बताए हुए मापदण्डों को तोड़ कर ग़लत बातों की वकालत करने वाले टेलीविजन शोज़, अश्लील साहित्य, अश्लील मनोरंजन आदि ग़लत बातों को और पाप को; शैतान अत्यन्त आकर्षक बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करता है। ऐसे वातावरण में रहकर हमें बचना है कि दुष्टों की युक्ति पर न चलें।

नीतिवचन 1:15 - “हे मेरे पुत्र, तू उनके संग मार्ग में न चलना, वरन् उनकी डगर में पांव भी न रखना”।

भजन संहिता 1:1 में लिखा है - “न पापियों के मार्ग में खड़ा होता है”। इस संसार में पापियों का, अधर्म का एक मार्ग है। मत्ती 7:13-14 में लिखा है - “चैड़ा है वह मार्ग जो विनाश को पहुंचाता है, और सकरा है वह मार्ग जो जीवन को पहुंचाता है”। इस संसार में दो मार्ग हैं - चैड़ा मार्ग; समझौतों का मार्ग है, अधर्मियों और पापियों का मार्ग है। दूसरा सकरा मार्ग है; जो सीधे अनन्त जीवन को पहुंचाता है और इसीलिए नीतिवचन 4:14 में लिखा है - “दुष्टों की राह में पांव न रखना, और न बुरे लोगों के मार्ग पर चलना”। मसीही जीवन में आगे बढ़ते हुए ख़तरे के रूप में दुष्टों की युक्ति है और पापियों का मार्ग है। 1 कुरिन्थियों 5:11 में लिखा है - “पर मेरा कहना यह है कि यदि कोई भाई कहलाकर, व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या ग़ाली देने वाला, या पियक्कड़, या अन्धेर करने वाला हो, तो उसकी संगति मत करना; वरन् ऐसे मनुष्य के साथ खाना भी न खाना”। धन्य है वह मनुष्य जो दुष्टों के मार्ग में खड़ा नहीं होता और न ठट्ठा करने वालों की मण्डली में बैठता है। हमें ऐसे लोगों की मण्डली से दूर रहना है जो पापियों के मार्ग पर चलते हैं क्योंकि हंसी मज़ाक करने एवं ठट्ठा करने में अन्तर है - हंसने की, खुश होने की, आनन्द मनाने की परमेश्वर के वचन में मनाही नहीं है परन्तु ठट्ठा करने का अर्थ अपमानित करना होता है। अर्थात् ठट्ठा करने का अर्थ है; परमेश्वर के किसी सेवक को अपमानित करना, उसके लोगों को अपमानित करना, उसकी योजना को अपमानित करना, उसके कार्यों को अपमानित करना।

नीतिवचन 19:29 में लिखा है - “ठट्ठा करने वालों के लिए दण्ड ठहराया जाता है”।

नीतिवचन 22:10 में लिखा है - “ठट्ठा करने वाले को निकाल दे, तब झगड़ा मिट जाएगा, और वाद-विवाद और अपमान दोनों टूट जाएंगे”। ये ठट्ठा करने वाले वे लोग हैं जो झगड़ा कराते हैं, जो वाद-विवाद कराते हैं, और ये वे लोग हैं जो अपमान कराते हैं; क्योंकि इनके द्वारा शैतान हमें फंसाता है, हमको फाड़ खाने के लिए तैयार रहता है।

दूसरा ख़तरा - अनुचित प्रतिक्रिया:- यह बहुत बड़ा ख़तरा है और यह एक ऐसा ख़तरा है जिसके द्वारा शैतान सबसे प्रभावशाली रूप से हम पर वार करता है। अनुचित प्रतिक्रिया के ख़तरे का अर्थ यह है कि संसार की बुराई से प्रभावित होकर हमारी जो अच्छाई है, उसे हम खो दें। इस संसार की अधार्मिकता से प्रभावित होकर अपनी धार्मिकता को हम खो देें। परमेश्वर ने प्रभु यीशु मसीह को हमारे लिए इस संसार में भेजा, उसने उसको बलिदान किया, उसे पुनरुत्थित किया, हमें बचाया, हमारे पापों को क्षमा किया और हमें अनन्त जीवन का दान दिया; ये वे सब बातें हैं जो हमें परमेश्वर की ओर से मिली हैं और अनुचित प्रतिक्रिया से प्रभावित होकर, इस संसार के प्रलोभनों में हम इस धार्मिकता को खो देते हैं।

अक्सर हम कहते हैं कि हमसे दूसरे जैसा व्यवहार करते हैं हमें भी वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए। ये सारी बातें परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं हैं। मानव स्वभाव हमेशा बदला लेने की सोचता है और संसार की इस बुराई के कारण जो कुछ परमेश्वर ने हमारे लिए किया है, उसे हम खो देते हैं।

इसलिए प्रभु यीशु मसीह जब पहाड़ी उपदेश देते हैं और अपनी शिक्षाओं की आधारशिला रखते हैं तो वह कहते हैं कि तुम नमक के समान हो। नमक थोड़ा-सा होता है पर ढेर सारे आटे को प्रभावित करता है, और यही हमारा गुण होना चाहिए। शैतान की बुराई से, उसके अधर्म से हम अपने आप को प्रभावित न होने दें। प्रभु यीशु मसीह ने गाली सुनकर गाली नहीं दी; यह बहुत कठिन है परन्तु यही मसीही जीवन है। मसीही जीवन की कल्पना ख़मीर से की गई है, थोड़े से ख़मीर को पांच पसेरी आटे में मिला दिया जाता है और थोड़ा सा ख़मीर सारे आटे को प्रभावित करता है, उसके गुणों में परिवर्तन आ जाता है। परमेश्वर ने हमें इस संसार में अपना राजदूत बनाकर भेजा है ताकि हम इस संसार में रहते हुए लोगों को प्रभावित कर सकें। पौलुस प्रेरित कहता है - कि तुम संसार में तो हो परन्तु संसार के नहीं।

बाइबिल में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जो इसमें असफल हो गए। शिमशोन के जीवन को हम पाते हैं, जिसे माता के गर्भ में परमेश्वर ने चुन लिया था। उसको नाज़ीर करके ठहराया था, उसको अपनी योजना के लिए तैयार किया था, परमेश्वर ने उसे शक्तिशाली बनाया था। परन्तु शिमशोन संसार के अनुसार अपने को ढाल लेता है। अपने आप को संसार के प्रलोभनों से, लोभ से बचा नहीं पाता और अन्त में शिमशोन के साथ क्या हुआ, वह सारी घटना हम सब जानते हैं।

यहूदा प्रभु यीशु मसीह का शिष्य था, उसकी अच्छी शुरुआत थी, उसमें योग्यताएं थीं। परन्तु यहूदा स्वार्थी हो जाता है और महायाजकों के पास जाकर कहता है कि अगर मैं यीशु को तुम्हारे हाथ पकड़वा दूं तो मुझे क्या मिलेगा? जब हमारे जीवन में यह भावना आ जाती है कि मुझे क्या मिलेगा...? तब हम अपने अनन्त जीवन को दांव पर लगा देते हैं। इस कारण प्रभु यीशु मसीह यहूदा के विषय में कहते हैं कि भला होता कि ऐसे मनुष्य का जन्म ही न हुआ होता। एसाव ने अपने पहिलौठेपन का अधिकार एक कटोरे दाल के बदले में बेच दिया। हमारे साथ भी ऐसा ही होता है कि जब संसार की परीक्षाएं और प्रलोभन हमारे सामने आते हैं तो उस एक कटोरा दाल के बदले में हम अपने अनन्त जीवन को बेच देते हैं। इब्रानियों 12:16-17 में लिखा है - “ऐसा न हो कि कोई जन व्यभिचारी या एसाव के समान अधर्मी हो, जिसने एक बार के भोजन के बदले अपने पहिलौठे होने का पद बेच डाला। तुम जानते हो कि बाद में जब उसने आशीष पानी चाही, तो अयोग्य गिना गया, और आंसू बहा-बहाकर खोजने पर भी मन फिराव का अवसर उसे न मिला”। थोड़ा-सा लाभ, थोड़ा-सा लालच और हमारा अनन्त जीवन दांव पर लग जाता है।

परन्तु बाइबिल में कुछ ऐसे लोगों का वर्णन भी है जो अनुचित प्रतिक्रिया से बचे हुए थे। मूसा के विषय में इब्रानियों 11:24-25 में लिखा है - “विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना और उत्तम लगा”।

फिलिप्पियों 3:7-8 में पौलुस लिखता है - “परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। वरन् मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं। जिसके कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं”।

पौलुस के जीवन को देखें तो उसके पास पद था, सांसद का अधिकार था परन्तु प्रभु यीशु मसीह की उत्तमता को पहचान कर वह इन सब बातों को पीछे छोड़कर वचन के प्रचार में लग गया। चेलों ने सब कुछ छोड़ दिया और प्रभु यीशु मसीह के पीछे चल पड़े। यूहन्ना ने अपना व्यापार छोड़ दिया, अपना धन छोड़ दिया, अपना पद छोड़ दिया, अपना अहंकार छोड़ दिया और इन बातों से कहीं ज्य़ादा यूहन्ना ने प्रभु यीशु मसीह को अपना लिया। इसलिए लिखा है कि लेने से देना अति उत्तम है। मत्ती 16:25-26 में लिखा है - “क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा; और जो कोई मेरे लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे पाएगा। यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा? या मनुष्य अपने प्राण के बदले में क्या देगा?”

संसार का नियम है कि पाओगे तो बहुत बड़े हो जाओगे, खोओगे तो ख़त्म हो जाओगे परन्तु प्रभु यीशु मसीह कहते हैं जो खोएगा, वह पाएगा और जो पाना चाहेगा वह खोएगा। अनुचित प्रतिक्रिया का ख़तरा है, परन्तु संसार की बुराई से, संसार के प्रलोभनों से हम अपने अनन्त जीवन को दांव पर न लगाएं।

तीसरा ख़तरा- अनुचित अपेक्षाएं:- इस संसार में हमारे बहुत से सम्बन्ध होते हैं और हर सम्बन्ध से हमारी अपेक्षाएं होती हैं। पति-पत्नी का सम्बन्ध है तो पति को पत्नी से और पत्नी को पति से कुछ अपेक्षाएं होती हैं और यह बात सामान्य है। जब तक वे अपेक्षाएं रहेंगी और जब तक हम उन्हें पूरा करते रहेंगे; हमारा सम्बन्ध बढ़ेगा। परन्तु समस्या तब आती है जब हमारी अनुचित अपेक्षाएं हो जाती हैं। पति की पत्नी से अनुचित अपेक्षाएं हो जाती हैं कि पत्नी घर से बाहर नहीं निकलेगी, लोगों से बात नहीं करेगी, बाज़ार नहीं जा सकती; जब इस प्रकार की अनुचित अपेक्षाएं हो जाती हैं तो सम्बन्धों में दरार आ जाती है, सम्बन्ध टूट जाते हैं। पत्नी की पति से कुछ अनुचित अपेक्षाएं हो जाती हैं। जब नौकरी से मिलने वाली तनख्वाह से ज़्यादा बढ़कर पति की आय की अनुचित अपेक्षा पूरी नहीं हो पाती तो पत्नी अंसतुष्ट हो जाती है और सम्बन्धों में दरार पैदा हो जाती है। पिता की बेटे से और बेटे की पिता से अपेक्षाएं होना तो ठीक है। परन्तु जब अनुचित अपेक्षाएं हो जाएं तो वे सम्बन्धों में दरार पैदा कर देती हैं। एक कार्यकत्र्ता की अपने अधिकारी से अनुचित अपेक्षाएं हो जाएं, तो वह सम्बन्ध चलता नहीं बल्कि टूट जाता है।

एक बहुत बड़े वैज्ञानिक डाॅ. जाॅन राॅस ने कहा है कि जब अनुचित अपेक्षाएं हमारे जीवन में आती हैं तो उसके चार परिणाम होते हैं। अनुचित अपेक्षाएं हमारे सम्बन्धों को तोड़ती हैं, हमको पाप की ओर ढकेलती हैं, जीवन में निराशा लाती हैं और जीवन में क्रोध को जन्म देती हैं। इन अनुचित अपेक्षाओं का ख़तरा हमारेे मसीही जीवन में और भी बढ़ जाता है जब हमारी अनुचित अपेक्षाएं परमेश्वर से हो जाती हैं।

यूहन्ना 6:26 में लिखा है- “यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, मैं तुमसे सच सच कहता हूं, तुम मुझे इसलिये नहीं ढूंढते हो कि तुम ने आश्चर्यकर्म देखे, परन्तु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्त हुए”। शारीरिक भूख की तृप्ति की अपेक्षा है, जो ग़लत है। प्रभु यीशु मसीह यरूशलेम में प्रवेश करते हैं और लोग होशन्ना के नारे लगाते हैं, प्रभु यीशु मसीह को सांसारिक राजा बनाना चाहते हैं, क्यों? क्योंकि लोगों ने देखा है कि प्रभु यीशु मसीह ने पांच रोटी और दो मछली से हज़ारों लोगों को भोजन कराया, लोग सोचते हैं कि यह राजा बन जाएगा तो इसके राज्य में कोई भूखा नहीं होगा। प्रभु यीशु मसीह ने चंगाई दी तो लोग सोचते हैं कि अगर यह राजा बन जाएगा तो कोई बीमार नहीं होगा। प्रभु यीशु मसीह ने मृतकों को जिलाया, लोग सोचते हैं कि बहुत अच्छा होगा, अब इसके राज्य में कोई मरेगा नहीं क्योंकि यह तो मृतकों को भी जिला देता है। इसलिए लोग प्रभु यीशु मसीह की सेवा को सांसारिक तराजू से, सांसारिक बांट से तौलते हुए लोग उसे सांसारिक राजा बना देना चाहते हैं; एक अनुचित अपेक्षा प्रभु यीशु मसीह से है।

प्रभु यीशु मसीह यरूशलेम जाने की अपनी अन्तिम यात्रा प्रारम्भ कर रहे हैं, जहां उन्हें मालूम है कि उन पर थूका जाएगा, उनके पंजर को भाले से छेदा जाएगा, उन्हें क्रूस पर चढ़ा दिया जावेगा, उन्हें मार डाला जाएगा। यरूशलेम जाने से पहले जब्दी के पुत्रों की माता आती है और प्रभु यीशु मसीह से कहती है, मेरी इच्छा है कि तेरे राज्य में मेरा एक पुत्र तेरे दाहिने और दूसरा पुत्र बांयी ओर बैठे। अनुचित अपेक्षाएं! प्रभु यीशु मसीह नाराज़ होते हैं और कहते हैं, तुम जानते नहीं कि कौन-सा कटोरा मैं पीने वाला हूं? क्या तुम पी सकते हो? वे जवाब देते हैं, हां, हम पी सकते हैं। प्रभु यीशु मसीह उनसे कह देते हैं कि मेरे राज्य में किसी को दांये और बांये बैठाना मेरा काम नहीं परन्तु पिता का काम है, तुम लोगों की अपेक्षाएं ग़लत हैं, तुम्हारी अपेक्षाएं अनुचित हैं।

कई बार बहुत से लोग बीमार पड़ने पर कहते हैं कि हम दवा नहीं खाएंगे, सिर्फ़ प्रार्थना से चंगे हो जाएंगे, यह अनुचित अपेक्षा है। परमेश्वर ने मसीही अस्पताल दिए हैं जिनसे उसकी सेवा और गवाही होती है। परमेश्वर ने मेडिकल साइंस को आशीषित किया है और यह सब उसने हमारी बेहतरी के लिए ही किया है। यदि हम भोजन सामने रखें और प्रार्थना करें कि हमारा पेट भर जाए तो ऐसा सम्भव नहीं, यह हमारी अनुचित अपेक्षा है। कई बार लोग पूछते हैं कि यदि मसीही हो जाएंगे तो हमें क्या मिलेगा? क्या नौकरी मिल जाएगी, क्या घर मिल जाएगा, क्या विवाह हो जाएगा? यदि मसीही होने के पीछे ये कारण हैं तो फिर यह हमारी अनुचित अपेक्षा है।

1 कुरिन्थियों 15:19 में लिखा है- “यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे है”। प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि पहले तुम परमेश्वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी .... तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है कि तुम्हें इन सब वस्तुओं की आवश्यकता है।

जब हमारे यहां डकैती हुई और हम लोग मौत के करीब पहुंचने के बाद भी बच गए तो बहुत से लोग कहने लगे कि आपने अच्छे काम किए होंगे, इसलिये आप लोग बच गए। मसीही जीवन में ऐसे कथन और अपेक्षाएं ठीक नहीं। प्रश्न है कि क्या डाॅ. ग्राहम स्टेन्स ने ग़लत काम किये थे, जो उन्हें और उनके बच्चों को जला दिया गया? क्या प्रभु यीशु मसीह ने पाप किया था, जो उसे क्रूस पर चढ़ा दिया गया? उसके चेलों की हत्या क्यों कर दी गई, क्या वे अपराधी थे? यह सोचना कि यदि हम मसीही हैं तो हम पर कोई मुसीबत नहीं आएगी, ग़लत है। जब ऐसी अनुचित अपेक्षाएं हम रखते हैं और जब हमें अपने जीवन में दुःख से गुज़रना पड़ता है तो फिर परमेश्वर से हमारा सम्बन्ध टूटता है और हमारी गवाही बिगड़ती है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमें क्या मिलेगा? प्रश्न यह होना चाहिए कि हम क्या दे सकते हैं? प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमारे अधिकार क्या हैं? प्रश्न यह होना चाहिए कि हमारे कर्तव्य क्या हैं? प्रतिदिन की रोटी के लिए हम परमेश्वर पर निर्भर हैं, प्रतिदिन की श्वास पर, प्रतिदिन के जीवन के लिए, हृदय की एक-एक धड़कन के लिए हम परमेश्वर पर निर्भर हैं और यह उसकी दया है। जब हृदय में यह अहसास होगा तो फिर हमारा मसीही जीवन कमज़ोर नहीं बल्कि चट्टान पर बना हुआ होगा। और जब तूफान आएगा तो हम अपने विश्वास में मज़बूत रह सकेंगे।

अनुचित वातावरण, अनुचित प्रतिक्रिया और अनुचित अपेक्षाओं से हमें बचना है नहीं तो किसी भी दिन इन के कारण हमारा मसीही जीवन टूट सकता है। हमारे सम्बन्ध न सिर्फ़ हमारे प्रियों से वरन् परमेश्वर से टूट सकते हैं।

इसी कारण, पौलुस प्रेरित 2 कुरिन्थियों 5:1 में लिखता है - “क्योंकि हम जानते हैं, कि जब हमारा पृथ्वी पर का डेरा सरीखा घर गिराया जाएगा तो हमें परमेश्वर की ओर से स्वर्ग पर एक ऐसा भवन मिलेगा जो हाथों से बना हुआ घर नहीं, परन्तु चिरस्थाई है”।

परमेश्वर आपकी अगुवाई करे।