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इच्छा और चयन

संदर्भ: व्यवस्था विवरण 28:1-14; लूका 12:54-57

परमेश्वर ने मानव जाति को एक बड़ी आशीष यह दी है कि उसने हमें रोबोट के समान नहीं बनाया। प्रारम्भ से परमेश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा दी है कि मनुष्य अपना निर्णय करे, अपनी इच्छा से परमेश्वर से प्रेम करे, अपनी इच्छा से परमेश्वर को स्वीकार करे, अपनी इच्छा से परमेश्वर के वचन को माने। बाध्य होकर कोई किसी को प्रेम नहीं कर सकता। वह प्रेम का नाटक तो कर सकता है, थोड़ी देर का दिखावा तो कर सकता है परन्तु हृदय की गहराई से कोई बाध्य होकर प्रेम नहीं कर सकता। इसी कारण परमेश्वर ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा दी है।

जब परमेश्वर ने आदम और हव्वा की सृष्टि की और उन्हें अदन की वाटिका में रखा तो हम पाते हैं कि परमेश्वर ने उन्हें स्वतंत्र इच्छा दी। परमेश्वर ने उन्हें बताया कि क्या उचित है और क्या अनुचित। क्या सही है और क्या वर्जित है, तुम्हारी सीमाएं कहां तक हैं। उसने निर्णय करने की क्षमता आदम और हव्वा को दी। हम जानते हैं कि फिर किस प्रकार आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लघंन किया। परमेश्वर द्वारा निर्धारित सीमाओं का अतिक्रमण किया और परमेश्वर का अपमान करते हुए उसी फल को खाया जिसे खाने की मनाही की गई थी।

हम इब्राहीम और लूत का उदाहरण पाते हैं - लूत को निर्णय करना था कि भूमि के कौन से भाग को चुने। तब लूत को यरदन नदी के पास वाली तराई, जो हरी-भरी थी और जहां पर सदोम और अमोरा नगर थे, दिखाई देती है। लूत को सांसारिक प्रलोभनो और आकर्षणों की बातें दिखती हैं और वह उस बात को चुन लेता है।

यहोशू की पुस्तक के 24 वें अध्याय में हम पाते हैं कि यहोशू ने इस्राएल के सब गोत्रों के सारे लोगों को, मुख्य पुरुषों को, न्यायियों को और सरदारों को बुलाया और उसने उनके सामने इस बात का उल्लेख किया कि परमेश्वर ने हमारे जीवन में और हमारे पुरखाओं पर कितने महान आश्चर्य कर्म किए हैं। उसने हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति की है। परमेश्वर ने हमारी रक्षा की है, दुश्मन से हमें बचाया है, लाल समुद्र से हमें बचाया है और अन्त में यहोशू कहता है - इसीलिये आज तुम चुन लो कि किस की सेवा करोगे। पराए देवी- देवताओं की या परमेश्वर यहोवा की। उसके बाद वह अपना उदाहरण देता है और कहता है कि मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूंगा।

वचन में यह बात स्पष्ट लिखी हुई है कि इस संसार में मनुष्य दो प्रकार के बीज बो सकते हैं। ऐसे बीज जो शरीर के लिए हैं और ऐसे बीज जो आत्मा के लिए हैं। लिखा हुआ है कि जो शरीर के लिए बोता है, वह विनाश की कटनी काटेगा। जो शरीर पर ध्यान लगाता है, जो केवल अपने आनन्द, सुख, मनोरंजन और अपने लाभ, अपने भोग-विलास की अभिलाषा करता है, वह विनाश की कटनी काटेगा। अगर उसका ध्यान इस बात की ओर लगा है तो वह नरक की आग में जलेगा और विनाश की कटनी काटेगा।

परन्तु लिखा है कि जो आत्मा के लिए बोता है वह अनन्त जीवन की कटनी काटेगा। लिखा है; धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता। परमेश्वर यहोवा के हाथों में पड़ना भयानक बात है।

कितना समय हम शरीर के लिए देते हैं, अपने मनोरंजन के लिए देते हैं और कितना समय हम अपनी आत्मा के लिए देते हैं। शरीर तो कुछ दिनों का है, संसार तो कुछ दिनों का है परन्तु आत्मा तो हमेशा के लिए है, अनन्त जीवन तो हमेशा के लिए है। हम किस के लिए बो रहे हैं? शरीर के लिए या आत्मा के लिए? कितना समय हम किस बात के लिए दे रहे हैं?

यदि मनुष्य परमेश्वर के वचनों पर चले, यदि वह परमेश्वर का भय माने और उसकी निकटता में चले तो चार प्रकार की आशीषों का वर्णन किया गया है। व्यवस्थाविवरण 28:1-14 में इस बात का वर्णन है।

पहली आशीष -आर्थिक आशीष। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यदि आप प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण कर लें तो करोड़पति हो जाएंगे। परन्तु; 11 वें पद में लिखा है - “और जिस देश के विषय यहोवा ने तेरे पूर्वजों से शपथ खाकर तुझे देने को कहा था, उस में वह तेरी सन्तान की, और भूमि की उपज की, और पशुओं की बढ़ती करके तेरी भलाई करेगा”।

12 वें पद में लिखा है - “यहोवा तेरे लिये अपने आकाशरूपी उत्तम भण्डार को खोलकर तेरी भूमि पर समय पर मेंह बरसाया करेगा, और तेरे सारे कामों पर आशीष देगा; और तू बहुतेरी जातियों को उधार देगा, परन्तु किसी से तुझे उधार लेना न पड़ेगा”।

यह लाभ की आशीष है जो परमेश्वर हमें देता है।

दूसरी आशीष -आदर और सम्मान की आशीष। पद 3 में लिखा है - “धन्य हो तू नगर में, धन्य हो तू खेत में”।।

“धन्य हो तू भीतर आते समय, और धन्य हो तू बाहर जाते समय” (पद 6)।

“और यहोवा तुझ को पूंछ नहीं, किन्तु सिर ही ठहराएगा, और तू नीचे नहीं, परन्तु ऊपर ही रहेगा; यदि परमेश्वर की आज्ञाएं जो मैं आज तुझ को सुनाता हूं; तू उनके मानने में मन लगाकर चैकसी करे” (पद 13)।

तीसरी आशीष - विजयी होने की आशीष। “यहोवा ऐसा करेगा कि तेरे शत्रु जो तुझ पर चढ़ाई करेंगे वे तुझ से हार जाएंगे; वे एक मार्ग से तुझ पर चढ़ाई करेंगे, परन्तु तेरे साम्हने से सात मार्ग से होकर भाग जाएंगे” (पद 7)।

तेरे शत्रु तुझ पर चढ़ाई तो करेंगे परन्तु उनकी शक्ति समाप्त हो जाएगी और वे खुद बिखर जाएंगे। वे एक मार्ग से आएंगे और सात मार्ग से भाग जाएंगे।

चौथी आशीष - सफलता की आशीष। “तेरे खत्तों पर और जितने कामों में तू हाथ लगाएगा उन सभों पर यहोवा आशीष देगा; इसलिये जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में वह तुझे आशीष देगा” (पद 8)।

जिन-जिन कामों में तू हाथ लगाएगा, परमेश्वर यहोवा उसको आशीषित करेगा।

परन्तु इसी के साथ परमेश्वर का भय न मानने और उसकी आज्ञाओं का पालन न करने पर परमेश्वर के शापों का भी वर्णन व्यवस्थाविवरण के 28 वें अध्याय में पाया जाता है।

पहला शाप - आर्थिक हानि का शाप। “तू खेत में बीज तो बहुत सा ले जाएगा, परन्तु उपज थोड़ी ही बटोरेगा; क्योंकि टिड्डियां उसे खा जाएंगी” (पद 38)।

“तू दाख की बारियां लगाकर उन में काम तो करेगा, परन्तु उनकी दाख का मधु पीने न पाएगा, वरन फल भी तोड़ने न पाएगा; क्योंकि कीड़े उनको खा जाएंगे” (पद 39)।

दूसरा शाप - पराजय का शाप। “फिर जिस जिस काम में तू हाथ लगाए, उस में यहोवा तब तक तुझ को शाप देता, और भयातुर करता, और धमकी देता रहेगा, जब तक तू मिट न जाए, और शीघ्र नष्ट न हो जाए; यह इस कारण होगा कि तू यहोवा को त्यागकर दुष्ट काम करेगा” (पद 20)।

तीसरा शाप - शारीरिक शाप। “यहोवा तुझ को मिस्र के से फोड़े, और बवासीर, और दाद, और खुजली से ऐसा पीड़ित करेगा, कि तू चंगा न हो सकेगा। यहोवा तुझे पागल और अन्धा कर देगा, और तेरे मन को अत्यन्त घबरा देगा” (पद 27-28)।

यह दया करने वाला परमेश्वर, क्षमा करने वाला परमेश्वर, अनुग्रह करने वाला, उद्धार करने वाला और बचाने वाला परमेश्वर; यह परमेश्वर तुझे पागल और अन्धा कर देगा। “यहोवा तेरे घुटनों और टांगों में, वरन नख से शिख तक भी असाध्य फोड़े निकालकर तुझ को पीड़ित करेगा”(पद 35)।

चौथा शाप - प्राकृतिक विपदा का शाप। “यहोवा तेरे देश में पानी के बदले बालू और धूलि बरसाएगा, वह आकाश से तुझ पर यहां तक बरसेगी कि तू सत्यानाश हो जाएगा” (पद 24)।

पांचवां शाप - अपमान का शाप। “जो परदेशी तेरे मध्य में रहेगा वह तुझ से बढ़ता जाएगा; और तू आप घटता चला जाएगा। वह तुझ को उधार देगा, परन्तु तू उसको उधार न दे सकेगा; वह तो सिर और तू पूंछ ठहरेगा” (पद 43-44)।

छठवां शाप - भयानक शाप। “और वहां तुम अपने शत्रुओं के हाथ दास-दासी होने के लिये बिकाऊ तो रहोगे, परन्तु तुम्हारा कोई ग्राहक न होगा” (पद 68 ब)।

वचन कहता है, तुम्हारा कोई ग्राहक न होगा। तुम्हारी कोई अहमियत न होगी। तुम्हारा कोई मूल्य नहीं होगा। तुम्हारा कोई वजूद, तुम्हारी कोई पहचान नहीं होगी। दास और दासी होने के लिए तुम बिकाऊ तो रहोगे मगर तुम्हें गुलाम बनाने वाला भी कोई नहीं होगा।

ये सारी बातें हम सभी के लिए हैं फिर तो कौन सी बातों का निर्णय हमें करना है?

1. हमें निर्णय करना है कि हम परम्परा का निर्वाह करेंगे या प्रभु यीशु से हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध होगा।

यह शैतान का एक तरीका है कि वह धर्म को परम्परा बना देता है। जो हमारे माता-पिता ने किया वही हम करते हैं। त्योहारों को मनाते हैं, समय आने पर सब प्रकार की रीति-विधियों को परम्परा के समान पूरा करते हैं, यहां तक कि परम्परा के रूप में हम बपतिस्मा भी ले लेते हैं।

परन्तु मसीही धर्म का आधार परम्परा नहीं बल्कि प्रभु यीशु मसीह से मेरा और आपका व्यक्तिगत सम्बन्ध है।

प्रभु यीशु के पास एक धनी युवा प्रशासक आता है। वह कहता है कि मैं तो बचपन से ही व्यवस्था की बातों को मानता चला आया हूं। इन सब बातों को तो मैं जानता हूं। व्यवस्था तो मुझे रटी हुई है। परन्तु प्रभु यीशु कहते हैं कि तुझ में एक बात की कमी हैऋ तेरी प्राथमिकताएं सही नहीं हैं, तेरे लिए धन प्रमुख है।

शास्त्रियों और फरीसियों से प्रभु यीशु कहते हैं - हे शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम चूना फिरी कबरों के समान हो, जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, पर भीतर मुर्दों की हड्डियों से भरी हैं। प्रभु यीशु ने ऐसा क्यों कहा? क्योंकि ये शास्त्री और फरीसी परम्पराओं का निर्वाह करते थे। ये विधि-विधानों में अगुवाई करते थे। यहां तक कि ये सौंफ और पौदीने का दसवांश देते थे और सोचते थे कि इन सब कर्मकाण्डों को पूरा करने से, इन सब परम्पराओं को निभाने से हम स्वर्ग चले जाएंगे। हम परमेश्वर की दृष्टि में उचित ठहरेंगे।

हमारा परमेश्वर चाहता है कि हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध प्रभु यीशु मसीह से हो। इसी लिए नये जन्म की बात की गई है। क्या हमारा नया जन्म हुआ है? क्या प्रभु यीशु मसीह हमारे हृदय में जीवित है? क्या प्रभु यीशु मसीह से हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध है? जिससे व्यक्तिगत सम्बन्ध होता है तो उससे व्यक्तिगत सम्वाद भी होता है। उसके वचन का पठन भी होता है, उसके साथ समय भी बिताया जाता है। संसार हमें बाहर से तो बदल सकता है पर भीतर से बदलने में केवल प्रभु यीशु मसीह हमारी मदद करता है। वही हमको भीतर से परिवर्तित करता है।

1 शमूएल 16:7-8 में लिखा है - क्योंकि मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है परन्तु यहोवा की दृष्टि मन पर रहती है।

हमारा क्या सोच है, हमारा क्या उद्देश्य है? किस उद्देश्य से हम परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं? किस उद्देश्य से हम परमेश्वर के पीछे चल रहे हैं? क्या हमारा उद्देश्य बस यही है कि हमें लाभ मिल जाए। हमें सब अच्छी वस्तुएं मिल जाएं, हमें अच्छा पद मिल जाए या वास्तव में हम चाहते हैं कि हम प्रभु यीशु मसीह के पास लोगों को ला सकें, प्रभु यीशु मसीह की गवाही दे सकें, लोगों को उद्धार के विषय में बता सकें। लोगों को अपने साथ स्वर्ग ले जा सकें। लोगों को अनन्त मृत्यु से अनन्त जीवन की ओर ले जा सकें।

परमेश्वर हमसे कहता है कि तुम चुन लो कि तुम परम्परा का निर्वाह करोगे या प्रभु यीशु मसीह तुम्हारा व्यक्तिगत मुक्तिदाता होगा।

2. हम अपनी इच्छा के अनुसार जीवन बिता रहे हैं या परमेश्वर से कह रहे हैं कि तेरी इच्छा पूरी हो।

1 यूहन्ना 2:16-17 में लिखा है - “क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। और संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा”।

संसार की बातें तो मिट जाएंगी, धन और घमण्ड, सुख और सम्पत्ति; यह सब मिट जाएगा परन्तु केवल वही जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, सर्वदा बना रहेगा।

यशायाह 55:8-9 में लिखा है - “क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है”।

हमारे साथ समस्या यह है कि जो हम सोचते हैं वही हमें सही लगता है। हमें लगता है कि हमारा तराजू ही सही है, हमारे बांट ही सही हैं, हमारा पैमाना ही सही है।

नीतिवचन 14:12 में लिखा है - “ऐसा मार्ग है, जो मनुष्य को ठीक देख पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु ही मिलती है”। यदि हमें अपनी इच्छा और अपने स्वार्थ का मार्ग ठीक जान पड़ रहा है और उसी पर हम चल रहे हैं तो उसके अन्त में मृत्यु है।

पीलातुस ने भीड़ को खुश करने के लिए बरअब्बा को छोड़ दिया और प्रभु यीशु मसीह को दण्डित कर दिया।

अक्सर हम यह सोचने लगते हैं कि लोग क्या कहेंगे, लोग क्या सोचेंगे, फलां क्या कहेगा? फलां व्यक्ति नाराज़ तो नहीं हो जाएगा? हमारा अधिकारी क्या सोचेगा? परन्तु क्या कभी हम यह सोचते हैं कि हमारे इस निर्णय से, इस कार्य से परमेश्वर क्या सोचेगा? क्या परमेश्वर इससे प्रसन्न होगा।

प्रेरितों के काम 24:27 में फेलिक्स के विषय में लिखा है कि वह एक अधिकारी था और लोगों को खुश करने के लिये वह पौलुस को क़ैद में ही छोड़ गया।

कुलुस्सियों 2:8 में लिखा है - “चैकस रहो कि कोई तुम्हें उस तत्व-ज्ञान और व्यर्थ धोखे के द्वारा अहेर न कर ले, जो मनुष्यों के परम्पराई मत और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार है, पर मसीह के अनुसार नही”।

हमें चुनना है कि हमारे जीवन में हमारी इच्छा या परमेश्वर की इच्छा। हमारा मत या फिर परमेश्वर का मत। हमारे तराजू या परमेश्वर का मापदण्ड।

3. हमें चुनना है कि हम भावनाओं के आधार पर जीएंगे या विश्वास के आधार पर जीएंगे।

अक्सर अपने जीवन में भावनाओं के आधार पर हम निर्णय ले लेते हैं। हम उन बातों को चुन लेते हैं जिनसे हमें खुशी मिलती है, शरीर को आनन्द का अनुभव होता है, प्रसन्नता का अहसास होता है। जिन बातों से मन को शान्ति मिलेगी, जिससे मन को आनन्द मिलेगा, जिन बातों से ग़म भूल जाएंगे; उन बातों को हम स्वीकार कर लेते हैं। परन्तु हमें चुनना है कि हम भावनाओं के आधार पर जीएंगे कि विश्वास के आधार पर।

यिर्मयाह 17:9 में लिखा है - “मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?”

अक्सर हम कहते हैं कि मेरे मन में तो यह इच्छा हो रही है, मेरा मन तो ऐसा कर रहा है, क्या करें मन पर काबू नहीं रह गया। क्या करें, दिल तो समझता नहीं और बस बहक गए हम।

मरकुस 7:21-23 में लिखा है - “क्योंकि भीतर से अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरी बुरी चिन्ता, व्यभिचार। चोरी, हत्या, पस्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान और मूर्खता निकलती है। ये सब बुरी बातें भीतर ही से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती है”।

ये सभी बातें भीतर ही से निकलती हैं और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं। यदि हम मन को नियंत्रित नहीं रखेंगे तो फिर ये सारी बातें होंगी।

नीतिवचन 4:23 में लिखा है - “सब से अधिक अपने मन की रक्षा कर, क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है”।

इब्रानियों 11:7 में पुराने नियम की घटना का वर्णन है; जब इब्राहीम ने अपने बेटे को बलिदान करने के लिए अपना हाथ उठा दिया। क्या उस समय वह भावनाओं के आधार पर जी रहा था या फिर परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जी रहा था?

यूसुफ के सामने जब पोतीफर की पत्नी आई और उससे अनैतिक सम्बन्ध बनाना चाहे और जब यूसुफ वहां से भागा तो क्या वह भावनाओं के आधार पर जी रहा था या फिर परमेश्वर के वचन के आधार पर जी रहा था?

मिस्र का प्रधानमंत्री बन जाने के बाद यूसुफ के पास उसके भाई मदद मांगने के लिए आते हैं, जिन्होंने उसे गड़हे में डाला था और गुलाम बना कर बेच डाला था। क्या उस समय यूसुफ भावनाओं के आधार पर जी रहा था या फिर परमेश्वर के वचन के आधार पर जी रहा था?

दानिय्येल के सामने जब राजाज्ञा आई कि राजा की प्रतिमा के आगे झुकना है, नहीं तो सिंहों की मांद है, तो क्या दानिय्येल भावनाओं के आधार पर जी रहा था या फिर परमेश्वर के वचन के आधार पर जी रहा था?

शद्रक, मेशक, अबेद-नगो के सामने जब आग का भट्टा आता है तो जो निर्णय उन्होंने किया, क्या वह उनकी अपनी भावनाओं के आधार पर था, अपने मन के आधार पर था या फिर परमेश्वर के प्रति उनकी जो प्रतिबद्धता थी वह निर्णय उसके आधार पर था?

जब हमारी परीक्षा हो, जब हमारा अपमान हो, जब हमारे प्रियों से हमें चोट लगे; तब हमारे मन की परीक्षा होती है और इसीलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने मन की चैकसी करें।

4. हमें चयन करना है कि हम अनन्त जीवन को पाना चाहते हैं या अनन्त मृत्यु को।

इस पृथ्वी पर हम जो निर्णय करते हैं वह इसलिए प्रमुख है क्योंकि वह हमारे जीवन की नियति को, आत्मा के अनन्त को प्रभावित करता है। जो निर्णय हम यहां करते हैं, वह इस बात को निर्धारित करता है कि हम अनन्त आग में जलते रहेंगे या परमेश्वर के साथ अनन्त काल के लिए स्वर्ग में रहेंगे।

यह निर्णय एक बीज के समान है। हमारे पास विनाश का बीज भी है और अमरता का बीज भी है। प्रश्न यह है कि कौन-सा बीज हम डालेंगे?

इब्रानियों 10:26-31 में लिखा है - “क्योंकि सच्चाई की पहिचान प्राप्त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं। हां, दण्ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा। जब कि मूसा की व्यवस्था का न माननेवाला दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है। तो सोच लो कि वह कितने और भी भारी दण्ड के योग्य ठहरेगा, जिस ने परमेश्वर के पुत्र को पांवों से रौंदा, और वाचा के लोहू को जिस के द्वारा वह पवित्र ठहराया गया था, अपवित्र जाना है, और अनुग्रह की आत्मा का अपमान किया। क्योंकि हम उसे जानते हैं, जिस ने कहा, कि पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूंगाः और फिर यह, कि प्रभु अपने लोगों का न्याय करेगा। जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है”।

जब हम पाप करते हैं, जब हम मन के अनुसार चलते हैं, जब हम अपनी इच्छा को पूरी करना चाहते हैं तो हम जीवित परमेश्वर के पुत्र को पांव से रौंदते हैं, उसके लहू को अपवित्र जानते हैं और उसके अनुग्रह की आत्मा का अपमान करते हैं।

बाइबिल काॅलेज में अध्ययन के दौरान हम लोगों को प्रचार की कक्षा में पढ़ाया गया था कि सन्देश तीन प्रकार के होते हैं।

पहला सन्देश जिसे विषय पर आधारित सन्देश या Topical sermon कहा जाता है - एक विषय को आधार बनाकर सन्देश बनाया जाता है।

दूसरे प्रकार का सन्देश व्याख्यात्मक सन्देश या Expository sermon कहलाता है - यह किसी संदर्भ पर आधारित होता है। बाइबिल का एक सन्दर्भ ले लिया जाता है और उस सन्दर्भ की व्याख्या की जाती है।

तीसरा सन्देश प्रेरणात्मक सन्देश या Inductive sermon कहलाता है - इस प्रकार के सन्देश की विशेषता होती है कि इसमें सन्देश देने वाला निष्कर्ष नहीं बताता। वह यह नहीं कहता कि तुम ऐसा करो और ऐसा नहीं करो। वह सिर्फ़ यह बताता है कि यह रास्ता है, तुम्हारे सामने यह विकल्प है; चयन तुम्हारे हाथ में है, निर्णय करना तुम्हारे हाथ में है।

प्रभु यीशु मसीह के सन्देश प्रेरणात्मक (Inductive) सन्देश थे।

वचन में लिखा है कि वह द्वार पर खड़ा खटखटाता है। वह निवेदन करता है, याचना कर रहा है, बुला रहा है। बांहों को पसारे हुए ठहरा हुआ है। वह दबाव नहीं डाल रहा, दरवाज़ा तोड़ नहीं रहा बल्कि खटखटा रहा है।

लूका 12:54 में प्रभु यीशु मसीह कहते हैं - जब बादल को पश्चिम से उगते हुए देखते हो, तो तुरन्त कहते हो, कि वर्षा होगी और ऐसा ही होता है।

प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि तुम तो दुनिया की बातों को देखकर और सुनकर जान लेते हो कि कौन-सी बात उचित है और कौन-सी बात अनुचित। फिर आगे लूका 12:57 में प्रभु यीशु कहते हैं कि - “तुम आप ही निर्णय क्यों नहीं कर लेते कि उचित क्या है?”

सही चयन की दिशा में परमेश्वर आपकी अगुवाई करे।