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संघर्ष का उपहार

संदर्भ — 2 तीमुथियुस 4:6—8

विभिन्न देशों में नया वर्ष अलग-अलग प्रकार से मनाया जाता है।

मिस्र देश में नये वर्ष में आमोन देवता की उपासना की जाती है। लोग उसकी मूर्तियों को मन्दिर से बाहर निकालकर नावों पर रखते हैं और उन्हें नील नदी पर ले जाते हैं। जहां वे सारी रात खु़शियां मनाते हैं, नाचते, गाते, खाते और पीते हैं और सुबह होने के पहले वापस मन्दिरों में आमोन देवता की मूर्तियां रख देते हैं। इस प्रकार से मिस्र में नया वर्ष मनाया जाता है।

बेबीलोन में उस देश के राजा को तीन दिन पहले से एक स्थान पर भेज दिया जाता है। जहां राजा को परम्परानुसार तीन दिन नग्नावस्था में रहना पड़ता है। नये वर्ष के दिन वह नये कपड़े पहनकर बाहर निकलता है। पुराने सारे कपड़े जला दिए जाते हैं और उसके बाद एक बड़ा जुलूस निकलता है जिसमें सब लोग नये वस्त्र पहनते हैं। विशेष बात यह है कि उन तीन दिनों में राजा किसी भी सभा में मुख्य अतिथि होकर नहीं जाता।

रोम में लोग नये वर्ष में अपने पूरे घर में रोशनी करते हैं और घरों को सजाते हैं और अपने पड़ोसियों को भेंट देते हैं। अपने राजा जूलियस सीज़र को स्मरण करते हैं, क्योंकि जूलियस सीज़र ने ही कैलेण्डर का प्रारम्भ किया था और इसीलिए जनवरी का माह देवता जैनस के नाम पर आधारित है। इस समय लोग नये वर्ष के दिन जैनस देवता की उपासना करते हैं। जैनस देवता के दो चेहरे हुआ करते थे। जैनस के समान आज भी कितने लोग हैं जिनके दो चेहरे होते हैं।

यहूदियों के विषय में लिखा है कि वे आराधनालयों में जमा होते हैं और वर्ष भर जितनी ग़लतियां उन्होंने की हैं, उसकी एक सूची बनाते हैं और आराधनालय में परमेश्वर के सामने खड़े हो कर उन ग़लतियों को पढ़ते हैं कि हमने बीते वर्ष में जो ग़लतियां कीं, उनके लिए हमें माफ कर दे। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि उन ग़लतियों को वे फिर नहीं दोहराएंगे।

अनेक मुस्लिम राष्ट्रों में नये वर्ष के तीन दिन पहले गेहूं के दानों को भिगोकर एक कपड़े में रख दिया जाता है और जब वे अंकुरित हो जाते हैं तो लोग अपने पड़ोसियों, मित्रों और यहां तक कि अपने दुश्मनों के पास वे अंकुरित बीज लेकर जाते हैं। जब वे ये अंकुरित बीज अपने दुश्मनों या ऐसे व्यक्ति को देते हैं जिनसे उनके दिल में कोई कटुता या घृणा है तो इसका अर्थ होता है कि जैसे यह नया अंकुरण हुआ है, हम भी अपने सम्बन्धों को एक नये तरीके से प्रारम्भ करेंगे।

वियतनाम के विषय में लिखा है कि लोग सारी रात जागते हैं, घर सजाते हैं और कोशिश करते हैं कि रात में सबसे अच्छा व्यवहार हो, बहुत विनम्रता से, प्रेम से, ख़ुशी से रहें। क्योंकि वे मानते हैं कि नये वर्ष की रात्रि को स्वर्ग के देवता घर-घर जाकर देखते हैं कि कौन कितनी अच्छी तरह से रह रहा है।

जापान के विषय में मैं पढ़ रहा था तो लोग नये साल के पहले प्यांर या पैरा की रस्सी बनाते हैं और उसे अपने घर के चारों तरफ बांध देते हैं। वे विश्वास करते हैं कि ऐसा करने से वर्ष भर दुष्टात्माएं हमें प्रभावित नहीं करेंगी और बुरी नज़र हमें नहीं लगेगी।

ग्रीस के विषय में लिखा है कि शाम को बहुत आग-अलाव जलाया जाता है। छोटे-छोटे बच्चे अपनी जूतियां उस अलाव के चारों ओर छोड़ देते हैं और वे सोचते हैं कि रात में ईश्वर मिठाइयों की बरसात करेगा और नये साल में उन्हें अपनी जूतियां मिठाइयों से भरी हुई मिलेंगी। उनके माता-पिता या परिवार के लोग रात में उनके जूतों में मिठाइयां रख देते हैं और सुबह जैसे ही बच्चों की नींद ख़ुलती है, वे दौड़कर जाते हैं और अपनी जूतियों में कुछ मिठाइयां रखी हुई पाते हैं।

स्काॅटलैण्ड में लोग रात को 12 बजे कोयले और कोलतार को लकड़ी में बांध करके घर के सामने जलाते हैं, क्योंकि ये दोनों चीज़ें काली होती हैं। वे सोचते हैं कि पिछले वर्ष के हमारे सब प्रकार के पाप, अपराध और जो बुराइयां हमने की हैं, उन्हें हमने कोयले और कोलतार के प्रतीक के रूप में जला दिया और अब सारी पुरानी बुराइयां, पाप, श्राप, बुरे सम्बन्ध, घृणा और दुर्भावनाएं समाप्त हो गईं।

2 तीमुथियुस 4ः5-8 में लिखा हुआ है - “पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर। क्योंकि अब मैं अर्घ की नाईं उंडेला जाता हूं, और मेरे कूच का समय आ पहुंचा है। मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिए धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन् उन सब को भी, जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं”।

मेरे पिता की क़ब्र पर भी इसी आयत को लिखा गया है। वास्तव में, यदि मैं और आप मसीही जीवन जीना चाहते हैं, यदि प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलना चाहते हैं तो हमारे लिए यह जीवन आसान नहीं है। यह जीवन एक युद्ध के समान है, एक संघर्ष, संग्राम के समान है।

पुराने नियम में 200 से अधिक बार सेनाओं का यहोवा शब्द आया है। हमारा यहोवा परमेश्वर सेनाओं का यहोवा है और हम जो उसके पीछे चलते हैं, वे उसके सैनिक हैं।

पुराने और नये नियम में, वे सभी लोग जिन्होंने परमेश्वर के लिए महान कार्य किए, वे सभी योद्धा थे, जो संग्रामों से गुज़रे, जिन्होंने युद्ध किए। वह चाहे मूसा हो, यहोशू, गिदोन, शिमशोन, दाऊद हो या फिर एलीशा, एलिय्याह या सुलैमान हो। इन्हें परमेश्वर ने एक विशेष उद्देश्य से भेजा था और ये सभी योद्धा थे।

पौलुस मसीही जीवन के विषय में, इस संदर्भ से तीन बातें बताता है।

1. जीवन एक संग्राम-संघर्ष है:- पौलुस तीमुथियुस के नाम अपने पत्र में लिखता है- “हे पुत्र तीमुथियुस, उन भविष्यद्वाणियों के अनुसार जो पहिले तेरे विषय में की गईं थीं, मैं यह आज्ञा सौंपता हूं, कि तू उन के अनुसार अच्छी लड़ाई को लड़ता रहे” (1 तीमुथियुस 1ः18) “विश्वास की अच्छी कुश्ती लड़; और उस अनन्त जीवन को धर ले, जिस के लिए तू बुलाया गया, और बहुत गवाहों के सामने अच्छा अंगीकार किया था” (1 तीमुथियुस 6ः12)।

“मसीह यीशु के अच्छे योद्धा की नाईं मेरे साथ दुख उठा” (2 तीमुथियुस 2ः3)।

लूका रचित सुसमाचार में, जब प्रभु यीशु मसीह अपने चेलों को दूसरी बार वचन के प्रचार के लिए भेजते हैं तो कहते हैं - “उस ने उन से कहा, परन्तु अब जिस के पास बटुआ हो वह उसे ले, और वैसे ही झोली भी, और जिस के पास तलवार न हो वह अपने कपड़े बेचकर एक मोल ले” (लूका 22ः36)।

इस संसार से गुज़रते हुए हमें इस संसार की शक्तियों से युद्ध करना पड़ता है। न केवल हम, परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने भी बचपन से लेकर उसकी क्रूस पर मृत्यु तक संसार की शक्तियों से युद्ध किया और संघर्ष से भरा हुआ जीवन जिया।

राजा हेरोदेस जब आज्ञा निकाल देता है कि दो वर्ष और उससे छोटे जितने बच्चे हैं उनको मार डाला जाए तो यूसुफ और मरियम उस छोटे से बालक को लेकर एक देश से दूसरे देश को भागते हैं। एक लम्बी और कठिन यात्रा करते हैं। उनके जीवन में भी संघर्ष दिखाई देता है।

हमारे सामने भी आज वही संघर्ष है, हमें भी आज सांसारिक शक्तियों का सामना करना पड़ता है। आज भी ऐसे शासक हैं जो मसीही विरोधी हैं, आज भी ऐसी सेनाएं हैं, ऐसे दल हैं, ऐसे संगठन हैं, जिन्होंने मसीहियों के खि़लाफ झण्डा उठा लिया है। हमें यह निर्णय करना है कि अगर हम मसीह के लिए जीना चाहते हैं, और उसी के लिए मरना तो हमें इन सांसारिक शक्तियों से निपटना होगा, और उसके साथ-साथ आत्मिक शक्तियों से भी हमारा युद्ध निश्चय है।

इफिसियों 6ः12 में लिखा है “क्योंकि हमारा यह मल्लयुद्ध, लोहू और मांस से नहीं, परन्तु प्रधानों से और अधिकारियों से, और इस संसार के अन्धकार के हाकिमों से, और उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं”।

हम जानते हैं कि शैतान ने प्रभु यीशु मसीह की परीक्षा ली। उसको सांसारिक राजपाट दिखाया, शारीरिक भूख, अधिकार और सत्ता का लालच दिया। आज हमारा भी युद्ध आत्मिक शक्तियों से होता है। हमारे दैनिक जीवन में भी आत्मिक शक्तियों से हमें लड़ना होता है। फिर चाहे वह जादू-टोने की बात हो, कहीं ग़लत रीति-रिवाज़ हो, कहीं बच्चे के सिर में काला टीका लगाना हो, नज़र उतारना हो, झाड़-फूंक हो, चादर चढ़ाना हो चाहे फिर विजातीय विवाह की बात हो। यह सब हम कर लेते हैं क्योंकि कहीं न कहीं इससेे हमारा व्यक्तिगत स्वार्थ जुड़ा होता है और सांसारिक लाभ होता है। परन्तु ये सब ग़लत बातें हैं। ये सब शैतान की ओर से है और परमेश्वर के वचन के विरोध में है।

इस संसार में शारीरिक लालसाओं से हमारा युद्ध है। हम मनुष्य हैं, पाप में पड़ जाते हैं, और निरन्तर शारीरिक अभिलाषाओं से हमारा युद्ध होता है। प्रभु यीशु मसीह की परीक्षा ली गई तो शैतान ने उससे रोटी की बात की। जब आदम और हव्वा की परीक्षा ली गई तो उन्हें वह फल दिखाया गया जो देखने में आकर्षक था, जो उनकी शारीरिक भूख को तृप्त कर सकता था।

मरकुस 4ः19 में लिखा है- “और संसार की चिन्ता, और धन का धोखा और वस्तुओं का लोभ उन में समाकर वचन को दबा देता है। और वह निष्फल रह जाता है”।

आज हमारे आस-पास, हमारे जीवनों में, हमारे समाज में इतनी समस्याएं हैं, और ये समस्याएं दूर नहीं हो रहीं, क्यों? क्या हमने कभी इस बात पर विचार किया है? क्योंकि वचन हमारे जीवनों में निष्फल हो गया है। वचन से बढ़कर सांसारिक चिन्ता, धन, वस्तुओं का लोभ प्रमुख हो गया है।

1 पतरस 5ः8 में लिखा है “सचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जनेवाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए”।

हमारे जीवनों में न सिर्फ शारीरिक लालसाओं से संघर्ष है परन्तु मानसिक संघर्ष भी है। आज के संसार में मानसिक दबाव ज्य़ादा है। काम का तनाव, परिवार का तनाव, बच्चों का तनाव, भविष्य के लिए तनाव; हमारा शरीर निरन्तर मानसिक संघर्ष से जूझता रहता है। न सिर्फ हम परन्तु प्रभु यीशु मसीह भी इस संघर्ष से गुज़रे और उन्हें तो इतना मानसिक संघर्ष था कि गतसमनी बाग में उनका पसीना लहू बनकर बहने लगता है।

हमें इस बात का ध्यान रखना है कि इन सब बातों से हमें भी गुज़रना है, इन बातों के लिए हमें तैयार रहना है क्योंकि मसीही जीवन एक संघर्ष का जीवन है। यदि हम ठण्डे होकर बैठे रहें, तटस्थ होकर बने रहें तो फिर हमारे लिए यह जीवन आसान होगा क्योंकि उस स्थिति में तो शैतान ने हमें जीत लिया है और हम उसके पक्ष में हो गए।

2. कभी हार नहीं मानना है:- मसीही जीवन आगे बढ़ते जाने का, विकास का जीवन है। कभी ठहरने या रुकने का जीवन नहीं है। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जो हल पर हाथ रखकर पीछे मुड़कर देखता है, वह मेरे योग्य नहीं है।

दूसरे विश्व युद्ध के समय जनरल मैकार्थर के साथ उनका सहयोगी फ्रेज़ीयर अपनी सेना की टुकड़ी के साथ था, जिसमें 400 से अधिक जवान थे परन्तु फिर भी दुश्मन की सेना ने उसको घायल कर दिया। फ्रेज़ीयर मृत्यु शैय्या पर अपनी अन्तिम सांसे ले रहा था, उसे मालूम था कि उसका अन्तिम समय आ गया है। वह बहुत पीड़ा में था और लोग देख रहे थे कि उसके शरीर से रक्त बह रहा है। तब सेनापति आते हैं और फ्रेज़ीयर से कहते हैं- फ्रेज़ीयर हार नहीं मानो, तुम अपने आप को, अपने दिल को नहीं तोड़ो। तुम बताओ कि हम लोगों को क्या करना है? हमें तुम्हारे निर्देश की ज़रूरत है और तब फ्रेज़ीयर ने अपनी सेना से कहा- “कभी हार नहीं मानो, कभी हार नहीं मानो, कभी हार नहीं मानो”- और उसके बाद फ्रेज़ीयर की मृत्यु हो गई।

पौलुस प्रेरित ने फिलिप्पियों 1ः12 में लिखा- “मैं चाहता हूं, कि तुम यह जान लो, कि मुझ पर जो बीता है, उस से सुसमाचार ही की बढ़ती हुई है”।

पौलुस के साथ बीते वर्षों, बीते माहों में क्या-क्या हुआ था। उसे 5 बार 39-39 कोड़े लगाए गए। और इन कोड़ों की मार आसान नहीं थी। इनके शरीर पर पड़ते ही खून की धार बहने लग जाती थी। एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह मार सहना आसान बात नहीं थी।

पौलुस ने 3 बार बेतें खाईं। 1 बार पत्थरवाह किया गया। 3 बार समुद्री जहाज टूट गए। सोचिए! यदि समुद्री यात्रा में जहाज टूट जाए तो क्या होगा। उसने एक दिन और एक रात समुद्र में काटी। डाकुुओं के बीच यात्रा की।

अपने जातिवालों और अन्यजाति के लोगों से विवाद किया। जंगलों में यात्राएं कीं, कलीसियाओं की चिन्ता के कारण तनाव में रहा। 10 से अधिक बार रोम, यरूशलेम, सिकन्दरिया, कुरिन्थ, इफिसुस, फिलिप्पियों, मकिदुनिया, क्रेते आदि स्थानों पर उसे क़ैद में डाल दिया गया।

परन्तु पौलुस कहता है कि जो कुछ मुझ पर बीता है उससे सुसमाचार ही की बढ़ती हुई, वह कहता है कि मेरे लिए जीना मसीह है और मर जाना लाभ है।

2 कुरिन्थियों 2ः14 में लिखा है- “परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो मसीह में सदा हम को जय के उत्सव में लिए फिरता है, और अपने ज्ञान की सुगन्ध हमारे द्वारा हर जगह फैलाता है”।

यदि आपका कोई प्रिय क्रिकेट मैच छूट जाए और आपके परिवार वालों से आपको उस मैच की पूरी जानकारी मिल जाए कि कौन सी टीम कितने विकेट से जीती। तो फिर उसी मैच का यदि आप री-प्ले देखें तो आपको मज़ा नहीं आएगा क्योंकि आपको पहले से ही मालूम है कि कौन सी टीम जीत चुकी है। हमारी स्थिति भी इसी प्रकार है, हमें पहले से ही मालूम है कि प्रभु यीशु में अन्तिम विजय हमारी है। हमारी जीत तो हो चुकी है। क्योंकि वचन में लिखा है कि हम तो प्रभु यीशु मसीह में जयवन्त से भी बढ़कर हैं।

इसलिए जब ये संघर्ष, आरोप, मानसिक-आत्मिक और शारीरिक द्वन्द्व आते हैं तो उनसे संघर्ष करते हुए, युद्ध करते हुए आगे बढ़ते जाना है।

पौलुस ने फिलिप्पियों 1ः20 में लिखा है- “मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूं कि मैं किसी बात में लज्जित न होऊं, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसा ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूं वा मर जाऊं”।

काश! हम भी कह सकें कि किसी भी बात में, मैं लज्जित न होऊं परन्तु मेरी देह से मसीह की बड़ाई होती रहे। चाहे मैं जीवित रहूं या मर जाऊं।

प्रेरितों के काम 7ः54-56 में लिखा है- “ये बातें सुनकर वे जल गए और उस पर दांत पीसने लगे। परन्तु उस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और, यीशु को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा देखकर कहा; देखो, मैं स्वर्ग को खुला हुआ, और मनुष्य के पुत्र को परमेश्वर की दाहिनी ओर खड़ा हुआ देखता हूं”। 1 कुरिन्थियों 9ः24 ब- “तुम वैसे ही दौड़ो, कि जीतो”।

सांसारिक पारितोषिक पाने के लिए तो सब दौड़ते हैं, परन्तु तुम तो अनन्त जीवन की दौड़ को दौड़ रहे हो। इसलिए ऐसे दौड़ो कि जीतो। दौड़ते रहो, दौड़ते रहो, कभी अपने आप को पराजित न मानो।

3. अनन्त के परिप्रेक्ष्य में जिएं:- हमें अनन्त की ओर दृष्टि लगाते हुए उस बड़े चित्र को देखते हुए अनन्त के परिप्रेक्ष्य में जीना है।

पौलुस 2 कुरिन्थियों 4ः18 में लिखता है- “और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं”।

अमेरिकी सीनेट के सदस्य न्यूबर्गर को जब पता चला कि उनको कैंसर है तो उसके 6 महीने बाद वह लिखते हैं कि - कैंसर का पता चलने के बाद मेरे जीवन का सारा नज़रिया बदल गया। उन्होंने लिखा कि पहले मैं केवल नाम, पद, धन-दौलत और सफलता को चाहता था। यही मेरे जीवन का उद्देश्य था। परन्तु अब मेरी सारी इच्छाएं, आकांक्षाएं और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब ईश्वर से प्रार्थना करना, उसके वचन को पढ़ना, पत्नी के प्रेम भरे हाथों से चाय स्वीकार करना, मित्रों के साथ हंसने का समय बिताना, बच्चों की मुस्कुराहट, उनकी उपस्थिति का अहसास, उनके प्रेम से भरे हाथों का स्पर्श, रविवार की आराधना का इन्तज़ार करना; यह सब मेरे जीवन की प्राथमिकता बन गया है और मैंने पाया कि जीवन की वास्तविक ख़ुशी इसी में है।

मत्ती 5ः11-12 में लिखा है- “धन्य हो तुम, जब मनुष्य मेरे कारण तुम्हारी निन्दा करें, और सताएं और झूठ बोल-बोलकर तुम्हारे विरोध में सब प्रकार की बुरी बात कहें। आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिए स्वर्ग में बड़ा फल है इसलिए कि उन्हों ने उन भविष्यद्ववक्ताओं को जो तुम से पहिले थे, इसी रीति से सताया था”।

प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जब लोग मेरे कारण तुम्हें सताएं, झूठ बोलें, आक्षेप लगाएं, तुम्हारे विरोध में बुरी बातें कहें तो आनन्दित और मगन होना क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग में बड़ा फल है और तुम भविष्यद्वक्ताओं की श्रेणी में आ गए।

1 कुरिन्थियों 15ः19 में लिखा है- “यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं”।

रोमियों 8ः28 में लिखा है- “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए गए हैं”।

संजय लीला भंसाली की बहुचर्चित फिल्म ब्लैक को बहुत से अवाॅर्ड़ज़ मिले। इस फिल्म की कहानी हेलन कैलर के जीवन पर आधारित है। वह एक मसीही विश्वासी महिला थी। उसने अपने एक सन्देश में कहा कि यह बड़ी आशीष की बात होती; यदि कुछ दिनों के लिए हर इन्सान अपने जीवन में बहरा और अन्धा होने का अनुभव करता क्योंकि ऐसे अनुभव के बाद उसकी सारी ज़िन्दगी परमेश्वर को धन्यवाद देने में बीतती। यशायाह 40ः31 में लिखा है- “परन्तु जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वे नया बल प्राप्त करते जाएंगे, वे उकाबों की नाईं उड़ेंगे और श्रमित न होंगे, चलेंगे और थकित न होंगे”।

हाॅट एयर बलून ;गर्म हवा का गुब्बाराद्ध जिसमें हीलियम गैस भरी होती है और उसके नीचे आग जलती है तब वह ऊपर उड़ता है। स्टीव फाॅसिट नाम के एक व्यक्ति ने ऐसे गुब्बारे में बैठकर विश्व भ्रमण का निर्णय लिया। उसने यह निर्णय किया कि वह ऐसा करके एक नया वल्र्ड रिकाॅर्ड बनाएगा। उसने अपनी यह यात्रा 13 जनवरी 1997 को पूरी की। 2450 फीट की ऊंचाई तक वह उस हाॅट एयर बलून को ले गया। इस यात्रा में उसे 6 दिन 2 घण्टे 44 मिनट का समय लगा। परन्तु अटलांटिक महासागर पार करने के बाद जब हीलियम गैस की कमी होने लगी और लीबिया देश के दक्षिणी भाग में वह हवाई गुब्बारा उतरने लगा। स्टीव का उस पर से नियंत्रण ख़त्म होता जा रहा था क्योंकि जब यह हाॅट एयर बलून नीचे आता है तो हवा के प्रभाव से वह किसी भी दिशा में चला जाता है। लीबिया की सरकार ने कहा कि इस अमेरिकी व्यक्ति को हम अपने देश में उतरने की इजाज़त नहीं देंगे। यदि यह गुब्बारा 1000 फीट की ऊंचाई से नीचे आ गया तो इसे गोली मारकर उड़ा देंगे। किसी प्रकार एक छोटे हेलीकाप्टर की सहायता से उस तक मदद पहुंचाई गई और उसके गुब्बारे में हीलियम गैस भरी गई।

अपनी यात्रा के अन्त में जब वह भारत पहुंचा तो पत्रकारों ने उससे पूछा कि उसने अपनी इस लम्बी यात्रा के अनुभव से क्या सीखा? स्टीव ने उत्तर दिया कि हीलियम की कमी से गुब्बारा नीचे आने लगता है। जब वह नीचे आता है तो हवा का नियंत्रण कम हो जाता है। हवा के कम नियंत्रण से, तूफानों से, गुब्बारा ध्वस्त हो सकता है। परन्तु यदि गुब्बारा ऊंचाइयों पर रहे तो उस पर तूफानों का असर नहीं होता। और ऐसा करने के लिए हीलियम की आवश्यकता होती है। इसलिए यदि ऊंचे स्तर पर रहेंगे तो आंधी-तूफानों का प्रभाव हम पर नहीं पड़ेगा।

इससे यह बात सीखने को मिलती है कि अगर हम परमेश्वर की निकटता में रहेंगे, तो सांसारिकता से थोड़ी ऊंचाई पर रहेंगे। परमेश्वर की निकटता में बने रहेंगे तो परमेश्वर का नियंत्रण भी बना रहेगा और यदि सांसारिकता के धरातल पर आ गए तो हमारा नियंत्रण खो जाएगा और शैतान के नियंत्रण में हम अपनी आत्मा को, अपने जीवन को बर्बाद कर लेंगे।

वास्तव में, हमें अनन्त के परिप्रेक्ष्य में जीना है। हमें इन तीन बातों को अपने जीवनों में लागू करना है।

हमें समझना है कि मसीही जीवन संघर्ष है, संग्राम है और हम युद्ध क्षेत्र में हैं।

हमें आगे बढ़ते जाना है क्योंकि मसीही जीवन ख़ामोश हो जाने, समझौता कर लेने, ठहर जाने का जीवन नहीं है।

हमें अनन्त के चित्र के परिप्रेक्ष्य में अपना जीवन जीना है।

किसी विचारक ने कहा है कि हम दौड़ कैसे शुरू करते हैं, यह प्रमुख नहीं है परन्तु उसे कैसे ख़त्म करते हैं; यह प्रमुख है।

परमेश्वर इन बातों के द्वारा हमें अपनी आशीष से परिपूर्ण करे।