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अंजीर के वृक्ष के समान

मरकुस 11ः12-14; 19-20

मरकुस 11ः12-14; 19-20 में लिखा है - “दूसरे दिन जब वे बैतनिय्याह से निकले तो उसको भूख लगी। और वह दूर से अंजीर का एक हरा पेड़ देखकर निकट गया, कि क्या जाने उसमें कुछ पाए, पर पत्तों को छोड़ कुछ न पाया, क्योंकि फल का समय न था। इस पर उसने उससे कहा, अब से कोई तेरा फल कभी न खाए और उसके चेले सुन रहे थे। और प्रतिदिन सांझ होते ही वह नगर से बाहर जाया करता था। फिर भोर को जब वे उधर से जाते थे तो उन्होंने उस अंजीर के पेड़ को जड़ तक सूखा हुआ देखा”।

बाइबिल में अंजीर के वृक्ष के विषय में कई बातों का वर्णन पाया जाता है। जब आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा को तोड़कर निषिद्ध फल को खाया और उन्हें अपने नंगेपन का अहसास हुआ तो उन्होंने अंजीर के वृक्ष के पत्तों से अपना तन ढंक लिया (उत्पत्ति 3ः7)। अंजीर का वृक्ष आशीष का प्रतीक है (व्यवस्थाविवरण 8ः7-8)। जकर्याह 3ः10 में लिखा है - “उसी दिन तुम अपने-अपने भाई बन्धुओं को दाखलता और अंजीर के वृक्ष के नीचे आने के लिए बुलाओगे, सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है”।

जब यीशु ने नतनएल को बुलाया, वह अंजीर के वृक्ष के नीचे बैठा था (यूहन्ना 1ः48)। प्रकाशित वाक्य 6ः13 में लिखा है - और आकाश के तारे पृथ्वी पर ऐसे गिर पड़े जैसे बड़ी आंधी से हिलकर अंजीर के पेड़ में से कच्चे फल झड़ते हैं।

अंजीर का वृक्ष सामान्यतः काफी घना और छायादार होता है। इसमें वर्ष में दो बार फल आते हैं; जून और सितम्बर- अक्टूबर माह में। यह 15 से 20 फीट ऊंचा होता है और इसकी शाखाओं का फैलाव 25 से 35 फुट तक होता है। आज भी अंजीर का वृक्ष फिलिस्तीन में बहुतायत से पाया जाता है। इस्राएल का राष्ट्रीय चिन्ह अंजीर का वृक्ष है।

मरकुस 11ः36 पद में एक प्रमुख प्रश्न सामने आता है, जहां लिखा है - क्योंकि फल का समय न था। जब फल का समय न था तब फिर प्रभु ने क्यों शाप दिया क्योंकि मत्ती 21ः19 में लिखा है कि यीशु ने कहा - अब से तुझ में फल न लगें।

अंजीर के पेड़ की यह विशेषता है कि उसमें फल आना पहले शुरू होता है फिर बाद में पत्ते निकलते हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि अंजीर के वृक्ष में पत्ते हैं तो फल होना चाहिए। वनस्पति विज्ञानियों का कहना है कि अंजीर के पत्तों का प्रमुख कार्य यही होता है कि वे फल पर सीधा सूर्य का प्रकाश पड़ने से रोक सकें जिससे फल ठीक से पक सकें। परन्तु इस वृक्ष में पत्ते तो थे लेकिन फल नहीं थे। दिखने से जो बात थी वैसी भीतर से नहीं थी।

प्रभु यीशु के जीवन की यह प्रमुख घटना मीका 7ः1 की भविष्यवाणी की परिपूर्णता है। जहां पर लिखा है - हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूं जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, वा रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिए कोई गुच्छा नहीं रहा।

इस घटना से हमारे लिए क्या शिक्षा है, इस पर हम विचार करेंगे।

1. यह घटना यीशु की परिपूर्णता को प्रगट करती है: - इस घटना में दो बातें सामने आती हैं, पहली बात, यीशु के सारे आश्चर्यकर्म उसके प्रेम को प्रकट करते हैं केवल यह आश्चर्यकर्म उसके न्यायी होने को प्रगट करता है। यीशु के 37 आश्चर्यकर्मों का वर्णन नया नियम में पाया जाता है। 36 आश्चर्यकर्म उसके प्रेम, दया, अनुग्रह, क्षमा और उसके सृष्टिकत्र्ता होने को प्रकट करते हैं परन्तु यह एक आश्चर्यकर्म उसके न्यायी होने को प्रकट करता है। लिखा है - जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा और सब स्वर्गदूत उसके साथ आएंगे, तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा। और सब जातियां उसके सामने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग कर देता है, वैसे ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा (मत्ती 25ः31-32)।

यूहन्ना 5ः22 में यीशु कहते हैं कि - और पिता किसी का न्याय नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम उसने पुत्र को सौंप दिया है।

दूसरी बात, यह आश्चर्यकर्म दूसरे आश्चर्यकर्मों से इस मायने में समान है कि यह यीशु की दिव्यता और उसके मानव होने, दोनों को प्रकट करता है।

मत्ती 21ः18 में लिखा है - उसे भूख लगी (यह उसके मनुष्य होने का प्रमाण है)। मत्ती 21ः19,20 में लिखा है - उसने वृक्ष को शाप दिया और पेड़ तुरन्त सूख गया (यह उसके परमेश्वर होने का प्रमाण है)। मरकुस 4ः35-41 में एक घटना का वर्णन है। 38 वें पद में लिखा है - वह नाव में सो रहा था (यह उसके मनुष्य होने का प्रमाण है)। 39 वें पद में वह कहता है - शान्त रह थम जा और आंधी थम गई और तूफान शान्त हो गया (यह उसके परमेश्वर होने का प्रमाण है)। यूहन्ना के 11 वें अध्याय में लाजर को प्रभु यीशु द्वारा पुर्नजीवित किए जाने की घटना है। 35 वें पद में लिखा है कि जब यीशु क़ब्र पर पहंुचा तो उसके आंसू बहने लगे (यह उसके मानव होने का प्रमाण है)। उसके बाद उसने आवाज़ दी, हे लाजर निकल आ (यह उसके ईश्वर होने का प्रमाण है)।

क्या हम प्रभु यीशु की परिपूर्णता को समझते हैं? स्वीकारते हैं कि वह मसीहा तो है - पर वह प्रभु भी है? कहीं हम यहूदा के समान तो नहीं कि जब तक आशीषें हैं तब तक यीशु के साथ हैं। जब तक आश्चर्यकर्म हैं, भोजन है, चंगाई है तो हम यीशु के साथ हैं। परन्तु जब एक तरफ क्रूस है और दूसरी राह पर चांदी के सिक्के हैं तो हम संसार से समझौता कर लेते हैं। कहीं हम पतरस के समान तो नहीं कि जब तक सफलताएं हैं, उपलब्धियां हैं, नाम है, यश है, तब तक यीशु के साथ हैं, पर जब क्रूस है, अन्धकार की राह और मृत्यु की छाया है तो हमने उसे पहचानने से इन्कार कर दिया है। हम संसार के साथ सांसारिकता में बैठे हाथ सेंक रहे हैं। कहीं हम भीड़ के समान तो नहीं जो यीशु को सांसारिक राजा बनाना चाहती है। क्योंकि लोगों को लगता है कि इसके राज्य में कोई भूखा नहीं रहेगा, कोई बीमार नहीं होगा, कोई मरेगा नहीं और हम इसलिए होसन्ना के नारे लगा रहे हैं, जयकार कर रहे हैं। परन्तु जब यीशु सांसारिक राजा बनने से इन्कार कर देता है और हमारा आत्मिक राजा बनने की बात करता है तो हम कहते हैं कि इसे क्रूस पर चढ़ाओ और हमारे लिए बरअब्बा को छोड़ दो।

सम्पूर्ण मानव से बढ़कर यीशु सम्पूर्ण परमेश्वर है। प्रेम और अनुग्रह करने वाले से बढ़कर वह न्यायी है। क्या हमने परिपूर्णता से, सम्पूर्णता से यीशु को अपने जीवन का प्रभु स्वीकार किया है?

2. यह घटना हमारे जीवनों के अधूरेपन को चुनौती देती है:- फलवन्त होना परमेश्वर की उपस्थिति और उसकी आशीष का प्रतीक है और फल न होना उसके अनुग्रह और आशीष के न होने का प्रतीक है। यीशु उस पेड़ के पास आया जो दूर से गवाही दे रहा था कि वह भूख शान्त करने की क्षमता रखता है पर पास आकर उसने फल नहीं पाए। यीशु हमारे जीवनों से फल की अपेक्षा करता है। परन्तु जब वह हमारे जीवनों को देखता है तो क्या फल पाता है? हरियाली और पत्ते तो हैं परन्तु फल कहां हैं? यीशु कहता है कि मैंने तुम्हें जीवन दिया है, तुमने मुझे क्या दिया? किसी ने लिखा है कि जो कुछ हम हैं वह परमेश्वर की भेंट है और जो कुछ हम बन जाते हैं वह परमेश्वर को हमारी भेंट है। यूहन्ना 15ः5 में लिखा है - मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हों। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। लूका 13ः6-9 में लिखा है - फिर उसने यह दृष्टान्त भी कहा; किसी की अंगूर की बारी में एक अंजीर का पेड़ लगा हुआ था। वह उसमें फल ढूंढ़ने आया, परन्तु न पाया। तब उसने बारी के रखवाले से कहा, देख, तीन वर्ष से मैं इस अंजीर के पेड़ में फल ढूंढ़ने आता हूं, परन्तु नहीं पाता। इसे काट डाल कि यह भूमि को भी क्यों रोके रहे? उसने उसको उत्तर दिया, हे स्वामी, इसे इस वर्ष और रहने दे कि मैं उसके चारों ओर खोदकर खाद डालूं। सो आगे को फले तो भला, नहीं तो उसे काट डालना।

मात्र छाया पर्याप्त नहीं है, भूख मिटना चाहिए। शब्दों के उच्चारण और परम्पराओं के पालन से कुछ नहीं होगा, लोगों के परिवर्तित जीवन का प्रमाण होना चाहिए। फलवन्त होना इसलिए भी प्रमुख है क्योंकि फल में बीज है, जिसमें सम्भावना है नया वृक्ष पैदा करने की। जब प्रचार किया जाता है, जब वचन का बीज बोया जाता है तो नए विश्वासी बनते हैं और कलीसियाओं की स्थापना होती है। सोचिए! यदि किसी ने यह बीज न बोया होता तो हमारी कलीसिया कहां होती! हम कहां होते! हमने क्या किया है? आज जब परमेश्वर हमें और हमारे हृदय को देखता है तो उसे क्या दिखाई देता है? आज यीशु उनको ढूंढ़ रहा है जो संसार से बिना समझौता किए चलते जाएं। यीशु ढूंढ़ रहा है क्रूस के योद्धाओं को जो उसके नाम की ख़ातिर हर ख़तरा सहने को तैयार हों, जो उसके वचन को फैलाने के लिए योद्धा की नाईं तैयार हों।

3. यह घटना चेतावनी देती है कि न्याय का दिन आने वाला है:- यीशु वृक्ष को देखता है और उसे शाप देता है। मत्ती 21ः19 ब में लिखा है - और अंजीर का पेड़ तुरन्त सूख गया। हमें स्मरण रखना है कि यीशु को शाप देने का भी अधिकार है। जो आज अवसर दे रहा है वह एक दिन आदेश देगा। जो आज बांहें फैलाए हुए बुला रहा है वह एक दिन द्वार बन्द कर देगा। जो आज प्रेम, क्षमा, अनुग्रह करता है वह एक दिन सिंहासन पर बैठकर न्याय करेगा। परम्पराएं पूर्ण करना पर्याप्त नहीं है, त्योहार मना लेना पर्याप्त नहीं है बल्कि हमारा हृदय सही होना चाहिए, हमारे हृदय में यीशु होना चाहिए।

फरीसी जब पर्व मनाते थे तो एक पर्व के दौरान यरूशलेम में लगभग ढाई लाख पशुओं की बलि चढ़ाते थे। जब वे दान करते थे तो बिगुल बजवाते थे, जिसके दो अर्थ थे, पहला कि बिगुल बजने से गरीब जमा हो जाते थे और दूसरा कि फरीसियों की पब्लिसिटी भी हो जाती थी। फरीसी जब प्रार्थनाएं करते थे तो सड़क पर खड़े होकर लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएं करते थे। जब उपवास करते थे तो उनके मुंह लटके हुए होते थे, मायूसी छाई रहती थी ताकि लोगों को दिखा सकें। हर समय धार्मिक शब्दावली बोलते थे। यह सब कुछ वे मनुष्यों को दिखाने के लिए और अपनी तारीफ करवाने के लिए करते थे। धर्म उनके लिए मात्र एक परम्परा बनकर रह गया था, सिर्फ़ दिखावा और ढोंग! परन्तु न्याय का दिन आने वाला है, परमेश्वर से कोई बच नहीं सकता। यह यीशु एक दिन द्वार बन्द कर देगा। वह रात आने वाली है जब कुछ नहीं हो सकेगा। इसीलिए मत्ती 7ः17-23 में यीशु कहता है - इसी प्रकार हर एक अच्छा पेड़ अच्छा फल लाता है और निकम्मा पेड़ बुरा फल लाता है। अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं ला सकता, और न निकम्मा पेड़ अच्छा फल ला सकता है। जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में डाला जाता है। सो उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे। जो मुझ से, हे प्रभु! हे प्रभु! कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे, हे प्रभु, हे प्रभु क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत से अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उनसे खुलकर कह दूंगा, कि मैंने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करने वालों मेरे पास से चले जाओ।

प्रश्न यह उठता है कि हम फलवन्त कैसे हो सकते हैं? इसके लिए; अ. हम सम्पूर्ण पश्चात्ताप करें - मैं तुमसे सच सच कहता हूं कि जब तक गेहूं का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है; परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है (यूहन्ना 12ः24)।

ब. जीवन के जल से हमारा सम्पर्क वचन, प्रार्थना और कलीसियाई संगति के द्वारा बना रहे - वह उस वृक्ष के समान है, जो बहती नदियों के किनारे लगाया गया है, और अपनी ऋतु में फलता है, और जिसके पत्ते कभी मुरझाते नहीं। इसलिये जो कुछ वह पुरुष करे वह सफल होता है (भजन संहिता 1ः3)।

स. वचन को हम अपने हृदय में ग्रहण करें - जो अच्छी भूमि में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनकर समझता है, और फल लाता है; कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, और तीस गुना (मत्ती 13ः23)।

द. प्रभु में सदैव बने रहें - मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो। जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते (यूहन्ना 15ः5)।