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तनावमुक्त जीवन

मत्ती 2:1-12

सन्दर्भ: फिलिप्पियों 4ः4-16

यह उन दिनों की बात है, जब मैं शायद प्रायमरी कक्षा में पढ़ता था। भारत और पाकिस्तान का युद्ध हो रहा था। अचानक से कभी भी सायरन की गूंज होती थी और तुरन्त हम लोगों को स्कूल के अन्दर चले जाना होता था। रात को अचानक से ब्लैकआउट होता था और तुरन्त लोगों को घर के अन्दर चले जाना होता था क्योंकि पाकिस्तान के फाइटर प्लेन कभी भी आकर बमबारी कर सकते थे। बहुत से शहरों को तबाह कर दिया गया। हज़ारों निर्दोष लोग मारे गए। अन्ततः भारत की जीत हुई। परन्तु जितने दिन युद्ध चलता रहा उतने दिनों सभी भारतीय तनाव में जीते रहे, खासकर उत्तरी व मध्य भारत में रहने वाले लोग।

इतिहासकारों का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध का समय सारे विश्व के लिए सबसे अधिक तनाव का समय था। उन्हीं विद्वानों का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के अनुपात में आज दोगुने तनाव का समय है। हमारे परिवारों में, सम्बन्धों में, कार्यक्षेत्र में, हमारी ज़िन्दगी में, हमारे दिल और दिमाग के बीच में तनाव है। इस तनाव से भरे वातावरण में हम जीते हैं, घुटते हैं, पिसते हैं और जो दिखाई नहीं देता वह यह कि इस बढ़ते हुए मानसिक तनाव के कारण हम एक ख़तरनाक मृत्यु की ओर जा रहे हैं।

किसी ने कहा है कि किसी टूटे हुए थर्मस के समान हमारी ज़िन्दगी हो गई है जो बाहर से तो बहुत अच्छा दिखाई देता है परन्तु अन्दर से चकनाचूर हो चुका है। भीतर से तनाव है जिसको हम व्यक्त नहीं कर सकते और उन तनावों में हम जी रहे हैं।

एक सर्वे में यह बात सामने आई कि प्रमुख रूप से सात कारण हैं, जिनकी वजह से व्यक्ति तनाव में रहता है।

पहला - कार्य क्षेत्र की स्थितियों के कारण।
दूसरा - आर्थिक कारण।
तीसरा - बीमारियों के कारण।
चैथा - वैवाहिक जीवन में सम्बन्धों के कारण।
पांचवां - नशे की आदत के कारण।
छठवां - असन्तुलित आहार के कारण।
सातवां - पर्याप्त नींद न लेने के कारण।

परमेश्वर हमसे प्रतिज्ञा करता है कि हम तनाव मुक्त जीवन जी सकते हैं। यह किसी डाॅक्टर, वैज्ञानिक या शोधकर्ता की प्रतिज्ञा नहीं है। परन्तु यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा है।

फिलिप्पियों 4ः7 में लिखा हुआ है - “तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है। तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी”।

यहां पर ग़ौर कीजिए, लिखा है कि - तब, परमेश्वर की शान्ति। ‘तब’ शब्द तब आता है जब आप किसी ब्वदकपजपवद को पूरा करते हैं, जब आप किसी बात को मान लेते हैं। इसका अर्थ यह है कि जब हम ऐसा करेंगे, तब ऐसा होगा। फिर लिखा हुआ है - ‘समझ से परे है’। इसका मतलब - हम समझ नहीं सकते कि यह शान्ति हमको कैसे मिल गई। इसका अर्थ यह है कि कोई कारण नहीं कि हम शान्त रहें। हमारी समझ से परे है कि इतना शान्त हमारा मन, हमारा हृदय कैसे रहेगा जबकि चारों तरफ अशान्ति, तनाव और कठिन परिस्थितियां हैं। भविष्य को देखते हैं तो असुरक्षित भविष्य है, फिर भी मन में शान्ति है, फिर भी हृदय में दृढ़ता है। मानवीय दृष्टिकोण से यह बात वास्तव में समझ से परे है। परन्तु परमेश्वर इस बात की निश्चितता दे रहा है कि तुम्हारे हृदय में और तुम्हारे विचारों में यह शान्ति रहेगी। हम में से हर एक को ऐसी ही निश्चितता की आवश्यकता है।

बाइबिल में परमेश्वर की सात हज़ार प्रतिज्ञाएं हैं। परन्तु उन से पहले परमेश्वर की कुछ अपेक्षा है कि हम करें। उसकी कुछ शर्तें हैं जिनको हमें पूरा करना है।

2 इतिहास 7ः14-15 में लिखा है - “तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं। यदि दीन होकर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी होकर अपनी बुरी चाल से फिरें तो मैं स्वर्ग से सुनकर उनका पाप क्षमा करूंगा। उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा। और उनकी प्रार्थना सुनूंगा। मेरी आंखें उन पर लगी रहेंगी। मेरे कान उन पर लगे रहेंगे”।

यहां पर ‘यदि’ शब्द आया है, जिसका अर्थ है कि कुछ Conditions ब्वदकपजपवदे हैं, कुछ Requirements हैं, उन्हें यदि हम पूरा करते हैं तब परमेश्वर की यह प्रतिज्ञा है।

वे कौन सी बातें हैं जिन्हें करने से हम पूर्णतः तनावमुक्त और शान्ति का जीवन जी सकेंगे।

परमेश्वर कहता है कि यदि तुम इन बातों को करोगे तो तुम्हें ऐसी शान्ति मिलेगी जो समझ से परे है।

पूर्णतः तनावमुक्त और शान्ति से भरा जीवन जीने के लिए वचन के इस सन्दर्भ के आधार पर हमें इन बातों को करना है।

1. किसी भी बात की चिन्ता मत करो। तनाव कार्य से करने से नहीं परन्तु चिन्ता करने से होता है। लिखा है - ‘किसी भी बात की चिन्ता मत करो’ - यह किसी भी बात.... का दायरा बहुत बड़ा है। भविष्य की चिन्ता नहीं, बीमारी की चिन्ता नहीं, आवश्यकताओं की चिन्ता नहीं, बच्चों की चिन्ता नहीं। किसी भी बात की चिन्ता मत करो!

प्रभु यीशु मसीह ने चिन्ता की बात को इतना प्रमुख समझा कि अपने पहले ही उपदेश में उसने चिन्ता के विषय में बात की। प्रभु यीशु ऐसे चार कारण बताते हैं कि हमारा चिन्ता करना क्यों व्यर्थ है।

पहली बात - चिन्ता करना व्यर्थ है क्योंकि चिन्ता समस्या को बढ़ाती है। किसी ने यदि आपके बारे में बुरा कहा और आप उस बात के बारे में सोचेंगे, ध्यान देंगे तो आपके दिमाग में वह बात बार-बार आएगी और आपकी समस्या बढ़ती जाएगी।

किसी ने लिखा है कि किसी ऐसी बात की चिन्ता करना बेकार है जिसे आप बदल नहीं सकते और किसी ऐसी बात की चिन्ता करना जिसे आप बदल सकते हैं, बेवकूफी है।

मत्ती 6ः25 में लिखा है - “इसीलिए मैं तुम से कहता हूं, कि अपने प्राण के लिए यह चिन्ता न करना कि हम क्या खाएंगे? और क्या पीएंगे? और न अपने शरीर के लिए कि क्या पहिनेंगे? क्या प्राण भोजन से, और शरीर वस्त्र से बढ़कर नहीं?”

दूसरी बात - चिन्ता करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि यह परमेश्वर की योजना नहीं है। वह सारी सृष्टि जिसे परमेश्वर ने सृजा है उसमें मनुष्य के अलावा और कोई चिन्ता नहीं करता। न पशु, न पक्षी, न पेड़-पौधे, न सूर्य, न चंद्रमा, न समुद्र चिन्ता करता है, केवल मनुष्य चिन्ता करता है।

मत्ती 6ः26 में प्रभु यीशु कहते हैं - “आकाश के पक्षियों को देखो। वे न बोते हैं, न काटते हैं, और न खत्तों में बटोरते हैं; तौभी तुम्हारा स्वर्गीय पिता उन को खिलाता है; क्या तुम उन से अधिक मूल्य नहीं रखते”।

प्रभु यीशु के कहने का अर्थ यह है कि पक्षियों का पिता नहीं है वह। उनका तो वह रचने वाला है, पिता तो तुम्हारा है। जिनको उसने रचा है जब वे चिन्ता नहीं करते तो तुम क्यों चिन्ता करते हो। चिन्ता के साथ कोई व्यक्ति पैदा नहीं होता। कोई बच्चा चिन्ता नहीं करता। बच्चा हंसी के साथ-रोने के साथ पैदा होता है। यह तो संसार हमें सिखा देता है कि हमको चिन्ता करना है। अगर हमने यह सीख लिया है कि हम चिन्ता कर सकते हैं तो यह भी सीख सकते हैं कि हम चिन्ता न करें।

मत्ती 6ः28-29 में लिखा है - “और वस्त्र के लिए क्यों चिन्ता करते हो? जंगली सोसनों पर ध्यान करो, कि वे कैसे बढ़ते हैं। वे न तो परिश्रम करते, न कातते हैं। तौभी मैं तुम से कहता हूं, कि सुलैमान भी, अपने सारे वैभव में उन में से किसी के समान वस्त्र पहिने हुए न था”।

नीतिवचन में यह बात स्पष्ट लिखी हुई है कि चिन्ता करने और चिन्ता न करने से क्या होता है!

नीतिवचन 14ः30 - “शान्त मन, तन का जीवन है, परन्तु मन के जलने से हड्डियां भी जल जाती हैं”।

चिन्ता अस्वभाविक है। चिन्ता कितने ही रोगों को जन्म देती है। इसी से हमें डिप्रेशन और घुटन होती है। इसी से हमें ग्लानि होती है और चिन्ता हमें खा जाती है।

किसी ने लिखा है कि आप क्या खाते हैं, इससे भी बड़ी बात यह है कि आपको क्या खा रहा है।

तीसरी बात - चिन्ता करना व्यर्थ है क्योंकि चिन्ता अतीत को बदल नहीं सकती। जो घटित हो चुका है चिन्ता उसे बदल नहीं सकती और भविष्य को सुधार नहीं सकती। चिन्ता केवल वर्तमान को बर्बाद कर सकती है।

मत्ती 6ः27 - “तुम में कौन है, जो चिन्ता करके अपनी अवस्था में एक घड़ी भी बढ़ा सकता है?”

प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि क्या करोगे चिन्ता करके? मैंने इस चिन्ता के साथ तुमको पैदा नहीं किया।

मत्ती 6ः30 - “इसलिए जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहिनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्योंकर न पहिनाएगा?”

चौथी बात - चिन्ता करना व्यर्थ है क्योंकि परमेश्वर को हमारा ध्यान है।

1 पतरस 5ः7 - “और अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है”।

परमेश्वर हमसे कहता है कि मैं सामर्थी हूं, मैं ज़िन्दा हूं। मैं तुम्हारे साथ हूं। मैं तुम्हें कभी नहीं त्यागूंगा। मैं तुम्हारा रक्षक हूं। मैं तुम्हारी चट्टान हूं। मैं तुम्हारा दृढ़ गढ़ हूं। तुम मुझ पर विश्वास रखो। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं - चिन्ता करना व्यर्थ है। इससे केवल तुम्हारी समस्या बढ़ेगी। इससे केवल तुम्हारा आज बर्बाद होगा। इससे केवल तुम्हारे सम्बन्धों में तनाव आएगा। इससे केवल तुम्हारी रातों की नींद जाएगी। इससे तुम्हारी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक हानि होगी। यह सब व्यर्थ है, सारी चिन्ताएं मुझ पर डाल दो।

जिस परमेश्वर ने माता के गर्भ में हमें रचा। हमें सब कुछ दिया। हमसे इतना प्रेम किया कि अपने पुत्र को भी बलिदान कर दिया। क्या वह परमेश्वर तुम्हारी देखभाल नहीं करता? तुम पर ध्यान नहीं देता? तुम्हारी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं करता? परमेश्वर कहता है कि उसे हमारा सोच है, हमारा ध्यान है। बाइबिल में लिखा है कि वह हमारे विचारों को जानता है। हमारे सिर के बाल भी गिने हुए हैं परमेश्वर के पास। जब परमेश्वर हमसे इतना अधिक प्रेम करता है तो फिर चिन्ता क्यों?

2. सब बातों के लिए प्रार्थना करो।

फिलिप्पियों 4ः6 में लिखा है - “परन्तु हर बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएं”।

मेरा आपसे यह प्रश्न है कि आप कितनी चिन्ता करते हैं? इसी के साथ दूसरा प्रश्न यह है कि आप कितनी प्रार्थना करते हैं? जितनी चिन्ता हम करते हैं अगर उतनी हम प्रार्थना करने लगें तो फिर चिन्ता के लिए कोई विषय नहीं रह जाएगा। लिखा है - हर बात में तुम्हारे निवेदन प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएं।

किसी ने कहा है कि परमेश्वर पर विश्वास करना और चिन्ता करना, दोनों चीज़ें एक साथ सम्भव नहीं हैं। जो चिन्ता करता है वह अविश्वासी और अनीश्वरवादी के समान है। वह मुंह से कहता तो है कि मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूं। परन्तु यदि दिल और दिमाग चिन्ताओं से भरा हुआ है तो फिर विश्वास कहां है?

ज़िन्दगी के चित्र में से अगर परमेश्वर को अलग कर दें तो फिर कोई आशा नहीं। इसके विपरीत अगर कितनी भी अन्धकारपूर्ण स्थिति हो यदि उसमें परमेश्वर है तो आशा है। उस चित्र में उजाला है, निश्चतता, सामर्थ्य, विश्वास और आगे बढ़ने के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य और उसमें विजय है। यदि ज़िन्दगी की कितनी भी उज्जवल तस्वीर हो, अगर उसमें परमेश्वर अनुपस्थित है तो सब खोखला है। सब कुछ दिखावा है, व्यर्थ है। निराशा, घुटन और अन्धकार है।

रोमियों 8ः32 में लिखा है - “जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिए दे दियाः वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्योंकर न देगा?”

3. हर बात में परमेश्वर को धन्यवाद दो। यहां पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह नहीं लिखा कि हर बात के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दो क्योंकि हर बात के लिए हम परमेश्वर को धन्यवाद नहीं दे सकते। शैतान की शक्तियां भी हैं। षैतान की शक्तियों के प्रहार भी हैं। इसलिए हर बात के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं दिया जा सकता परन्तु हर बात में हम परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं।

फिलिप्पियों 4ः6 में लिखा है - “किसी भी बात की चिन्ता मत करोः परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएं”।

जब हमारे हृदय में धन्यवाद की भावना होती है या किसी व्यक्ति के प्रति जब हम धन्यवादित होते हैं तो यह धन्यवाद की भावना ही आदर को जन्म देती है। यह भावना प्रेम, समर्पण, दया को भी जन्म देती है। यह भावना सेवा और सकारात्मक सोच को जन्म देती है। आज्ञाकारिता को जन्म देती है। हम उस इन्सान के लिए कुछ भी करने को तैयार होते हैं। जो व्यक्ति धन्यवादित है वह आनन्दित रहेगा, परन्तु जो व्यक्ति धन्यवादित नहीं है, वह दुखी और चिन्ताग्रस्त रहेगा।

यदि हम यह सोचेंगे कि हमारे पास क्या नहीं है तो हम कृतघ्न हो जाएंगे। हमें विचार करना है कि परमेश्वर ने हम पर कितने उपकार किए हैें, कितनी आशीषें हमें परमेश्वर ने दी हैं?

1 थिस्सलुनीकियों 5ः18 में लिखा है - ”हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिए मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है“।

हर बात के लिए धन्यवाद देने की बात नहीं है परन्तु हर बात में, हर परिस्थिति में परमेश्वर को धन्यवाद देने की बात है क्योंकि आधारभूत बात यही है कि हमारा हृदय पिता के प्रति धन्यवादित हो।

फिलिप्पियों की पत्री 2ः14-15 में लिखा है - “सब काम बिना कुड़कुड़़ाए, बिना विवाद के किया करो। ताकि तुम निर्दोष और भोले होकर टेढ़े और हठीले लोगों के बीच परमेश्वर की निष्कलंक सन्तान बने रहो। जिनके बीच में तुम जीवन का वचन लिए हुए जगत में जलते हुए दीपकों की नाईं दिखाई देते हो”।

क्या हमारा हृदय परमेश्वर पिता के प्रति धन्यवादित है? परमेश्वर, जिसने हमको अपनी माता के गर्भ में रचा, जिसने हमको जन्म दिया, जिसने हमको श्वास दी, जिसने हमारे हृदय में धड़कन दी। परमेश्वर जिसने हमारी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक आवश्यकताओं को प्रभु यीशु मसीह में पूरा किया। जब हम पापी ही थे, प्रभु यीशु मसीह हमारे लिए मारा गया। परमेश्वर ने हमसे इतना प्रेम किया कि उसने अपना एकमात्र पुत्र हमारे लिए दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। उस परमेश्वर के पुत्र प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमारी पहचान है। हमारे जीवन में अर्थ है। हमें इस जीवन के पार अनन्त जीवन है। वही हमारा दृढ़ गढ़ है। वही हमारा उजाला है। उसी ने हमारा उद्धार किया है। उसी के साथ हमें अनन्त काल तक रहना है। प्रभु यीशु कहते हैं कि मैं जाता हूं कि तुम्हारे लिए जगह तैयार करूं ताकि जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो।

क्या वह धन्यवाद हमारे हृदयों में है? कठिनाइयों में, विषम और जटिल परिस्थितियों में हमें याद रखना है कि यह घर, यह संसार हमारा डेरा है। यह जीवन का शिखर नहीं है। इसलिए अभी हमें दर्पण में धुन्धला सा दिखाई देता है। क्यों पीड़ा है? अभी हमें दर्पण में धुन्धला सा दिखाई देता है। क्यों समस्याएं हैं? अभी हमें दर्पण में धुन्धला सा दिखाई देता है। क्यों अच्छे लोगों के साथ बुरा होता है और बुरे लोगों के साथ अच्छा होता है? अभी हमें दर्पण में धुन्धला सा दिखाई देता है। क्यों अधर्मी व्यक्ति जल्दी उठा लिया जाता है और अधर्मी लम्बा जीवन जीते हैं? अभी हमें दर्पण में धुन्धला सा दिखाई देता है। क्यों जब हम परमेश्वर के मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं तो उतनी ही पीड़ा, उतने ही शैतान के वार हमारे ऊपर होते हैं? अभी हमें दर्पण में धुन्धला सा दिखाई देता है। पर वह दिन आएगा जब उसे ऐसे देखेंगे जैसे एक दूसरे को साक्षात् देखते हैं।