मत्ती 2:1-12 परिचय :- प्रभु यीशु मसीह के जन्म के कारण बैतलहम जो एक छोटा सा नगर है । परमेश्वर की महानतम योजना का केन्द्र बन गया । बैतलहम जिसका अर्थ है स्ल् ँद्भट्टक्ल् द्भश्न भड्डलीश्व अर्थात् रोटी का घर । बैतलहम यरूशलेम से बहुत दूर नहीं है । यरूशलेम से जो रास्ता मिस्र की ओर जाता है उसके दक्षिण में 5 मील की दूरी पर बैतलहम नगर आज भी स्थित है । यह वही बैतलहम है जो यहूदा की पहाड़ी पर बसा हुआ है, जिसको एप्राता कहा गया था । जब यहोशू उस एप्राता नगर में पहुंचता है तो उसका नाम बैतलहम हो जाता है । इस कारण से कुछ लोग उसे एप्राता कहते हैं, कुछ बैतलहम एप्राता कहते हैं और कुछ लोग बैतलहम कहते हैं । यह वही बैतलहम है, जिसके बारे में पुराना नियम में हम पाते हैं कि जब याकूब और राहेल यात्रा कर रहे थे तो वहां पहुंचकर राहेल को प्रसव की भयानक पीड़ा हुई। याकूब राहेल से अत्यधिक प्रेम रखता था । जब प्रसव हुआ तो उस समय राहेल की मृत्यु हो गई । बैतलहम में आकर याकूब ने राहेल को भारी हृदय से दफ्रन किया । यह वही बैतलहम है, जहां पर इस प्रसव के पश्चात् बिन्यामीन पैदा हुआ । यह वही बैतलहम है, जहां कभी रूत और बोअज का मिलन हुआ था और उन्होंने वहां से एक नया परिवार प्रारम्भ किया था । यह वही बैतलहम है, जहां रूत और बोअज का नाती दाऊद रहा करता था । यह वही बैतलहम है, जहां दाऊद अपनी भेड़ों को चराया करता था । यह वही बैतलहम है, जो प्रभु यीशु मसीह के जन्म के समय दाऊद का नगर कहा गया, जिसके लिए स्वर्ग दूतों ने गड़ेरियों से कहा कि तुम्हारे लिए दाऊद के नगर में एक उद्धारकर्त्ता जन्मा है और यही मसीह प्रभु है । यह वही बैतलहम है, जिसके सम्बन्ध में सैकड़ों वर्षां पूर्व मीका नबी ने कहा था, कि हे बैतलहम एप्राता, तू जो यहूदा के उन छोटों में से छोटा है, यहां से संसार के लिए एक अधिपति निकलेगा। बैतलहम परमेश्वर की योजना का केन्द्र बन गया । बैतलहम परमेश्वर की योजना के लिए परमेश्वर की राजधानी बन गया । यदि हम क्रिसमस के दृश्य को देखें, जो बैतलहम में दिखाई देता है, तो हम पाते हैं कि बहुत सामान्य से लोग वहां एकत्रित थे । हम वहां यूसुफ और मरियम को पाते हैं जो बहुत सामान्य से परिवार के थे । मरियम साधारण से परिवार की युवती थी, जो कुंवारी थी, जो परमेश्वर के भय और उसकी निकटता में चलती थी । यूसुफ एक साधारण सा बढ़ई था और बढ़ई का कार्य करके अपना जीवन-यापन करता था। हम चरवाहों को पाते हैं । इन चरवाहों को परमेश्वर के वचन में बहुत प्रमुखता दी गई है। दाऊद स्वयं एक चरवाहा था । जब वह परमेश्वर की ओर मन लगाता है, जब वह ईश्वर के विषय में सोचता है, तो कहता है, कि यहोवा मेरा चरवाहा है। चरवाहे के वंश में प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ । जब वह इस संसार में आया तो कहता है - ``अच्छा चरवाहा मैं हूं, अच्छा चरवाहा अपनी भेड़ों के लिए अपना प्राण देता है ।'' जब प्रभु यीशु मसीह पैदा हुआ तो स्वर्गदूतों ने बड़े आनन्द और उत्साह से यह समाचार चरवाहों को दिया । चरवाहों पर परमेश्वर की महानतम योजना को प्रगट किया । ये चरवाहे संसार की दृष्टि में महत्वहीन थे परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में महत्वपूर्ण थे । यूसुफ एक साधारण सा बढ़ई था । संसार की दृष्टि में महत्वहीन था। परन्तु यही यूसुफ परमेश्वर की दृष्टि में महत्वपूर्ण था । किसी टीकाकार ने लिखा है- र्ंद्भट्ट श्वद्भ छद्भऱ् सीख्ल् ऱ्द्भ ाल् रूब्ढ्यद्भड्डऱ्ीछऱ् रूछ ऱ्स्ल् क्रूश्रस्ऱ् द्भश्न ऱ्स्ल् ञ्द्भड्डड्यश्व रूछ द्भड्डश्वल्ड्ड ऱ्द्भ ाल् रूब्ढ्यद्भड्डऱ्ीछऱ् रूछ ऱ्स्ल् क्रूश्रस्ऱ् द्भश्न ऱ्स्ल् णद्भड्डश्व अर्थात् परमेश्वर की दृष्टि में प्रमुख होने के लिए आवश्यक नहीं है कि आप संसार की दृष्टि में प्रमुख हों । संसार की दृष्टि में हमारा बड़ा नाम प्रमुख होता है । हमारी बड़ी डिग्रियां प्रमुख होती हैं । हमारे बड़े-बड़े पद प्रमुख होते हैं । परन्तु ज़रूरी नहीं कि आप मनुष्यों की दृष्टि में प्रमुख हों । हो सकता है, कि मैं और आप मनुष्यों की दृष्टि में महत्वहीन हों । हो सकता है, मनुष्यों की दृष्टि में आपकी कोई गिनती न हो । परन्तु यदि परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, तो आप परमेश्वर के लिए संसार में सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं । बैतलहम में पहुंचकर, क्रिसमस के इस दृश्य में, हमारी दृष्टि जाती है गौशाले और चरनी पर। गौशाला, जो बलिदान का प्रतीक है । गौशाला, जहां मेम्नों को रखा जाता था, वे मेम्ने जो बलिदान किए जाते थे । यीशु के लिए कहा गया कि यह परमेश्वर का मेम्ना है जो जगत के पापों को उठा ले जाता है । यह मेम्ना गौशाले में पैदा होता है । किसी टीकाकार ने लिखा है कि गौशाला बड़ी विलक्षण जगह है । गौशाले में कोई द्वार नहीं होता, कोई द्वारपाल नहीं होता, कोई अवरोध नहीं होता । गौशाला शहर में भी होती है और गांव में भी। गौशाला बच्चों की आवश्यकता भी पूरी करती है और बुज़ुर्गों की आवश्यकता भी। यह गौशाला परमेश्वर की दृष्टि में प्रमुख जगह बन गयी। जहां प्रभु यीशु मसीह ने एक चरनी में जन्म लिया । उसके बाद हमारी नज़र जाती है विद्वान पुरुषों पर जिनको हम ज्योतिषी कहते हैं । ये वे लोग थे जिन्होंने मीलों की यात्रा की थी । बहुत कठिनाइयों को सहते हुए वे प्रभु यीशु मसीह के दर्शन को आए थे । इतिहासकारों का लिखना है कि इन्होंने जब यह यात्रा की तो उनको बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्हें मरूस्थलों से होकर गुज़रना पड़ा । टीकाकारों के अनुसार ये ज्योतिषी पारसी धर्म को मानने वाले लोग थे । पारसी धर्म का प्रारम्भ मिस्र में हुआ था। प्रभु यीशु मसीह के पैदा होने के 600 वर्ष पूर्व इस धर्म का प्रार्दुभाव हुआ था । ये विद्वान पुरुष थे, इनको न सिर्फ्रज्योतिष विद्या का ज्ञान था परन्तु ये मेडिकल साइन्स के बारे में भी ज्ञान रखते थे । ये भूगोल को भी समझते थे । ये भविष्य की बातों की ओर देखते थे । ये तारों का विश्लेषण करते थे । इन ज्ञानी ज्योतिषियों ने आकर यीशु को सोना, लोबान और गन्धरस की भेंटें चढ़ाइंर् । सोना प्रतीक है राजा को भेंट चढ़ाने का । सोना प्रदान करना इस बात का प्रतीक है कि राजा उत्पन्न हुआ है । प्रभु यीशु मसीह जो गौशाले में पैदा हुआ था, वह संसार का राजा था । लोबान को मन्दिरों में जलाया जाता था और वह परमेश्वर की उपस्थिति को प्रगट करता था । प्रभु यीशु मसीह इस संसार में आया । उसका नाम इम्मानुएल रखा गया जिसका अर्थ होता है कि परमेश्वर हमारे साथ है । लोबान मन्दिर में आराधना के समय जलाया जाता था । लोबान आराधना का प्रतीक था । यह लोबान उस वातावरण का प्रतीक है, जहां मनुष्य का परमेश्वर से मिलन होता है । यह वह केन्द्र बिन्दु है जिसको हम आराधना कहते हैं, जहां मनुष्य परमेश्वर की महिमा के लिए, उसके दर्शन के लिए, उससे प्रेरणा प्राप्त करने के लिए एकत्रित होते हैं । यह लोबान उस आराधना का प्रतीक है । प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर और मनुष्यों के बीच में मेल कराने के लिए आया । वह परमेश्वर के लिए मनुष्यों की आराधना का प्रतीक बन गया । परमेश्वर तथा मनुष्यों के बीच में बिचवई बन गया । यह लोबान उस बात का प्रतीक है । तीसरी भेंट जो प्रभु यीशु को जो इन ज्योतिषियों ने चढ़ाई वह गन्धरस थी । उन दिनों में ऐसा रिवाज था कि गन्धरस मृतक देह पर लगाया जाता था । मृतक देह पर उसका लेप किया जाता था । यह एक प्रक्रिया थी । परन्तु बड़ी विचित्र सी बात लगती है कि संसार का राजा पैदा हुआ है और उसको गन्धरस की भेंट चढ़ाई जा रही है । यह गन्धरस की भेंट इस बात का प्रतीक है कि प्रभु यीशु मसीह न सिर्फ्र राजा होकर आया है, न सिर्फ्र वह मनुष्यों और परमेश्वर के बीच में मेल कराने के लिए आया है परन्तु वह मेम्ना बनकर, बलिदान बनकर, आया है। गन्धरस इस बात को प्रदर्शित करता है कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का मेम्ना है, जो बलिदान होने के लिए आया है, जो मृत्यु को प्राप्त होगा । वे ज्योतिषी जानते थे कि बैतलहम से प्रारम्भ होने वाली यह यात्रा गुलगुता से होकर कलवरी तक जाएगी । बहुत सी बातें क्रिसमस के इस दृश्य में दिखाई देती हैं । परन्तु जो सबसे प्रमुख बात है वह यह कि क्रिसमस के इस दृश्य में मैं और आप कहां हैं ? यदि क्रिसमस के दृश्य में मैं और आप नहीं हैं, तो हमारा जीवन भी अधूरा है । क्रिसमस का दृश्य भी अधूरा है । प्रभु यीशु मसीह जो इस संसार में हमको बचाने के लिए आया, उसकी योजना हमारे जीवन में अधूरी है । जो मूलभूत बात है, जो प्रश्न है, वह यह कि क्रिसमस में हमारी क्या प्रतिक्रिया है ? हम कहां हैं ? प्रभु यीशु मसीह जब पैदा हुआ तो उस सन्दर्भ में तीन प्रमुख प्रतिक्रियाएं पाई जाती हैं । 1. हेरोदेस की प्रतिक्रिया, जो विरोध की प्रतिक्रिया है:- मत्ती 2:3 में लिखा है - ``यह सुनकर हेरोदेस राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया'' । सोलहवीं आयत में लिखा है कि हेरोदेस क्रोध से भर गया और उसने आज्ञा निकाल दी कि दो वर्ष के और उससे कम उम्र के बच्चों को मरवा डाला जाए । हेरोदेस के लिए यह कोई नई बात नहीं थी । वह एक ऐसा राजा था जो असुरक्षा की भावना से ग्रसित था । जब वह देखता था कि कोई उसका प्रतिद्वंद्वी खड़ा है तो उसको मरवा ड़ालता था । उसने ऐसे सैकड़ों लोगों का सिर कलम करवा दिया था जो राजा बनने की आकांक्षा रखते थे । उसने अपने बहुत से निकट के रिश्तेदारों को मरवा दिया था । यहां तक कि उसने अपने तीन बेटों की हत्या करवा दी थी । क्योंकि वह जानता था कि उनके दिल में यह जिज्ञासा है कि किसी दिन राज सिंहासन उनको मिल जाएगा । अपनी मृत्यु सेदो सप्ताह पूर्व हेरोदेस ने अपने उस बेटे का, जो राजा बनना चाहता था, सरे-आम सिर कलम करवा दिया था । हेरोदेस के जीवन में यह एक सामान्य सी बात थी कि जो व्यक्ति भी राजा बनने के लिए सिर उठाता था वह उसका सिर कटवा देता था । हेरोदेस की प्रतिक्रिया मसीही विश्वास, मसीही धर्म और प्रभु यीशु मसीह के विरोध की प्रतिक्रिया है । मसीही धर्म और मसीही विश्वास का जो इतिहास है वह लोगों के खून से लिखा गया है । हम पाते हैं कि किस प्रकार प्रारम्भिक कलीसिया के मसीही अगुवों की हत्या कर दी गई। हम जानते हैं कि चेलों में से यूहन्ना को छोड़ हर एक को मार डाला गया। हम पाते हैं कि जो प्रारम्भिक फादर्स हुए उनको मार डाला गया । हम नीरो बादशाह के विषय में पढ़ते हैं जो मसीही अगुवों को खम्भों पर लटकाकर उनके जीवित शरीर में तेल झिड़कवाकरआग लगा देता था। जब उसकी बादशाहत में विशेष दावतें होती थीं तो उसके राजमहल के बगीचे में लगे हुए खम्भों के ऊपर मसीही अगुवों को लटका दिया जाता था और उन्हें जीवित जला दिया जाता था । जब उनका शरीर जलता और शरीर की चर्बी जलती थी तो उससे जो रोशनी होती थी उस रोशनी से नीरो बादशाह अपनी दावतों को रोशन करता था। मसीही धर्म का जो इतिहास है वह खून से लिखा हुआ है, वह त्याग का इतिहास है । वह सरे आम सिर कलम कर दिये जाने का काम है । आज भी इसकी कमी नहीं है । संसार में 32 ऐसे देश हैं जहां मसीही अगुवों को मार डाला जाता है । चीन का उदाहरण देखें तो वहां मसीही अगुवों और पासबानों को क़ैद कर लिया जाता है । उनको कुछ दवाइयां दी जाती हैं । जब थोड़ी बेहोशी आने लगती है, तब उनको बन्दूक से मार डाला जाता है । उनके शरीर के अंगों जैसे किडनी इत्यादि को निकाल कर बेच दिया जाता है । मसीहियत के साथ ऐसा क्रूरतम व्यापार आज हो रहा है। मसीही समाज के अगुवों के जीवनों से आज ऐसा खिलवाड़ हो रहा है । इन्डोनेशिया, चीन, अरब देशों और यहां तक कि पाकिस्तान और भारत में भी इन बातों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है । ऐसे बहुत से हेरोदेस हुए, ऐसे बहुत से राजा हुए, ऐसी बहुत सी तलवारें उठीं, ऐसी बहुत सी खून की धाराएं बहीं जिन्होंने मसीहियत को ख़त्म करना चाहा परन्तु इतिहास इस बात का गवाह है कि हेरोदेस कभी जीतते नहीं । हेरोदेस के पास पूरा शासन था, उसके पास पूरी सेना थी, उसके पास सब प्रकार के अस्त्र-शस्त्र थे और दूसरी तरफ एक अबोध सा बालक था, जो बैतलहम के गौशाले में था परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य उस बालक के साथ थी । इस प्रकार के हेरोदेस पैदा तो होते हैं परन्तु विजय उनकी नहीं होती । वे समय के साथ समाप्त हो जाते हैं । परन्तु मसीही विश्वास आगे बढ़ता जाता है । फ्रांस का एक शासक था जिसने यह प्रतिज्ञा की थी कि मेरे जीवन का मिशन और मेरे जीवन का उद्देश्य यह है कि 12 बेवकूफ चेलों ने, कुछ मछुवारों ने, जिस मसीही धर्म का प्रचार किया, उसको मैं अपने जीते जी समाप्त कर दूंगा । मसीहियत के खिलाफ फ्रांस के इस शासक ने एक बड़ा अभियान चलाया । उसने एक बहुत बड़ा भवन बनवाया और वहां पर एक बहुत बड़ा प्रिन्टिंग प्रेस लगवाया, उन दिनों में प्रिन्टिंग प्रेस का आविष्कार हुआ भर था । वहां से मसीही धर्म के खिलाफ बहुत सा साहित्य छपने लगा । फिर हुआ यह कि फ्रांस का वह शासक मार डाला गया। तब बाइबिल सोसायटी ने उस प्रेस और उस भवन को खरीद लिया । वहां से मसीही साहित्य और बाइबिल छपने लगी । जो स्थान प्रभु यीशु मसीह की शिक्षाओं को समाप्त करने के लिए बनाया गया था आज वहां से प्रभु यीशु मसीह का प्रचार किया जा रहा है । वर्ष 1989 की बात है । रोमानिया के शासक ने लाखों लोगों को मरवा दिया था । उसने आज्ञा दी कि 25 दिसम्बर की शाम होने वाली कलीसिया की आराधना में जितने पासबान और बिशप्स् हैं, सबको आराधना के बीच में मार डाला जाए । जब वहां के मसीहियों ने यह सुना तो उन्होंने अपने हाथ में मशालें ले लीं और उन पासबानों और अगुवों से कहा कि आप कलीसिया के भवन में बैठकर प्रार्थना कीजिए। उन मसीहियों ने चारों तरफ से कलीसिया के भवन को घेर लिया । वे गीत गाते जाते थे और मशालें जलाते जाते थे। एक के बाद दो और दो के बाद चार और चार के बाद आठ और वह जो घेरा बना हुआ था...... बढ़ता गया । न सिर्फ्र मसीही लोग परन्तु सारे शहर के लोग उस भवन को घेरकर खड़े हो गए । तब किसी ने आवाज़ उठाई ल्छद्भट्टश्रस् रूक् ल्छद्भट्टश्रस् अब बहुत हो गया । तब वह सारी भीड़ उन मशालों को लेकर जाती है और वे राजा की हत्या कर देते हैं । क्रिसमस की उस शाम मसीही विरोधी की हत्या हो जाती है और प्रभु यीशु मसीह की मशाल दूर-दूर तक फैलती जाती है । क्रिसमस की एक शाम को मिखाइल गोर्बाचोफ खड़े होकर कहते हैं कि सोवियत रूस में कम्युनिज़्म ख़त्म हो चुका है । तलवार और तोप का शासन जाता रहा और आज के बाद रूस जो 75 वर्षों से कम्युनिस्ट रहा, बदला जा रहा है । एक समय समाप्त हुआ, एक सदी समाप्त हुई और एक तंत्र भी समाप्त हुआ । स्वतंत्रता में रहकर हमको जीना है, स्वतंत्रता में रह कर हमको सांस लेना है, और स्वतंत्रता में रहकर हमको मरना है । वह कम्युनिस्ट तंत्र जिसने घोषणा की थी कि एक दिन हम ईश्वर के नाम को और चर्च को इस संसार से मिटा देंगे, स्वयं समाप्त हो गया, स्वयं धराशायी हो गया । बहुत से हेरोदेस आए, बहुत से हेरोदेसों ने तलवारें उठाईं, अपने सिर उठाए, जंग का एलान किया परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य और उसकी योजना के सामने वे सब धराशायी हो गए । 2. महायाजकों और शास्त्रियों की प्रतिक्रिया, जो तटस्थता की प्रतिक्रिया है :- मत्ती 2:3-6 में लिखा हुआ है - ``यह सुनकर हेरोदेस राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया । और उस ने लोगों के सब महायाजकों और शास्त्रियों को इकट्ठे करके उन से पूछा, कि मसीह का जन्म कहां होना चाहिए? उन्हों ने उस से कहा, यहूदिया के बैतलहम में; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के द्वारा यों लिखा गया है । कि हे बैतलहम, जो यहूदा के देश में है, तू किसी रीति से यहूदा के अधिकारियों में सब से छोटा नहीं; क्योंकि तुझ में से एक अधिपति निकलेगा जो मेरी प्रजा इस्राएल की रखवाली करेगा'' । यह महायाजकों और शास्त्रियों की प्रतिक्रिया है । बड़ी अजीब सी बात यहां पर हम पाते हैं कि हेरोदेस ने महायाजकों और शास्त्रियों को बुलाया जो भेदों का ज्ञान जानते थे और जो भविष्य का ज्ञान रखते थे । उन्होंने कहा कि बैतलहम में राजा का जन्म होना चाहिए क्योंकि ऐसा-ऐसा लिखा हुआ है । ये महायाजक और शास्त्री बैतलहम से सिर्फ्र 5 मील की दूरी पर रहते थे और ये जानते थे कि राजा का जन्म हुआ है । वे यह जानते थे कि राजा का जन्म बैतलहम में हुआ है । वे उस तारे को समझते थे । परन्तु ये शास्त्री और महायाजक प्रभु यीशु मसीह को देखने नहीं गए, उसको दण्डवत् करने नहीं गए । उसको अपनी भेंटें देने नहीं गए । उसकी महिमा और उसकी स्तुति करने नहीं गए । उसकी आराधना करने नहीं गए । यीशु के पास होकर भी, सारी बातों को जानते हुए भी, वे निष्क्रिय बने रहे, तटस्थ बने रहे और निश्चिन्त बने रहे । जो दूसरी प्रतिक्रिया है वह निश्चिन्तता की प्रतिक्रिया है, तटस्थ होने की प्रतिक्रिया है । प्रभु यीशु मसीह से कोई विरोध नहीं है, उसके खिलाफ कोई विद्रोह नहीं है, उसको अपमानित नहीं करना है, परन्तु तटस्थ हैं । हमें कोई मतलब नहीं, हम निश्चिन्त हैं, हम निष्क्रिय हैं । कितनी बार हम भी अपने उद्धार के प्रति निश्चिन्त हो जाते हैं । प्रभु यीशु मसीह से हमारी कोई बुराई नहीं है, उससे हमारा कोई विरोध या विद्रोह नहीं है । हम प्रभु यीशु मसीह को अपमानित नहीं करते, अपशब्द नहीं कहते । परन्तु हम उसके प्रति तटस्थ हैं, उसके प्रति निश्चिन्त हैं, उसकी कलीसिया के प्रति निश्चिन्त हैं । यिर्मयाह 8:7 में लिखा है - ``आकाश में लगलग भी अपने नियत समयों को जानता है, और पण्डुकी, सूपाबेनी, और सारस भी अपने आने का समय रखते हैं; परन्तु मेरी प्रजा यहोवा का नियम नहीं जानती'' । जो पक्षी हैं वे भी अपने नियत समयों को जानते और पहचानते हैं । परन्तु यह जो मेरी प्रजा है, यहोवा के नियमों को नहीं समझती। यह पक्षियों से भी गई-बीती हो गई है । यह पशुओं से भी बदतर हो गई है । यहोवा के नियम को मेरी प्रजा नहीं जानती है । जकर्याह 7:11 में वह लिखा है - ``परन्तु उन्हों ने चित्त लगाना न चाहा, और हठ किया, और अपने कानों को मूंद लिया ताकि सुन न सकें''। जकर्याह 7:13 में लिखा है - ``और सेनाओं के यहोवा का यह वचन हुआ, कि जैसे मेरे पुकारने पर उन्हों ने नहीं सुना, वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी न सुनूंगा''। हम सभी चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं को सुने । हम चाहते हैं कि परमेश्वर हमारी इच्छाओं को पूरा करे । क्या हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं ? क्या हम उसकी इच्छा को पूरा करते हैं ? इसीलिए परमेश्वर कहता है कि जैसे मेरे पुकारने पर उन्होंने नहीं सुना वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी नहीं सुनूंगा । मत्ती 13:15 में प्रभु यीशु मसीह कहते हैं - ``क्योंकि इन लोगों का मन मोटा हो गया है, और वे कानों से ऊंचा सुनते हैं और उन्हों ने अपनी आंखें मूंद ली हैं''। लूका 12:47-48 में लिखा है - ``और वह दास जो अपने स्वामी की इच्छा जानता था, और तैयार न रहा और न उस की इच्छा के अनुसार चला बहुत मार खाएगा। परन्तु जो नहीं जानकर मार खाने के योग्य काम करे वह थोड़ी मार खाएगा, इसलिये जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत मांगा जाएगा, और जिसे बहुत सौंपा गया है, उस से बहुत मांगेंगे'' । यहां पर प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जिसे बहुत दिया गया है । उससे अपेक्षा भी बहुत है, जिसे बहुत दिया गया है उससे बहुत मांगा जाएगा और जिसे बहुत सौंपा गया है उससे बहुत अधिक मांगा जाएगा। इब्रानियों 2:3 में लिखा है - ``तो हम लोग ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रहकर क्यों कर बच सकते हैं ?'' इस आयत में लेखक यह नहीं कह रहा कि इस उद्धार का विरोध करके बल्कि वह यह कह रहा है कि ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रहकर । कितनी बार अपने जीवनों में हम निश्चिन्त हो जाते हैं । एक टी.बी. का मरीज़ है । उसे मालूम है कि टी.बी. का इलाज सम्भव है । उसको मालूम है कि इसकी दवाई कहां मिलेगी । उसको मालूम है फलां अस्पताल में मुफ्त में इलाज हो जाएगा । परन्तु उसके जीवन में दूसरी प्राथमिकताएं हैं । वह गांव में रहता है, खेती करता है । खांसी आती है, ध्यान नहीं देता । कभी थूक में से खून भी निकलता है । यदि उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाए तो वह टी.बी. से नहीं मरेगा वरन् वह इग्नोरेन्स से मरेगा । लापरवाही से मरेगा, वह निश्चिन्तता के कारण मरेगा। उसका रोग टी.बी. नहीं बल्कि निश्चिन्तता है । वह जानते हुए भी कुछ नहीं करता क्योंकि वह निश्चिन्त है। उस बात की उपेक्षा करता है । कोई विद्रोह नहीं है । कोई विरोध नहीं है । कोई षड़यंत्र नहीं है । बस हम ख़ामोश हैं । हम तटस्थ हैं । आज जो प्रभु यीशु की देह है; वह कलीसिया है । आज जो प्रभु यीशु मसीह का वचन है; वह बाइबिल है। आज जो प्रभु यीशु मसीह से सम्बन्ध रखने की बात है; वह प्रार्थना है । हम लोग जो मसीही कहलाते हैं उन महायाजकों के समान हैं, जो प्रभु यीशु मसीह से मात्र 5 मील की दूरी पर थे । जो सब बातों को जानते थे, जो सब बातों को मानते थे । जिनको विश्वास था । जिन्होंने राजा को खुश करने की बात नहीं की परन्तु वही बात की जो सच्ची थी । जो सीधी थी । जो सही थी । परन्तु वे उसको दण्डवत् करने नहीं गए । हमारी भी प्रतिक्रिया निश्चिन्तता की हो जाती है । कलीसिया से हमारा कोई विरोध नहीं, परन्तु कलीसिया की आराधनाओं में आएंगे नहीं । क्रिसमस में आ जाएंगे । ईस्टर में आ जाएंगे । परन्तु बाकी सब चल रहा है... काम बहुत है, बाज़ार करना है, हफ्ते में एक दिन मिलता है । परन्तु प्रभु यीशु मसीह के प्रति हम उदासीन हैं । यह महायाजकों की प्रतिक्रिया है। यह तटस्थता की प्रतिक्रिया है । 3. चरवाहों की प्रतिक्रिया, जो आज्ञापालन की प्रतिक्रिया है :- ये सीधे-साधे चरवाहे हैं, ये भोले- भाले चरवाहे हैं । लूका 2:16-20 में लिखा है - जब उन्होंने सुना कि प्रभु यीशु का जन्म बैतलहम में हुआ है तो तुरन्त ... जाकर उन्होंने देखा । वे तुरन्त चले गए । जब वे लौटे तो अपने जीवन से परमेश्वर की महिमा कर रहे थे, स्तुति कर रहे थे । चरवाहों की जो प्रतिक्रिया है, वह स्वीकृति की प्रतिक्रिया है, आज्ञापालन की प्रतिक्रिया है । मरियम और यूसुफ की प्रतिक्रिया भी आज्ञापालन की प्रतिक्रिया है । मरियम साधारण सी युवती थी, कुंवारी थी, उसकी मंगनी हो चुकी थी । स्वर्गदूत आता है और कहता है कि हे मरियम ! तू धन्य है । तुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह हुआ है । कैसा अनुग्रह हुआ है ? तू गर्भवती होगी । मरियम सोचती होगी कि कैसा अजीब अनुग्रह है परमेश्वर का । मैं कुंवारी हूं , मैं पुरुष को जानती ही नहीं और मैं गर्भवती होऊंगी ! परन्तु मरियम जवाब देती है । लूका 1:38 में उसका जवाब है - ``मैं प्रभु की दासी हूं , मुझे तेरे वचन के अनुसार हो'' । मरियम जानती थी कि उस पर उंगलियां उठेंगी । मरियम जानती थी कि उसके लिए कहानियां गढ़ी जाएंगी । मरियम जानती थी कि उसका मंगेतर उस पर शक करेगा । मरियम जानती थी कि सब प्रकार की बातें होंगी । परन्तु मरियम कहती है, मैं प्रभु की दासी हूं , मुझे तेरे वचन के अनुसार हो । यूसुफ की मंगनी हो गई थी मरियम के साथ । वह जानता था कि वह कुंवारी है, वह जानता था कि वह एक अच्छी युवती है, उसका चरित्र अच्छा है, अच्छे परिवार की है, परमेश्वर की निकटता में रहती है; और तब पता चलता है कि उसकी मंगेतर शादी के पहले गर्भवती है । कल्पना कीजिए यदि हमारे समाज में ऐसा हो जाए, यदि हमारे मोहल्ले में ऐसा हो जाए और कोई कहे कि मंगनी तो हो गई है परन्तु मेरी जो होने वाली पत्नी है वह गर्भवती है, लेकिन है वह कुंवारी । क्या बातें होंगी? कैसी प्रतिक्रिया होगी ? और तब यूसुफ ने ख़ामोशी से सोचा कि मरियम को त्याग दे । परन्तु तब परमेश्वर का सन्देश यूसुफ के पास पहुंचा। उसके बाद यूसुफ जाता है, और अपनी मंगेतर को लेता है । उसके साथ वह यात्रा करता है । उसके साथ-साथ वह रहता है । क्योंकि वह परमेश्वर की आज्ञा के प्रति समर्पित है। परमेश्वर की जो आज्ञा है उसको वह स्वीकार करता है। कभी आपने सोचा कि मरियम और यूसुफ के लिए सारी बातें उल्टी थीं । वचन में लिखा है कि - जब समय की परिपूर्णता हुई, जब समय परिपूर्ण हुआ तब परमेश्वर ने प्रभु यीशु मसीह को भेजा । मरियम और यूसुफ के हिसाब से तो सारी बातें उल्टी थीं....... पहली बात - कुंवारी गर्भवती हो गई...... दूसरी बात - मंगेतर को उसे स्वीकार करना है...... तीसरी बात - लम्बी यात्रा करना है । राजा की आज्ञा है कि सारे संसार के लोगों के नाम लिखे जाएं । पैदल चलकर 85 मील की यात्रा करना है, गधे पर बैठकर । तीन दिनों की यात्रा है । मरियम गर्भवती है, नौ माह का गर्भ है और लम्बी यात्रा करना है । ऐसे समय में प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ । एक कुंवारी से उसका जन्म हुआ । जब सारे संसार की जनगणना हो रही थी, नाम लिखे जा रहे थे, सब कुछ अस्त-व्यस्त था । जब हमारे यहां मतगणना होती है, जब चुनाव होते हैं तो सारा माहौल कैसा हो जाता है ! ऐसे समय में प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ, जब सारे संसार के लोग जनगणना में व्यस्त थे । जब वे बैतलहम पहुंचते हैं तो उन्हें जगह नहीं मिलती । क्योंकि सिर छिपाने को भी जगह नहीं है । उसके बाद प्रसव कहां होता है? गौशाले में । वह भी उल्टी जगह है । जब हमारे परिवार में प्रसव की बात आती है तो हम अच्छे से अच्छे डॉक्टर से जांच करवाने की सोचते हैं । अच्छे से अच्छे अस्पताल को देखते हैं । अच्छी से अच्छी जगह को देखते हैं । गौशाला तो सबसे खतरनाक स्थान है । जो मेडिकल साइन्स को जानते हैं, वे जानते हैं कि गौशाले में कितने रोगाणु हैं । कितनी बदबू होती है । प्रसव के लिए गौशाला सबसे ज़्यादा असुरक्षित स्थान है । टेटनेस के रोगाणु वहां होते हैं । जानवर वहां होते हैं । मक्खियां वहां होती हैं । ऐसी परिस्थिति में परमेश्वर ने उस गौशाले को चुना । उस कुंवारी को चुना । उस लम्बी यात्रा को चुना । उस गौशाले में प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ । परमेश्वर की योजना आसान नहीं होती । परन्तु मरियम और यूसुफ की प्रतिक्रिया थी, गड़ेरियों की प्रतिक्रिया थी, कि उन्होंने उसको स्वीकारा । परमेश्वर के वचन के रास्ते में आज भी यदि हम चलते हैं, तो बहुत सी चुनौतियां हैं, बहुत सी समस्याएं हैं । समझौता करने के लिए दबाव पड़ते हैं । बहुत से लोगों का तिरस्कार है । बहुत सी उंगलियां हम पर उठती हैं । बहुत से हेरोदेस हो सकते हैं । बहुत सी तलवार की धारे हैं । बहुत सी खून की नदियां हैं । हेरोदेसों की बहुत सी उल्टी-उल्टी राजाज्ञाएं हैं । गतसमनी बाग है । सिंहासन पर झूठ और फरेब बैठा हुआ है । जो धर्मी लोग हैं वे गौशालों में हैं । कलवरी है । गतसमनी बाग है । गुलगुता का क्रूस है । परन्तु यह एक ही रास्ता है । केवल एक ही रास्ता है, जो अनन्त जीवन का रास्ता है, जो उद्धार का रास्ता है, जो परमेश्वर का रास्ता है, जो गौशाले से गुलगुता का रास्ता है। निष्कर्ष :- क्रिसमस के प्रति हमारे जीवन में हमारी तीन प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं । पहली प्रतिक्रिया, हेरोदेस की प्रतिक्रिया है जो विरोध की प्रतिक्रिया है । दूसरी प्रतिक्रिया, महायाजकों और शास्त्रियों की प्रतिक्रिया है जो निश्चिन्तता, उदासीनता और उपेक्षा की प्रतिक्रिया है । और तीसरी प्रतिक्रिया, गड़ेरियों और चरवाहों की प्रतिक्रिया, मरियम और यूसुफ की प्रतिक्रिया थी । हो सकता है कि आप कहें कि हमारी प्रतिक्रिया तो ऐसी नहीं है जो विरोध की प्रतिक्रिया है, हेरोदेस की प्रतिक्रिया है । परन्तु कहीं हमारी प्रतिक्रिया महायाजकों की प्रतिक्रिया तो नहीं है ? कहीं हम कलीसिया के प्रति, प्रभु यीशु मसीह की देह के प्रति, अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति, अपने मसीही जीवन के प्रति, परमेश्वर से सम्बन्ध रखने के प्रति, प्रार्थना के प्रति, वचन के अध्ययन के प्रति हम उदासीन तो नहीं हो गए? कहीं हम निश्चिन्त तो नहीं हो गए ? इब्रानियों 2:3 में लिखा है कि उस बड़े उद्धार से निश्चिन्त होकर हम कैसे बच सकेंगे? क्रिसमस के दृश्य में हम पाते हैं कि जब गड़ेरिये लौटे तो प्रभु यीशु मसीह की महिमा और स्तुति करते हुए लौटे । ज्योतिषी गए तो हेरोदेस के रास्ते से थे, परन्तु जब वे लौटे तो दूसरा रास्ता था उनके जीवन में । वे हेरोदेस के रास्ते को छोड़कर दूसरे रास्ते से लौटे । हो सकता है, यह रास्ता लम्बा रहा हो । हो सकता है यह रास्ता कठिनाइयों से भरा हुआ हो । परन्तु उनके जीवन में दूसरा रास्ता था । हो सकता है, हम भी हेरोदेस के रास्ते पर चल रहे हों । हो सकता है हम भी महायाजकों के रास्ते पर चल रहे हों । हो सकता है, कि हम हेरोदेस के रास्ते से होकर बैतलहम आए हों, और प्रभु यीशु मसीह के दर्शन किए हों । यदि हमने प्रभु यीशु मसीह को देखा है, यदि हमने उसे पहिचाना है, यदि हमने उसे स्वीकारा है, यदि हमने उसको अपने हृदय में स्थान दिया है, तो हमारे लिए भी नया रास्ता होना चाहिए। हमारा जीवन भी नया जीवन होना चाहिए । हमारा जीवन भी प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण योग्य होना चाहिए । यही तो क्रिसमस की सही प्रतिक्रिया होगी । इसी से तो क्रिसमस सफल होगा और इसी से परमेश्वर प्रसन्न होगा । हमारे जीवन की क्या प्रतिक्रिया है ? हेरोदेस की प्रतिक्रिया, महायाजकों की प्रतिक्रिया या चरवाहों की प्रतिक्रिया? यह निर्णय मुझ पर और आप पर है । परमेश्वर आपको आशीष दे ।