फिलिप्पियों 3:7-14 परिचय :- अक्सर जब मृत्यु आती है तो हमारे जीवनों में कुछ प्रश्न आ जाते हैं। अक्सर जब हम मृत्यु का सामना करते हैं, मृत्यु की छाया से गुज़रते हैं, मृत्यु के अन्धकार की तराई में से होकर चलते हैं तो हमें इस बात का अहसास होता है कि एक दिन इसी प्रकार से हमें भी क़ब्रिस्तान लाया जाएगा । एक दिन ऐसा होगा कि हमारे प्रिय लोग इसी प्रकार आंसू बहा रहे होंगे । ऐसे ही एक दिन कन्धे पर उठाकर हमें प्रभु वाटिका की ओर ले जाया जाएगा । ऐसे ही एक दिन क़ब्र में हमारे शरीर को दफ्रना दिया जाएगा । हमारे हृदयों में यह प्रश्न आता है कि हम हैं कहां? हम किस दिशा में जा रहे हैं ? हमारे जीवन की कौन सी प्राथमिकताएं हैं ? कौन सी बातें हैं जिनको हम अहमियत दे रहे हैं? कौन सी बातें हैं जिनको हमने अपने जीवन का बड़ा मुद्दा बना लिया है ? प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है ? ऐसे समयों में अक्सर हमें अपने आपका मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है । जब हम बीमार होते हैं, जब हम गम्भीर पीड़ा से होकर गुज़रते हैं, जब हमारे परिवार में मृत्यु आती है, जब हमारे प्रियजन पर सताव आता है, तब उस दु:ख व पीड़ा से गुज़रते समय हमारे जीवनों में प्रश्न होता है कि हम कहां हैं ? हमारा कितना विकास हुआ है ? हम किस दिशा में जा रहे हैं ? हमारा मसीही जीवन कितना गहरा है ? कितनी गहरी जड़ें हैं हमारे विश्वास की ? क्या मात्र उथला मसीही जीवन है जो ऊपर से तो दिखाई देता है किन्तु वास्तव में उसमें कोई गहराई नहीं है । हमारा सम्बन्ध परमेश्वर से जुड़ा हुआ नहीं है । क्या हमारा मसीही जीवन ऐसा है जिसकी जड़ें खोखली हो गई हैं और हम मात्र सांसारिकता के धरातल पर बने हुए हैं । यदि हम अपने जीवन को देखें तो पाएंगे कि प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार किए हुए तो बहुत वर्ष हो गए । हमें वह समय याद आता है जब हमारा बपतिस्मा हुआ था । याद आता है कि किस अगुवे, किस पासबान ने हमें बपतिस्मा दिया था । कितने वर्ष पुरानी बात है यह । स्मरण करिए उस समय को और तुलना कीजिए कि आज जब हम यहां पर हैं तो हमारे जीवन में कितना विकास हुआ है? मसीह में हमारी परिपक्वता की जड़ें कितनी गहराई तक बढ़ी हैं ? कितनी ऊंचाइयों तक हमारी शाखाएं गई हैं ? एक बार मैं अपने सहकर्मी भाई फ्रेंक हेरीसन के साथ भोपाल गया था । वे मुझे एक नर्सरी दिखाने के लिए ले गए । वे कहने लगे कि ऐसी नर्सरी मैंने कहीं नहीं देखी, यह बहुत बड़ी नर्सरी है । करोड़ों रुपए के पेड़-पौधे वहां पर हैं । मैंने वहां कुछ पेड़ों की क़ीमत पूछी। उस नर्सरी का मालिक उन पेड़ों के लिए बताने लगा कि यह पेड़ दो सौ रुपए का है, यह चार सौ का है, यह पांच सौ का है, यह छह सौ का है । फिर वह एक पेड़ के पास गया और कहा यह ढाई हज़ार रुपए का है । मैंने कहा ढाई हज़ार रुपए तो बहुत बड़ी बात है । इतना महंगा पेड़ कौन खरीदेगा ? वह बोला आप क्या बात कर रहे हैं, हमारे पास तो दस हज़ार से लेकर पच्चीस हज़ार रुपए तक के पेड़ हैं । मैंने कहा कि कम से कम हमें दिखा तो दो, हम भी देखें कि कैसे हैं वे पेड़ जो पच्चीस हज़ार रुपए की क़ीमत के हैं । मैंने दृष्टि इधर-उधर दौड़ाई तो मुझे कोई बड़ा पेड़ नहीं दिखाई दिया । वह कहने लगा थोड़ा दूसरी तरफ चलना पड़ेगा, वहां कुछ गमले रखे हुए हैं, उनमें वे पेड़ लगे हुए हैं । मेरे मन में उत्सुकता थी कि कैसे होंगे वे पेड़ जो इतने मंहगे हैं । जब हम लोगों ने जाकर देखा तो पाया कि छोटे-छोटे गमलों में छोटे-छोटे पेड़ लगे थे । कोई विशेष बात उन में दिखाई नहीं दे रही थी। तब उस नर्सरी के मालिक ने कहा, ये जो पेड़ हैं, उनमें से एक बरगद का है, एक आम का है, एक इमली का है और एक नीम का है । ये पेड़ बहुत विशिष्ट हैं, क्योंकि ये इतने छोटे हैं कि इन्हें गमलों में लगाकर ड्रॉइंग रूम में सजा सकते हैं । इमली का पेड़ 100 साल पुराना है । कोई पेड़ 50 साल तो कोई पेड़ 75 साल पुराना है और ये छोटे-छोटे पेड़ हैं जो गमलों में लगे हुए हैं । मैंने कहा यह कैसे सम्भव है कि इतने पुराने पेड़ गमलों में लगे हुए हैं ? उन्होंने कहा कि हम इनकी जड़ों को काटते जाते हैं और ये ऐसे ही बौने रह जाते हैं । ये पेड़ बड़े आर्कषण का केन्द्र हैं । यदि आप मुम्बई और दिल्ली जाएंगे तो वहां आपको ऐसे पेड़ मिलेंगे भी नहीं । अक्सर इन पेड़ों से हमारे जीवन में एक समानता दिखाई देती है कि हम हैं तो बहुत पुराने परन्तु हमारी जड़ें गहरी नहीं हैं । हम बहुत उथले धरातल पर लगे हुए हैं । उम्र तो बढ़ गई है परन्तु कद उतना ही है। बहुत अच्छे दिखते हैं, बहुत महंगे दिखते हैं; ऐसे दिखते हैं जिनसे ड्रॉइंग रूम की शोभा बढ़ाई जा सके परन्तु वास्तव में उनमें कोई फल नहीं है । वास्तव में उनमें कोई छाया नहीं है । किसी पथिक के लिए कोई आसरा नहीं है । किसी पथिक के लिए कोई आश्रय नहीं है । मसीही जीवन में हम कहां हैं ? हमारा कितना विकास हुआ है? हम मसीही जीवन के विकास को कैसे नापेंगे ? वह कौन सा मापदण्ड है जिसके आधार पर हम अपने मसीही विकास को नाप सकते हैं ? वह कौन सा आइना है जिसमें हम अपने आत्मिक रूप को देख सकते हैं ? किन बातों के आधार पर हम अपने आप को नाप सकते हैं ? 1. मसीही विकास हमारे हृदयों से शुरू होता है । क्या हमारा हृदय सही स्थान पर है ? क्या हमारा हृदय सही है ? मत्ती रचित सुसमाचार 13:3-9 में बीज बोने वाले व्यक्ति का दृष्टान्त है । एक बीज बोने वाला बीज बोने को निकला ओर कुछ बीज मार्ग के किनारे पर गिरे परन्तु पक्षियों ने आकर उनको चुग लिया। यहां पर भूमि का वर्णन किया गया है, एक भूमि मार्ग के किनारे पर है। दूसरी भूमि, पथरीली है । कुछ बीज जो पथरीली भूमि पर गिरे वे जड़ नहीं पकड़ पाए। तीसरी भूमि वह है जहां बीज झाड़ियों में गिरे, उसके बाद वह थोड़ा तो पनपे परन्तु झाड़ियों में दबकर मर गये । चौथी भूमि जो अच्छी भूमि है, जहां वचन का बीज गिरा और वहां कई गुना फल लाया । हम परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं, बहुत सी बातें हम सुनते हैं, बहुत से लेख हम पढ़ते हैं । परन्तु प्रश्न यह है कि हमारा हृदय कैसा है ? भूमि के वर्गीकरण के किस भाग में हम आते हैं ? क्या हमारा हृदय सड़क के किनारे की भूमि के समान है जो दिखती तो बड़ी समतल है परन्तु है बड़ी कठोर? या हमारा हृदय उस पथरीली भूमि के समान है जो ऊपर से तो बहुत चमकता है परन्तु उसमें कोई चीज़ पनप नहीं सकती । उसमें कोई चीज़ जड़ नहीं पकड़ सकती। उसमें कोई चीज़ जीवित नहीं रह सकती । तीसरी भूमि का जो वर्णन है वह झाड़ियों वाली भूमि है । इसकी व्याख्या भी प्रभु यीशु मसीह ने की है । मार्ग के किनारे जो बीज गिरा वह ऐसा है कि हमने परमेश्वर का वचन तो सुना परन्तु शैतान हम पर इतना हावी है कि वचन का बीज बोया जाता है और शैतान उसको उठाकर ले जाता है। हम परमेश्वर के वचन को प्रति सप्ताह सुनते हैं । हम परमेश्वर के वचन का अध्ययन करते हैं । परन्तु सांसारिकता इतनी हावी है कि वचन का बीज पड़ते ही शैतान उसको उठा ले जाता है। क्या हमारा हृदय सड़क के किनारे की भूमि के समान है ? पथरीली भूमि से सम्बन्ध उन लोगों का है जिनका विवेक लगभग मृतक सा हो गया है । बाइबिल में इनके अनेक उदाहरण पाए जाते हैं । प्रेरितों के काम 26:24 में लिखा है कि जब पौलुस ने वचन का प्रचार किया तो जो लोग वहां पर थे वे उससे कहने लगे कि तू पागल है । इसी प्रकार प्रेरितों के काम 17:32 को यदि हम देखें तो पाते हैं कि जब पौलुस ने पुनरुत्थान का प्रचार किया तो कुछ लोगों ने उसे ठठ्ठों में उड़ा दिया । कुछ लोगों ने कहा कि तू बेवकूफी की बातें करता है, ऐसी बातें हमसे मत कर । कुछ लोगों ने उसे टाल दिया और कहा तेरी बातें हम बाद में सुनेंगे । तीसरे प्रकार का जो बीज है, वह झाड़ियों में है । इस सम्बन्ध में दो बातें लिखी हुई हैं - संसार की चिन्ता और धन का धोखा । इस बात की व्याख्या प्रभु यीशु मसीह ने मत्ती 13:19 में की है कि इस दृष्टान्त का क्या अर्थ है । 22 वीं आयत में लिखा है कि जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है जो वचन को सुनता है पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है और वह फल नहीं लाता। संसार की चिन्ता हमें ज़्यादा है । हम इस चिन्ता में दबे हैं कि कल क्या होगा? हमारे बच्चों का क्या होगा ? हमारी नौकरी का क्या होगा ? कल अगर ऐसा हो जाता है तो क्या होगा ? अगर सरकार बदल जाती है तो क्या होगा ? अगर परिस्थितियां बदल जाती हैं तो क्या होगा ? हमारे अधिकारी की मृत्यु हो जाती है तो क्या होगा? अगर संस्था में समस्या आ जाती है तो क्या होगा ? इन सारी चिन्ताओं से हम दब जाते हैं । इसी के साथ जो दूसरी बात लिखी हुई है, वह है धन का धोखा । हमें यह धोखा है कि धन से हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं । धन से हम शान्ति प्राप्त कर सकते हैं, धन से हम सुख से जी सकते हैं । यदि धन का घमण्ड है और यदि संसार की चिन्ता है तो हमारा जीवन और हमारा हृदय भी झाड़ियों की पास की ज़मीन के समान है। इसके बाद प्रभु यीशु मसीह बताते हैं कि कुछ बीज अच्छी भूमि में गिरे । अच्छी भूमि अर्थात् जहां उस बीज को अंकुरित होने का वातावरण मिले, जहां उसको पानी मिले, जहां पर उसको वे सब तत्व मिलें जिसकी उसे आवश्यकता है। हम कैसे माहौल में रहते हैं ? हमारा पारिवारिक माहौल कैसा है ? कैसे विचार हमारे मन में आते हैं? हमारे मित्र कैसे हैं ? किन लोगों के साथ हमारी सहभागिता है ? जो बीज अच्छी भूमि में गिरा वह कई गुना फल लाया, वह बहुतायत से फल लाया । क्या हम परमेश्वर के वचन को ग्रहण करते हैं ? सड़क की भूमि के समान हमारा हाल होता है या पथरीली भूमि के समान ? झाड़ियों से घिरी उस भूमि के समान हमारा हाल होता है कि चिन्ता या धन के धोखे में हम पड़ जाते हैं ? या वास्तव में हमारा हृदय अच्छी भूमि के समान है ? हम परमेश्वर के वचन को यह सोचकर ग्रहण नहीं करते कि किसने प्रचार किया या किस पत्रिका में हमने पढ़ा ? परन्तु यह सोचकर ग्रहण करते हैं कि यह परमेश्वर का जीवित वचन है, जो मनुष्य को बदलता है । यह परमेश्वर के वचन की सामर्थ्य है, जो हमें बदलती है, जो हमारे कठोर हृदय को तोड़ती है । आप किसी ग़ैर मसीही से पूछें जिसने प्रभु यीशु मसीह को स्वीकार किया हो तो वह यह नहीं बोलेगा कि फलां प्रचारक आया था जिसने मुझे बदल दिया। बल्कि वह यह बोलेगा कि फलां पुस्तक के इस अध्याय की अमुक आयत ने मेरे जीवन में काम किया और मेरे जीवन को बदल दिया। अक्सर आप ऐसे लोगों की गवाही में यह बात सुनेंगे । क्या हमारा हृदय एक अच्छी भूमि के समान है? क्या हम अच्छे वातावरण में रहते हैं ? क्या हम नदियों के किनारे की उपजाऊ भूमि के समान हैं, जहां हमारी परमेश्वर के वचन से संगति बनी रहती है, हम उसकी कलीसिया से जुड़े रहते हैं। मसीही जीवन के विकास के सम्बन्ध में जो पहली बात है वह यह कि क्या हमारा हृदय सही है ? हम चाहे कितनी भी आत्मिक जागृति सभाएं अटेन्ड कर लें ? चाहे हम कितने बड़े-बड़े वक्ताओं को सुन लें ? चाहे हम कितना भी बाइबिल अध्ययन कर लें ? इससे कुछ होने वाला नहीं है। हमें अपने आपसे प्रश्न करना है कि क्या हमारा हृदय उपजाऊ भूमि के समान है ? यहेजकेल नबी की पुस्तक 36:26 में लिखा है - ``मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूंगा'' । यह कार्य केवल परमेश्वर कर सकता है । यह परमेश्वर का काम है जो नया मन देता है, जो नई आत्मा उत्पन्न करता है । जो पत्थर के हृदय को निकालता है और मांस का हृदय देता है । 2. क्या हम लाभ की बातों को हानि समझते हैं ? फिलिप्पियों 3:7 में पौलुस लिखता है - ``जो-जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है । वरन् मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं : जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं'' । प्रश्न यह है कि प्रभु यीशु मसीह जब जीवन में आया तो उससे पहले कौन सी बातें थीं जो उत्तम थीं ? जो लाभ की थीं ? और अब वे बातें हमें हानि दिखाई देती हैं । क्या वास्तव में हमारा परिवर्तन हुआ है ? क्या पहले जो बातें हमें प्रमुख दिखाई देती थीं, वे अब हमें प्रमुख दिखाई नहीं देतीं ? पौलुस कहता है कि जो जो बातें मेरे लाभ की थीं उनको मैंने हानि समझ लिया । प्रभु यीशु मसीह की उत्तमता से जब परिचय हुआ तो सांसारिकता की बातें मुझे हानि के समान लगने लगीं। क्या हमने प्रभु के लिए कुछ त्याग किया है ? यदि ऐसा किया है तो तभी गवाही होगी । कोई बुरी आदत थी जो हमने छोड़ी है, कोई बुरी संगति थी जिसको हमने छोड़ा है, कोई बुरी बातें थीं जिन्हें हमने अपने जीवन से पूरी तरह से निकालकर फेंक दिया है। कोई ऐसी बात थी जिससे हमें लगता था कि वह हमारे लाभ की बात है पर अब प्रभु यीशु मसीह की उत्तमता के कारण हमने उसे हानि समझ लिया है ? पहले धन कमाने की बात थी, क्या अब सेवा की बात है ? एक विद्वान ने कहा है कि जो हमें मिलता है वह हमारी गवाही कभी नहीं बनता बल्कि जो हम देते हैं वह हमारी गवाही बनता है । जो हम देते हैं वही हमारी मसीही गवाही को प्रदर्शित करता है । इसलिए लिखा है कि लेने से देना धन्य है । हम पौलुस के जीवन में पाते हैं कि उसके पास सांसद के समान अधिकार था। उसने गमलीएल जैसे व्यक्ति के चरणों के पास बैठकर शिक्षा प्राप्त की थी । वह दर्शन शास्त्र का विद्वान था । उसके पास संसद का अधिकार-पत्र था कि जाकर मसीहियों को सताए और उनकीकलीसियाओं को समाप्त करे । परन्तु पौलुस ने अपना सब कुछ छोड़ दिया । जो कुछ उसने छोड़ा था वह उसकी गवाही बन गया। अब उसके पास अधिकार नहीं परन्तु विनम्रता है कि वह कोड़े खाने को भी तैयार है । तोड़े जाने को भी तैयार है । पथराव सहने के लिए भी तैयार है । सब प्रकार के जोखिम सहने को भी तैयार है। जो पीड़ा उसने सही, जो दुख उसने सहे, जो पत्थर उसके शरीर पर लगे; वे उसकी गवाही बन गए । हमारे जीवन की क्या गवाही है ? हम जक्कई के जीवन में देखते हैं कि जब प्रभु यीशु मसीह उसके जीवन में आया तो जो लेने वाला था, वह देने वाला बन गया । जक्कई कहता है कि जिसका मैंने लिया है उसको दोगुना और जिसके साथ छल-कपट किया है उसका चौगुना फेर देता हूं । 2 तीमुथियुस 4:10 में देमास का उदाहरण देते हुए पौलुस लिखता है - ``क्योंकि देमास ने इस संसार को प्रिय जानकर मुझे छोड़ दिया है'' । कितने लोगों के जीवन के विषय में प्रभु यीशु मसीह के ये शब्द होंगे कि इसने संसार को प्रिय जानकर मुझे छोड़ दिया है । यह उनके लिए बड़ी त्रासदी की बात होगी । जॉर्ज विलन ने लिखा है - रूिख्रूछश्र रूक् छद्भऱ् ब्लीक्ट्टड्डल्श्व ाए ञ्सीऱ् एद्भट्ट श्ररूख्ल् ऱ्द्भ ेस्ड्डरूक्ऱ् ाट्टऱ् ञ्सीऱ् एद्भट्ट ञ्रूऱ्स्स्द्भड्यश्व अर्थात् जो दान आप देते हैं उससे आप नापे नहीं जाते । परन्तु इससे नापे जाते हैं कि आपने कितना बचा लिया । दान इस बात से नापा जाता है कि आप अपने पास कितना बचाकर रखते हैं । आप जो दान दे रहे हैं, आप कितना दे रहे हैं उससे यह नहीं नापा जा सकता। हो सकता है कि संसार की दृष्टि में आप बहुत दे रहे हों परन्तु उससे आपको कोई अन्तर नहीं पड़ेगा क्योंकि आपके पास बहुत है । दान नापने की परमेश्वर की जो विधि है वह यह कि कितना हमने अपने लिए बचा लिया है । हमारे जीवनों में किस बात से मसीह की गवाही हुई है? पौलुस फिलिप्पियों 3:12 में लिखता है कि यह मतलब नहीं कि मैं पा चुका हूं या सिद्ध हो चुका हूं, पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिए दौड़ा चला जाता हूं जिसके लिए मसीह यीशु ने मुझको पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी यह भावना नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं परन्तु केवल यह एक काम करता हूं कि जो बातें पीछे रह गई हैं उनको भूलकर मैं आगे की बढ़ता हुआ निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं ताकि वह इनाम पाऊं जिसके लिए परमेश्वर ने, प्रभु यीशु मसीह में मुझे ऊपर बुलाया है । पौलुस जो बूढ़ा हो गया है, जो काल कोठरी में पड़ा है, जो जेल में बन्द है, जिसके हाथों में शायद हथकड़ियां लगी होंगी, पांव में ज़ंजीरें बंधी होंगी, उसके जीवन के अन्तिम समय में लिखी गई यह पत्री है । वह कहता है कि मैं तेज़ी से निशाने की ओर बढ़ता चला जाता हूं । मैं दौड़ा चला जाता हूं । मेरा यही उद्देश्य रह गया है। यह नहीं कि मैं कुछ पा चुका हूं या सिद्ध हो चुका हूं। पौलुस अपनी तारीफ नहीं करता । वह कहता है कि अभी भी मेरे जीवन में कुछ ख़ालीपन है, अभी भी कुछ प्यास है, अभी भी कुछ करने की इच्छा है, अभी भी मुझको बहुत दूर जाना है । ये सारी बातें पौलुस के जीवन में थीं । जो बात यहां पर हमारे विचार के लिए है वह यह कि क्या हमारे जीवन में निरन्तर विकास दिखाई देता है ? जो चीज़ जीवित है, उसमें बढ़त तो होगी । अगर किसी चीज़ में विकास नहीं होता, तो इसका अर्थ है कि वह चीज़ जीवित नहीं है । जीवित और अजीवित में प्रमुख अन्तर यह होता है कि जो जीवित होता है उसमें विकास होता है । क्या यह निरन्तरता हमारे जीवनों में है ? पौलुस जो बूढ़ा था, जेल में अपनी क़ैद की स्थिति में भी कहता है कि मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं । वह यह भी कहता है कि जो मुझको सामर्थ्य देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूं । पौलुस यह कहकर संतुष्ट हो सकता था कि देखो मैंने 5 देशों की यात्रा कर ली है, मैंने 17 कलीसियाओं की स्थापना कर ली है, मैंने नये नियम की 13 पुस्तकें लिख ली हैं । हज़ारों लोगों को मैं प्रभु यीशु मसीह में लाया हूं, जिनमें बड़े और प्रमुख लोग भी शामिल हैं । इतने साल मैंने परिश्रम किया है । इतनी पीड़ाओं से मैं गुज़रा हूं । अब बस । अब बहुत हो गया । अब मैं अपनी मृत्यु का इंतज़ार करूंगा । उसके लिए शायद यह कहना बहुत आसान था कि मैं अब उस उम्र में पहुंच गया हूं कि रिटायरमेन्ट ले लूं। परन्तु पौलुस के जीवन में हम पाते हैं कि अभी भी एक निरन्तरता बनी हुई है, एक प्यास बनी हुई है, एक इच्छा बनी हुई है । वह कहता है कि मैं निशाने की ओर तेज़ी से दौड़ा चला जाता हूं । कभी-कभी लगता है मानो हमारे मसीही जीवन के चक्के जाम हो गए हों । कुछ स्थिरता आ गई हो । अक्सर लगता है कि वही बासीपन है । वही दुआएं हैं, जो हम दो साल पहले करते थे। उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल करते हैं । उन्हीं वचनों को पढ़ते हैं । उन्हीं बातों को लेकर चलते हैं । जीवन में एक स्थिरता आ जाती है । परन्तु यदि हमें जीवित रहना है, मसीह की जीवित गवाही बनना है, यदि हमारे मसीही जीवन का विकास होना है, तो यह निरन्तरता, यह बढ़त, यह विकास, यह दौड़, जीवन के अन्तिम समय तक बनी रहनी चाहिए । कुछ लोग प्रभु यीशु मसीह के पास आए और उससे कहा कि राजा हेरोदेस तुझे मार डालना चाहता है । तुझे मालूम नहीं है कि ऐसी परिस्थिति बन गई है कि तेरी कभी भी हत्या हो सकती है । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जाकर उस लोमड़ी से कह दो कि मुझे आज और कल और निरन्तर चलते जाना है । इस संसार की बाधाओं से, इस संसार की समस्याओं से, इस संसार के अवरोधों से मैं रुकने वाला नहीं हूं। मुझको निरन्तर चलते जाना है । मसीही जीवन में भी यह बात अनिवार्य है कि हम निरन्तर तेज़ी से बढ़ते चले जाएं । लिखा हुआ है जो बातें पीछे रह गई हैं, उन्हें भूलकर मैं आगे की ओर बढ़ता हुआ दौड़ा चला जाता हूं । आगे दौड़ तब पाएंगे जब अतीत से मुक्त हो जाएंगे । अतीत से बंधे रहेंगे, पुरानी बातों में उलझे रहेंगे तो कुछ नहीं होने वाला । अक्सर यह होता है कि हम कहते हैं कि इससे मेरी दुश्मनी है, इसके साथ मेरे सम्बन्ध ठीक नहीं हो सकते, मैं ऐसा नहीं कर सकता । ये बातें मसीही जीवन के लिए ठीक नहीं हैं । इन बातों से मसीही जीवन का विकास नहीं हो सकता। पौलुस कहता है कि मैं पुरानी बातों को छोड़कर आगे निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं । मीका 7:18,19 की आयतें बहुत सुन्दर हैं, जहां इस प्रकार लिखा है - ``तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे । वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है । वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा । तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा'' । परमेश्वर ने हमारे सारे पापों को लेकर मानो गहरे समुद्र में डाल दिया है। हमारे पापों को उसने ऐसा लताड़ा है कि वे हमारे जीवन से दूर हो गए हैं । हमारे पुराने जीवन के सारे अपराध, पुरानी बातें, पुराने दुष्कर्म, सारे पाप उसने जैसे मानो गहरे समुद्र में डाल दिए हैं । प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उसने हमें शुद्ध किया, पवित्र किया और अनन्त जीवन की आशा दी है । एक ऐसा जीवन जो कभी न ख़त्म होगा। जब उसने हमें क्षमा किया है तो क्या हम दूसरों को क्षमा नहीं कर सकते ? मत्ती 6:14-15 में बड़ा स्पष्ट लिखा हुआ है कि ``इसलिए यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा । और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा''। यह समय है कि हम पुरानी बातों को भूलकर, पुरानी चोटों को भूलकर, पुराने घावों को भूलकर आगे बढ़ते जाएं । अतीत से छूटकर, उस अतीत से निकलकर जिसे प्रभु यीशु मसीह ने गहरे समुद्र में डाल दिया है; आगे की ओर, निशाने की ओर दौड़े चले जाएं । 3. क्या हम वास्तव में निशाने की ओर दौड़ रहे हैं ? क्या हमारा उद्देश्य सही है? क्या हमारी दिशा सही है? अपने जीवन में कॅरियर बना लेना, बहुत धन प्राप्त कर लेना, बड़े पद पर पहुंच जाना, देश-विदेश में अपना नाम ऊंचा कर लेना, यह वास्तविक उद्देश्य नहीं है । ये तो बड़े उथले उद्देश्य हैं । परन्तु हमारा वही उद्देश्य होना चाहिए, जो पौलुस का उद्देश्य है, प्रभु यीशु मसीह का उद्देश्य है और वह यह कि हम अनन्त जीवन को प्राप्त करें । यही बात पौलुस कहता है कि मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं । क्यों दौड़ा चला जाता हूं ? ताकि उस इनाम को प्राप्त करूं जिसके लिए परमेश्वर ने मसीह यीशु में मुझे ऊपर बुलाया है । परमेश्वर ने हमें ऊपर बुलाया है, यहां नहीं बुलाया । जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है; वह है मेरा उद्देश्य । वह है मेरी मंज़िल । वहां मुझे देखना है । उसी दिशा में मुझे दौड़ना है । उसी ट्रैक पर मुझे जाना है । प्रकाशित वाक्य 14:13 में लिखा है - ``मैं ने स्वर्ग से यह शब्द सुना, कि लिख; जो मृतक प्रभु में मरते हैं, वे अब से धन्य हैं, आत्मा कहता है, हां क्योंकि वे अपने परिश्रमों से विश्राम पाएंगे, और उन के कार्य उन के साथ हो लेते हैं'' । हम कहते हैं कि इस संसार में हम खाली हाथ आए थे, और खाली हाथ चले जाएंगे । सांसारिक सन्दर्भ में यह बात सही है परन्तु आत्मिक सन्दर्भ में हम पाते हैं कि लिखा हुआ है - और उनके कार्य उनके साथ हो लेते हैं। जो कार्य हमने किए हैं वे हमारे साथ हो लेंगे । क्यों ? क्योंकि जो कार्य हैं वे हमारे विश्वास की अभिव्यक्ति हैं । क्योंकि जो कार्य हैं वे हमारे विश्वास की गवाही हैं । क्योंकि जो कार्य हैं, उन कार्यों के बग़ैर हमारा विश्वास मरा हुआ है । इसीलिए जो हमारा विश्वास है वह हमें बचाता है । हमारा विश्वास हमें अनन्त जीवन की ओर ले जाता है । हमारा विश्वास सही ट्रैक पर आगे बढ़ने में, इस संसार में, हमारी मदद करता है । यदि सही विश्वास होगा तो सही कार्य होगा । यदि हमारे कार्य ग़लत होंगे, हम ग़लत बीज बोएंगे, तो उसका परिणाम भी हमें ग़लत ही मिलेगा । हम यह कभी न भूलें कि हमारे कार्य हमें नहीं छोड़ेंगे; न इस संसार में और न वहां; क्योंकि उनके कार्य उनके साथ हो लेते हैं । एक राजा था, उसका राजमहल बहुत बड़ा था । उसमें तेरह-चौदह मंज़िलें थीं। एक दिन उसमें आग लग गई । राजा को पता चला कि आग की लपटें तेरहवीं मंज़िल से शुरू हुई हैं और नीचे आती जा रही हैं । राजा को याद आया कि उसका सारा धन, हीरे-जवाहरात और उसने विदेशों की जो यात्राएं कीं थी, वहां के राजा-रानियों ने उसे जो तोहफे दिए थे, उसकी तिजोरी छठवीं मंज़िल पर है। उसका सामान और शयन कक्ष सातवीं मंज़िल पर है। उसने अपनी सेना और अधिकारियों को आदेश दिया कि जल्दी जाओ और सारी मंज़िलों से सामान निकालो। उसकी सेना के अधिकारी और सैनिक तेज़ी से उस काम में लग गए । एक-एक करके सारी मंज़िलों से हीरे-जवाहरात, बहुमूल्य वस्त्र, सिंहासन, राजा के सोने का बिस्तर, चांदी के बर्तन आदि सारी चीज़े निकाल लाए । आधे घण्टे तक जो दृश्य था, वह बस देखते ही बनता था । उसका वर्णन करना सम्भव नहीं । आग की लपटें तेज़ होती जाती थीं, ऊपर से सामान नीचे फेंका जाता था और उसको बटोर कर रखा जाता था । आधे घण्टे के बाद बहुत तेज़ी से आग लग गई । अधिकारी व सैनिक नीचे उतर आए। राजा बहुत खुश था कि कम से कम उसका क़ीमती सामान तो बच गया । अचानक किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई । राजा-रानी को याद आया कि वे अपने एकलौते बेटे को तो तलघर में सोता हुआ छोड़कर आ गए हैं । जब सेना के अधिकारी अपनी जान हथेली में लेकर वहां तक पहुंचे तो पता चला कि बच्चा जलकर मर चुका था। निष्कर्ष :- जीवन में हमारी दौड़ भी ऐसी ही होती है; पांचवीं मंज़िल, छठवीं मंज़िल, सातवीं मंज़िल और तेरहवीं मंज़िल की ओर । परन्तु तलघर में हमारी आत्मा है; उसकी चिन्ता हमें नहीं है । जब अन्त का समय आता है तो हम पाते हैं कि जो नहीं ले जाना है, वह तो हमने सब पा लिया है परन्तु जो लेकर जाना है उसे खो दिया है। परमेश्वर की प्रेरणा से, उसके वचन के अनुसार यह प्रश्न है जो हमें अपने आपसे करना है । - क्या मैंने अपनी दौड़ पूरी कर ली ? - क्या मैंने अपना ईनाम पा लिया ? परमेश्वर आपको आशीष दे ।