याकूब 2:14-26 परिचय :- संसार में अधिकांश लोग कहते हैं कि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं । शायद ही कोई ऐसा आपको मिले विशेषकर हमारे देश भारत में, जो कहे कि मैं परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता । परन्तु वास्तव में जो सच्चा विश्वास और जीवित विश्वास है, वह कौन सा है ? वह कौन सा ऐसा विश्वास है जिसे हम मसीही विश्वास तो कहें परन्तु वह परमेश्वर की दृष्टि में ग़लत हो और उसे ग्रहण योग्य न हो? तो फिर सच्चा मसीही विश्वास क्या है ? इसी विश्वास की चर्चा याकूब अपने पत्र के दूसरे अध्याय में करता है । याकूब के पत्र से पहले इब्रानियों की पत्री है । इस पत्री के 11 वें अध्याय में विश्वास के बारे में लिखा हुआ है । इसे हम विश्वास का अध्याय कहते हैं । विश्वास हमारे मसीही जीवन का आधार है । इब्रानियों के 11 वें अध्याय के प्रारम्भ में ही विश्वास की परिभाषा लिखी हुई है कि अब विश्वास आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय है । अर्थात् जिन वस्तुओं की हम आशा करते हैं उनका निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है । जो बातें दिखाई नहीं देतीं उनका प्रमाण है, विश्वास। वचन में जो प्रतिज्ञाएं की गई हैं उनको हम देख नहीं सकते परन्तु उनको मानते हैं, उन पर चलते हैं, और उनके अनुसार जीवन जीते हैं । हम गीत गाते हैं कि ``हम विश्वास से एक देश देखते हैं ।'' उस देश को हम देख तो नहीं सकते परन्तु परमेश्वर के वचन के आधार पर यह गीत गाते हैं । हम उस अनन्त जीवन की आशा लगाते हैं । इसी अध्याय के छठे पद में देखें तो बड़ी मूलभूत बात लिखी हुई है कि विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है । विश्वास बिना हम मसीही नहीं हो सकते । विश्वास बिना यदि कहें कि हम मसीही हैं तो यह आधारहीन बात है। इफिसियों 2:8 में लिखा है - ``क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्वर का दान है'' । यह विश्वास ही तुम्हारे उद्धार का आधार है। मरकुस 16:16 में लिखा है - ``जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा'' । बिना विश्वास के हम मसीही हो नहीं सकते । बिना विश्वास के हमारा उद्धार हो नहीं सकता । बिना विश्वास के हम परमेश्वर को प्रसन्न कर नहीं सकते । विश्वास हमारे मसीही जीवन और परमेश्वर से हमारे सम्बन्ध की आधारशिला है । याकूब अपने दूसरे अध्याय में इस बात को लिखता है कि ऐसा विश्वास भी होता है जो हमारा उद्धार नहीं करता । वास्तव में कौन सा विश्वास सही है ? हम सोचते हैं कि हम विश्वासी हैं क्योंकि हमने मसीह पर विश्वास किया है । हो सकता है कि हम इस विश्वास को बड़ी गम्भीरता से मानते भी हों । परन्तु इसके बावज़ूद हम ग़लती पर हो सकते हैं । याकूब इस सन्दर्भ में ऐसे तीन प्रकार के विश्वास का वर्णन करता है जो खोखले विश्वास हैं और हमारा उद्धार नहीं कर सकते । 1. ऐसा विश्वास जो मात्र शब्दों तक सीमित है, हमारा उद्धार नहीं कर सकता :- याकूब 2:14 में लिखा हुआ है - ``हे मेरे भाइयो, यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो उस से क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास कभी उसका उद्धार कर सकता है ?'' याकूब यहां पर यह प्रश्न कर रहा है कि ऐसा विश्वास जो कर्म न करे, उससे क्या लाभ ? यह ऐसा विश्वास है जिससे उद्धार नहीं मिल सकता । अंजीर का पेड़ तो लगा हुआ है, दिखाई देता है कि उसमें हरे-भरे पत्ते हैं, परन्तु फल नहीं हैं । इसलिए प्रभु यीशु मसीह उसको शाप देता है । नाम तो बहुत अच्छा है परन्तु काम उस नाम के अनुरूप नहीं है । इसलिए परमेश्वर की दृष्टि में वह व्यक्ति शापित है । नाम तो यहूदा है, जिसका अर्थ होता है `परमेश्वर की महिमा' परन्तु काम ऐसे हैं जो परमेश्वर की निन्दा करते हैं । काम ऐसे हैं जो चुम्बन देकर परमेश्वर के पुत्र को पकड़वाते हैं। काम ऐसे हैं कि प्रभु यीशु मसीह स्वयं कहता है कि भला होता ऐसे व्यक्ति का जन्म ही न होता। नीतिवचन 26:23 में लिखा है - ``जैसा कोई चान्दी का पानी चढ़ाया हुआ मिट्टी का बर्तन हो, वैसा ही बुरे मन वाले के प्रेम भरे वचन होते हैं'' । बर्तन तो मिट्टी का है परन्तु उस पर चांदी का पानी चढ़ा दिया गया है। ठीक इसी प्रकार बुरे मन वाले व्यक्ति के वचन होते हैं । बर्तन गिरेगा तो फूट जाएगा । उसी प्रकार वचन तो बड़े प्रेम के हैं परन्तु हृदय में भीतर से जलन, कुढ़न, और बैर-भाव है । ऐसे वचनों का कोई फायदा नहीं । यहेजकेल 33:31 में लिखा है - ``वे प्रजा की नाइंर् तेरे पास आते और मेरी प्रजा बनकर तेरे साम्हने बैठकर तेरे वचन सुनते हैं, परन्तु वे उन पर चलते नहीं; मुंह से तो वे बहुत प्रेम दिखाते हैं, परन्तु उनका मन लालच ही में लगा रहता है'' । यहां परमेश्वर अपनी प्रजा के लोगों के लिए यह बात कह रहा है कि वे प्रजा की नाईं मेरे पास आते हैं, वचन को सुनते हैं परन्तु उस पर चलते नहीं । प्रेम दिखाते तो हैं परन्तु करते नहीं। क्योंकि मन में लालच भरा हुआ है । मरकुस 7:6 में लिखा है - ``उस ने उन से कहा; कि यशायाह ने तुम कपटियों के विषय में बहुत ठीक भविष्यवाणी की; जैसा लिखा है; कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है''। प्रभु यीशु मसीह यहां कह रहा है कि हे कपटियो, होठों से तो तुम मेरा आदर करते हो परन्तु तुम्हारा मन मुझसे दूर रहता है । तीतुस 1:16 में लिखा है - ``वे कहते हैं, कि हम परमेश्वर को जानते हैं : पर अपने कामों से उसका इन्कार करते हैं, क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न मानने वाले हैं; और किसी अच्छे काम के योग्य नहीं हैं'' । तीतुस लिखता है कि ऐसे लोग कहते तो हैं कि हम परमेश्वर को जानते हैं परन्तु अपने कामों से, अपने व्यवहार से उसका इन्कार करते हैं । क्योंकि वे घृणित और आज्ञा न मानने वाले हैं । याकूब अपनी पत्री के दूसरे अध्याय के चौदहवें पद में लिखता है कि ऐसा विश्वास जो सिर्फ्र बातों का हो और उसमें काम न हो तो उसका क्या लाभ ? ऐसा विश्वास हमारा उद्धार नहीं कर सकता । अगर हम मात्र होठों से परमेश्वर का अंगीकार करते हैं, होठों से उसका गुणगान करते हैं, होठों से उससे प्रार्थना करते हैं, होठों से उसकी प्रशंसा करते हैं, परन्तु हमारे कार्य और व्यवहार उसका इन्कार करते हैं, तो ऐसा विश्वास और कर्मकाण्ड हमारा उद्धार नहीं कर सकता । हम अपने आपको धोखे में रखते हैं । 2. ऐसा विश्वास जो मात्र परम्परा तक सीमित है, हमारा उद्धार नहीं कर सकता:- याकूब 2:17-18 में लिखा है - ``वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है । वरन् कोई कह सकता है कि तुझे विश्वास है, और मैं कर्म करता हूं : तू अपना विश्वास मुझे कर्म बिना तो दिखा; और मैं अपना विश्वास अपने कर्मों के द्वारा तुझे दिखाऊंगा''। विश्वास कार्य के बिना मरा हुआ है। अक्सर हमारे जीवन में ऐसा होता है कि धर्म हमारे लिए मात्र एक परम्परा बन जाता है । यह शैतान की चाल होती है । एक समय ऐसा आता है जब हमारे लिए धर्म एक परम्परा बन जाता है । प्रभु यीशु मसीह एक परम्परा बन जाता है । सण्डे स्कूल आना मात्र एक परम्परा बन जाता है । कलीसिया की आराधना मात्र परम्परा बन जाती है। प्रार्थना करना मात्र औपचारिकता रह जाती है । यहां तक कि उपवास करना भी मात्र एक रस्म बन जाता है । त्योहारों का मनाना भी एक रस्म अदायगी की बात हो जाती है । हम सोचते हैं कि हम बहुत अच्छे मसीही हैं क्योंकि हमारा विश्वास बहुत मज़बूत है, क्योंकि हमारे बच्चे सण्डे स्कूल जाते हैं, क्योंकि हम नियमित रूप से कलीसिया की आराधना में उपस्थित होते हैं। ये सारी बातें ज़रूरी और अच्छी हैं । परमेश्वर ये बातें हमसे चाहता है । परन्तु शैतान प्रयास करता है कि प्रार्थना करना, कलीसिया की आराधना में भाग लेना एक परम्परा बन जाए। लूका रचित सुसमाचार के अट्ठारहवें अध्याय में दो उदाहरण हैं कि दो लोग प्रार्थना कर रहे हैं । एक फरीसी प्रार्थना कर रहा है । वह कहता है कि मैं सप्ताह में दो बार उपवास रखता हूं, दशमांश देता हूं । मैं कभी अन्धेर नहीं करता । मैं अन्यायी नहीं हूं । मैं व्यभिचारी नहीं हूं । तब एक व्यक्ति और है जिसके लिए प्रार्थना करना परम्परा नहीं है । जिसके लिए धर्म का अर्थ सिर्फ्र उपवास करना, दशमांश देना, अन्धेर न करना, अन्याय न करना और व्यभिचार न करना नहीं है । वह प्रार्थना करता है, अपने हृदय की गहराइयों से । कहता है कि हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर। प्रभु यीशु मसीह कहता है कि परमेश्वर की दृष्टि में पहला व्यक्ति धर्मी नहीं ठहरेगा । क्योंकि उसके लिए धर्म एक परम्परा बन गया था । दूसरा व्यक्ति धर्मी ठहरेगा क्योंकि उसने हृदय से प्रार्थना की । उसने अपनी धार्मिकता का गुणगान नहीं किया, बल्कि यह कहा हे परमेश्वर ! मुझ पापी पर दया कर । लूका 18:18 में दूसरा उदाहरण मिलता है । एक धनी युवा प्रशासक था जो प्रभु यीशु मसीह के पास आता है और कहता है कि मैं आज्ञाओं को बचपन से जानता हूं । मैं आज्ञाओं को न सिर्फ्र जानता हूं बल्कि उन्हें मानता भी हूं । लिखा है, प्रभु यीशु मसीह उससे कहता है जा ! और जाकर अपना सारा धन कंगालों को बांट दे। इस युवा के लिए धर्म मात्र एक परम्परा थी । उसने कहा कि मैं इन बातों को जानता हूं और मानता हूं । परन्तु जब रीति-रिवाजों से बढ़कर कुछ काम करने की, त्याग करने की बात आई तो वह पीछे हट गया । जब प्रभु यीशु मसीह ने उससे कहा कि सामान्य से कुछ हटकर तेरे विश्वास में होना चाहिए कि जा ! जो कुछ तेरे पास है सब गरीबों में बांट दे और तुझे स्वर्ग में बड़ा धन मिलेगा तो वह प्रभु यीशु मसीह की बात को नकार देता है क्योंकि वह बहुत धनवान था। ऐसा विश्वास जो मात्र परम्परा बन जाता है, जिसमें कोई जीवन नहीं होता, जिसमें कोई भावनाएं नहीं होतीं, जिसमें कोई कार्य नहीं होते, जिसमें कोई त्याग नहीं होता, जिसमें कोई आंसू नहीं होते, जिसमें कोई परिश्रम नहीं होता, जिसमें दूसरों के साथ एक के बदले चार मील जाना नहीं होता, जिसमें कोई कुर्ता मांगे और दोहर नहीं दी जाती; ऐसा विश्वास कोई काम का नहीं । ऐसा विश्वास हमें धोखे में रखता है और हमारा उद्धार कभी नहीं हो सकता । क्योंकि ऐसा विश्वास मरा हुआ है। 3. ऐसा विश्वास जो हमारे ज्ञान तक सीमित है, हमारा उद्धार नहीं कर सकता :- याकूब 2:19-20 पद में लिखा है - ``तुझे विश्वास है कि एक ही परमेश्वर है : तू अच्छा करता है: दुष्टात्मा भी विश्वास रखते, और थरथराते हैं । पर हे निकम्मे मनुष्य क्या तू यह भी नहीं जानता, कि कर्म बिना विश्वास व्यर्थ है?'' हो सकता है हम बुद्धिमत्ता की बातें करें, हम तर्क-वितर्क करें, हम अपने ज्ञान के द्वारा परमेश्वर की प्रभुसत्ता को स्वीकार करते हुए उस पर विश्वास करें । परन्तु याकूब कहता है कि यह तो तू अच्छा करता है परन्तु ऐसा तो दुष्टात्माएं भी करती हैं । यहूदा भी परमेश्वर पर विश्वास करता था । उसने भी प्रभु यीशु मसीह के आश्चर्यकर्म देखे थे । वह प्रभु यीशु मसीह की रोटी में से खाता था । उसके साथ एक थाली में से खाता था । परन्तु वह यीशु मसीह के पास रहकर भी उद्धार से वंचित था । धनी युवा प्रशासक सब आज्ञाओं को जानता था, उसके दिमाग में सारी बातें भरी हुई थीं, सारी परम्पराएं रटी हुई थीं । परन्तु प्रभु यीशु मसीह के पास आकर भी वह उद्धार से वंचित रह गया । इसीलिए पौलुस कहता है कि ``यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं, और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल और झनझनाती हुई झांझ हूं । और यदि मैं भविष्यवाणी कर सकूं, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं, और मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो, कि मैं पहाड़ों को हटा दूं, परन्तु प्रेम न रखूं, तो मैं कुछ भी नहीं । और यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिला दूं, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूं, और प्रेम न रखूं, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं'' (1 कुरिन्थियों 13:1-3) । ऐसे विश्वास से क्या लाभ, जब सब प्रकार के ज्ञान की बातें तो हैं परन्तु प्रेम नहीं । यदि कोई कहे कि मैं परमेश्वर को मानता हूं तो यह व्यर्थ है क्योंकि विश्वास तो दुष्टात्माएं भी करती हैं । मरकुस 3:11 में हम पाते हैं कि दुष्टात्माएं भी जब उसे देखती थीं तो उसके आगे गिर पड़ती थीं और चिल्लाकर कहती थीं कि यह परमेश्वर का पुत्र है । दुष्टात्माएं उसके अधिकार को मानती थीं और चिल्लाकर उसके परमेश्वर का पुत्र होने की बात स्वीकार करती थीं। लूका 4:41 में हम पाते हैं कि दुष्टात्मा चिल्लाती है और कहती है कि यह परमेश्वर का पुत्र है । ऐसा विश्वास जो मात्र हमारे ज्ञान तक सीमित है, वह हमारा उद्धार नहीं कर सकता । तो फिर प्रश्न यह उठता है कि कैसा विश्वास हमारा उद्धार कर सकता है? कौन सा विश्वास सही मसीही विश्वास है ? इस बारे में न सिर्फ्र याकूब यहां पर बताता है बल्कि उदाहरण भी देता है । याकूब 2:21-25 में लिखा है - ``जब हमारे पिता इब्राहीम ने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया, तो क्या वह कर्मों से धार्मिक न ठहरा था । सो तू ने देख लिया कि विश्वास ने उस के कामों के साथ मिलकर प्रभाव डाला है और कर्मों से विश्वास सिद्ध हुआ । और पवित्र शास्त्र का यह वचन पूरा हुआ, कि इब्राहीम ने परमेश्वर की प्रतीति की, और यह उसके लिये धर्म गिना गया, और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया। सो तुम ने देख लिया कि मनुष्य केवल विश्वास से ही नहीं, वरन् कर्मों से भी धर्मी ठहराता है । वैसे ही राहाब वेश्या भी जब उस ने दूतों को अपने घर में उतारा, और दूसरे मार्ग से विदा किया, तो क्या कर्मों से धार्मिक न ठहरी ?'' इब्राहीम विश्वास का पिता कहलाता है । उसने न सिर्फ्र विश्वास किया परन्तु इस विश्वास को अभिव्यक्त भी किया । वह अपने कार्यों के द्वारा, अपने विश्वास की कसौटी पर इतना खरा उतरा कि बेटे की बलि चढ़ाने से भी अपने हाथ को न रोका । इसीलिए हम उसे विश्वास का पिता कहते हैं । राहाब वेश्या ने भी परमेश्वर के वचन के अनुसार, उसकी आज्ञा के अनुसार उन दूतों को अपने घर में उतारा, अपने घर में ठहराया, अपने घर में शरण दी, अपने घर में उनकी रक्षा की । उसने केवल यह नहीं कहा कि परमेश्वर तू जो कहता है, उसको मैं मान लेती हूं; परन्तु करके भी दिखाया । इस कारण वह धर्मी ठहरी । वह यहां तक धर्मी ठहरी कि प्रभु यीशु मसीह की वंशावली में राहाब वेश्या का नाम आया । इब्रानियों की पत्री के ग्यारहवें अध्याय को यदि देखें तो वास्तव में किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं है, यह अपने आप में पूर्ण सन्देश है । इब्रानियों 11:8 में लिखा है - ``विश्वास ही से इब्राहीम जब बुलाया गया तो आज्ञा मानकर ऐसी जगह निकल गया जिसे मीरास में लेने वाला था, और यह न जानता था, कि मैं किधर जाता हूं; तौभी निकल गया'' । इब्राहीम परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार उस पर विश्वास करते हुए निकल गया जबकि वह नहीं जानता था कि कहां जाने वाला है । कल क्या होने वाला है । वह भविष्य से अनजान था । इब्राहीम के विश्वास की गवाही उसके कार्यों और जीवन के द्वारा प्रतिदिन प्रगट हुई । इब्रानियों 11:24-25 में लिखा है - `` विश्वास ही से मूसा ने सयाना होकर फिरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया । इसलिये कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दु:ख भोगना और उत्तम लगा । और मसीह के कारण निन्दित होने को मिस्र के भण्डार से बड़ा धन समझा : क्यों कि उस की आंखें फल पाने की ओर लगी थीं । विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उस ने मिस्र को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा'' । इब्रानियों 11:33-34; 36-40 में लिखा है - ``इन्हों ने विश्वास ही के द्वारा राज्य जीते; धर्म के काम किए; प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएं प्राप्त कीं, सिंहों के मुंह बन्द किये । आग की ज्वाला को ठण्डा किया; तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में बलवन्त हुए; लड़ाई में वीर निकले; विदेशियों की फौजों को मार भगाया । कई एक ठट्ठों में उड़ाए जाने; और कोड़े खाने; वरन् बांधे जाने; और कैद में पड़ने के द्वारा परखे गए, पत्थरवाह किए गए; आरे से चीरे गए; उन की परीक्षा की गई; तलवार से मारे गए; वे कंगाली में और क्लेश में और दुख भोगते हुए भेड़ों और बकरियों की खालों को ओढ़े हुए, इधर-उधर मारे-मारे फिरे । और जंगलों, और पहाड़ों, और गुफाओं में, और पृथ्वी की दरारों में भटकते फिरे । संसार उन के योग्य न था : और विश्वास ही के द्वारा इन सब के विषय में अच्छी गवाही दी गई, तौभी उन्हें प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न मिली । क्योंकि परमेश्वर ने हमारे लिये पहिले से एक उत्तम बात ठहराई, कि वे हमारे बिना सिद्धता को न पहुंचें'' । ये सब कार्य थे, यह सब त्याग था जो उनके विश्वास की गवाही बना । जिससे उनके मसीही विश्वास की गवाही आग की लपटों के समान सारे संसार में फैल गई। अगर विश्वास है तो उसकी अभिव्यक्ति होना चाहिए। यदि हम कहें कि हमारे दिल, हमारे दिमाग, हमारे शब्दों, हमारी परम्पराओं, हमारी बातों, हमारे तर्क-वितर्कों में विश्वास है तो उससे कुछ होने वाला नहीं है । हम मात्र यह न कहें कि हम विश्वास करते हैं। परन्तु जो प्रश्न मुझे और आपको स्वयं से करना है कि क्या हमारा विश्वास दिखाई देता है ? क्या हमारे व्यक्तिगत जीवन में, हमारे कलीसियाई जीवन में आत्मा के फल लगे हुए हैं ? क्या हमने मसीह की सेवा की है ? क्या हमने अपने विश्वास की गवाही अपने कार्यों के द्वारा, अपने परिश्रम के द्वारा दी है ? जब हम तपाए गए तो क्या हम उस विश्वास की परीक्षा में खरे उतरे ? अन्त में याकूब अपने सन्देश का सार लिखता है - निदान, जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है । क्या हमारे परिवारिक जीवन में, क्या हमारे सम्बन्धों में यह विश्वास दिखाई देता है ? उसकी गवाही होती है ? हम अपने विश्वास को जीवन्त बना सकते हैं, हम अपने विश्वास की गवाही को दूर-दूर तक फैला सकते हैं । परमेश्वर ने जो विश्वास दिया है, जो वचन दिया है उसके अनुसार अपने जीवन को, अपने व्यवहार को, अपने परिवार को, अपनी कलीसिया को और अपने समाज को बना सकते हैं। हिमालय के पर्वत पर कुछ लोग चढ़ने का प्रयास कर रहे थे । माउण्ट एवरेस्ट संसार की सबसे ऊंची चोटी है । उस समय तक उस शिखर पर कोई पहुंचा नहीं था। इंग्लैण्ड से 7 लोगों का एक दल आया । ये सब मसीही थे जिनमें तीन महिलाएं और चार पुरुष थे । उन्होंने विचार किया कि हम माउण्ट एवरेस्ट पर पहुंचेंगे । बहुत प्रार्थना के साथ उन्होंने अपनी यात्रा प्रारम्भ की । एक के बाद एक पड़ाव वे तय करते गए। जैसे-जैसे वे ऊपर चढ़ते गए समस्याएं आती गईं । ऑक्सीजन कम होती गई । बर्फीले तूफानों का उन्होंने सामना किया । ऊंचाई से गिरने के कारण कुछ की हडि्डयां टूट गईं । अन्त में माउण्ट एवरेस्ट उनके सामने था और लगभग 100 फीट की दूरी और तय करनी थी। एक बहुत भंयकर आंधी आई । पहाड़ से एक बहुत भारी टुकड़ा नीचे गिरा । इस दल के चार लोग दबकर मर गए । दल के बाकी लोग निराश हो गए । उन्होंने निर्णय किया कि हम अपने इन चार साथियों के शव लेकर वापस अपने देश चले जाएंगे । बड़ी कठिनाई से अपने मित्रों की मृतक देहों को लेकर वे नीचे उतरे और उन्हें इंग्लैण्ड वापिस ले गए । लंदन में जब एक बहुत बड़े हॉल में अन्तिम संस्कार की आराधना हो रही थी तो वहां हज़ारों लोग जमा थे। दल का मुखिया जो बच गया था वह बड़े भारी हृदय से अपने चार मित्रों की पार्थिव देहों को विदाई दे रहा था। जब फ्यूनरल की आराधना चल रही थी, वह खड़ा हुआ और जिस दिशा में हिमालय के माउण्ट एवरेस्ट पर्वत की चोटी थी, उस तरफ उसने अपना मुंह किया और उस फ्यूनरल के दौरान उसने इस प्रकार से कहा - ``हे माउण्ट एवरेस्ट, आज तूने हमारी टोली को पराजित कर दिया। परन्तु हमने तुझसे हार नहीं मानी है । एक दिन हम अपना झण्डा तुझ पर चढ़ाएंगे, एक दिन हम तुझ पर विजय प्राप्त करेंगे । क्योंकि हे माउण्ट एवरेस्ट, तुम अपनी ऊंचाई से और अधिक बढ़ नहीं सकते परन्तु परमेश्वर ने हम में क्षमता दी है कि हम अपने जीवन में ऊंचे उठ सकें।'' निष्कर्ष :- यह मसीही जीवन की आशा है कि हम अपने आपको बाइबिल के मापदण्डों के सामने भले ही बहुत छोटा तो पाते हों, हो सकता है कि यह हमारे लिए माउण्ट एवरेस्ट के समान हों, परन्तु परमेश्वर ने हमें ऊंचा उठने की क्षमता दीहै। परमेश्वर ने अपने पुत्र प्रभु यीशु मसीह को हमारे लिए बलिदान किया है । उसने अपने वचन का प्रकाश दिया है । वह अपने दूतों के द्वारा हमारी सुरक्षा करता है । वह अपने पवित्र आत्मा की अगुवाई में हमको प्रेरणा देता और आगे बढ़ाता है । परमेश्वर के पीछे चलने वाले लोगों में, उस पर विश्वास करने वाले लोगों में अद्भुत क्षमता है । हमारा विश्वास चाहे राई के दाने के बराबर हो, परन्तु यदि हम पहाड़ों से कहें हट जा, तो वे हट जाएंगे । हम अपने विश्वास में आगे बढ़ें, मसीही जीवन में आगे बढ़ें । अपने कार्यों और अपने त्याग में आगे बढ़ें । जो समय हमको परमेश्वर ने दिया है उसमें हम आगे बढ़ते जाएं । हमारे जीवन, हमारे कार्यों और हमारे सम्बन्धों से प्रभु यीशु मसीह की गवाही हो । परमेश्वर आपको आशीष दे ।