Background

विजय के साथ प्रवेश (पाम सण्डे)

लूका 19:41-44

परिचय :- प्रभु यीशु मसीह ने जब अपने जीवन की अन्तिम यात्रा प्रारम्भ की तो वह जानता था कि यह यात्रा सरल नहीं है । यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें मृत्यु है । यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें उसे अपनों से धोखा मिलने वाला है । यह एक ऐसी यात्रा है जहां उसे दर्द, अपमान, थूक, कांटों के ताज, तिरस्कार और कोड़ों की मार का सामना करना है । प्रभु यीशु मसीह इन बातों को जानता था । परन्तु उसने दृढ़ता से अपना मुख यरूशलेम की ओर कर लिया था।

यह फसह के पर्व का समय था । यरूशलेम इस फसह के पर्व का केन्द्र था । इस समय सारे विश्व से यहूदी लोग यरूशलेम में जमा होते थे । इतिहासकारों का कहना है कि यरूशलेम में लगभग 30 लाख लोग बाहर से आकर जमा होते थे। प्रभु यीशु मसीह ने एक बड़ी भीड़ के साथ इस जुलूस का प्रतिनिधित्व किया । इस फसह के पर्व के समय यहूदी स्मरण करते थे कि किस प्रकार परमेश्वर ने उनके पुरखाओं को मिस्र की गुलामी से निकाला । किस प्रकार मूसा को परमेश्वर ने भेजा कि मिस्र की बंधुवाई से उनको निकाले । किस प्रकार परमेश्वर ने उनकी अगुवाई की। किस प्रकार परमेश्वर ने उन पर दया की । वे स्मरण करते थे कि जब मिस्रियों पर दस विपत्तियां पड़ीं और आखिरी विपत्ति के समय परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार निर्दोष मेम्ने का लहू इस्राएलियों ने अपने घरों की चौखट पर लगा दिया । जब परमेश्वर का दूत पहिलौठों को मारने के लिए आया तो जिन दरवाज़ों की चौखटों में मेम्ने का लहू लगा हुआ था, उस चौखट से वह आगे बढ़ गया । वहां से वह `पास-ओवर' कर गया। इसीलिए अंग्रेज़ी में फसह के पर्व को `पास-ओवर' कहा जाता है।

यह मेम्ने के लहू के रक्त को स्मरण करने का पर्व था कि किस प्रकार मेम्ने के लहू ने अपने लोगों को बचा लिया और अब एक और मेम्ना तैयार था जो मेरे और आपके लिए अपना लहू बहाने जा रहा था । यह मृत्यु का जुलूस था । उस समय इस्राएल पर रोमी शासन था। रोमी शासन इतना भ्रष्ट हो चुका था कि वहां कोई न्याय नहीं था । वहां किसी की सुरक्षा नहीं थी । वहां इतना भ्रष्टाचार था जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते ।

परन्तु लोगों ने प्रभु यीशु मसीह को देखा था । वे जानते थे कि उसने पांच रोटियों और दो मछलियों से हज़ारों लोगों को खिलाया था । वे सोचते थे कि यदि उसका राज्य आ जाए, यदि वह राजा बन जाए, जो थोड़े से भोजन से हज़ारों लोग की भूख को तृप्त कर सकता है, जो आश्चर्य कर्म कर सकता है, तो उसके राज्य में कोई भूखा न होगा। हमको ऐसा राजा चाहिए जिसके राज्य में भुखमरी न हो । लोगों ने देखा था कि प्रभु यीशु मसीह ने रोगियों को चंगा किया था और कोढ़ियों को शुद्ध किया था । वे सोचते थे यदि वह राजा बन जाएगा तो उसके राज्य में कोई कभी बीमार न होगा । वह सबको चंगा कर देगा । वह सबको शुद्ध कर देगा। लोगों ने देखा था कि नाईन नगर की विधवा के मृतक पुत्र को प्रभु यीशु मसीह ने कहा था - ``हे जवान मैं तुझसे कहता हूं उठ ।'' लोगों ने देखा था कि मुर्दा लाजर को किस प्रकार से प्रभु यीशु मसीह ने जीवित किया था । वे सोचते थे कि यदि वह राजा हो जाएगा तो उसके राज्य में कोई मरेगा नहीं । यदि किसी की मृत्यु होगी तो वह आएगा, उनको स्पर्श करेगा और वे जीवित हो जाएंगे । ऐसा राजा जिसके राज्य में कोई भूख नहीं होगी । कोई प्यास नहीं होगी । कोई बीमारी नहीं होगी, किसी को मौत नहीं आएगी । मौत आएगी तो वह उनको जिला देगा । इस कारण से लोग प्रभु यीशु मसीह को सांसारिक राजा बनाना चाहते थे। वे उसे सांसारिक राजा की गद्दी पर बिठाना चाहते थे । इसीलिए वे उसके स्वागत में चिल्ला रहे थे - ``होशन्ना, होशन्ना, होशन्ना।'' जिसका अर्थ है - ``हमें अभी बचा।'' ग्नीख्ल् ट्टक् छद्भञ्. परन्तु ये लोग नहीं जानते थे कि वह वर्तमान का, अभी का राजा नहीं है । वे नहीं जानते थे कि वह लोगों को मात्र भूख से मुक्ति दिलाने के लिए नहीं आया । वे नहीं जानते थे कि मात्र वह चंगा करने के लिए नहीं आया । वे यह नहीं जानते थे कि वह तो अनन्त का राजा है । वे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे - ``ग्नीख्ल् ट्टक् छद्भञ् अर्थात् हमें अभी बचा।''

इस 2000 साल पुरानी घटना का मेरे और आपके जीवन में आज क्या अर्थ है ? इस घटना से परमेश्वर हमें क्या सन्देश देना चाहता है ? इस सन्दर्भ में कुछ बातें हम देखेंगे :-

1. प्रभु यीशु सब कुछ जानते हैं :- लूका 19:30-32 में लिखा है - ``यीशु ने कहा, साम्हने के गांव में जाओ, और उस में पहुंचते ही एक गदही का बच्चा जिस पर कभी कोई सवार नहीं हुआ, बन्धा हुआ तुम्हें मिलेगा, उसे खोलकर लाओ । और यदि कोई तुम से पूछे, कि क्यों खोलते हो, तो यह कह देना, कि प्रभु को इस का प्रयोजन है । जो भेजे गए थे, उन्हों ने जाकर जैसा उस ने उन से कहा गया था, वैसा ही पाया''।

यूहन्ना 6:64 में लिखा है - ``यीशु तो पहिले ही से जानता था कि जो विश्वास नहीं करते, वे कौन हैं ? और कौन मुझे पकड़वाएगा''।

प्रभु यीशु मसीह ने अपने चेलों से कहा, जाओ । उसके बाद क्या घटना घटेगी, उसने यह भी बता दिया । क्या प्रश्न लोग करेंगे, कौन तुम्हें मिलेगा, तुम्हें क्या जवाब देना है और उसके बाद क्या घटनाक्रम होगा, उसने उन्हें सब कुछ बता दिया । प्रभु यीशु मसीह भविष्य को जानता था । वह एक-एक बात जानता था ।

यूहन्ना 18:4 में लिखा है - ``तब यीशु उन बातों को जो उस पर आने वाली थीं, जानकर निकला''।

मत्ती 10:30 में यीशु ने कहा - ``तुम्हारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं'' ।

भजन संहिता 139:13 में लिखा हुआ है - ``मेरे मन का स्वामी तो तू है; तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा''। उसके बाद भजन संहिता 139:16 में लिखा है - ``मेरे सब अंग जो दिन-दिन बनते जाते थे, वे रचे जाने से पहिले तेरी पुस्तक में लिखे हुए थे'' ।

यिर्मयाह 1:5 में लिखा है - ``गर्भ में रचने से पहिले ही मैं ने तुझ पर चित्त लगाया, और उत्पन्न होने से पहिले ही मैं ने तुझे अभिषेक किया'' ।

हमारा परमेश्वर जीवित परमेश्वर है जो सब बातों को जानता है। वह माता के गर्भ के तत्व को जानता था। माता के गर्भ में आने के पूर्व उसने हम पर चित्त लगाया और उत्पन्न होने के पहले उसने हमारा अभिषेक किया । वह महान सामर्थी, सर्वज्ञानी, सर्वव्यापक परमेश्वर है जो हर एक बात को जानता है । वह ऐसा प्रभु है जो हमारे जीवन को जानता है, हमारे चिन्तन को जानता है, हमारे मनों को जानता है। वह हमारे विचारों को जानता है, हमारी प्राथमिकताओं को जानता है ।

हम चाहे कितनी भी अच्छी बातें करें । हम चाहे कितने भी अच्छे वस्त्र पहनें। हम कितनी ही डिग्रियां प्राप्त कर लें । हम कितने ही देशों की यात्राएं कर लें परन्तु प्रभु यीशु मसीह इन बाहरी बातों को नहीं देखता । वह हमारे दिल को देखता है । वह हमारे हृदय को जानता है । वह हमारे हृदय का स्वामी है । इसीलिए वचन में लिखा है - धोखा न खाओ, परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता । न्याय के दिन हमें हर एक बात का लेखा देना होगा । जब कि परमेश्वर सब बातों को जानता है, और हर एक बात का लेखा हमको न्याय के दिन देना होगा, तो यह बड़ी घबराहट की बात है ।

मत्ती 12:36-37 में लिखा हुआ है - ``और मैं तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे । क्योंकि तू अपनी बातों के कारण निर्दोष और अपनी बातों ही के कारण दोषी ठहराया जाएगा''।

क्या कभी हम सोचते हैं कि हमने कैसी बातें की हैं ? कैसी बातों पर मन लगाया है ? कैसी बातें हमारे लिए प्रमुख हैं ? कैसी बातें है जो हमारे मन में आती हैं ? हम एक ऐसे प्रभु के सामने खड़े हैं जो हर एक बात को जानता है । वह हमारे विचारों को जानता है। हमारी भावनाओं को जानता है । हमारे दिल को देखता है। एक दिन हमको इस परमेश्वर के सामने अपना लेखा देना होगा।

2. प्रभु यीशु के लिये छोटों का महत्व है :- हम वचन को देखें तो पाते हैं कि जो संसार में महत्वपूर्ण है, वह परमेश्वर की दृष्टि में महत्वहीन है । लेकिन जो संसार में महत्वहीन है, वह परमेश्वर की दृष्टि में महत्वपूर्ण है । उसका नज़रिया, उसका मापदण्ड, उसकातराजू, सब कुछ संसार से बहुत भिन्न है ।

प्रभु एक गधा चुनता है जो महत्वहीन है । गधा जो अपमान का, मज़ाक का, उपहास का सूचक है । उदाहरण के लिए यदि हम किसी से कह दें कि तू बहुत गधा है, या तेरा बच्चा गधा है, या यह बच्चा जो क्लास में पढ़ता है, यह गधा है; तो हमको बहुत अपमान सा लगता है । ऐसा लगता है जैसे कोई हमारा मज़ाक उड़ा रहा है। परमेश्वर के एकलौते पुत्र को तो रथ में, बग्घियों पर सवार होकर आना था । उसे तो शायद आकाश से एक बड़े शब्द के साथ उतरना चाहिए था; परन्तु वह एक गदही के बच्चे पर सवार होकर आता है ।

संसार के रचने वाले का जन्म किसी राजमहल में नहीं हुआ । जब हम लोग हाई स्कूल में पण्डित जवाहर लाल नेहरू के बारे में निबन्ध पढ़ते थे तो हमारे टीचर लिखवाते थे - `ही वॉज़ बॉर्न विथ ए सिल्वर स्पून इन हिज़ माउथ ।' यानि वे चांदी का चम्मच मुंह में लिए हुए पैदा हुए । परन्तु हमारा प्रभु यीशु मसीह बैतलहम में पैदा हुआ, जो छोटा सा नगर था । वह जानवरों के बीच एक गौशाले में जन्मा । हमारे परिवारों में जब बच्चे का जन्म होता है तो हम प्रसव के लिए अच्छे से अच्छे स्थानों में ले जाना चाहते हैं । जो लोग डॉक्टर्स हैं या जो मेडिकल प्रोफेशन में हैं, वे जानते हैं, कि जानवरों के बीच में और उस परिस्थिति में, शायद कोई नहीं चाहेगा कि उसकी पत्नी का या उसकी बेटी का प्रसव हो । परन्तु परमेश्वर के लिए बैतलहम का वह छोटा सा स्थान, वह गौशाला, वह महत्वहीन स्थान प्रमुख है। जानवरों के बीच की जगह में वह चरनी, जिसमें वह पैदा होता है, प्रमुख है । गधा उसके लिए प्रमुख है । वह चरनी उसके लिए प्रमुख है। वह गौशाला उसके लिए प्रमुख है ।

चेले आपस में वाद-विवाद करते हैं कि स्वर्ग के राज्य में कौन बड़ा होगा ? और तब प्रभु यीशु मसीह एक छोटे से बालक को लाते हैं और कहते हैं - जब तक तुम इन बालकों के समान अपने आपको न बनाओ तो स्वर्ग के राज्य में कदापि प्रवेश नहीं कर सकते । जक्कई नाम का व्यक्ति एक महसूल लेने वाला है । जो भ्रष्टाचारी है । जो लोगों की दृष्टि में तिरस्कृत है । प्रभु यीशु मसीह उससे कहते हैं कि आज ही मैं तेरे घर भोजन करने आऊं गा । जो संसार के लिए छोटा है, वह परमेश्वर की दृष्टि में बड़ा है । जो संसार के लिए महत्वपूर्ण है, वह परमेश्वर के लिए महत्वहीन है; और जो संसार के लिए महत्वहीन है, वह उसके लिए महत्वपूर्ण है । शिमशौन है, जो एक गधे के जबड़े की हड्डी से हज़ारों पलिश्तियों को मार गिराता है । एक साधारण गधे का जबड़ा है और हज़ारों पलिश्ती हैं । परन्तु उसके पीछे परमेश्वर की ताकत कार्यरत है । परमेश्वर के लिए वह गधे का जबड़ा प्रमुख है । उससे परमेश्वर की शक्ति प्रगट होती है । राहाब वेश्या जो तिरस्कृत है, जो वेश्यावृत्ति करती है, जो व्यभिचारिणी है, जो समाज में निकम्मी है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में वह प्रमुख है । जब वह परमेश्वर की योजना में आती है, परमेश्वर के लोगों की सहायता करती है तो प्रभु यीशु मसीह की वंशावली का एक भाग बन जाती है। राहाब वेश्या के लिए भी प्रभु यीशु मसीह की वंशावली में स्थान है ।

डॉ. बिली ग्राहम ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि जब मैं अपने हृदय की गहराइयों को देखता हूं, तो मुझे नर्क की गहराइयां अपने दिल में दिखाई देती हैं ।

1 कुरिन्थियों 1:26-29 में लिखा है - ``हे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, कि न शरीर के अनुसार बहुत ज्ञानवान, और न बहुत सामर्थी, और न बहुत कुलीन बुलाए गए परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञानवानों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करे । और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो हैं भी नहीं उन को भी चुन लिया, कि उन्हें जो हैं, व्यर्थ ठहराए । ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के सामने घमण्ड न करने पाए''।

1 कुरिन्थियों 1:21 में लिखा है - ``क्योंकि जब परमेश्वर के ज्ञान के अनुसार संसार ने ज्ञान से परमेश्वर को न जाना तो परमेश्वर को यह अच्छा लगा, कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करने वालों को उद्धार दे'' ।

अक्सर हम समझते हैं कि संसार की दृष्टि में जो हैं, हम वही हैं। परन्तु वास्तव में वह हम हैं नहीं । हम वह हैं जो परमेश्वर की दृष्टि में हैं । परमेश्वर छोटों को तुच्छ नहीं जानता । परमेश्वर गधे को तुच्छ नहीं जानता। परमेश्वर गौशाले को, और चरनी को तुच्छ नहीं जानता। परमेश्वर भ्रष्टाचारी, व्यभिचारी और महसूल लेने वालों को तुच्छ नहीं जानता । इसलिए जब राहाब वेश्या का स्थान प्रभु यीशु मसीह की वंशावली में है तो मेरे और आपके लिए भी आशा है । क्योंकि परमेश्वर ने जगत के तुच्छों को, और नीचों को, वरन् जो हैं भी नहीं उनको चुन लिया ।

मैं दमोह की कलीसिया में पला-बढ़ा हूं । दमोह में यह कलीसिया आई कहां से ? उसका अस्तित्व कैसे प्रारम्भ हुआ ? अगर इतिहास को देखा जाए तो हम पाएंगे कि आज से करीब 90 वर्ष पहले दमोह और उसके आसपास के क्षेत्रों में एक भयंकर अकाल पड़ा था । सात वर्षों तक कोई पानी नहीं बरसा । लोग मर रहे थे । एक सप्ताह में पूरे क्षेत्र में 40 हज़ार लोगों की मौत हो चुकी थी । तब वहां पर एक मिशनरी आए। उन्होंने एक अनाथालय प्रारम्भ किया । कोई अपने बच्चे को टोकरी में रखकर बीस मील दूर से दौड़कर लाया । किसी ने अपने बच्चे को लाकर उन मिशनरीज़ के पास छोड़ दिया । पता नहीं कि कौन बच्चा किस मज़हब का है ? क्या जाति है उसकी? बस एक जात है और वह यह कि वह परमेश्वर की सन्तान है । वह बच्चा और कोई नहीं मेरे दादाजी थे । उनकी उम्र शायद उस समय दो वर्ष की थी, जब उन्हें उस अनाथालय में छोड़ दिया गया और उनके माता-पिता काल के ग्रास बन गए । ऐसे-ऐसे स्थानों से उठकर दमोह की कलीसिया बढ़ी है और शायद इसी सन्दर्भ में परमेश्वर का यह वचन पूरा होता है कि ``हे भाइयो, अपने बुलाए जाने को तो सोचो, और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो हैं भी नहीं उन को भी चुन लिया''। परमेश्वर छोटों को तुच्छ नहीं जानता इसलिए मेरे और आपके लिए भी आशा है ।

3. प्रभु यीशु का प्रेम कभी नहीं बदलता :- परमेश्वर का प्रेम कभी बदलता नहीं। लूका 19:41 में लिखा है - ``जब वह निकट आया तो नगर को देखकरउस पर रोया''।

बड़ी अजीब सी बात है कि वह नगर को देखकर रोया । जो घटनाक्रम हुआ, उसमें प्रभु यीशु मसीह को मारा गया, उसकी देह को तोड़ा गया । उस पर भाला भोंका गया । उसका अपमान किया गया । उसको दर्द और पीड़ा से गुज़रना पड़ा । वहां पर कहीं प्रभु यीशु मसीह के रोने का वर्णन नहीं है । बल्कि वह रोया यरूशलेम नगर को देखकर । उस यरूशलेम के लिए जिससे यीशु मसीह को प्रेम है । आज जो यरूशलेम है, वह उसकी कलीसिया है । वह उसके लोग हैं। वह मैं और आप हैं, जिनके लिए प्रभु यीशु मसीह का प्रेम आज भी बना हुआ है । वह आज भी हमारे लिए आंसू बहाता है । भीड़ तो बदल जाएगी, लोग बदल जाएंगे, संसार बदल जाएगा, मित्र बदल जाएंगे, जिनका सहारा है वे भी बदल जाएंगे, समय बदल जाएगा, परिस्थितियां बदल जाएंगी । जिनके ऊ पर आपको आशा है, उनसे निराशा होगी। जो आज दुश्मन हैं वे मित्र बन जाएंगे और हो सकता है कि जो मित्र हैं वे दुश्मन बन जाएं । यह बदलने वाला संसार है । परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि प्रभु यीशु मसीह का प्रेम कभी बदलता नहीं । वह सर्वदा एक सा है। हम गीत में भी यही गाते हैं - `यस्टरडे टुडे फॉर ऐवर जीसस इज़ द सेम।'

वह जानता था कि भीड़ जो आज होशन्ना और जय-जयकार के नारे लगा रही है, यही भीड़ कल कहेगी - ``हमारे लिए बरअब्बा को छोड़ दो और इसे क्रूस पर चढ़ाओ ।'' यह भीड़ जो है, यह बदल जाने वाली भीड़ है । यह प्रेम जो है वह कुछ समय का है । ओस की बूंदों सा है, जो कुछ समय में समाप्त हो जाएगा । परन्तु परमेश्वर का जो वचन है, जो उसकी प्रतिज्ञाएं हैं, जो उसका प्रेम है वह अटल है । न बदलने वाला है । आकाश और पृथ्वी भले ही टल जाएं परन्तु परमेश्वर का वचन कभी टल नहीं सकता । आज भी वह हमको बुलाता है ।

मत्ती 23:27-38 में लिखा है - ``हे यरूशलेम, हे यरूशलेम, तू जो भविष्यवक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठा कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा । देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिये उजाड़ छोड़ा जाता है'' ।

लूका 19:43-44 में लिखा है - ``तेरे बैरी मोर्चा बान्धकर तुझे घेर लेंगे, और चारों ओर से तुझे दबाएंगे । और तुझे और तेरे बालकों को मिट्टी में मिलाएंगे, और तुझ में पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ेंगे, क्योंकि तू ने वह अवसर जब तुझ पर कृपा दृष्टि की गई, न पहचाना'' ।

एक अवसर आता है जब परमेश्वर हम पर कृपा दृष्टि करता है परन्तु उसके बाद वह अवसर चला जाता है । वह समय निकल जाता है । इसलिए यरूशलेम तू नाश हो जाएगा । तुझ पर पत्थर पर पत्थर भी बाकी नहीं रहेगा । तू और तेरे बच्चे मिट्टी में मिला दिए जाएंगे । वह आंसू बहा रहा है । उसकी आंखों में आंसू हैं । यरूशलेम जो उसका नगर है, जो उसके पिता का नगर है, जो उसके लोगों का नगर है । वह शान्ति का स्थान, जो परमेश्वर की राजधानी रहा, जो परमेश्वर की योजना का केन्द्र रहा, उसके लिए प्रभु यीशु मसीह कहता है - मैंने तो चाहा पर तुमने नहीं चाहा । इसलिए अब तुम्हारा घर उजाड़ छोड़ा जाता है ।

आज प्रभु यीशु मसीह जब हमें देखता है, जब हमारे जीवनों को देखता है, जब हमारे जीवनों की प्राथमिकताओं को देखता है, जब हमारे हृदय को देखता है, जब हमारे हृदय पर उसकी नज़र जाती है, तो उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है ?

परमेश्वर हमको त्रासदियों से निकालता है । महामारियों से बचाता है । वह हमें बढ़ाता है । आशीषित करता है । हमारी रक्षा करता है । एक गौरव के स्थान पर लाकर खड़ा कर देता है । हम क्या करते हैं? प्रभु यीशु मसीह उस भीड़ की होशन्ना से खुश नहीं है । कपड़े तो बिछा दिए राह में तुमने, लेकिेन यह तो औपचारिकता है। तुमने त्योहार मना लिए, किसी परम्परा के समान । तुमने होठों से जय-जयकार तो कर दिया, लेकिन यह तो दिखावा है । तुमने खजूर की डालियां तो बिछा दीं, परन्तु यह तो संसार का तरीका है । मगर क्या प्रभु यीशु मसीह को तुमने अपना दिल दिया है? क्या तुम्हारे हृदय पर उसके लहू की मुहर लगी है ? क्या प्रभु यीशु मसीह को तुमने अपने जीवन के आत्मिक राजा के रूप में स्वीकारा है ?

हे यरूशलेम, मैंने तो चाहा पर तुमने नहीं चाहा । यहूदा, मैंने तो चाहा पर तुमने मुझे नहीं चाहा । यहूदा, तुम तो मेरे परम मित्र थे, तुम तो मेरी रोटी में से खाते थे। मैंने तो चाहा पर तुमने नहीं चाहा ।

लूका रचित सुसमाचार के 8 वें अध्याय में गिरासेनियों के लोगों का वर्णन है। जहां पर प्रभु यीशु मसीह उनको बचाने के लिए जाता है । वह वहां पर दुष्टात्माओं को निकालता है । व्यक्ति बच जाते हैं परन्तु लोग अपने शहर के बीच में से उसको निकाल देते हैं । गिरासेनियों के लोगो ! मैंने तो चाहा, पर तुमने नहीं चाहा।

पतरस ! मैंने तो तुझको बुलाया, अपने साथ में रखा, तुझे स्वर्ग की कुन्जियां देने का वादा किया । पर तूने मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया । पतरस ! मैंने तो चाहा, परन्तु तुमने नहीं चाहा । नासरत के लोगो ! जहां मैं तुम्हारे बीच में रहा, तुम्हारी छाया में मैं बढ़ा और पला। जहां मैंने तुम्हें अनन्त जीवन का सन्देश दिया । वहां तुमने मेरी हत्या कर देना चाही । तुमने पहाड़ से गिराकर मुझे मार डालना चाहा। नासरत के लोगो ! मेरे अपने लोगो ! मैंने तो चाहा, पर तुमने मुझे नहीं चाहा ।

आज परमेश्वर हमसे यही प्रश्न कर रहा है कि जब हम पर कृपा दृष्टि की गई, तो क्या उस अवसर को हम पहचान रहे हैं ? आज वह समय है जब परमेश्वर हम पर कृपा दृष्टि करता है । आज वह समय है, जब प्रभु यीशु मसीह हमको बुलाता है। आज वह समय है, जब हमको पश्चात्ताप करने का अवसर मिलता है ।

आज वह समय है, जब हम उसकी राह पर चल सकते हैं । परन्तु एक रात आने वाली है, जब ये सब बातें बन्द हो जाएंगी । तब हमसे परमेश्वर यही कहेगा कि मैंने तो चाहा, पर तुमने नहीं चाहा । वह अवसर जब तुम पर कृपा दृष्टि की गई, तुमने उसे नहीं पहचाना। इसलिए अब मैं तुम्हारे नगर को, तुम्हारे जीवन को, तुम्हारी आत्मा को, तुम्हारे अनन्त जीवन को उजाड़ छोड़कर चला जाता हूं ।

जीवन में परमेश्वर हमको अवसर देता है । उस समय, जब हम मृत्यु की छाया से गुज़रते हैं । जब हमारे जीवन में त्रासदियां आती हैं। परन्तु एक और अवसर परमेश्वर हमको तब देता है जब हम पर्वों को मनाते हैं । जब हम उसके वचन की व्याख्या प्रति रविवार सुनते हैं । यह अवसर है । यह परमेश्वर की दया दृष्टि है । यह उसकी कृपा दृष्टि है । वह बार-बार कहता है, आंसू बहाता है, बुलाता है । अपने पंखों के नीचे समेट लेना चाहता है जैसे मुर्गी अपने बच्चों को समेट लेती है । परन्तु प्रश्न यह है कि ऐसी त्रासदियां, ऐसी बीमारियां, ऐसे अवसर जब आते हैं तब क्या हमने उसको पहचानते हैं ?

निष्कर्ष :- जिन बातों पर हमने विचार किया है उनमें से - पहली बात यह है कि प्रभु यीशु मसीह सब बातों को जानता है। हमारे जीवन की कोई बात, हमारे मस्तिष्क का कोई विचार, हमारे

जीवन की कोई प्राथमिकता, हमारे जीवन का कोई अन्धियारा भाग, ऐसा नहीं जिसको वह नहीं जानता ।

दूसरी बात है कि वह हमको तुच्छ नहीं जानता। वह हमको बुलाता है । वह हमारा उपयोग करना चाहता है । वह आज भी हमको आवाज़ देता है । वह आज भी बांहें पसारे हुए खड़ा हुआ है । वह किसी को तुच्छ नहीं जानता।

इसके साथ ही तीसरी और सबसे प्रमुख बात यह है कि वह कभी न बदलने वाला प्रभु है।

जब हम इस संसार से जाएं तो काश ! परमेश्वर हमसे कह सके - ``धन्य हे अच्छे और सच्चे विश्वास योग्य दास, तू थोड़े में विश्वास योग्य रहा । आ, अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो जा ।'' या फिर इस संसार से जाना हमारे लिए वह भयंकर त्रासदी का दिन होगा जब वह हमसे कहेगा - क्योंकि तूने वह अवसर जब तुझ पर कृपा दृष्टि की गई, न पहचाना।

निर्णय हम पर है ।

परमेश्वर आपको आशीष दे ।