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राजा सुलैमान और जीवन का रहस्य

1 राजा 10:1-30; सभोपदेशक 5:10

परिचय :- अक्सर मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से होती है जो अपने जीवन में बहुत सफल रहे हैं, जो बहुत प्रसिद्ध हैं, जो बहुत प्रमुख हैं, जो बहुत प्रमुख पदों पर बैठे हुए हैं । मैं उनसे पूछता हूं कि ऐसी कौन सी तीन सबसे प्रमुख बातें हैं, जो आपने अपने जीवन में सीखी हैं ? जिन्हें आप अपने बच्चों को भी सिखाएंगे । उनसे बात करने में अक्सर उनके जीवन के वर्षों के अनुभव का निचोड़ जानने को मिल जाता है । कोई कहता है कि जीवन में पहला स्थान परमेश्वर को देना चाहिए । कोई कहता है कि यह बात प्रमुख है कि जो बात कहें उसे पूरा भी करें, जो वायदा किया, उसे निभाएं । कोई कहता है कि सम्बन्धों में सच्चे बने रहें। कोई कहता है कि संसार आपके साथ कैसा भी व्यवहार करे परन्तु आप सदा भलाई करते जाएं । एक बात जो बहुत से लोग कहते हैं, वह यह कि कभी हिम्मत मत हारो।

आज यही प्रश्न मैं बाइबिल के एक प्रमुख चरित्र के सन्दर्भ में करना चाहता हूं। एक ऐसा शऱूस जिसने अपने जीवन में बहुत अनुभव हासिल किया था । जिसने अपने जीवन में बहुत कुछ कमाया था । जिसने अपने जीवन में बहुत सी ग़लतियां की थीं । जिसने अपने जीवन में अपने पापों से पश्चात्ताप किया और जो अपने जीवन में राज सिंहासन तक पहुंच गया। वह व्यक्ति सुलैमान राजा है । आज इसी सुलैमान राजा से हम जानना चाहते हैं कि वे कौन सी बातें हैं जो वह आज हमसे कहना चाहता है । वे बातें जिन्हें हम अपने जीवनों में जोड़ सकें और जिनसे हम अपनी ज़िन्दगियों को बेहतर समझ सकें ।

सर्वप्रथम हम सुलैमान की विशेषताआें पर गौर करें :-

1. सुलैमान बहुत धनवान था । उसका आयात और निर्यात का व्यापार था । उसके पास बहुत से समुद्री जहाज़ थे । टीकाकारों का मानना है कि उसको प्रति वर्ष 140 करोड़ रुपये का लाभ प्राप्त होता था या लगभग 12 करोड़ रुपये प्रतिमाह की उसकी आमदनी थी । उसका सोने-चांदी और हाथी दांत का व्यापार था । 5हज़ार किलो सोना प्रति वर्ष उसके पास आता था । अपने जीवन में इतना धन कमाने के बाद, करोड़ों रुपये का लाभ प्राप्त करने के बाद, आयात-निर्यात का व्यापार करने के बाद सुलैमान जब अपने जीवन के अन्त में पीछे मुड़कर देखता है तो अपनी पुस्तक सभोपदेशक के अध्याय 5 और उसके 10 वें पद में कहता है - ``जो रुपये से प्रीति रखता है वह रुपये से तृप्त न होगा; और न जो बहुत धन से प्रीति रखता है, लाभ से : यह भी व्यर्थ है''।

हो सकता है कि नये वर्ष के लिए हमारा एजेन्डा हो कि हम सुखी रहें, हम आराम से रहें । हमारे पास सुख के साधन और सम्पन्नता हो। हो सकता है कि हम चाहते हों कि एक कार खरीद लें, हमारे घर में एक बड़ा रेफ्रिजरेटर हो परन्तु हमें सुलैमान से कुछ सीखना होगा । हम पाते हैं कि उसके पास भोग-विलास, सुख-सम्पन्नता के सारे साधन थे । वह राजमहल में रहता था । उसके बहुत खूबसूरत बाग थे, जिन्हें देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते थे । उसके पास बहुत अच्छे गायक और वादक थे, जो उसका दिल बहलाते थे । उसकी 700 पत्नियां और 300 अन्य स्त्रियां थीं। अपने जीवन के अन्त में पीछे मुड़कर सुलैमान इस भोग-विलास और सुख-सम्पन्नता को देखता है और तब सभोपदेशक 2:11 में कहता है - ``तब मैं ने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है; और संसार में कोई लाभ नहीं''। सुलैमान ने अपने जीवन में इन सारी बातों का अनुभव किया और उसका निष्कर्ष यह है कि यह भी व्यर्थ है । यह ऐसा है मानो वायु को पकड़ना ।

2. सुलैमान बहुत बुद्धिमान था । हम में से कुछ लोगों की इच्छा होगी कि हम बहुत बुद्धि को प्राप्त कर सकें, ज्ञान प्राप्त कर सकें । कोई डिग्री हमको हासिल हो जाए । हम अध्ययन में आगे बढ़ सकें । यदि सुलैमान को देखें तो उसके समान बुद्धिमान अब तक कोई नहीं हुआ । उसने जो कुछ भी लिखा है वह न सिर्फ्र बाइबिल में है परन्तु आज बहुत सारी यूनिवर्सिटीज़ में, और सारे संसार में जो अंग्रेज़ी साहित्य हम पढ़ते हैं, उसमें सुरक्षित है । उसकी लिखी बातों का अध्ययन किया जाता है । उसकी बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वह बहुत बुद्धिमान था । उसकी बुद्धि की प्रशंसा सुनकर लोग अपने प्रश्नों का समाधान जानने के लिए उसके पास आते थे । उसकी बातें सुनने के लिए बड़े-बड़े विद्वान उससे मिलने आते थे । यही सुलैमान अपने जीवन के अन्त में पीछे मुड़कर देखता है और सभोपदेशक 1:16-17 में लिखता है ``मैं ने मन में कहा, देख, जितने यरूशलेम में मुझ से पहिले थे, उन सभों से मैं ने बहुत अधिक बुद्धि प्राप्त की है; और मुझ को बहुत बुद्धि और ज्ञान मिल गया है; और मैं ने अपना मन लगाया कि बुद्धि का भेद लूं और बावलेपन और मूर्खता को भी जान लूं । मुझे जान पड़ा कि यह भी वायु को पकड़ना है''।

3. सुलैमान ने बड़े-बड़े काम किए थे । हम में से बहुत से लोग सोचते होंगे कि हम अपने जीवन में कुछ बड़े-बड़े कार्य कर लें । कुछ मील के पत्थर स्थापित कर दें । अगर हम कुछ बड़े-बड़े भवन बना दें तो बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर लेंगे । अगर हम हॉस्पिटल की बिल्डिंग बना दें, स्कूल की बिल्डिंग बना दें, समाज सेवा के कुछ कार्य कर लें तो यह बहुत बड़ी बात होगी । सुलैमान राजा ने भी बहुत बड़े-बड़े काम किए थे । उसने बाग लगवाए थे, कुण्ड खुदवाए थे, भवन बनवाए थे, मन्दिर बनाए थे । 1राजा5:13-18 में वर्णन है कि उसके पास 70 हज़ार लोग थे जो बोझ ढोते थे । 80 हज़ार लोग थे जो वृक्ष काटते थे और भूमि को समतल करते थे। 3300 सुपरवाइज़र और 30 हज़ार मज़दूर थे । सुलैमान के स्टाफ में 1,90,300 लोग काम करते थे। हमारे देश की बड़ी-बड़ी फर्म्स और मिलों में भी शायद इतने लोग काम नहीं करते होंगे । इन सब के बाद अपने जीवन के अन्तिम पड़ाव पर खड़ा होकर सुलैमान पीछे मुड़कर अपने सारे कार्यों को देखता है और वह सभोपदेशक 2:11 में लिखता है - ``तब मैं ने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और संसार में कोई लाभ नहीं''।

तो फिर सुलैमान से प्रश्न यह है कि जीवन में सार्थक क्या है ? कौन सी बात है जो व्यर्थ नहीं है ? वे कौन सी तीन शिक्षाएं हैं जो सुलैमान के कथनों से मेरे और आपके लिए शिक्षा का कारण हो सकती हैं ?

1. पहली बात जो सुलैमान के कथनों से शिक्षा के रूप में हमें मिलती है वह यह कि जीवन में बहुत सी बातें हैं जिन्हें हम समझ नहीं पाते, उसे विश्वास से स्वीकारना है । वह यह कहता है कि जीवन में ऐसी परिस्थितियां और ऐसी बातें जिन्हें हम समझ नहीं पाते, जिन्हें हम बदल नहीं सकते, जिनके लिए हम कुछ कर नहीं सकते; उन्हें हमें विश्वास से स्वीकारना है । इतनी बुद्धिमत्ता के बाद भी सुलैमान कहता है कि बहुत सी चीज़ें हैं जो मैं समझ नहीं पाता । हमारे जीवन में भी ऐसा ही होता है । बहुत से अनुत्तरित प्रश्न होते हैं । अनसुलझी गुत्थियां होती हैं । सुलैमान अपनी पुस्तक के 8 वें अध्याय में तीन-चार ऐसी बातों के बारे में बताता है कि जिन्हें वह समझ नहीं पाता। सभोपदेशक 8:10 में वह कहता है - ``तब मैं ने दुष्टों को गाड़े जाते देखा; अर्थात उनकी तो क़ब्र बनी, परन्तु जिन्हों ने ठीक काम किया था वे पवित्र स्थान से निकल गए और उनका स्मरण भी नगर में न रहा; यह भी व्यर्थ ही है''। इस बात को मैं समझ नहीं पाता ।

8:14 में वह कहता है - ``ऐसे धर्मी हैं जिनकी वह दशा होती है जो दुष्टों की होनी चाहिए, और ऐसे दुष्ट हैं जिनकी वह दशा होती है जो धर्मियों की होनी चाहिए''। इस बात को मैं समझ नहीं पाता ।

7:15 में वह कहता है -``कोई धर्मी अपने धर्म का काम करते हुए नाश हो जाता है, और दुष्ट बुराई करते हुए दीर्घायु होता है''। इस बात को मैं समझ नहीं पाता ।

6:2 में वह कहता है - ``किसी मनुष्य को परमेश्वर धन-संपत्ति और प्रतिष्ठा यहां तक देता है कि जो कुछ उसका मन चाहता है उसे उसकी कुछ भी घटी नहीं होती, तौभी परमेश्वर उसको उस में से खाने नहीं देता, कोई दूसरा ही उसे खाता है''। यह बात मैं समझ नहीं पाता।

1:18 में वह कहता है - ``बहुत बुद्धि के साथ बहुत खेद भी होता है, और जो अपना ज्ञान बढ़ाता है वह अपना दुख भी बढ़ाता है''। यह गुत्थी भी मैं समझ नहीं पाता ।

2:17 में वह कहता है- ``बुद्धिमान भी मरता है, मूर्ख भी मरता है, दोनों की एक सी दशा होती है और दोनों का स्मरण नहीं रहता''। यह बात भी मैं समझ नहीं पाता।

बाइबिल में यदि हम देखें तो बहुत से अनुत्तरित प्रश्न हैं । हम कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें परन्तु बहुत से प्रश्नों के उत्तर बाइबिल में हमें नहीं मिलते ।

उदाहरण के लिये अभी-अभी हमने क्रिसमस मनाया । हमने पाया कि राजा हेरोदेस ने आज्ञा निकाली कि यरूशलेम के चारों तरफ जितने क्षेत्र हैं, वहां पर दो साल और उनसे छोटे जितने भी बालक हैं, उनको मरवा दिया जाए । इतिहासकार कहते हैं कि चीत्कार मच गया, हा-हाकार मच गया । सिपाही जाकर अपनी तलवारें निकालते थे, दरवाज़ा खटखटाते थे और मां-बाप के सामने जाकर उनके दो साल या उससे छोटी उम्र का जो भी बच्चा होता था, उसकी गर्दन कलम कर देते थे । आप कल्पना कीजिए कि जिन बच्चों के माता-पिताआें ने इन दिनों में अपने बच्चों का अर्पण करवाया है, क्या स्थिति होगी उनकी यदि उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े ।

प्रश्न उठता है कि क्यों हज़ारांे ऐसे अबोध बच्चे मर गए, जिनका कोई गुनाह नहीं था ? प्रश्न उठता है कि परमेश्वर ने एक रात पहले, यह राजाज्ञा निकालने से पहले हेरोदेस को क्यों नहीं मार डाला ? परमेश्वर के लिए तो यह चुटकियों का काम था । कठपुतली के समान हेरोदेस के जीवन की डोर खींच लेता । परन्तु एक अधर्मी, कुकर्मी व्यक्ति हेरोदेस जीवित रहा और हज़ारों बेगुनाह बच्चे मारे गए । परमेश्वर ! ऐसा क्यों होता है ?

यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला एक धार्मिक मनुष्य था जो परमेश्वर की योजना के अनुसार माता के गर्भ में आया । उसने प्रभु यीशु मसीह का मार्र्ग तैयार किया । वह अभावों में जीता रहा और लोगों के बीच में जाकर मन-फिराव का प्रचार करता रहा। तब एक अधिकारी, भ्रष्टाचारी यह आज्ञा निकालता है कि उसका सिर काट लिया जाए और थाल में सजाकर यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले का सिर उस भ्रष्टाचारी के सामने लाया जाता है ।

ऐसा क्यों होता है कि यह भ्रष्टाचारी राजा सिंहासन पर बैठा है, उसकी आज्ञा मानी जा रही है और यूहन्ना का सिर काट दिया जाता है ?

पुराना नियम में यदि हम अय्यूब को ही देखें और बड़े सामान्य हृदय व सामान्य ढंग से अय्यूब की पुस्तक को पढ़ें तो ऐसा लगता है कि अय्यूब के साथ कुछ ज़्यादती हो गई ।

अय्यूब 1:18-19 पढ़ें तो पाएंगे कि उसके जवान बेटे और बेटियों को मार डाला गया । उसके बाद बहुत से बेटे-बेटियां उसे मिल तो गए पर जो बेटे और बेटियां पहले से थे उनको तो मार डाला गया।

निर्गमन की पुस्तक में देखें तो पाते हैं कि मिस्र का राजा फिरौन राजाज्ञा निकालता है कि इस्राएलियों को जाने न दिया जाए । फिरौन के अड़ियल रवैये के कारण हज़ारों पहिलौठों को मार डाला जाता है । प्रश्न उठता है कि परमेश्वर ने ऐसे फिरौन को उठा क्यों नहीं लिया ?

सुसमाचार की पुस्तकों में हम पढ़ते हैं पीलातुस और फेलिक्स जैसे अन्यायी लोग न्यायाधीश होते हैं । प्रभु यीशु मसीह को कटघरे में खड़ा किया जाता है और बरअब्बा को छोड़ दिया जाता है । बरअब्बा को बेगुनाह कह दिया जाता है और निर्दोष प्रभु यीशु मसीह को मृत्यु का दण्ड दिया जाता है । शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठते हैं और प्रभु यीशु मसीह, परमेश्वर का पुत्र कहता है - मेरे पास सर छुपाने को जगह नहीं है । इस संसार में भी हमारे साथ ऐसा ही होता है । बहुत से अनुत्तरित प्रश्न होते हैं जिनका उत्तर हमारे पास नहीं होता ।

डॉ. जेम्स डॉबसन अपनी पुस्तक `व्हेन गॉड डज़न्ट मेक सेन्स' में एक जवान का वर्णन करते हैं, जिसका नाम चक फ्राय था जो यू.एस.ए. के ऐरीज़ोना में मेडिकल कॉलेज में अन्तिम वर्ष का छात्र था। कैरन नाम की लड़की से उसका विवाह हुआ था । वे दोनों बहुत समर्पित मसीही थे । उन्होंने निर्णय किया कि वे मिशनरी होकर साउथ अफ्रीका के जंगलों में जाएंगे, जहां अभी तक परमेश्वर का वचन नहीं पहुंचा और ऐसी जगह में जाकर मेडिकल मिनिस्ट्री शुरू करेंगे, लोगों को प्रभु यीशु मसीह का सन्देश सुनाएंगे । चक फ्राय अपनी वार्षिक अन्तिम परीक्षा दे रहा था और परीक्षा देते समय उसको चक्कर आ गया । उसकी तबीयत बहुत बिगड़ गई और उसे हॉस्पिटल ले जाया गया । पता चला कि चक फ्राय को ब्लड कैंसर हुआ था । चार माह में ही उसकी मृत्यु हो गई । डॉ. जेम्स डॉबसन कहते हैं -श्स्ल्छ द्भिश्व श्वद्भल्क् छद्भऱ् बीबल् क्ल्छक्ल्.

डॉ. डॉबसन अपनी पुस्तक में एक और व्यक्ति डॉ. पॉल कार्डसन का ज़िक्र करते हैं । डॉ. पॉल कार्डसन ने 1961 में अमेरिका में अपनी शासकीय नौकरी को छोड़ा और अपनी पत्नी व तीन बच्चों को लेकर कांगो के जंगलों में प्रचार करने और चिकित्सा करने चले गए । उनकी एक बच्ची 6 माह की, एक बच्चा 3 वर्ष का और एक लड़की 5 साल की थी । वह कांगो के जंगलों में प्रचार करते थे । गांव में झोपड़ी में रहते थे। जहां बिजली नहीं थी । वे टॉर्च से ऑपरेशन किया करते थे । उनकी क्लीनिक में हर दिन सैकड़ों लोगों की भीड़ लगी रहती थी। 2 साल बाद डॉ. पॉल कार्डसन अपने घर लौट रहे थे कि दो कबीलों के बीच झगड़ा होता देख वे बीच बचाव करने पहुंचे । इस झगड़े में उन्हें गोली लग गई और उनकी मृत्यु हो गई । ऐसा क्यों होता है परमेश्वर?

डॉ. हेडेन रॉबिन्सन क्रिश्चियनिटी टुडे पत्रिका में एक जवान का वर्णन करते हैं जिसका नाम डैनिएल था । उसकी उम्र 24 साल की थी और वह सेन्ट एन्टोनियो के मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा था । उसके ग्रेजुएशन का अवसर था । सब लोग आए हुए थे । माता-पिता, भाई-बहन और सास-ससुर भी आए हुए थे । पत्नी खड़ी हुई मुस्कुरा रही थी । चार माह का बेटा पत्नी की गोद में था । अगले दिन डॉ. डैनिएल को ग्रेजुएशन के बाद रोड आयलैंड अपनी इन्टर्नशिप प्रारम्भ करने के लिए जाना था। उसने अपनी पत्नी से कहा कि घर के सब लोग जमा हैं इसलिए यहीं रहो । मैं अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर दो दिन के बाद वापिस लौट आऊंगा । दूसरे दिन जब वह यात्रा कर रहे थे तो पहाड़ के ऊपर एक घुमावदार मोड़ पर एक ट्रक ड्राइवर ने अपना नियंत्रण खो दिया क्योंकि वह बहुत शराब पिये हुए था। शराब पिये हुए ट्रक ड्राइवर ने अपना ट्रक डैनिएल की कार से टकरा दिया और डैनिएल की मृत्यु घटना स्थल पर ही हो गई । उसका जीवन समाप्त हो गया । न केवल उसका जीवन बल्कि उसका अध्ययन भी समाप्त हो गया। उसका अनुभव भी समाप्त हो गया । उसके जो स्वप्न थे वे भी समाप्त हो गए । उसका उत्साह भी समाप्त हो गया। उसके माता-पिता की जो आशाएं थीं वे भी समाप्त हो गइंर् । चार माह के बेटे के लिए उसकी जो योजना थी, वह भी समाप्त हो गई ।

उसके बाद डॉ. हेडेन रॉबिन्सन लिखते हैं कि एक महिला है, जिसकी उम्र 96 वर्ष की है । वह नर्सिंग होम में भर्ती है । वह अपना सिर झुकाकर व्हील चेयर पर बैठी है । वह अपने बच्चों को पहचानती नहीं, वह किसी को जानती नहीं । ऐसा लगता है जैसे मौत उसका पता भूल गई हो ।

सभोपदेशक का लिखने वाला राजा सुलैमान कहता है कि बहुत सी ऐसी बातें हैं, बहुत से प्रश्न हैं, बहुत सी गुत्थियां हैं जो समझ में नहीं आतीं परन्तु इन्हें हमें स्वीकार करना है । क्योंकि यह परमेश्वर की योजना का अंग हैं । परमेश्वर, परमेश्वर है और मनुष्य, मनुष्य है। परमेश्वर की बुद्धि असीमित है और मनुष्य की अपनी सीमाएं हैं । इसलिए हमें इन बातों को इस विश्वास से स्वीकार करना है कि परमेश्वर की योजना में इन बातों की कोई प्रमुखता होगी ।

इसीलिए सभोपदेशक 8:17 में सुलैमान कहता है - ``तब मैं ने परमेश्वर का सारा काम देखा जो सूर्य के नीचे किया जाता है, उसकी थाह मनुष्य नहीं पा सकता । चाहे मनुष्य उसकी खोज में कितना भी परिश्रम करे, तौभी उसको न जान पाएगा; और यद्यपि बुद्धिमान कहे भी कि मैं उसे समझूंगा, तौभी वह उसे न पा सकेगा''।

सुलैमान इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि मनुष्य उन कामों का भेद नहीं जान सकता जो परमेश्वर के द्वारा किये जाते हैं चाहे वह उनकी खोज-बीन कितने ही परिश्रम से करे, वह भेद नहीं जान सकता ।

हिन्द महासागर की गहराई 2300 से 2500 मीटर की है । मैं अपने एक मित्र से जबलपुर बात कर रहा था और वह बताने लगे कि समुद्र के धरातल से 7000 मीटर गहराई पर भूकम्प आया । रेक्टर स्केल पर इसकी तीव्रता 9 मापी गई । जिससे सूनामी लहरें उठीं । जो विश्व की सबसे बड़ी तबाहियों में एक बन गइंर् । कहा जाता है कि सूनामी लहरों को जन्म देने वाले भूकम्प में 9500 परमाणु बमों की शक्ति से कहीं ज़्यादा ऊर्जा थी, इतना भयानक विस्फोट था वह । ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बी.बी.सी.) की खबरों के अनुसार सूनामी लहरों के हादसे में मारे गए लोगों की संख्या 5 लाख से अधिक थी ।

मेरे मित्र ने उसके बाद बताया कि उनके एक पड़ोसी मित्र थे जो आर्मी में काम करते हैं । वे क्रिसमस की छुटि्टयों में अपने परिवार के साथ चेन्नई गए हुए थे और जब वे समुद्र के किनारे अपने परिवार के साथ घूम रहे थे उसी समय सूनामी लहरें आ गइंर् । वे डूबने लगे तो उन्होंने अपने दोनों बच्चों को उठाकर भागने का प्रयास किया । लहरों का झोंका आया और दोनों बच्चे हाथ से छूटकर लहरों के साथ बह गए। किसी प्रकार पति और पत्नी अपनी जान बचाकर वापस भाग सके । उनके दोनों बच्चे चले गए और वे खाली हाथ क्रिसमस की छुटि्टयां बिताकर वापस लौट आए।

यह क्यों होता है ? हम नहीं जानते, परमेश्वर जानता है । परमेश्वर, परमेश्वर है । मनुष्य, मनुष्य है । त्रासदियों को हमें स्वीकार करना है और विश्वास में बने रहना है । परमेश्वर की योजना के लिए हमें धन्यवाद देना है। सुलैमान कहता है कि जिन बातों को हम समझ नहीं सकते उनको स्वीकार करना है क्योंकि परमेश्वर के कार्यों की थाह पा लेना, परमेश्वर की योजनाआें को समझ लेना मनुष्य के बस की बात नहीं है ।

2. दूसरी बात जो सुलैमान कहता है वह यह कि जीवन में जो अच्छा समय परमेश्वर हमें देता है, जो आनन्द का समय है, उसे हमें धन्यवाद के साथ स्वीकारना है ।

सभोपदेशक 3:12-13 में लिखा है -``मैं ने जान लिया है कि मनुष्यों के लिये आनन्द करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाय, और कुछ भी अच्छा नहीं; और यह भी परमेश्वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे''।

सभोपदेशक 5:18-19 में सुलैमान लिखता है - ``जो भली बात मैं ने देखी है, वरन जो उचित है, वह यह कि मनुष्य खाए और पीए और अपने परिश्रम से जो वह धरती पर करता है, अपनी सारी आयु भर जो परमेश्वर ने उसे दी है, सुखी रहे : क्योंकि उसका भाग यही है । वरन हर एक मनुष्य जिसे परमेश्वर ने धन-सम्पत्ति दी हो, और उन से आनन्द भोगने और उस में से अपना भाग लेने और परिश्रम करते हुए आनन्द करने की शक्ति भी दी हो यह परमेश्वर का वरदान है''।

यह परमेश्वर की आशीष है कि जो दिन बीत गया, जो पेट भर गया, जो आनन्द मना लिया, प्रियों के साथ जो वक्त बिता लिया, हंसी-खुशी के लम्हे जो बिता लिए; यह परमेश्वर का वरदान है । यह उसकी आशीष है, इसे स्वीकार करो और परमेश्वर को धन्यवाद दो । परमेश्वर के द्वारा दिया गया जो अच्छा समय है उसे आनन्द से स्वीकार करना है। पुराने नियम के अनुसार यदि इन बातों को आनन्द से स्वीकार न करें तो व्यवस्था में इसको पाप माना गया है । यदि परमेश्वर के हाथ से दिए गए आनन्द के समय और आशीषों के लिए हम चेहरे लटकाकर और दुखी मन से बैठे रहें तो व्यवस्था में इसे पाप गिना गया है ।

इसीलिए सभोपदेशक 9:7 में सुलैमान कहता है - ``अपने मार्ग पर चला जा, अपनी रोटी आनन्द से खाया कर, और मन में सुख मानकर अपना दाखमधु पिया कर; क्योंकि परमेश्वर तेरे कामों से प्रसन्न हो चुका है''।

सुलैमान कहता है कि अरे मनुष्य ! आनन्द करता हुआ बढ़ता जा । चैन से अपनी रोटी खाया कर और उसके बाद सुख से रह । सुख मना क्योंकि परमेश्वर तुझ पर प्रसन्न हुआ ।

सभोपदेशक 2:24 में वह कहता है -``मनुष्य के लिये खाने-पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं। मैं ने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है''।

जो बात सुलैमान कहता है वह यह कि परमेश्वर की तरफ तो देखो कि उसने कैसे उपकार किए हैं । उसने तुम्हें जीवन दिया है, आशीषें दी हैं, भोजन दिया है, परिवार दिया है, तुम्हंे आनन्द के क्षण दिए हैं । परमेश्वर की ओर तो देखो, उसने अपने बेटे को तुम्हंे दिया है । उसने तुम्हारे पापों को क्षमा किया है । तुम्हें अनन्त जीवन दिया है । तुम्हारी आत्मा का उद्धार किया है । तुम्हंे शान्ति दी है ।

अगर तुम परमेश्वर की ओर देखोगे तो खुश होगे, आनन्द मनाओगे। अगर मनुष्यों की ओर देखोगे, मनुष्यों से आशा रखोगे तो दुख मिलेगा । क्योंकि जब मनुष्यों की ओर हमारा सारा ध्यान केन्द्रित होगा तो फिर वहां जलन है, बुराई है, श्राप है, बैर भाव है, कुढ़न है, ग़लतफ्रहमियां हैं, निराशाएं हैं, असन्तुष्टि है । सुलैमान कहता है कि परमेश्वर की ओर तो देखो कि उसने तुम्हंे क्या-क्या दिया है । इस चिन्ता में मत रहो कि कल हम मर जाएंगे । जो दिन अच्छा है, उसे अच्छे से जियो, खुशी से जियो ।

इसी सन्दर्भ में वह दूसरी बात कहता है कि अतीत की बात छोड़ो । अतीत को जाने दो, वर्तमान को देखो । इसमें जियो, इसमें खुश रहो ।

सभोपदेशक 9:4 में वह कहता है - ``जीवता कुत्ता मरे हुए सिंह से बढ़कर है''।

कितनी बार हमारी नज़र मरे हुए सिंह की ओर जाती है । अरे! हमारा खानदान तो ऐसा था । हमारे दादा की मूंछें तो ऐसी थीं । हमारे नाना का रूआब तो ऐसा था। हमारे घर में तो बड़ी ज़मींदारी का हिसाब चलता था । अरे ! जीवित कुत्ते को देखो, मरे हुए सिंह को मत देखो । शेर तो था, उसकी दहाड़ तो थी । अब कुत्ता ही तुम्हारे पास है । इसी में सन्तुष्ट रहो । अतीत को जाने दो, वर्तमान को जियो ।

इसी से जुड़ी एक बात और वह कहता है कि जीवन में भलाई करते जाओ और उसी के लिए प्रयत्नशील रहो ।

सभोपदेशक 3:12 में वह कहता है कि ``मैं ने जान लिया है कि मनुष्यों के लिए आनन्द करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं''।

सभोपदेशक 9:10 में वह कहता है -``जो काम तुझे मिले उसे अपनी शक्ति भर करना, क्योंकि अधोलोक में जहां तू जानेवाला है, वहां न काम, न युक्ति, न ज्ञान और न बुद्धि है''।

मृत्यु के पार यह सब कुछ नहीं होगा । इसलिए जो काम तुम्हें इस जीवन में मिले उसे शक्ति भर करो और आनन्द से जियो ।

3. तीसरी बात जो सुलैमान अपनी पुस्तक के निष्कर्ष में कहता है वह यह कि अनन्त की ओर दृष्टि लगाए रहो ।

सभोपदेशक 7:1 में वह कहता है -``मृत्यु का दिन, जन्म के दिन से उत्तम है''। वह कहता है कि इस बात को मत भूलो ।

सभोपदेशक 11:9 में वह जवानों से कहता है कि ``अपनी जवानी के दिनों में मगन रह; अपनी मनमानी कर और अपनी आंखों की दृष्टि के अनुसार चल । परन्तु यह जान रख कि इन सब बातों के विषय परमेश्वर तेरा न्याय करेगा''। उसके न्याय को मत भूलो ।

इसके बाद सभोपदेशक 12:1 में वह कहता है - ``अपनी जवानी के दिनों में अपने सृजनहार को स्मरण रख''।

सभोपदेशक 12:13-14 में वह कहता है कि जब सब कुछ सुन लिया गया । सारे अनुभव से मैं गुज़र गया। सारे काम मैंने कर लिए। सारा धन, सम्पत्ति, सुख-सुविधा, भोग-विलास सब कुछ मैंने देख लिया । जब सब कुछ सुन लिया गया तो निष्कर्ष यह है कि ``परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाआें का पालन कर; क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है । क्योंकि परमेश्वर सब कामों और सब गुप्त बातों का, चाहे वे भली हों या बुरी, न्याय करेगा''।

वह कहता है कि क्या नया है इस पृथ्वी के नीचे ? सूर्य निकलता है, उदय होता है, अस्त होता है । वायु दक्षिण की ओर से चलती है और उत्तर की ओर घूम जाती है । नदियां बहती हैं और समुद्र में मिल जाती हैं। धन आता है और चला जाता है। प्रतिष्ठा आज है तो कल विलोपित हो जाती है । बुद्धिमत्ता प्राप्त होती है और एक दिन वह धूल और राख में मिल जाती है । सभोपदेशक कहता है कि इस सूर्य के, इस वायु के, इन नदियों के, इस धन के, इस प्रतिष्ठा के, इन इमारतों के, इस बुद्धि के परे देखो । उसको देखो जिसने इनको बनाया है । अपने सृजनहार को स्मरण करो । इस संसार के परे अनन्त को देखना सीखो । परमेश्वर के भय को देखो । परमेश्वर के न्याय को देखो । उसको मत भूलो, क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्त्तव्य यही है । उस सृजनहार को देखो । उसको देखो जो सब कुछ नया कर देता है ।

सुलैमान कहता है कि क्या नया है ? सूर्य, नहीं । चंद्रमा, पृथ्वी, नदियां, वेग से बहने वाली वायु, कुछ भी नया नहीं है । क्या नया है, कुछ भी नहीं !

प्रकाशित वाक्य 21:1-5 में यूहन्ना लिखता है ``फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा । फिर मैं ने पवित्र नगर नये यरूशलेम को स्वर्ग पर से परमेश्वर के पास से उतरते देखा और वह उस दुल्हिन के समान थी, जो अपने पति के लिये सिंगार किए हुए हो । फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊं चे शब्द से यह कहते हुए सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा । और वह उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी । और जो सिंहासन पर बैठा था, उस ने कहा, कि देख, मैं सब कुछ नया कर देता हूं''।

परमेश्वर जो सिंहासन पर बैठा है वह कहता है कि मैं तेरे आंसुआें को नया कर देता हूं । मृत्यु को नया कर देता हूं । तेरी देह को नया कर देता हूं । सूर्य को नया कर देता हूं । चंद्रमा को नया कर देता हूं । यरूशलेम को नया कर देता हूं । मैं अपना डेरा तुम्हारे बीच में करूंगा । तुम मेरे लोग होगे, मैं तुम्हारा परमेश्वर हूं ।

उसके बाद परमेश्वर कहता है -``मैं अल्फा और ओमिगा, आदि और अन्त हूं : मैं प्यासे को जीवन के जल के सोते में से संेत-मंेत पिलाऊं गा । जो जय पाए, वही इन वस्तुआें का वारिस होगा; और मैं उसका परमेश्वर होऊं गा, और वह मेरा पुत्र होगा। पर डरपोकों, और अविश्वासियों, और घिनौनों, और हत्यारों और व्यभिचारियों, और टोन्हों, और मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा, जो आग और गन्धक से जलती रहती है''(प्रकाशित वाक्य 21:6-8) ।

यह प्रभु यीशु मसीह है जो सब कुछ नया कर देता है । यह प्रभु यीशु मसीह है जो कहता है- जो कुछ मुझ में है वह नई सृष्टि है । देखो सारी बातें बीत गइंर्, वे पाप दफ्रन हो गए । वयस्क व्यक्ति का नया जन्म हो जाता है । वेश्या का जीवन भी नया हो जाता है । महसूल लेने वाला, दान देने वाला बन जाता है । कोढ़ी का शरीर शुद्ध हो जाता है । पानी दाखरस में बदल जाता है । तूफान शान्त हो जाते हैं। आंधियां बहार बन जाती हैं, यहां तक कि मृत्यु के बाद हम नया जीवन पा जाते हैं ।

यहेजकेल 36:26-27 में लिखा है -``मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूंगा । और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे''।

निष्कर्ष :- सुलैमान कहता है कि जो समझ से परे है, जो अनुत्तरित प्रश्न हैं, जो अनसुलझी गुत्थियां हैं; उनको विश्वास से स्वीकार करो । जो अच्छा समय है उसे आनन्द और सुख से मनाओ, भला करते जाओ। और अन्तिम बात वह कहता है कि अनन्त की ओर देखो । नदियों, समुद्रों, वायु, पर्वतों के पार देखो। प्रभु यीशु मसीह को देखो, जो कहता है - मैं सब कुछ नया कर देता हूं । इस प्रभु यीशु मसीह की युक्तियों को हम समझ नहीं सकते ।

प्रोफेसर अल्बर्ट आईन्स्टाइन की पत्नी से किसी ने पूछा कि क्या आप प्रोफेसर आईन्स्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को समझती हैं? क्या आप उनके द्वारा लिखे गए ग्रंथों को समझती हैं ? श्रीमती आईन्स्टाइन ने मुस्कुराते हुए कहा - ``मैं उनकी रिसर्च को तो नहीं समझती, मैं उनके फॉर्मूले को नहीं समझती, पर हां, मैं प्रोफेसर आईन्स्टाइन को समझती हूं''।

हम परमेश्वर की युक्तियों को नहीं समझते । हम परमेश्वर की योजनाआें को नहीं समझते । परन्तु हम परमेश्वर को समझते हैं । उसके प्रेम को समझते हैं । उसकी क्षमा को समझते हैं । उसके उद्धार को समझते हैं । श्ल् श्वद्भ छद्भऱ् ट्टछश्वल्ड्डक्ऱ्ीछश्व ऱ्स्ल् ऱ्स्ल्द्भड्डए द्भश्न द्भिश्व ाट्टऱ् ञ्ल् ट्टछश्वल्ड्डक्ऱ्ीछश्व द्भिश्व. वह परमेश्वर जिसका डेरा हमारे बीच में हुआ है । वह परमेश्वर जो प्रभु यीशु मसीह के रूप में मेरे और आपके पास आया है । क्या हम उसे स्वीकार करने को तैयार हैं ?

परमेश्वर आपको आशीष दे ।