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यूहन्ना : एक विशिष्ट चरित्र

मरकुस 1:8; यूहन्ना 3:30

परिचय :- यह लगभग ए.डी. १५५ की बात है । उन दिनों मसीहियों पर सताव बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था। सारे रोम में मसीहियों पर भयंकर सताव था । जब मसीहियों को सताया जाता था तो उसका बड़ा प्रदर्शन किया जाता था। स्टेडियम में हज़ारों और लाखों लोग जमा होते थे । उसके बाद उस बड़े जन समुदाय के बीच में मसीहियों, मसीही प्रचारकों और मसीही अगुवों को बहुत सी यातनाएं देकर उनके जीवन को समाप्त कर दिया जाता था । किसी को भूखे शेरों के सामने छोड़ दिया जाता था तो किसी को ज़िन्दा जला दिया जाता था । यह उन्हीं दिनों की बात है जब सताव रोम से बढ़ता हुआ स्मुरना के शहर में आया । उन दिनों में स्मुरना का बिशप पोलीकार्प था । पोलीकार्प को गिरफ्तार करके जन समुदाय के सामने लाया गया। एक बहुत बड़े स्टेडियम जैसा स्थान था, जिसमें लगभग १ लाख लोग जमा हुए थे । वहां पर बहुत तेज़ी से लोग चिल्ला रहे थे कि इस व्यक्ति को मार डाला जाए। मसीहियों के खिलाफ बहुत नारेबाज़ी हो रही थी। लोगों में बड़ा उन्माद था । लोग यह देखने के लिए एकत्रित थे कि कैसे इस मसीही अगुवे की सरेआम हत्या की जानी है । इस शोर के बीच उस भीड़ में से एक अधिकारी शीर्ष स्थान में उठकर खड़ा हुआ। अपने हाथ उठाकर भीड़ की आवाज़ को उसने शान्त किया। उसके बाद उसने पोलीकार्प की तरफ देखा । पोलीकार्र्प उस समय तक बहुत वृद्ध हो चुका था । इतिहासकारों के अनुसार उसकी उम्र लगभग १०० वर्ष की रही होगी। उस वृद्ध को बांध दिया गया था । उस अधिकारी ने उसकी ओर देखा । शायद वृद्ध पोलीकार्प को देखकर उस अधिकारी के दिल में कुछ विनम्रता उत्पन्न हुई। उसने कहा - पोलीकार्प, अब भी समय है, तू यीशु को नकार दे तो तुझे जीवित छोड़ दिया जाएगाऔर इस जलसे को यहीं समाप्त कर दिया जाएगा । तब कुछ पलों के लिए खामोशी छा गई। भीड़ की नज़र और ध्यान पोलीकार्प की तरफ था । और तब पोलीकार्प ने बड़ी बुलन्द आवाज़ में कुछ इस प्रकार से कहा - ``८६ वर्षों से मैंने यीशु की सेवा की है और उसने मेरा कोई अहित नहीं किया । यह सम्भव नहीं कि मैं अपने प्रभु और अपने राजा को नकार दूं । यह सम्भव नहीं कि मैं अपने प्रभु और अपने राजा का अपमान करूं।'' ये पोलीकार्प के अन्तिम शब्द थे और उसके तुरन्त बाद पोलीकार्प की हत्या कर दी गई ।

वह कौन सी बात थी उस व्यक्ति में, जो विश्वासयोग्यता के साथ अपना जीवन जीता रहा ? वह कौन सी बात थी उसके जीवन में, कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी उसने अपनी मृत्यु तकप्रभु यीशु मसीह की गवाही दी ? वह कौन सी बात थी जो उसकी आवाज़ की बुलन्दी को कायम करती रही ? इस सम्बन्ध में हम बहुत से आत्मिक कारण सोच सकते हैं और उनका विश्लेषण कर सकते हैं । परन्तु मानवीय दृष्टिकोण से यदि हम देखें तो जो बात थी वह यह कि पोलीकार्प का गुरू, प्रभु यीशु मसीह का चेला यूहन्ना था । यूहन्ना ने पोलीकार्प को पढ़ाया था, उसे सिखाया था और बहुत समय तक अपने साथ रखा था । इंग्लिश में इस सन्दर्भ में जो शब्द प्रयुक्त किया जाता है, वह है मेन्टर । यूहन्ना पोलीकार्प का मेन्टर था । पोलीकार्प ने यूहन्ना के जीवन को देखा था । उसने प्रभु यीशु मसीह की दिव्यता को यूहन्ना से समझा था। यूहन्ना के जीवन के विश्वास, उसके जीवन की गवाही और उसके जीवन की दृढ़ता को पोलीकार्प ने शायद किसी हद तक सीखकर अपने जीवन में अपना लिया था ।

आज हम इस बात की चर्चा करेंगे कि यूहन्ना में ऐसी कौन सी बात थी जिसने पोलीकार्प के जीवन को प्रभावित किया। यूहन्ना और प्रभु यीशु मसीह के सम्बन्धों को हम देखेंगे और तब विचार करेंगे कि हमारा सम्बन्ध प्रभु यीशु मसीह से कैसा है।

यूहन्ना प्रभु यीशु मसीह के बहुत निकट था । प्रभु यीशु मसीह के बारह शिष्य थे । इन बारह में से भी दो-तीन ऐसे थे जो उसके अन्तरंग मित्र कहे और समझे जाते थे । इनमें एक यूहन्ना भी था । रूपान्तरण के पर्वत पर जब प्रभु यीशु मसीह की दिव्यता का, उसके ईश्वरत्व का प्रकाशन होना था तो वह अपने साथ यूहन्ना को लेकर गया था । जब अन्तिम ब्यारी का समय था तो प्रभु यीशु मसीह के निकट यूहन्ना बैठा हुआ था । यूहन्ना क्रूस के पास अन्तिम समय तक विश्वासयोग्य शिष्य की नाइंर् खड़ा था । यूहन्ना में वह दिव्य दृष्टि थी कि वह अपनी लेखनी में सम्पूर्ण बाइबिल का, परमेश्वर की योजना का, प्रभु यीशु मसीह के संसार में आने का, उसकी मृत्यु का और उसके द्वारा दिए गए उद्धार का सार लिख सकता था । इसी कारण वह अपने सुसमाचार में लिख सका ``क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए'' (यूहन्ना ३:१६) । यूहन्ना ने प्रभु यीशु मसीह की दिव्यता को पहचाना था। यदि आप मत्ती, मरकुस और लूका का सुसमाचार पढ़ेंगे तो मत्ती और मरकुस के सुसमाचार में आप काफी समानता पाएंगे । परन्तु इन तीनों सुसमाचारों से अलग हटकर यूहन्ना ने जो कुछ लिखा, सबसे अधिक जिस बात का उसने प्रकाशन किया वह प्रभु यीशु मसीह की दिव्यता एवं उसके ईश्वरत्व के विषय में है। यूहन्ना ने इस बात को प्रकट किया कि प्रभु यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर था ।

यूहन्ना के जीवन और उसके विश्वास के सम्बन्ध में कुछ बातों को हम देखेंगे।

१. यूहन्ना ने यीशु को अपनी धन-सम्पदा, और अपनी सम्पन्नता से अधिक महत्व दिया :- इतिहास में यूहन्ना के विषय में देखें तो हम पाएंगे कि यूहन्ना के पिता का एक बहुत बड़ा व्यापार था। उसका सारा परिवार इस व्यापार में संलग्न था । इतिहासकार लिखते हैं कि उन दिनों में आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई मध्यम वर्ग नहीं हुआ करता था । या तो उच्च वर्ग था, या निर्धन वर्ग था । यूहन्ना एक उच्च वर्गीय परिवार में पला-बढ़ा था । इतिहासकार ही नहीं बल्कि आज जो अर्थशास्त्री हैं वे भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि फिलिस्तीन में यह बहुत असामान्य बात है कि किसी व्यक्ति के दो घर हों । हम पाते हैं कि यूहन्ना के दो घर थे । उसका एक घर गलील प्रान्त के उत्तरी भाग में था और दूसरा यरूशलेम में। इस बात के संकेत भी मिलते हैं कि यूहन्ना के परिवार के सम्बन्ध राजकीय लोगों से थे । उस समय के राजा, उसके वंश के लोगों तथा अधिकारी वर्ग के प्रमुख लोगों का सम्बन्ध यूहन्ना के परिवार से था । यह बात भी पाई जाती है कि यूहन्ना के घर और उसके व्यापार में बहुत से दास थे जो विभिन्न कार्य करते थे ।

इस धन-सम्पन्न व्यक्ति ने प्रभु यीशु मसीह को सुना । उसने प्रभु यीशु मसीह की बातों पर ध्यान दिया। उसने प्रभु यीशु मसीह के कार्यों को देखा और उसे लगा कि मैंने ऐसी बातें संसार में कभी नहीं सुनीं । ऐसे व्यक्ति को मैंने कभी नहीं देखा। ऐसे आश्चर्यकर्मों को मैंने पहले कभी नहीं देखा । तब उसने जाना कि धन, सम्पन्नता, पारिवारिक सम्बन्धों और मान-मर्यादा से बढ़कर यदि कोई प्रमुख बात है तो वह प्रभु यीशु मसीह है । मुझे सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लेना है । तब यूहन्ना प्रभु यीशु मसीह के पीछे हो लिया ।

२. यूहन्ना ने प्रभु यीशु मसीह को अपने स्वयं के महत्व एवं अपनी प्रशंसा से कहीं अधिक माना :- यूहन्ना ने न सिर्फ्र प्रभु यीशु मसीह को अपनी धन-सम्पन्नता, मान-मर्यादा से अधिक माना परन्तु उसने प्रभु यीशु मसीह को अपने महत्व और अपनी प्रशंसा से भी कहीं अधिक माना ।

यूहन्ना रचित सुसमाचार को यूहन्ना ने लिखा है परन्तु बड़ी अजीब सी बात लगती है कि उसने अपने सारे सुसमाचार में कहीं भी अपना नाम नहीं लिखा । यदि आप पहला अध्याय देखें तो उसमें दो-तीन जगह यूहन्ना का ज़िक्र है परन्तु वह यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला है जिसके सन्दर्भ में यूहन्ना ने उसका नाम लिखा है। यूहन्ना रचित सुसमाचार में जहां यूहन्ना को अपने बारे में भी लिखना था वहां पर उसने नाम लिखने के बजाय यह लिखा कि वह शिष्य जिससे यीशु प्रेम रखता था।

जब हम पुस्तक लिखते हैं तो लेखक परिचय दिया जाता है । हमारा नाम दिया जाता है । अक्सर हम कुछ कार्य करते हैं तो चाहते हैं कि उसमें हमारे नाम का अवश्य उल्लेख किया जाए । हमें अपनी प्रशंसा की प्यास होती है । हमें अपने महत्व की इच्छा होती है। परन्तु जब यूहन्ना ने सुसमाचार को लिखा तो उसने प्रभु यीशु मसीह की बातों को, उसकी दिव्यता को, उसके ईश्वरत्व को, उसके कार्यों को, उसके राज्य को इतना अधिक प्रमुख जाना कि उसने अपना नाम लिखना, अपना उल्लेख भी करना उचित नहीं समझा । उसके लिए यह बात प्रमुख नहीं थी कि उसने प्रभु यीशु मसीह के लिए क्या किया । उसके लिए इस बात को लिखना प्रमुख नहीं था कि उसने प्रभु यीशु के लिए किन-किन बातों का त्याग किया । कौन-कौन सी बातें ऐसी थीं जिन्हें उसने प्रभु यीशु मसीह के लिए छोड़ दिया । उसके लिए जो बात प्रमुख थी वह यह कि प्रभु यीशु मसीह की गवाही हो । उसका प्रचार हो । उसके नाम को लोग जानें। लोग यह जानें कि मार्ग, सत्य और जीवन प्रभु यीशु मसीह ही है । लोग यह जानें कि जिसने प्रभु यीशु मसीह को देखा, उसने परमेश्वर को देखा । यूहन्ना के लिए प्रमुख यह था कि लोग यह जानें कि जिसने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया, उसने उसके भेजने वाले को ग्रहण किया । लोग यह जानें कि वह स्वर्ग और पृथ्वी का अधिकारी है, वह सृष्टिकर्ता है, सब बातें इसके द्वारा उत्पन्न हुइंर् । इसीलिए जब वह सुसमाचार का प्रारम्भ करता है तो लिखता है कि आदि में वचन था और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था । सब बातें उसी के द्वारा सृजी गइंर् ।

यूहन्ना के लिए यह प्रमुख नहीं था कि मेरी क्या भूमिका है । यह प्रमुख नहीं था कि मैं क्या कर रहा हूं । परन्तु प्रमुख यह था कि प्रभु यीशु मसीह की गवाही हो। प्रमुख यह था कि लोग उसके महत्व को समझें। प्रमुख यह था कि लोग उसकी प्रशंसा करें। मेरे नाम, मेरे जीवन, मेरे लेखन और मेरे परिश्रम का कोई अर्थ नहीं । अक्सर यह बात जीवन में स्वीकार करना बहुत कठिन होता है विशेषकर उनके लिए जो मसीही अगुवे समझे और कहे जाते हैं । परन्तु हमें यूहन्ना के समान प्रभु यीशु मसीह को अपने स्वयं के महत्व और अपनी प्रशंसा से अधिक प्रमुखता देनी है ।

३. यूहन्ना ने प्रभु यीशु मसीह को अन्य मानवीय सम्बन्धों से बढ़कर माना :- यदि हम यूहन्ना के जीवन को देखें तो पाते हैं कि उसने यीशु को अन्य मानवीय सम्बन्धों से बढ़कर माना था । पतरस से यूहन्ना की गहरी मित्रता थी । कुछ टीकाकार कहते हैं कि जब प्रभु यीशु मसीह ने चेलों का आव्हान किया कि मेरे पीछे हो लो तो उस समय यूहन्ना और पतरस साथ-साथ थे । उनका एक-दूसरे से पुराना परिचय था । सम्भवत: पुरानी मित्रता भी रही हो । यूहन्ना २०:२-८ में हम उस समय का वर्णन पाते हैं जब मरियम ने पुनरुत्थान की सूचना शिष्यों को दी । उस समय भी पतरस और यूहन्ना एक साथ थे । प्रेरितों के काम ३:१-१० में सुलैमान के मन्दिर के पास जन्म के लंगड़े की चंगाई का वर्णन है । उस समय भी पतरस और यूहन्ना साथ-साथ थे । गलतियों २:९ में हम पाते हैं कि पतरस और यूहन्ना प्रारम्भिक कलीसिया के स्तम्भ थे । प्रेरितों के काम नामक पुस्तक के अनेक सन्दर्भों में हम यह पाते हैं कि पतरस और यूहन्ना ने साथ-साथ मिलकर परमेश्वर के वचन को फैलाया, उसकी सेवा की ।

परन्तु यूहन्ना के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब उसे यह निर्णय करना पड़ता है कि किस तरफ जाए । एक राह पर पतरस है, दूसरी राह पर प्रभु यीशु मसीह है । पतरस मुकर गया, पतरस ने सोचा कि प्रभु यीशु मसीह क्रूस की ओर बढ़ रहा है । मृत्यु की ओर बढ़ रहा है । इस रास्ते का अन्त हो जाने वाला है । यह रास्ता आगे जाकर समाप्त हो जाने वाला है । इसलिए पतरस ने दूसरा रास्ता अपना लिया। पतरस ने सोचा कि यीशु का रास्ता, क्रूस का रास्ता; मृत्यु का रास्ता है । यह समापन का रास्ता है । पतरस ने दूसरा रास्ता अपना लिया और यूहन्ना को जीवन के उस दोराहे पर खड़े होकर यह निर्णय करना था मैं किस तरफ जाऊं । एक तरफ मेरा मित्र है और दूसरी तरफ ऐसा लगता है कि अंधकार है । वह रास्ता जिस पर यीशु है । वह रास्ता जहां क्रूस है ।

तब यूहन्ना ने निर्णय किया कि भले ही यह रास्ता कठिन हो । भले ही इस रास्ते में अन्धकार हो । भले ही इस रास्ते में क्रूस हो । भले ही इस रास्ते में समापन हो । मैं इस रास्ते को चुनूंगा । मैं प्रभु को नहीं छोड़ूंगा । उसने अन्य मानवीय सम्बन्धों को छोड़कर प्रभु यीशु मसीह के साथ जाना उचित समझा । यूहन्ना ने अपने परिवार को पीछे छोड़ दिया था । अपने प्रिय लोगों को, अपने क्षेत्र को, अपने घर को, अपनी सुख-सम्पन्नता को, अपने ऐशो-आराम को, अपने बड़े व्यापार को, अपने गुलामों को, अपने सहकर्मियों को उसने छोड़ दिया था । अब मित्रता की परीक्षा थी । उस समय उसने प्रभु यीशु मसीह के रास्ते को अख्तियार किया ।

४. यूहन्ना ने स्वयं अपने जीवन से बढ़कर प्रभु यीशु मसीह को प्रमुखता दी :- सारे चेले तितर-बितर हो गए थे । वे प्रभु यीशु मसीह को छोड़कर भाग गए थे । वह क्रूस पर लटका हुआ, मृत्यु की निकटता में था और यूहन्ना वहां पर खड़ा था । इतिहासकार बताते हैं कि यूहन्ना ने ऐसे कठिन समय में अपने जीवन को जोखिम में डाला । पतरस तो भाग गया था क्योंकि उसे डर था कि कहीं उसको भी पकड़ न लिया जाए । सम्भावना यह थी कि यूहन्ना को भी पकड़ लिया जाता। उसे बन्दीगृह में डाला दिया जाता । टीकाकार कहते हैं कि इस बात की सम्भावना थी कि यूहन्ना को भी पकड़कर क्रूस पर ठोेंक दिया जाता। परन्तु यूहन्ना को अपने प्राणों की परवाह नहीं थी । वह क्रूस पर जाने के लिए भी, अपने जीवन की बाजी लगाने के लिए भी, तैयार था ।

कुछ ही दिन पहले यीशु ने यरूशलेम में जय-जयकार के साथ प्रवेश किया था । एक बड़ी भीड़ वहां जमा थी । लोगों ने तालियां बजाई थीं । उसका आदर किया था । उसकी महिमा में बड़े-बड़े नारे लगाए थे । अपने कपड़े उतारकर उसके रास्ते में बिछा दिए थे । वे उसके स्वागत के लिए खजूर की डालियां तोड़कर ले आए थे, और होशन्ना के नारे लगा रहे थे । लोग यीशु को राजा बनाना चाहते थे क्योंकि वे उसको एक सांसारिक राजा के रूप में देखते थे। उस समय यीशु मसीह के पीछे चलना बड़ा आसान था । परन्तु जब प्रभु यीशु मसीह उस कलवरी पर नंगा लटका हुआ है और मृत्यु के निकट है । अकेला है, अन्तिम सांसें गिन रहा है, उस स्थिति में यीशु का साथ देना एक फर्क बात है ।

हमारे जीवन में जब तक सब बहुत अच्छा है, सब तरफ प्रशंसा है, सब तरफ आदर है, सब तरफ काम आगे बढ़ रहा है, उस समय प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलना बड़ा आसान है । परन्तु उस स्थिति में जब प्रभु यीशु मसीह अकेला, असहाय और नग्न है, जब वह लोगों की दृष्टि में असफल है और अपनी मृत्यु के निकट है, तब उसके साथ कौन खड़ा होगा ? वह कौन होगा जो अपने जीवन की बाज़ी लगाकर तब यीशु के साथ खड़ा होगा ? ऐसे कठिन समय में यूहन्ना अपने जीवन की बाज़ी लगाकर भी प्रभु यीशु मसीह के साथ खड़ा हुआ है।

ये बातें तो प्रभु यीशु मसीह के साथ यूहन्ना के सम्बन्धों का आधार थीं । ये बातें तो इस सन्दर्भ की भूमिका मात्र थीं । हमने देखा कि यूहन्ना का प्रभु यीशु मसीह पर कितना विश्वास था । वह यीशु पर किस सीमा तक विश्वास करता था । परन्तु इन सम्बन्धों का एक दूसरा आयाम भी है जो इन बातों से कहीं ज़्यादा प्रमुख है ।

यह बात उतनी प्रमुख नहीं कि यूहन्ना ने यीशु पर विश्वास किया था परन्तु जो प्रमुख बात है वह यह कि यीशु ने यूहन्ना पर विश्वास किया । प्रभु यीशु मसीह ने यूहन्ना को अपनी निकटता में रखा । उसने यूहन्ना से बहुत प्रेम किया । यूहन्ना के पास यीशु की दिव्यता की सारी जानकारी थी और प्रभु यीशु मसीह ने यूहन्ना को यह ज़िम्मेदारी दी कि वह उसकी आत्मिकता की लेखनी को लिखे । सबसे बढ़कर प्रभु यीशु मसीह ने जो विश्वास यूहन्ना पर किया वह यह कि उसने अपनी माता को यूहन्ना के हाथ में सौंप दिया । मां का मूल्य बेटे के लिए बहुत बड़ा होता है और वह बेटा क्रूस पर अन्तिम सांसें गिनते हुए अपनी मां की ओर देखता है और कहता है - हे नारी देख तेरा पुत्र । उसके बाद वह यूहन्ना की ओर देखता है और कहता है - हे पुत्र, देख तेरी माता। (यूहन्ना १९:२६-२७) ।

यहूदी संस्कृति में बेटे की ज़िम्मेदारी बहुत प्रमुख होती थी । विशेषकर जब पिता की मृत्यु हो जाती थी तो बेटे की यह ज़िम्मेदारी होती थी कि वह मां की परवरिश करे, मां की चिन्ता करेऔर जीवन पर्यन्त मां का ध्यान रखे । शायद हमारी संस्कृति के ही समान । जो काम प्रभु यीशु मसीह नहीं कर पाया, जिस काम के लिए उसे किसी विश्वासयोग्य भाई की आवश्यकता थी, ऐसी परिस्थिति में प्रभु यीशु मसीह ने उस काम के लिए यूहन्ना पर विश्वास किया। लिखा है - उसी समय वह चेला उसकी माता को लेकर वहां से चला गया ।

इसके बाद की घटना बाइबिल में नहीं है परन्तु इतिहास में बहुत सी बातें लिखी हुई हैं । वे बातें जिन्हें मसीही मान्यता देते हैं । इन बातों के अनुसार प्रभु यीशु मसीह के स्वर्गारोहण के पश्चात सारे चेले तितर-बितर हो गए । थोमा प्रचार करता हुआ भारत तक आ गया । पतरस प्रचार करता हुआ रोम चला गया । अन्द्रियास एशिया चला गया । फिलिप्पुस एशिया माइनर के हियरापुलिस नामक क्षेत्र में जाकर काम करने लगा । मत्ती के विषय में लिखा है कि वह यहूदिया और इथोपिया में जाकर प्रचार करने लगा । याकूब का बेटा यहूदा सीरिया चला गया। शमौन के विषय में पाया जाता है कि उसने ब्रिटेन में प्रचार किया, यूरोप में प्रचार किया और उसके बाद प्रचार करता हुआ अफ्रीका तक चला गया । ये सारे चेले तितर-बितर हो गए । परन्तु इतिहासकार लिखते हैं कि यूहन्ना तब तक यरूशलेम में ही रहा जब तक कि मरियम की मृत्यु नहीं हो गई ।

कई बार हम अपने आप से प्रश्न करते हैं या हमसे कई बार प्रश्न किया जाता है कि क्या आप परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं ? जवाब होता है - हां, हम परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं । हमसे प्रश्न किया जाता है - क्या आप प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास रखते हैं ? हम कहते हैं - हां, हम प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास रखते हैं। परन्तु प्रमुख बात जो है वह यह कि हमारा विश्वास कैसा है ? हमारा विश्वास किस सीमा तक है, कितना दृढ़ है, कितना मज़बूत है ? विश्वास तो दुष्टात्माएं भी करती हैं । परन्तु हमारे और उनके विश्वास में क्या अन्तर है ?

क्या हमारे लिए अपने धन, दौलत, नाम, पद, सम्पन्नता से बढ़कर प्रभु यीशु मसीह प्रमुख है ? यदि आज हमें निर्णय करना पड़े तो इन सबको छोड़कर प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलने के लिए क्या हम तैयार हैं ? क्या हम अपनी प्रशंसा, अपने महत्व, अपने जीवन के तौर-तरीकों और आदतों से बढ़कर प्रभु यीशु मसीह की आज्ञा को प्राथमिकता देते हैं ? इस संसार में हमारे जो सम्बन्ध हैं, हमारी जो मित्र मंडली है, उनसे बढ़कर क्या हमारे लिए प्रभु यीशु मसीह से हमारा सम्बन्ध प्रमुख है ? जब जीवन में खतरा हो, जब जीवन में जोखिम उठाना पड़े, तो क्या ऐसे स्थान पर हम प्रभु यीशु मसीह के लिए खड़े होने कोतैयार हैं ? जब जीवन में निराशा है । अंधकार है । जब प्रार्थनाआें का उत्तर नहीं मिलता । जब जीवन में असफलता है, कैंसर जैसी बीमारी है । त्रासदियां हैं । तब क्या हमारा विश्वास प्रभु यीशु मसीह पर बना हुआ है ?

निष्कर्ष :- यह तो ठीक है कि हम प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, परन्तु क्या प्रभु यीशु मसीह हम पर विश्वास करता है? आज जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवनों को देखता है । हमारे क्रिया-कलापों को देखता है । हमारी प्राथमिकताआें को देखता है। हमारे दिलों और मनों को देखता है । तो क्या प्रभु यीशु मसीह यह कह सकता है कि हां, मैं तुझ पर विश्वास रखता हूं । मेरी योजना को पूरा कर । मेरे कार्यों को परिणाम दे ।

जो बात मैं आपके और मेरे चिन्तन के लिए छोड़ना चाहता हूं वह यह कि क्या परमेश्वर हम पर विश्वास कर सकता है ? इस बात को हम अच्छी तरह जानते हैं। इसका निर्णय हमें ही करना है । अगर हम सोचते हैं कि परमेश्वर हम पर विश्वास नहीं कर सकता तो मौका है कि हम अपने जीवन को इस प्रकार से बनाएं कि परमेश्वर हम पर विश्वास कर सके । प्रभु यीशु मसीह हम पर विश्वास कर सके । जैसा प्रभु यीशु मसीह ने यूहन्ना पर विश्वास किया था और कहा था - हे पुत्र, देख तेरी माता; वैसे ही प्रभु यीशु मसीह हम से भी कह सके - देख पुत्र, यह संसार, ये तेरी ज़िम्मेदारियां हैं ।

परमेश्वर आपको आशीष दे ।