प्रकाशितवाक्य 2:10-11 परिचय :- जिस दिन प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर चढ़ाया गया, वह बड़ा विचित्र सा दिन था । उस दिन में बहुत से विरोधाभास थे । जो निष्पाप था उसको मृत्युदण्ड दिया गया और जो अपराधी मृत्युदण्ड के योग्य था उस डाकू को छोड़ दिया गया । जो निष्पाप था वह पाप के लिए बलिदान बन गया ताकि हम जो पापी हैं वे क्षमा किए जा सकें । प्रभु यीशु मसीह के साथ-साथ चलने वाले उसके प्रिय शिष्य पतरस ने उसका इन्कार कर दिया । वह डाकू जिसने इससे पहले शायद कभी प्रभु यीशु मसीह को नहीं देखा था उसने उसको स्वीकार कर लिया । जो जीवन देने आया था, जो जीवन का सन्देश देने आया था; उसको मृत्यु मिली। प्रभु यीशु मसीह के वे हाथ जिनसे उसने दुखित मानवता को स्पर्श किया था, गिरे हुआें को उठाया था, थके हुआें को सहारा दिया था; उन्हें काठ के क्रूस पर ठोंक दिया गया । जिन हाथों से उसने सेवा की थी, चंगाई दी थी, कोढ़ियों को छुआ था, उन हाथों को काठ के क्रूस पर ठोंक दिया गया । प्रभु यीशु मसीह के पैर, जिनसे उसने संसार को नई दिशा दी थी, जो गांव-गांव और शहरों और कस्बों में परमेश्वर के उद्धार का समाचार सुनाने के लिए तत्परता से आगे बढ़ते जाते थे, जो परमेश्वर की योजना को पूरा करने के लिए निरन्तर आगे चलते जाते थे, उन्हें क्रूस पर ठोंक दिया गया । उसके पंजर में भाला घोंप दिया गया । जो मनुष्यों को आदर देने आया था, उसका निरादर किया गया। जो मनुष्यों को ऊं चा उठाने आया था, उसको नीचे गिरा दिया गया, उसको कोड़े मारे गए । इतिहासकारों के अनुसार उन दिनों में जो कोड़ेे होते थे, उनमें बहुत तीखी कीलों के समान कुछ धातु की वस्तुएं लगी होती थीं । जब एक बार कोड़ा मारा जाता था तो वे धातु की वस्तुएं मांस-पेशियों में घुस जाती थीं । जब उस कोड़े को खींचा जाता था तो लगभग ५ से १० ग्राम मांस-पेशियां उस कोड़े के साथ खिंच जाती थीं । प्रभु यीशु मसीह को ऐसे अनेक कोड़े मारे गए । उसके मुंह पर थूका गया । उसको निर्वस्त्र किया गया । उसको कांटों का ताज पहनाया गया । उसका अपमान किया गया । एक अधर्मी के समान उसको क्रूस पर लटका दिया गया । हम इन घटनाआें का वर्णन पढ़ते हैं तो उनके बारे में सोचकर हमें बड़ी पीड़ा होती है । परन्तु क्या कभी हमने सोचा है कि प्रभु यीशु मसीह के लिए सबसे जो महानतम पीड़ा थी, वह शारीरिक पीड़ा नहीं थी । टीकाकार कहते हैं कि उन दिनों में जिस प्रकार से अपराधियों को यातनाएं दी जाती थीं, सम्भवत: क्रूस की मृत्यु तो उन यातनाआें से कहीं सहज थी । परन्तु जो बात थी वह यह कि प्रभु यीशु मसीह अपनी निष्कलंक आत्मा में सारे संसार के लोगों का बोझ लेकर मर रहा था । जितने लोग उस समय तक संसार में हुए थे, जितने लोग उस समय संसार में थे और जितने लोग अन्तिम समय तक इस संसार में होंगे; उन सबके अपराधों, पापों और ग्लानि का बोझ प्रभु यीशु मसीह की निर्दोष और निष्कलंक आत्मा में था । मेरे मित्र हैं फ्रेंक हेरीसन । वह एक क्रिसमस का समय था जब वे अपनी बहन के परिवार से मिलने गए। रात्रि में सबने बैठकर एक साथ भोजन किया । उसके बाद जब वे भोजन करके जा रहे थे तो उनके भाई ने अपनी जीप को स्टार्ट करके बैक किया । पीछे फ्रेंक की बहन खड़ी थीं । उन्हें बहुत चोट लगी और वह बुरी तरह कुचल गइंर् और कुछ समय के बाद उनकी मृत्यु हो गई । ज़रा सोचिए, यदि किसी मित्र की हत्या आपके हाथ से अनायास हो जाए तो क्या स्थिति होगी आपकी ? किसी व्यक्ति की हत्या आपके हाथों से हो जाए तो कैसी अपराधी भावना का बोझ आपके हृदय में होगा। ज़रा सोचिए कि संसार के हर एक हत्यारे, संसार के हर एक पापी, संसार के हर एक बलात्कारी और संसार के हर एक डाकू का बोझ प्रभु यीशु मसीह अपनी मासूम आत्मा में सहन कर रहा था । वह बोझ उसको भीतर ही भीतर तोड़ रहा था । उसके लिए सारे संसार के पापों का बोझ ढोना बहुत कठिन था । इन परिस्थितियों में प्रभु यीशु मसीह क्रूस पर लटका हुआ था । परमेश्वर क्यों ऐसी पीड़ा की अनुमति देता है ? इतनी पीड़ा इस संसार में क्यों है ? प्रभु यीशु मसीह के जाने के बाद भी मसीहियों पर सताव और उन पर पीड़ा खत्म नहीं हुई है । इसका विस्तृत वर्णन करना सम्भव नहीं है परन्तु संक्षेप में एक टीकाकार की पुस्तक में से कुछ घटनाआें का वर्णन करूंगा । रोमी शासक नीरो के समय में मसीहियों पर अनेक अत्याचार किए गए । उस स्टेडियम में जहां हज़ारों लोग बैठे होते थे । इन मसीहियों को भूखे शेरों के सामने छोड़ दिया जाता था । वे अपने आपको बचाने के लिए इधर-उधर भागते थे और लोग उन्हें देखते थे । जब भूखे शेर मसीहियों को झपट कर खा डालते तो लोग तालियां बजाते और उन्माद और उल्लास से चिल्लाते थे । मसीही अगुवों को जानवरों की गीली खालों में सिलकर मरूस्थल में फेंक दिया जाता था । जब वे गीली खालें सूखती थीं तो उस चिलचिलाती हुई धूप में सूखकर वे मसीही अगुवों के कई टुकड़े कर देती थीं । ऐसी पीड़ादायक परिस्थिति में वे लोग मृत्यु को प्राप्त होते थे, जहां उनकी वेदना सुनने वाला कोई भी उपस्थित नहीं होता था । एक बार करीब ३० मसीही अगुवों को नीरो ने पकड़ा । उनके नाखून निकाल लिए गए । उनकी आंखें फोड़ दी गइंर् । करीब दर्जन भर ऐसे मसीही अगुवे थे जिनको नीरो ने बुरी तरह से पिटवाया । उनके ऊपर तब तक खौलता गर्म तेल डलवाया, जब तक कि वे मर नहीं गए । कभी आपने अनुभव किया है कि यदि आपको दो रात और दिन तक निरन्तर जागना पड़े तो आपकी क्या स्थिति होती है । हम सोचने और समझने की स्थिति में नहीं रह जाते । हमारा दिल कहीं और होता है, दिमाग कहीं और । हमारा मस्तिष्क ठीक से काम नहीं करता । नीरो जब मसीही अगुवों को पकड़ता था तो उन्हें सोने नहीं दिया जाता था । उन मसीहियों को जब झपकी आती थी तो उनको कोड़ों से मारा जाता था । उनके शरीर से मांस को काटा जाता था । उनके ऊ पर खौलता हुआ तेल डाला जाता था । जब तक वे मर नहीं जाते थे उन्हें सोने नहीं दिया जाता था । ऐसे ८ मसीही अगुवों, जिन्होंने प्रभु यीशु मसीह को नकारने से इन्कार कर दिया था, उनके छोटे-छोटे नातिनों और नातियों को उनके सामने लाया गया । उनके सामने इन छोटे-छोटे बच्चों के एक-एक अंग को काट दिया गया । उनसे कहा गया कि प्रभु यीशु मसीह को अस्वीकार करो । उसका तिरस्कार करो । उनके द्वारा ऐसा न किए जाने पर उनकी आंखों के सामने एक के बाद एक करके पैनी तलवारों से उन छोटे बच्चों के शरीरों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए । वे बच्चे अपने दादा-दादी या नाना-नानी के सामने लहू-लुहान होकर मर गए । बहुत सी और भी बातें हैं । बड़ी वीभत्सता के साथ मसीहियों को भयंकर मौत दी जाती थी । नीरो के यहां जब कोई उत्सव होते थे तो उसके बाग में जो बहुत ऊंचे-ऊंचे खम्भे लगे हुए थे, उन पर मसीही अगुवों को लटका दिया जाता था । उनको ज़िन्दा जला दिया जाता था । उनकी मांस-पेशियों और चर्बी के जलने से जो आग निकलती थी, जो रोशनी होती थी, उनसे नीरो बादशाह अपनी बादशाहत की, अपनी महफिलों की रौनक बढ़ाता था । उन्हें रोशन करता था । मसीहियों को बहुत सी यातनाएं दी गइंर् । लाखों-करोड़ों व्यक्तियों को मारा गया । आज जब हम देखते हैं तो सोचते हैं कि वे यातनाएं क्यों हैं ? उनका दौर क्यों बन्द नहीं होता । क्या आप जानते हैं कि पिछले ५ वर्षों में प्रति वर्ष औसतन १ लाख ६० हज़ार मसीहियों की हत्या की गई है । यह तो सताव है । परन्तु उसके साथ-साथ हम यह भी सोचते हैं कि लोगों के जीवनों में दुख क्यों आता है? क्या कारण है कि बच्चा अविकसित रूप में पैदा होता है ? क्या कारण है कि ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स जैसे मसीहियों को उनके छोटे-छोटे बच्चों के साथ जला दिया जाता है ? क्यों परमेश्वर ऐसे दुख, सताव और पीड़ा की अनुमति देता है ? डॉ. जेम्स डॉबसन अमेरिका के बहुत प्रमुख मनोवैज्ञानिक हैं । उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि उनके पास एक माता का पत्र आया । उस पत्र में लिखा था। ``प्रिय डॉक्टर डॉबसन, मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूं । मैं एक मसीही परिवार में पैदा हुई । मेरा लालन-पालन मसीही वातावरण में हुआ । निरन्तर मैंने सण्डे स्कूल की शिक्षा प्राप्त की । परमेश्वर के वचन को सुना और उसके अनुसार जीने का यत्न भी किया । मेरा विवाह एक बहुत ही समर्पित और आदर्श जीवन जीने वाले पासबान से हुआ।१७ वर्षों तक हमारे यहां कोई संतान नहीं हुई । तब १७ वर्षों के बाद एक बालक पैदा हुआ। जब वह पैदा हुआ तो वह दोनों आंखों से अन्धा था । उसका एक ही पैर था । एक ही हाथ था । उसके दूसरे अंग भी अविकसित थे । उसका मस्तिष्क भी अपूर्ण और अधूरा था । डॉक्टर्स ने कहा कि यह बच्चा जीवित तो रहेगा पर इसी प्रकार अपने अधूरे जीवन में घिसटता रहेगा । जब-जब मैं इस बच्चे को देखती हूं तो परमेश्वर की योजना को समझ नहीं पाती। मैं परमेश्वर की इच्छा को समझ नहीं पाती । जब-जब मैं इस बच्चे के रोने की पुकार सुनती हूं तो परमेश्वर के स्वभाव को समझ नहीं पाती । मैं समझ नहीं पाती कि हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ ? क्या आप इसका उत्तर दे सकते हैं?'' डॉ. जेम्स डॉबसन लिखते हैं कि इस पत्र का उत्तर देना मेरे लिए बहुत कठिन था । वर्ष १९७९ की बात है, जब मैं स्वयं बाइबिल सेमिनरी में पढ़ रहा था । मेरे एक बहुत अच्छे मित्र थे जिनका नाम डॉन पीटर्स था । वे मुझसे २ साल आगे थे । उनका बड़ा आदर्श जीवन था । सारे हॉस्टल में हम लोग उनको अपना आदर्श मानते थे। अपनी पढ़ाई पूरी करने के तुरन्त बाद वे दक्षिण अफ्रीका के एक ऐसे भाग में जाना चाहते थे, जहां अब तक परमेश्वर का वचन नहीं पहुंचा था । जंगल में, कबीलों में रहने वाले लोगों के बीच में वह प्रचार करने के लिए जाने को तैयार थे। २२ वर्ष के वह जवान युवक थे । जिस दिन उनका ग्रेजुऐशन होना था, उसी दिन उनको एक घातक दिल का दौरा पड़ा । १० मिनिट के अन्दर उनकी मृत्यु हो गई । हम नहीं जानते कि भाई डॉन पीटर्स जैसे समर्पित मसीही युवा के साथ ऐसा क्यों हुआ । अमेरिका में एक हवाई जहाज़ दुर्घटना ग्रस्त हो गया । मलबे में से २ माह की एक बालिका का शव निकला । एक २४ वर्षीय प्रचारक का शव निकला । २३ वर्ष के एक सेना के जवान का शव निकला । ऐसा हमारे जीवनों में क्यों होता है ? क्यों परमेश्वर हमको पीड़ा से गुज़ारता है ? ऐसी परिस्थितियां क्यों आती हैं ? क्रिश्चियन विटनेस पत्रिका के मसीही सताव पर निकाले गए एक विशेषांक (सितम्बर-अक्टूबर २००८) में छपा था कि पिछले २ वर्षों में ४६ ऐसी घटनाएं घटीं जब मसीहियों ने सताव का सामना किया । यदि आप देखें तो पाएंगे कि ग्राहम स्टेन्स और उनके बच्चों को जलाने के बाद दो मसीहियों की हत्या कर दी गई । एक चर्च भवन को जला दिया गया । उड़ीसा में दो प्रचारकों को मार दिया गया । एक नर्स पर सामूहिक बलात्कार किया गया । मुज़फ्फरपुर (बिहार) के प्रभात तारा स्कूल पर आक्रमण करके कई बच्चों को ज़ख्मी कर दिया गया । जिसमें से कुछ का कुछ पता नहीं चला । बहुत सी ऐसी घटनाएं हैं जिनका वर्णन हमें आज भी सुनने को मिलता है। प्रश्न यह उठता है कि परमेश्वर ऐसी बातों की स्वीकृति क्यों देता है ? परमेश्वर ऐसी बातों की अनुमति क्यों देता है ? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर की इच्छा के बिना संसार में कुछ नहीं होता । कुछ लोग कहते हैं कि जो कुछ होता है वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होता है । तब लोग प्रश्न करते हैं कि यदि परमेश्वर है तो युद्ध क्यों होते हैं ? यदि परमेश्वर है तो महामारियां क्यों आती हैं ? यदि परमेश्वर है तो अबोध बच्चों की मृत्यु क्यों होती है ? यदि परमेश्वर है तो अच्छे और धर्मी लोगों के जीवन में बुरा समय क्यों आता है ? यदि परमेश्वर है तो तूफान क्यों उठते हैं ? ज्वालामुखी क्यों फटते हैं और भूकम्प क्यों आते हैं ? आंधियों में लोग क्यों मरते हैं ? एड्स और कैंसर जैसे रोगों से लोगों की मृत्यु क्यों हो जाती है ? छोटे-छोटे अबोध बच्चों में एड्स के कीटाणु पाए गए हैं क्योंकि उनके माता-पिता में से किसी को एड्स था। यह कोई नई बात नहीं है । ऐसा क्यों होता है ? सभोपदेशक ७:१५ में लिखा है - ``अपने व्यर्थ जीवन में मैं ने यह सब कुछ देखा है; कोई धर्मी अपने धर्म का काम करते हुए नाश हो जाता है, और दुष्ट बुराई करते हुए दीर्घायु होता है'' । हबक्कूक १:२-३ में लिखा है - ``हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूंगा, और तू न सुनेगा ? मैं कब तक तेरे सम्मुख उपद्रव-उपद्रव चिल्लाता रहूंगा ? क्या तू उद्धार नहीं करेगा ? तू मुझे अनर्थ काम क्यों दिखाता है ? और क्या कारण है कि तू उत्पात को देखता ही रहता है ? मेरे साम्हने लूट-पाट और उपद्रव होते रहते हैं; और झगड़ा हुआ करता है और वादविवाद बढ़ता जाता है। इसलिये व्यवस्था ढीली हो गई और न्याय कभी नहीं प्रगट होता । दुष्ट लोग धर्मी को घेर लेते हैं; सो न्याय का खून हो रहा है'' । भजन संहिता २२:१ में लिखा है - ``हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया ? तू मेरी पुकार से और मेरी सहायता करने से क्यों दूर रहता है ? मेरा उद्धार कहां है ?'' अक्सर जब हम इस संसार को देखते हैं तो हमारे सामने भी यही बात आती है । हमें ऐसा लगता है कि जैसे हमारी प्रार्थनाएं सुनी नहीं जा रहीं । हमें ऐसा लगता है कि जैसे परमेश्वर ने हमारी ओर से अपना मुंह मोड़ लिया है । हम भी मानो कह उठते हैं - ``हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर तूने मुझे क्यों छोड़ दिया ।'' हमेंे ऐसा लगता है कि अधर्मी सफल होते हैं । जो धर्मी हैं उनका नाश हो रहा है । धर्मियों पर अधर्मी शासन करते हैं । अधर्मियों की जीत होती है । अधर्मी आशीषित होते हैं। हम सब के जीवन में ऐसा समय आता है, जब हम प्रश्न करते हैं - हे परमेश्वर, मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? हे परमेश्वर, इस व्यक्ति के साथ ऐसा क्यों हुआ ? हे परमेश्वर, इस धर्मीजन के ऊ पर यह विपत्ति क्यों आई । इन प्रश्नों के जवाब हमारे पास नहीं हैं। वचन में लिखा है कि अभी हमको दर्पण में धुंधला सा दिखाई देता है परन्तु जब सर्वसिद्ध आएगा तो यह धुंधलापन चला जाएगा । तब हम सब बातों को साफ-साफ देख सकेंगे । जीवन में आने वाली नकारात्मक परिस्थितियों के सन्दर्भ में वचन अनुसार कुछ बातें मैं आपके सामने रखना चाहता हूं । सब बातों का उत्तर मेरे पास भी नहीं है परन्तु कुछ बातें वचन के प्रकाश में हम देखेंगे जो हमारे इन प्रश्नों के उत्तर दे सकेंगी । १. दुख और सताव मसीहियों के लिए कोई नई बात नहीं है :- जब कलीसिया की स्थापना हुई तो हम प्रेरितों के काम नामक पुस्तक के चौथे अध्याय में पाते हैं कि पतरस और यूहन्ना को क़ैद कर लिया गया । उसके बाद प्रेरितों के काम के पांचवें अध्याय में पाते हैं कि सभी चेलों को क़ैद कर लिया गया । उनको मारा गया । उनको धमकाया गया । उसके बाद सातवें अध्याय में पाते हैं कि स्तिफनुस को पथरवाह कर दिया गया । उसको मार डाला गया । आठवें अध्याय में लिखा है कि सारी कलीसिया पर सताव आया । यह सताव इतना था कि मसीही भाग गए, सब तरफ तितर-बितर हो गए । प्रेरितों के काम के बारहवें अध्याय में वर्णन है कि याकूब को मार डाला गया। तेरहवें अध्याय में पौलुस प्रेरित की मिशनरी यात्राआें का वर्णन है और उस सताव का वर्णन भी है जो उसे सहना पड़ा । उसके बाद प्रेरितों के काम पुस्तक के अन्तिम अध्याय तक एक भी अध्याय ऐसा नहीं है, जहां पर मसीहियों के सताव का वर्णन नहीं है । पूरी पुस्तक में हम पाते हैं कि मसीहियों और मसीही अगुवों सभी को सताव सहना पड़ा । इस कारण सताव मसीहियों के लिए कोई नई बात नहीं है । यह कोई असामान्य बात नहीं है । इसीलिए १ पतरस ४:१२-१३ में लिखा है - ``हे प्रियो जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिये तुम में भड़की है, इस से यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है। पर जैसे-जैसे मसीह के दुखों में सहभागी होते हो, आनन्द करो, जिस से उसकी महिमा के प्रगट होते समय भी तुम आनन्दित और मगन हो'' । २ तीमुथियुस ३:१२ में लिखा है - ``पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे'' । यह सिर्फ्र उस सदी की बात ही नहीं है बल्कि जितने लोग मसीह के साथ भक्ति का जीवन बिताना चाहते हैं, वे सताए जाएंगे । यूहन्ना १५:२० में लिखा है - ``जो बात मैं ने तुम से कही थी, कि दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता, उसको याद रखो : यदि उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएंगे; यदि उन्हों ने मेरी बात मानी, तो तुम्हारी भी मानेंगे'' । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि दास अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता। उन्होंने मुझे सताया तो वे तुम्हें भी सताएंगे । किसी टीकाकार ने कहा है कि यदि आप ब्लड बैंक जाएं और कोई आपका ब्लड निकाले तो यह कोई असामान्य बात नहीं । यदि आप किसी डेन्टिस्ट के पास जाएं और आपको पीड़ा हो तो यह कोई असामान्य बात नहीं है । यदि आप किसी युद्ध में जाएं और आप पर गोली चलाई जाए तो यह कोई असामान्य बात नहीं । यदि आप खेलने के लिए जाएं और वहां आपकी हार या जीत हो जाए तो यह कोई असामान्य बात नहीं। इसी प्रकार इस संसार में जब मसीही व्यक्ति भक्तिमय जीवन बिताएंगे तो उनके जीवन में दुख, तकलीफ और परीक्षाएं आएंगी । यह कोई असामान्य बात नहीं है । एक दृष्टांत में दो भवनों का वर्णन है, एक भवन जो बालू पर बना था और दूसरा चट्टान पर । परन्तु परीक्षा दोनों की हुईर्, तूफान से दोनों गुज़रे । इसलिए जितने मसीह के साथ भक्तिमय जीवन बिताएंगे वे सताए जाएंगे । उन पर दुख आएगा । उनके विश्वास की परीक्षा होगी । २. हर एक सताव और पीड़ा परमेश्वर की ओर से नहीं होती :- हम सोचते हैं कि जो कुछ हो रहा है वह सब परमेश्वर की ओर से हो रहा है । परन्तु ऐसा नहीं होता । कई दुख हम इसलिए उठाते हैं क्योंकि अपने जीवन में ग़लत निर्णय करते हैं । जब हम एक ग़लत निर्णय करते हैं तो वह हमारे जीवन के अनेक पहलुआें को, अनेक निर्णयों को प्रभावित करता है, अनेक लोगों के जीवनों को स्पर्श करता है । एक पिता निर्णय करता है कि वह आत्महत्या कर लेगा और उसकी समस्या समाप्त हो जाएगी । ऐसा सोचकर वह आत्महत्या कर लेता है । उसका यह ग़लत निर्णय उसके परिवार को वर्षों तक ही नहीं बल्कि कई पीढ़ियों तक प्रभावित करता है । नीति वचन १९:३ में लिखा है - ``मूढ़ता के कारण मनुष्य का मार्ग टेढ़ा होता है'' । इसी प्रकार गलतियों ६:७-८ में लिखा है - ``क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा । क्योंकि जो अपने शरीर के लिए बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा'' । हमारे ग़लत निर्णयों का परिणाम हम भोगते हैं । हम पर दुख या पीड़ा आती है । यदि कोई व्यक्ति नशा करके गाड़ी चलाता है और उसका एक्सीडेन्ट हो जाता है तो उस बात के लिए वह ईश्वर को दोष नहीं दे सकता। यदि कोई व्यक्ति वेश्यागामी है, अनैतिक सम्बन्ध बनाता है और उसको एड्स हो जाता है तो वह इस बात के लिए परमेश्वर को दोषी नहीं ठहरा सकता । हो सकता है कि परमेश्वर उसके पाप को क्षमा कर दे परन्तु उसके ग़लत निर्णय का परिणाम तो उसको भोगना पड़ेगा। यदि कोई व्यक्ति शराबी हो जाता है, और इससे उसका लिवर खराब हो जाता है। तब हो सकता है कि परमेश्वर उसके पाप को क्षमा करे दे परन्तु उसके ग़लत निर्णय के परिणामों को, उसकी परिणिति को तो किसी हद तक भोगना पड़ेगा। कुछ दुख हमारे जीवन में इस कारण आते हैं क्योंकि हम ग़लत निर्णय करते हैं । ३. कुछ दुख और सताव हमारे जीवन में दूसरों के ग़लत निर्णय के कारण आते हैं :- यदि माता या पिता को एड्स है और बच्चे को एड्स हो गया तो इसमें बच्चे की कोई ग़लती नहीं । दूसरे के ग़लत निर्णय के कारण उस बच्चे के जीवन में यह पीड़ा आई। मत्ती रचित सुसमाचार २:१६ में हम पाते हैं कि हेरोदेस ने आज्ञा निकाली कि दो साल और उससे छोटे सब बच्चों को मार डाला जाए। उसके आदेश पर बच्चों को मार डाला गया । परिवार में यह सताव क्या इसीलिए आया कि माता-पिता ने पाप किया था या उस बच्चे के जीवन में कोई पाप था ? नहीं! बल्कि हेरोदेस के ग़लत निर्णय के कारण दो साल से छोटे बच्चों की हत्या कर दी गई । कोई सिरफिरा आदमी आपके घर पर आकर आप पर गोली चलाए और आपको मार डाले तो यह उस व्यक्ति के ग़लत निर्णय का परिणाम है जो आपको और आपके बाद आपके परिवार को भोगना पड़ता है। उत्पत्ति ४:८ में कैन और हाबिल का वर्णन है । कैन की भेंट परमेश्वर ने अस्वीकार कर दी और हाबिल की भेंट स्वीकार कर ली। तब कैन ने जलन और प्रतिशोध के कारण हाबिल को मार डाला। कैन ने ग़लत निर्णय लिया, जिसे हाबिल को भुगतना पड़ा । ४. कुछ दुख या सताव हमारे जीवन में इसलिए आते हैं क्योंकि जिस पृथ्वी में हम रह रहे हैं, वह शापित है :- इस संसार को परमेश्वर ने श्राप दिया है । यह ऐसा संसार है जो पूर्ण नहीं है, सिद्ध नहीं है । इसमें ऐसे तत्व हैं, ऐसी परिस्थितियां हैं, जिसका परिणाम हमको सहना पड़ता है । रोमियों ८:२२ में लिखा है - ``क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कहरती और पीड़ाआें में पड़ी तड़पती है'' । उत्पत्ति ३:१७-१८ में लिखा है - ``आदम से उस ने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है; तू उसकी उपज जीवन भर दुख के साथ खाया करेगा; और वह तेरे लिये कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा'' । पृथ्वी की इस शापित दशा के कारण हम दु:ख भोगते हैं । ५. मसीही जीवन में बहुत से सताव और दुख धार्मिकता के कारण भी आते हैं :- हम एक ऐसे देश में रहते हैं, एक ऐसे वातावरण और संस्कृति में रहते हैं जहां हमारे परिवार में कोई त्रासदी आती है तो लोग कहते हैं कि इनके पापों का घड़ा भर गया। इनके कर्मों का फल इन्हें मिल रहा है । इन्होंने ज़रूर किसी के साथ बुरा किया होगा, जिसका फल इन्हें मिल रहा है । यदि बुरे कामों का फल हमें इस संसार में मिलता तो फिर ग्राहम स्टेन्स और उनके बच्चों को मृत्यु क्यों मिली? प्रभु यीशु मसीह जो निर्दोष और निष्कलंक था, उसको क्रूस पर क्यों चढ़ा दिया गया? क्या इसमें उसका कोई दोष था, क्या यह उसके किसी बुरे कार्य का परिणाम था ? जी नहीं । अक्सर हमारा चिन्तन उन बातों से प्रभावित हो जाता है जो हमारी संस्कृति में पाई जाती हैं । प्रभु यीशु के जीवन में जो सताव आया, जो पीड़ा उसे उठानी पड़ी, जो क्रूस की मृत्यु उसे सहनी पड़ी, यह उसकी धार्मिकता के कारण हुआ । पौलुस प्रेरित जब तक अधर्मी था, जब तक वह शाऊल था उसके जीवन में कोई बड़ा दुख नहीं आया । परन्तु जैसे ही उसने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया, उसके जीवन में एक के बाद एक पीड़ाएं आयीं और सताव आया । २ कुरिन्थियों ११:२३-२८ में पौलुस उन परिस्थितयों का वर्णन करता है जिनसे होकर वह गुज़रा । उसको पीटा गया । उस पर पत्थरवाह किया गया । एक बार तो उसको इतना मारा गया कि लोगों ने सोचा कि वह मर गया है। उसे मरा समझकर शहर के फाटक के बाहर फेंक दिया। परन्तु वह फिर से उठ गया और प्रचार करने लगा। पौलुस के जीवन में जो सताव और दुख आया वह उसके पापों के कारण नहीं आया परन्तु उसकी धार्मिकता के कारण आया। अय्यूब के जीवन में जो सताव आया, जो दुख आया वह इसलिए, क्योंकि अय्यूब का जीवन परमेश्वर और शैतान के युद्ध की रणभूमि बन गया था । अय्यूब इस बात को नहीं जानता था । अय्यूब के जीवन में जो सताव, पीड़ा और दुख आया, वह उसकी धार्मिकता के कारण आया । इसी कारण से जब हम मसीह के साथ जीवन बिताते हैं, उसको ग्रहणयोग्य धार्मिकता में चलते हैं तो कई बार हमें भी दुख और सताव का सामना करना पड़ता है । ६. मसीही जीवन में सताव और पीड़ा इस कारण भी आती है कि हमारे मसीही जीवन की गवाही मुखर हो :- बाइबिल का सार प्रकाशित वाक्य की पुस्तक में पाया जाता है । अर्थात् यह कि अन्तिम विजय हमारी है । उसमें बहुत सी बातें लिखी हैं जो हमें समझ में नहीं आतीं । परन्तु प्रकाशित वाक्य की पुस्तक का मूलभूत सन्देश यह है कि अन्तिम विजय मसीह की है । मसीह के लोगों की है। अन्तिम विजय हमारी है । प्रकाशितवाक्य ७:१३-१५ में लिखा है - ``इस पर प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा; ये श्वेत वस्त्र पहिने हुए कौन हैं ? और कहां से आए हैं ? मैं ने उस से कहा; हे स्वामी, तू ही जानता है : उस ने मुझ से कहा; ये वे हैं, जो उस बड़े क्लेश में से निकलकर आए हैं; इन्हों ने अपने-अपने वस्त्र मेम्ने के लोहू में धोकर श्वेत किए हैं। इसी कारण वे परमेश्वर के सिंहासन के साम्हने हैं, और उसके मन्दिर में दिन-रात उस की सेवा करते हैं; और जो सिंहासन पर बैठा है, वह उन के ऊ पर अपना तम्बू तानेगा। वे फिर भूखे और प्यासे न होंगे : और न उन पर धूप, न कोई तपन पड़ेगी । क्योंकि मेम्ना जो सिंहासन के बीच में है, उनकी रखवाली करेगा; और उन्हें जीवन रूपी जल के सोतों के पास ले जाया करेगा, और परमेश्वर उनकी आंखों से सब आंसू पोछ डालेगा'' । प्रकाशितवाक्य २:१०-११ में लिखा है - ``जो दुख तुझ को झेलने होंगे, उन से मत डर : क्योंकि देखो, शैतान तुम में से कितनों को जेलखाने में डालने पर है ताकि तुम परखे जाओ; और तुम्हें दस दिन तक क्लेश उठाना होगा : प्राण देने तक विश्वासी रह; तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा । जिसके कान हों, वह सुन ले कि आत्मा कलीसियाआें से क्या कहता है : जो जय पाए उस को दूसरी मृत्यु से हानि न पहुंचेगी'' । कभी-कभी हमारे जीवन में सताव और पीड़ा इसलिए आती है कि हमारे मसीही जीवन की न सिर्फ्र परीक्षा हो परन्तु हमारे मसीही जीवन की गवाही भी मुखर हो। मसीही जीवन की गवाही सबसे मुखर, सबसे प्रभावशाली कब हो सकती है ? यह प्रभावशाली तब हो सकती है जब हम पर पीड़ा हो । जब हम तूफान में से गुज़र रहे हों । जब हम तपाए जाएं । मेरे पिता ने बहुत वर्षों तक प्रचार किया और गवाही दी । जो प्रचार उन्होंने किया उसकी वास्तविकता को हमारे परिवार ने तब देखा जब हमें मालूम हुआ कि उन्हें कै न्सर है । हमें मालूम हुआ कि तीन महीने के बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी । उस तीन महीने के जीवन को उन्होंने जिस प्रकार से जिया, जिस विश्वास योग्यता से अपनी पुस्तकों को पूरा किया, वह हृदय स्पर्शी है । बड़ी विश्वास योग्यता से उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में गवाही दी । जब तक वे खड़े हो सकते थे, उन्होंने वीडियो रिकार्डिंग करवाई और परमेश्वर के वचन का प्रचार किया। मेरे विचार से यही वह समय था जब उनके जीवन की मसीही गवाही सबसे मुखर रही, सबसे प्रखर रही । ग्राहम स्टेन्स की घटना में हम देखें तो हम पाते हैं कि जिस गवाही ने सारे देश और सारे संसार को हिला दिया वह उनकी पत्नी की गवाही थी। वह गवाही जो उन्होंने अपने जले हुए पति और दोनों बच्चों के फ्यूनरल के समय दी । जब हम सबसे अधिक पीड़ा में होते हैं । जब हम सबसे अधिक सताव की स्थिति में, दर्द की स्थिति में होते हैं तब सबसे प्रमुख गवाही होती है । प्रभु यीशु मसीह ने जो कुछ कहा, विशेषकर क्रूस पर अपनी मृत्यु से पूर्व जो बातें कहीं, वह सबसे प्रमुख थीं । क्रूस पर मरते हुए प्रभु यीशु मसीह की स्थिति को उस सूबेदार ने देखा और कहा- निश्चय यह परमेश्वर का पुत्र था । जिस बात को चेले तीन साल में समझ नहीं पाए, प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर चढ़ाए जाने के समय यह सोचकर भाग गए कि अब सब कुछ खत्म हो गया । उस बात को वह डाकू सिर्फ्र उन तीन घंटों के कम समय में समझ गया । उस सबसे कठिन समय में उसने प्रभु यीशु मसीह को देखा और उसे पहचान लिया । जिस बात को चेले तीन साल में नहीं जान पाए वह डाकू सिर्फ्र तीन घंटों में जान गया । वह समझ गया कि यीशु का राज्य तो उसकी मृत्यु के बाद आएगा। चेलों ने सोचा कि उसकी मृत्यु के साथ सब खत्म हो गया । परन्तु डाकू जान गया कि उसका राज्य तो इसकी मृत्यु के बाद आएगा । तब वह डाकू कहता है कि जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी सुधि लेना । बड़ी अजीब सी बात लगती है कि यह जो कमज़ोर सा व्यक्ति क्रूस पर मर रहा है वह क्या कर पाएगा । परन्तु वह डाकू क्रूस पर लटके हुए इस व्यक्ति यीशु को तीन घंटे में पहचान गया । क्योंकि क्रूस की उस पीड़ा में उसकी गवाही सबसे अधिक मुखर थी, सबसे अधिक प्रभावशाली थी । दानिय्येल की पुस्तक में शदरक, मेशक और अबेदनगो का उदाहरण देखें । उनको आग के भट्ठे में डालने से पहले राजा से उनकी बातचीत होती है । वे कहते हैं - हे राजा, हम जानते हैं कि हमारा परमेश्वर ऐसा सामर्थी और शक्तिशाली है कि वह हमको आग के धधकते हुए भट्ठे से बचा सकता है । परन्तु यदि वह ऐसा नहीं करता तो भी हम तेरी बनाई हुई प्रतिमा की उपासना नहीं करेंगे । वह हमको बचाने की शक्ति रखता है परन्तु यदि नहीं बचाता तो यदि हमको जलना भी पड़ेतो भी हम तेरे सामने नहीं झुकेंगे । यूहन्ना रचित सुसामचार के बीसवें अध्याय में मरियम मगदलीनी के लिए लिखा है कि जब भोर को अंधेरा ही था तब मरियम मगदलीनी क़ब्र पर आई । वह कब्र पर क्यों आई ? क्या उसको विश्वास था ? क्या उसको कोई आशा थी ? नहीं! क्योंकि क़ब्र से किसी को कोई आशा क्या हो सकती है ? प्रभु यीशु मसीह ने उसके शरीर में से सात दुष्टात्माआें को निकाला था। उसका जीवन एक वेश्या के जीवन के समान था, (जैसा कि कई टीकाकार कहते हैं) उसके चरित्र का पतन हो चुका था। परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने उसको शुद्ध किया । उसके पापों की क्षमा उसे दी थी । वह उस क़ब्र के पास उस अंधेरे में इसलिए आई थी क्योंकि उसके हृदय में परमेश्वर के प्रति, प्रभु यीशु मसीह के प्रति प्रेम था । जब आप अपने किसी प्रिय की क़ब्र के पास खड़े होते हैं तो उस क़ब्र के पास कोई विश्वास नहीं होता। हम इसलिए नहीं जाते कि हमें वहां वह व्यक्ति जीवित मिल जाएगा । हमें कोई आशा नहीं होती । परन्तु हम वहां पर इस कारण खड़े होते हैं क्योंकि हमें उस से प्रेम होता है । अगर मेरे और आपके दिल में परमेश्वर के प्रति पे्रम है तो प्रेम का यह एक छोटा सा बीज ही विश्वास को पैदा करेगा । यही आशा को पैदा करेगा । हमारे जीवन को बदल डालेगा । इसीलिए वचन में लिखा है कि ``विश्वास, आशा और प्रेम; यह तीनों स्थायी हैं पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है'' (१ कुरिन्थियों १३:१३) । प्रेम का बीज आशा को पैदा करता है । प्रेम का यह बीज विश्वास को, आस्था को, उत्साह को, निश्चितता को, करुणा को, भलाई को, दया को, समर्पण को जन्म देता है । इसलिए हम मसीही लोगों को तैयार रहना है । जब हमारे जीवन में विरोधाभास आते हैं तो हम क्रूस की ओर देखें । मैं एक पत्रिका पढ़ रहा था । उसमें एक पत्रकार ने किसी मसीही पासबान से प्रश्न किया था कि कैसा परमेश्वर है तुम्हारा, जो ग्राहम स्टेन्स और उसके बच्चों को जलते हुए देखता रहा । वे बच्चे कार का दरवाज़ा भड़भड़ाते रहे कि किसी प्रकार उनको निकाल दिया जाए । वे चिल्लाते रहे, पुकारते रहे । जल कर जो मृत्यु होती है वह बड़ी दर्दनाक होती है, जिसकी मैं और आप कल्पना भी नहीं कर सकते । ग्राहम स्टेन्स और उसके बच्चे उस दर्दनाक पीड़ा से गुज़रे होंगे । उस पत्रकार ने पूछा कि यह कैसा आपका जीवित परमेश्वर है ? कैसे वह इस दृश्य को बर्दाश्त करता रहा? कैसे वह इस दृश्य को खामोशी से देखता रहा? उस पासबान ने पत्रकार को जवाब दिया - जैसे वह परमेश्वर अपने निर्दोष पुत्र को, क्रूस पर यातनाआें को सहते हुए, मरते हुए देखता रहा; अपनी भीगी आंखों के साथ । वैसे ही उसने ग्राहम स्टेन्स और उनके बच्चों को देखा होगा । निष्कर्ष :- हमारे जीवन में जब विरोधाभास आएं तो हम उनको स्वीकारें। परमेश्वर की गवाही हमारे जीवनों में बनी रहे । शायद विश्वास कम हो जाए । आशा चली जाए। परन्तु प्रेम का बीज हमारेेे जीवनों में है तो यह फिर से हमारे विश्वास को पैदा करेगा। यह फिर से हमारे जीवनों में आशा देगा । यह हमारी आत्मा को जिलाए रखेगा । यह हमको तैयार करेगा कि संसार से विदा होकर उस धाम को जा सकें जो परमेश्वर ने मेरे और आपके लिए तैयार किया है । परमेश्वर आपको आशीष दे ।