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प्रेम की परिभाषा

1 कुरिन्थियों 13:1-13

परिचय :- ग्रीस देश के उत्तरी भाग में एक छोटा सा शहर आज भी मौजूद है जिसका नाम कुरिन्थ है । इसको शहर कहें या कस्बा इस सम्बन्ध में टीकाकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं । यह इतना बड़ा स्थान नहीं कि इसे शहर कहा जा सके और इतना छोटा भी नहीं कि इसे कस्बा या गांव कह सकें । यदि इतिहास को देखें तो पाते हैं कि प्रभु यीशु मसीह के जन्म से १४६ वर्ष पूर्व कुरिन्थ शहर को नाश कर किया जा चुका था। भवनों को ध्वस्त कर दिया गया था और सब कुछ मिट्टी में मिल गया था । परन्तु १०० वर्ष के बाद और प्रभु यीशु मसीह के जन्म के लगभग ४६ वर्ष पहले जूलियस सीज़र ने इसे फिर से बसाया । जूलियस सीज़र ने कुरिन्थ को बहुत खूबसूरती से बसाया । इस कारण से यह शहर उन दिनों में जो रोमी सम्राट था, उसकी राजधानी बन गया । कुरिन्थ अपने विनाश के बाद एक राजधानी बन गया जिसे बहुत खूबसूरती के साथ सजाया गया ।

कुरिन्थ न सिर्फ्र रोमी सम्राट की राजधानी बना परन्तु प्रभु यीशु मसीह के बाद उनके चेलों ने वहां प्रचार भी किया । पौलुस प्रेरित ने अपनी दूसरी मिशनरी यात्रा के दौरान वहां पर रहकर डेढ़ वर्षो तक प्रचार किया और कुरिन्थ की कलीसिया उस क्षेत्र के लिए प्रभु यीशु मसीह के वचन के प्रचार की राजधानी बन गई । पौलुस प्रेरित डेढ़ वर्ष तक कुरिन्थ में रहा और उसके जैसे महान प्रचारक ने किसी बड़े भवन में नहीं परन्तु प्रिसकिल्ला और अक्विल्ला के घर में डेढ़ वर्ष गुज़ारे । उसके जाने के बाद वहां पर सीलास और तीमुथियुस ने भी आकर प्रचार किया ।

कुरिन्थ की कलीसिया में बहुत सी समस्याएं थीं जो आज भारत की कलीसियाआें और विश्व की कलीसियाआें में भी दिखाई देती हंै।

जो पहली समस्या थी, वह गुटबाज़ी की समस्या थी । अनेक कलीसियाआें में हम पाते हैं कि यह समस्या कलीसिया के विस्तार में बाधक होती है । कुरिन्थ की कलीसिया में तीन समूह हो गए थे । कोई अपने आपको पौलुस का, कोई अपुल्लोस का, और कोई कैफा यानि पतरस का कहता था । जहां इस प्रकार की गुटबाज़ी होती है वहां राजनीति प्रवेश करती है और तब समस्याएं बढ़ती हैं । कलीसिया कमज़ोर होती चली जाती है । न सिर्फ्र कलीसिया वरन् प्रभु यीशु मसीह की गवाही कमज़ोर होती है ।

जो दूसरी समस्या थी वह यह थी सांसारिकता की समस्या । कलीसिया के सदस्यों पर आत्मिकता से ज़्यादा सांसारिकता हावी थी। कलीसिया के सदस्य अनैतिकता में लगे रहते थे । भ्रष्टाचार और पाप में डूबे रहते थे । वे सोचते थे कि इस प्रकार का पाप सहित जीवन भी कलीसिया में स्वीकार्य होगा । कुछ लोग व्यभिचारी थे । कुछ लोग लोभी थे । कुछ जलन, बुराई, बैर रखने वाले लोग थे, फूट डालने वाले लोग थे। कुछ लोग अहंकार से भरे हुए थे । वे कलीसिया पर अपना कब्ज़ा करना चाहते थे । वे सोचते थे कि कलीसिया हमारी है, जिस तरफ हम लगाम खीचंेगे, उस तरफ कलीसिया जाएगी । कुछ लोग मूर्तिपूजक थे । उन्होंने प्रभु यीशु मसीह को आधे मन से स्वीकार किया था । उनका समर्पण अधूरा था, पश्चात्ताप अधूरा था। वे कलीसिया के सदस्य होने के बावजूद भी मूर्तिपूजा में लगे रहते थे । वे आत्मिक आशीष तो पाना चाहते थे परन्तु सांसारिकता और भोग-विलास के जीवन से मुक्त होना नहीं चाहते थे । दो नावों पर पैर रखकर, दो नावों पर सवार होकर, आगे जाना चाहते थे।

तीसरी बुराई यह थी कि यह कलीसिया आत्म केन्द्रित थी । उसके सारे कार्यक्रम सिर्फ्र अपने तक ही सीमित थे । कलीसिया के बाहर दूसरों को बचाने के लिए कार्यक्रम नहीं थे । पौलुस प्रेरित ने डेढ़ वर्ष तक उस कलीसिया में बड़े परिश्रम से सेवकाई की । बहुत से लोगों को बचाया । उसने बहुत से कष्टों को सहा । उसने आंसू बहा-बहाकर कलीसिया की सेवा की । जब पौलुस ने इन बातों को सुना तो उसका दिल टूट गया। उसने कुरिन्थियों की कलीसिया को एक बड़ा कठिन और बहुत स्पष्ट पत्र लिखा । उनके बीच उत्पन्न हो चुकी बुराइयों का उसने ज़िक्र किया । इनसे वे कैसे अपने आपको बचा सकते हैं,उसका वर्णन किया ।

कुरिन्थियों के नाम लिखे गए उसके दोनों पत्रों में से पहले पत्र में १३ वां अध्याय आता है । इसे बाइबिल के टीकाकार प्रेम का गीत कहते हैं । ऐसा लगता है जैसे मरूस्थल की गरम तपन में एक ठण्डी हवा का झोंका आ गया हो । पौलुस प्रेेरित कहता है यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं और प्रेम न रखूं तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल और झन-झनाती हुई झांझ हूं । यहां पौलुस प्रेरित यह याद दिलाना चाहता है कि मसीही जीवन का आधार जो है, वह प्रेम है । बाइबिल का सबसे आधारभूत और सरल सत्य यह है कि परमेश्वर प्रेम है । बाइबिल और मसीहियत का सार यदि एक वाक्य में पूछा जाए तो वह यही है कि परमेश्वर प्रेम है । ``परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए''। (यूहन्ना ३:१६)

यदि प्रेम हमारे जीवनों से चला जाएगा तो हम और हमारा समाज इस संसार में अपनी पहचान खो देगा। प्रभु यीशु मसीह कहते हैं इसी से जाने जाओगे कि तुम मेरे चेले हो । लोग तुम्हारे प्रेम से तुम्हें पहचानेंगे । १ कुरिन्थियों १३:७ में कुछ अच्छाइयों का वर्णन किया गया है । पौलुस प्रेरित कुरिन्थ की कलीसिया की तारीफ करता है, क्योंकि वहां आत्मिक वरदान पाए गए थे । परमेश्वर ने उनको आत्मिक वरदान दिए थे । कलीसिया में ऐसे लोग थे जो बहुत योग्य थे । उन्हें परमेश्वर ने आशीषित किया था । १ कुरिन्थियों ११:२ में लिखा है कि वहां पर सही सिद्धान्तों की शिक्षा दी जाती थी । कुरिन्थ की कलीसिया बहुत सक्रिय कलीसिया थी । किसी टीकाकार ने लिखा है कि यह एक परम्परावादी या ऑर्थोडॉक्स प्रकार की कलीसिया थी ।

परन्तु पौलुस कहता है कि इन सब बातों के बीच में, तुम्हारे आत्मिक वरदानों के बीच में, तुम्हारी कलीसिया के व्यस्त कार्यक्रमों के बीच में, तुम्हारी कलीसिया के प्रभाव के बीच में, जो बात है, वह यह कि तुम में प्रेम नहीं । इसी प्रकार की बात प्रभु यीशु मसीह प्रकाशितवाक्य २:२-५ में इफिसुस की कलीसिया से कहता है ``मैं तेरे काम, और परिश्रम, और तेरा धीरज जानता हूं; और यह भी, कि बुरे लोगों को तो देख नहीं सकता'' । यह एक अनुशासित कलीसिया थी । उसके आगे प्रभु यीशु मसीह कहता है ``और जो अपने आप को प्रेरित कहते हैं, और हैं नहीं, उन्हें तू ने परखकर झूठा पाया'' । तू अपने शिक्षकों को,अपने अगुवों को परखने वाली कलीसिया है, ऐसे लोग जो तुम्हारे आत्मिक जीवन को विनाश की ओर ले जाते हैं, जो ग़लत सिद्धान्तों की शिक्षा देते हैं, उनको समझने की तुम में क्षमता है । ``और तू धीरज धरता है'' । यह क्लेश में धीरज धरने वाली कलीसिया है । ``और मेरे नाम के लिए दुख उठाते-उठाते थका नहीं ।'' तू निरन्तर दुख उठाता है । ``पर मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तू ने अपना पहिला सा प्रेम छोड़ दिया है । सो चेत कर, कि तू कहां से गिरा है, और मन फिरा और पहिले के समान काम कर; और यदि तू मन न फिराएगा तो मैं तेरे पास आकर तेरी दीवट को उस स्थान से हटा दूंगा''। (प्रकाशित वाक्य २:४-५)

प्रेम को परिभाषित करना बड़ा कठिन है । पौलुस प्रेरित प्रयास करता है कि प्रेम को परिभाषित करे । वह प्रेम का क्रियात्मक पहलू बताता है । प्रेम की वास्तविक एवं व्यवहारिक परिभाषा यहां पौलुस प्रेरित ने दी है । परन्तु प्रेम की सम्पूर्ण परिभाषा सम्भवत: मात्र इस सन्दर्भ में भी नहीं मिलती । पौलुस कहता है कि प्रेम जो है वह कार्य है; मात्र शब्द नहीं है । अर्थात् हम दूसरे के हित के लिए कुछ त्याग करते हैं। हम दूसरे के हित के लिए अपना अहित बर्दाश्त करते हैं । कोई हमें एक मील बेगार में ले जाए तो हम दो मील चले जाएं । कोई कुर्ता मांगे तो हम दोहर भी दे दें । परमेश्वर ने हम से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, उसको बलिदान कर दिया । इस संसार में भेज दिया कि वह मनुष्यों का दास बन जाए । उसे इस संसार में भेज दिया कि वह गांव-गांव, गली-गली और कूचा-कूचा भटकता फिरे । उसे इस संसार में भेज दिया ताकि मेरे और आपके खातिर क्रूस पर वह अपने आपको बलिदान कर दे ।

रोमियों ५:१० में लिखा है- ``क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे'' ।

इसी प्रेम की बात को पौलुस समझाते हुए लिखता है कि प्रेम त्याग से किया गया कार्य है । प्रेम भावनाआें पर आधारित नहीं है वरन् परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के सत्य पर आधारित है । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और उनके लिए प्रार्थना करो । जब हम बैरी ही थे, जब हम शत्रु ही थे तब परमेश्वर ने हमसे प्रेम किया । प्रेम मात्र भावनात्मक बात नहीं है । भले ही उसका परिणाम भावनात्मक हो सकता है । वास्तव मेंं प्रेम आत्म त्याग और बलिदान है । पौलुस प्रेरित प्रेम की प्रमुखता बताता है । वह पांच ऐसी बातें बताता है जो प्रेम से ज़्यादा प्रमुख हैं । दूसरे शब्दों में कहें तो यह कि प्रेम के बिना ये बातें कोई अर्थ नहीं रखतीं ।

१. यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं:- मनुष्य की अधिकतम वाक शक्ति क्या हो सकती है या उसकी वाणी का अधिकतम अधिकार क्या हो सकता है ? इस विषय में हम अनेक बातें सोच सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज का न्याय या आदेश बहुत बड़ी बात होती है क्योंकि जो वह कह दे उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता । अमेरिका के राष्ट्रपति के पास बहुत अधिक अधिकार होता है, वह चाहे तो अपने आदेश के अधिकार से सारे संसार को कुछ ही सेकेण्डस् में तबाह कर सकता है । मनुष्य की वाणी में अधिकार हो सकता है। हो सकता है कोई कहे कि मैं देश में जितनी भाषाएं हैं उनको जानता हूं । शायद कोई कहे कि मैं ५ भाषाएं जानता हूं तो हमें लगता है कि यह बहुत बड़ी बात है । भारत में १४ आधिकारिक भाषाएं हैं और बहुत सी बोलियां हैं, शायद २००० से भी अधिक; और यदि कोई कहे कि मैं सारी बोलियां बोल सकता हूं, लिख सकता हूं, पढ़ सकता हूं। तो यह हमारे लिए बड़े आश्चर्य की बात होगी ।

पौलुस कहता है कि यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं । स्वर्गदूत कौन सी बोलियां बोलते हैं ? बाइबिल में इस बात का कोई संकेत नहीं है कि स्वर्गदूतों की कोई विशिष्ट भाषा होती है । स्वर्गदूतों ने जब भी इस संसार में आकर बोलियां बोलीं तो उसी भाषा को बोला जिसे लोग समझ सकते थे । चरवाहों के पास आकर उन्होंने उनकी ही भाषा का प्रयोग किया जिसे वेे समझ सकते थे । स्वर्गदूतों ने वही कहा जो परमेश्वर ने उनसे कहा । वे परमेश्वर के वचन को प्रगट करने वाले थे । यदि यह सम्भव हो जाए कि हम परमेश्वर के वचन को बोलने वाले हो जाएं या परमेश्वर हम से बात करने लगे और हम इस संसार में उसके संदेश वाहक बन जाएं। परन्तु पौलुस कहता है कि यदि मैं स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं और प्रेम न रखूं तो मैं कुछ भी नहीं। मनुष्य की वाणी के सारे अधिकार, खूबसूरत भाषा, प्रभावशाली संदेश, प्रभावपूर्ण लेखनी और अकाट्य तर्क; यह सब कुछ व्यर्थ है यदि हमारे जीवन में प्रेम नहीं ।

२. मैं भविष्यद्वाणी कर सकूं और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं और मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूं । परन्तु प्रेम न रखूं तो मैं कुछ भी नहीं :- सब अपना भविष्य जानना चाहते हैं । कभी-कभी अखबार उठाकर उसमें छपे राशिफल को भी देख लेते हैं। कभी कोई हाथ देखने वाला मिल जाता है तो शायद हाथ भी दिखा देते हैं । सब में भविष्य जानने की चाह होती है । परमेश्वर के वचन में हम पाते हैं कि एक ऐसा समय था जब भविष्यवक्ता भविष्य की बातें बताया करते थे । ये भविष्यवक्ता वे लोग होते थे जिन्हें परमेश्वर सन्देश देता था । ये भविष्यवक्ता लोगों को बताते थे कि भविष्य में क्या होने वाला है । इनका वर्णन हम नया नियम में भी हम पाते हैं । प्रेरितों के काम ११:२७ में अगबुस नाम के भविष्यवक्ता की चर्चा है । उसने बताया था कि अकाल पड़ने वाला है । इससे पहले कि अकाल पड़े, कलीसिया के लोगों ने दान इकट्ठा करके उस स्थान में भेज दिया । उसको भविष्यवाणी का विशेष वरदान मिला था ।

पुराना नियम (गिनती की पुस्तक का २२ वां अध्याय) में बालाम नाम के भविष्यवक्ता का ज़िक्र है । वह परमेश्वर के भय में चलता था । वह परमेश्वर के वचन को जानता था । वह यह जानता था कि परमेश्वर की इच्छा क्या है । परन्तु उसके हृदय में लोगों के प्रति पे्रम नहीं था । इसलिए परमेश्वर ने मूसा को आज्ञा दी कि बालाम को ले जाकर उसका वध करे । गिनती की पुस्तक ३१:८ में इस घटना का वर्णन किया गया है । भविष्यवक्ता तो है, परमेश्वर से प्रेम तो है, उसकी इच्छा को तो जानता है, उसके वचन पर तो चलता है, परन्तु पे्रम नहीं है । लोगों के प्रति प्रेम नहीं है,आंखों में आंसू नहीं हैं, दिल में करुणा नहीं है ।

यिर्मयाह नबी बार-बार रोने वाला भविष्यवक्ता था । क्या वह अपनी खुद की समस्याआें के लिए रोया ? जी नहींं । यिर्मयाह के जीवन में जो शोक था, जो उसके आंसू बहते थे, वह उसके लोगों के लिए बहते थे । अपनी प्रजा की दुर्दशा का उसको बड़ा दु:ख था ।

यिर्मयाह ९:१ में लिखा है कि - ``भला होता कि, मेरा सिर जल ही जल, और मेरी आंखें आंसुआें का सोता होतीं, कि मैं रात-दिन अपने मारे हुए लोगों के लिए रोता रहता'' । उसके बाद १८ वें पद में लिखा है - ``वे फुर्ती करके हम लोगों के लिए शोक का गीत गाएं कि हमारी आंखों से आंसू बह चलें और हमारी पलकें जल बहाएं''।

प्रेरितों के काम २०:१९ में पौलुस कहता है - ``बड़ी दीनता से, और आंसू बहा-बहाकर, मैं प्रभु की सेवा करता ही रहा'' ।

प्रभु यीशु के लिए लिखा हुआ है कि जब उसने यरूशलेम को देखा तो उसके निवासियों के लिए उसे शोक हुआ । प्रभु यीशु के सामने कलवरी का मार्ग था । क्रूस था, कांटों का ताज था । उसके सामने धोखा था । परन्तु जब वह यरूशलेम को देखता है तो रोता है । वह कहता है कि कितनी ही बार मैंने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने पंखों के नीचे अपने बच्चों को बटोर लेती है, मैं तुझको छिपा लूं परन्तु तूने न चाहा ।

पौलुस कहता है कि यदि मैं भविष्यवाणी कर सकूं । क्या होगा यदि हम में से किसी को भविष्यवाणी करने का वरदान मिल जाए । सारे संसार के बड़े-बड़े लोग हमारे पास आएंगे । भीड़ लगी रहेगी और हमें फु र्सत नहीं रहेगी । यहां तक कि सोने के लिए समय नहीं होगा । हमारे परिवार के लिए हमारे पास समय नहीं होगा। पैसों की बौछार होगी । परन्तु पौलुस कहता है यदि मैं सब प्रकार की भविष्यवाणी कर सकूं और प्रेम न रखूं तो कुछ भी नहीं । कुछ ऐसा है जो भविष्यवाणी से भी बड़ा है । कुछ ऐसा है जो मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलने से भी बड़ा है । वह है प्रेम ।

३. सब प्रकार के ज्ञान को समझूं :- दुनिया में क्या हो रहा है यह जानना अब मुश्किल नहीं रह गया । तकनीकी का तेज़ी से विकास हुआ है । हर दिन नयी-नयी खोज हो रही है । जापान में कुछ वर्षों में ऐसी ट्रेन्स चलने लगेंगी जो पटरियों से ४ सेन्टीमीटर ऊंची चलती हैं और उनकी रफ्तार लगभग ५०० मील प्रति घण्टा होगी। कंप्यूटर पर इन्टरनेट ने अनेक सुविधाएं ला दी हैं । अपने अमेरिका प्रवास के दौरान वॉशिंगटन डी सी में बैठकर इंटरनेट पर मुझे यह पता चल जाता था कि दमोह में क्या हो रहा है, वहां कैसा मौसम है ।

हम इन्टरनेट पर उपलब्ध सारी जानकारियांे को जान लें । सिर्फ्र इतना ही नहीं बल्कि इस संसार में उपलब्ध समस्त बातों की जानकारी का ज्ञान हमें हो जाए । हमें इतना ज्ञान हो जाए कि हम परमेश्वर के समान सर्वज्ञानी हो जाएं, जैसे कि पौलुस कहता है कि मैं सब प्रकार के भेदों को और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं, सारा ज्ञान मुझको हो जाए। सारे रहस्यों का जवाब मैं दे सकूं । लेकिन मुझ में प्रेम न हो तो मैं कुछ भी नहीं । मेरा सारा ज्ञान व्यर्थ है । कुछ ऐसा है जो सारे ज्ञान से बढ़कर है। कुछ ऐसा है जो मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलने से बढ़कर है । कुछ ऐसी बात है जो भविष्यवाणी से भी बढ़कर है । वह है प्रेम ।

४. मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूं :- पौलुस इस बात को कहता है कि मुझे इतना विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूं। अर्थात् मैं आश्चर्यकर्म करने लगूं । मैं प्रार्थना करूं तो लोग चंगे हो जाएं । हाथ रख दूं तो मृतक जी जाएं । आंधी और पानी को डांट सकूं । प्रकृति मेरा शब्द सुन ले । इतना ज़्यादा मुझे विश्वास हो । मत्ती रचित सुसमाचार के ७ वें अध्याय में प्रभु यीशु मसीह अपने चेलों से कहता है कि यदि राई के दाने के बराबर भी तुम में से किसी के पास विश्वास हो और इन पहाड़ों से कहे हट जा तो यह पहाड़ हट जाएगा। वह समस्याआें के पहाड़ों की बात नहीं कर रहा । वह अवरोधों के पहाड़ों की बात नहीं कर रहा । बल्कि वह यह कह रहा है कि यदि हम में राई के दाने के बराबर भी विश्वास होगा तो यदि हम पर्वत से कह देंगे कि हट जा तो वह अपने स्थान से हट जाएगा। पौलुस इस बात को कहता है कि मुझमें इतना विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा सकूं परन्तु यदि मैं प्रेम न रखूं तो मैं कुछ भी नहीं ।

५. यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिला दूं:- जब हम दान देते हैं तो चाहते हैं कि उसका श्रेय हमें मिले । यदि किसी ने कोई वस्तु दान में दी तो उसका नाम लिख दिया जाता है कि फलां व्यक्ति के द्वारा दिया गया । जब हम कोई दान देते हैं तो लोगों की बीच में उसकी चर्चा करते हैं । कई बार हम चाहते हैं कि हमारी दानवीरता के किस्से अखबारों में छपें, हमें बड़ा सम्मान मिले । कई बार ज़्यादा दान देकर किसी प्रमुख कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनने की चाह रखते हैं । परन्तु पौलुस कहता है यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिला दूं । इतना विश्वासी हो जाऊं , इतना धार्मिक हो जाऊं कि अपना घर-बार बेच दूं, विरासत में भी जो मिला हो वह भी बेच दूं और उससे कंगालों की मदद करूं परन्तु यदि मैं प्रेम न रखूं तो मैं कुछ भी नहीं ।

६. यदि मैं अपनी देह जलाने को दे दूं :- बहुत से धर्मों में त्याग और दान की बात की गई है । यह कहा गया है कि तुम ऐसी स्थिति में आ जाओ जहां कोई आकांक्षा न रहे । तुम इच्छा रहित हो जाओ । ऐसी अनिच्छा की स्थिति से क्या फायदा यदि उससे दूसरे का लाभ न हो । यदि उससे दूसरे आशीषित न हों । पौलुस ने लिखा कि यदि मैं अपनी देह जलाने के लिए दे दूं ।

उन दिनों में जब गुलाम बनाए जाते थे तो उसके मालिक की अपनी एक मुहर होती थी। यह मुहर लोहे की होती थी । उसको सुर्ख लाल होने तक गर्म किया जाता था । जिस गुलाम को उसने खरीदा होता था, उसके ऊपर वह लाल गर्म मुहर दाग दी जाती थी । उस मुहर से लोग जानते थे कि फलां गुलाम का मालिक कौन है । कुछ टीकाकारों का मानना है कि पौलुस कह रहा है कि मैं गुलाम हो जाऊं , सब कुछ छोड़ दूं और गुलामी करने लगूं ।

परन्तु वास्तव में पौलुस जो बात कर रहा है वह शहीद होने की बात है । वह कह रहा है कि यदि मैं अपनी देह जलाने के लिए दे दूं, अर्थात् यदि मैं प्रभु यीशु मसीह के नाम से अपने आप को समाप्त करने के लिए तैयार हो जाऊं। जब लोग कहें कि तुम यदि प्रभु यीशु मसीह को मानते हो तो तुम्हारी हत्या कर दी जाएगी और मैं कहूं कि हां, मेरी हत्या कर दी जाए । यहां पौलुस का आशय है कि अगर हमारा ऐसा इरादा है और हमारी इच्छा यह है कि इससे हमारा बड़ा नाम होगा । लोग कहेंगे कि फलां व्यक्ति ने कितना बड़ा काम किया है । हमारा नाम इतिहास में लिखा जाएगा कि हम प्रभु यीशु मसीह की खातिर शहीद हो गए । पौलुस कहता है कि यह सब बेकार की बात है । इससे कोई लाभ नहीं होने वाला । क्योंकि इस कार्य के पीछे हमारा जो उद्देश्य है वह ग़लत है । वह कहता है कि यदि मैं अत्याचार को इस कारण सह सकूं कि यह मेरे आत्म सम्मान की बात हो । उससे मेरे नाम को महिमा मिलने वाली हो। तो फिर यह व्यर्थ है । इससे मुझे कुछ भी लाभ नहींं।

सब कुछ त्यागने, कंगालों को खिलाने और अपनी देह को जलाने के लिए देने से भी बढ़कर है प्रेम। किसी ने कहा है कि जब हम झगड़ते हैं तो हमारा व्यवहार जानवरों के समान होता है। जब हम बुराई करते या दोषारोपण करते हैं तो हमारा व्यवहार मनुष्यों के समान होता है परन्तु जब हम प्रेम करते हैं तो हमारा व्यवहार परमेश्वर के समान होता है ।

एक युवती एक पास्टर के पास आई । उसने कहा कि मैं बहुत दुविधा में हूं । मेरे प्रेमी ने मुझसे कहा है कि यदि मैं उससे शादी नहीं करूंगी तो वह खुद को समाप्त कर लेगा । आप मुझे बताएं कि मैं क्या करूं ? पास्टर ने जवाब दिया कि बेटा यह प्रेम नहीं बल्कि स्वार्थ है ।

अक्सर हम स्वार्थ और प्रेम में अन्तर नहीं कर पाते । हम समझ नहीं पाते कि जो काम हम कर रहे हैं, उसमें क्या हमारा कोई स्वार्थ छिपा हुआ है ? या वास्तव में हम इसलिए कार्य कर रहे हैं क्योंकि हमें लोगों से प्रेम है ।

एक मिशनरी जो यूगाण्डा से लौटे थे उनसे मेरी बातचीत हो रही थी । ईदी-अमीन के समय में लोगों पर बहुत अत्याचार हुए । कई लोगों की हत्या कर दी गई। ये मिशनरी उन बच्चों की सेवा करने के लिए गए थे जिनके माता-पिता को मार डाला गया था और उन बच्चों को एकत्र करके एक मिशनरी कैम्प में बसा दिया गया था । जब यह मिशनरी ३ महीने उन बच्चों के साथ रहने के बाद वापस लौटने लगे तो उनके लौटने से पहले उन बच्चों ने गाया द्भिश्व रूक् क्द्भ श्रद्भद्भश्व, द्भिश्व रूक् क्द्भ श्रद्भद्भश्व, द्भिश्व रूक् क्द्भ श्रद्भद्भश्व ऱ्द्भ ब्ल्. यह गीत उन बच्चों ने गाया जिनके माता और पिताआें की हत्या सिर्फ्र ३ महीने पहले ईदी-अमीन के द्वारा कर दी गई थी । मैंने उनसे पूछा कि आप वहां के लोगों की भाषा नहीं जानते, फिर वहां ३ महीने काम कैसे किया ? उन्होंने कहा कि बोली जाने वाली भाषा तो सिर्फ्र सुनी जा सकती है परन्तु प्रेम की भाषा ऐसी है जिसको देखा जा सकता है । उसका अहसास किया जा सकता है । उसे बिना शब्दों में व्यक्त किए अनुभव किया जा सकता है। प्रेम की वह भाषा जो उन बच्चों के हृदय में थी, उसे मैं पढ़ सकता था । मेरे हृदय की भाषा वे पढ़ सकते थे । बस इतना ही काफी था ।

मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलने से भी बड़ी बात, संसार के ज्ञान को प्राप्त कर लेने से भी बड़ी बात, आश्चर्य कर्मो को कर लेने से भी बड़ी बात, सब कुछ दान में दे देने से भी बड़ी बात, अपनी देह जलाने के लिए दे दिए जाने से भी बड़ी बात; प्रेम है । प्रभु यीशु मसीह इसीलिए कहते हैं कि इसी से तुम जानोगे कि तुम मेरे चेले हो ।

पौलुस कहता है कि यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं और प्रेम न रखूं तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल और झनझनाती हुई झांझ हूं ।

मैं एक पुस्तक पढ़ रहा था उसमें वर्णन था कि यूनानी मन्दिर किस प्रकार के होते थे । ये मन्दिर वैसे ही होते थे जैसा कि कभी आपने किसी भव्य फिल्म में देखा होगा । इन मन्दिरों का बहुत ऊंचा कंगूरा होता था । ये विशाल मन्दिर सफेद रंग से पुते होते थे और उनमें यूनानी देवी-देवताआें की प्रतिमाएं रखी होती थीं । ये मन्दिर थोड़ी सी ऊंचाई पर बनाए जाते थे और सीढ़ियों से चढ़कर भक्त लोग इनमें जाते थे । दण्डवत करने से पहले ये भक्त उस जगह पर जाते थे, जहां एक बहुत बड़ी पीतल की झांझ होती थी । वहां एक लकड़ी का बड़ा हथौड़ा भी रखा होता था । वे उस हथौड़े को दोनों हाथ से पकड़ते थे और पूरी ताकत से उस झांझ को बजाते थे । उनका ऐसा विश्वास था कि जब हम ऐसा करते हैं तो देवता जाग जाते हैं और हमारी प्रार्थना सुनते हैं ।

यहां पौलुस कहता है कि यदि हम मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलें और प्रेम न रखें तो हम भी वैसे ही कार्य कर रहे हैं जिसका कोई अर्थ नहीं । ठनठनाते हुए पीतल और झनझनाती हुई झांझ से सिर्फ्र ऐसे स्वर हैं हम, जिससे वास्तव में कोई आराधना नहीं होती । जिससे ईश्वर का ध्यान हमारी ओर नहीं लगता। यह सब व्यर्थ की बात है । मात्र एक ढ़ोंग है । हम समस्त ज्ञान को प्राप्त कर लें, स्वर्गदूतों की भाषाएं बोल लें, दान दे दें, शहीद होने के लिए तैयार हो जाएं और प्रेम न हो तो सब कुछ व्यर्थ है; किसी ठनठनाते हुए पीतल और झनझनाती हुई झांझ की तरह।

निष्कर्ष :- वास्तव में हम यहां प्रेम के कारण उपस्थित हैं । वह प्रेम, जिसके कारण प्रभु यीशु मसीह इस संसार में आया । वह प्रेम, जिसके कारण हमको उद्धार मिला, वह प्रेम, जिसके कारण कलीसिया की स्थापना हुई । आज कितनी ऐसी बातें हैं जिनमें हम उलझ जाते हैं। कितनी ऐसी तकनीकी बातें हैं, कितने ऐसे नियम-कानून हैं, कितने ऐसे तर्क हैं, जिनमें हम उलझे हुए हैं । आवश्यकता इस बात की है कि हम इस स्थिति से ऊपर उठें और प्रेम के साथ, एकता के साथ कलीसिया को आगे बढ़ाएं। इस कलीसिया से परमेश्वर की योजना पूरी हो सके । यह तभी हो सकेगी जब हम प्रेम का जीवन जीएं । जब हमारे हृदय में एक-दूसरे के प्रति प्रेम होगा तब हमारी कलीसिया मज़बूत होगी । तब हमारी कलीसिया की एकता होगी । तब हमारी कलीसिया में रहकर वास्तव में परमेश्वर का महान कार्य हम कर सकेंगे ।

परमेश्वर आपको आशीष दे ।