Background

प्रभु यीशु का अद्वितीय स्मारक

1 कुरिन्थियों 11:23-36

परिचय :- प्रभु यीशु मसीह की ब्यारी में शामिल होना, उस घटना का स्मरण करना है जिसे प्रभु यीशु मसीह ने मेरे और आपके लिए स्मारक स्वरूप ठहराया है।

राष्ट्रों के वे नायक जो अपने देश के लोगों के हितों के लिये कुछ प्रमुख कार्य करते हैं, उनकी स्मृति में स्मारक बनाए जाते हैं । उनकी स्मृति में भवन बनाए जाते हैं । उनकी प्रतिमाएं खड़ी की जाती हैं । लोग उनको देखकर गर्व करते हैं । हमारे देश की राजधानी नई दिल्ली में इण्डिया गेट है उसमें एक ज्योति जलती रहती है । इस इण्डिया गेट पर बहुत से योद्धाआें और जवानों के नाम लिखे हुए हैं, जो दूसरे महायुद्ध में मारे गए । उनकी स्मृति में, उनके आदर में और उनके प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए एक मशाल जलाई गई है जो निरन्तर जलती रहती है । इसे अमर जवान ज्योति कहते हैं।

हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू को शान्ति का दूत कहा जाता था । जब उनकी मृत्यु हुई तो उनकी याद में दिल्ली में शान्तिवन बना दिया गया। यह शान्तिवन का स्मारक उनकी याद दिलाता है । इसी प्रकार आगरा में ताजमहल वह स्मारक है जिसे शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज की स्मृति में बनवाया । प्रेम का प्रतीक यह ताजमहल दुनिया के सात आश्चर्यकर्मों में से एक है ।

समय के साथ इन स्मारकों की चमक धुंधली पड़ जाती है । उनमें पीलापन आ जाता है । उनमें दरारें पड़ जाती हैं । समय के साथ-साथ ये स्मारक बिखरकर खण्डहरों में तब्दील हो जाते हैं । दमोह में एक बहुत पुराना एंग्लिकन चर्च भवन है जो बहुत ही खराब स्थिति में है । यह अब सरकार के कब्ज़े में है । १०० वर्षों से अधिक पुराने इस चर्च भवन को सरकार ने म्यूज़ियम बना दिया है । यह बड़ी त्रासदी की बात लगती है कि एक चर्च भवन म्यूज़ियम बनकर रह गया ।

शब्दकोष में स्मारक की परिभाषा है - कोई दृश्य वस्तु या स्थान, जो किसी की याद को सुरक्षित रखता है, स्मारक कहलाता है ।

परमेश्वर के वचन में ऐसे बहुत से स्मारक हमको देखने को मिलते हैं । परमेश्वर यहोवा ने जो महान कार्य किए, अपने लोगों के साथ जो वाचा उसने बांधी, अपने लोगों के साथ जो प्रतिज्ञा की; उसको स्मरण कराने के लिए, अपने प्रेम और दया को स्मरण कराने के लिए बहुत से स्मारक परमेश्वर ने हमारे लिए तैयार किए, उन सब स्मारकों की सूची बनाना तो सम्भव नहीं होगा परन्तु कुछ ऐसे स्मारक हैं जो आज भी हमारे सामने हैं ।

१. सप्तरंगी धनुष :- उत्पत्ति की पुस्तक में वर्णन मिलता है कि जल प्रलय से सृष्टि को नाश करने के बाद परमेश्वर ने उस स्थिति को देखा । एक प्रमुख विद्वान डॉ. हेनरी मॉरिस बताते हैं कि उस समय विश्व की जनसंख्या ८०० करोड़ थी । जितनी जनसंख्या आज सारे संसार की है, उससे कहीं ज़्यादा जनसंख्या उस समय थी परन्तु उसमें से केवल ५ लोग ऐसे थे जो परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी थे । जब करोड़ों लोगों को जल प्रलय से परमेश्वर ने नाश कर दिया तो वह दुखित हुआ, वह बहुत खेदित हुआ। परमेश्वर के स्वभाव का मानवीयकरण करते हुए जो शब्द वहां पर लिखा हुआ है, वह यह है कि - परमेश्वर को शोक हुआ, पश्चात्ताप हुआ । उसके बाद परमेश्वर ने नूह से वाचा बांधी कि वह पृथ्वी को जल प्रलय से कभी नाश न करेगा। इस वाचा का जो स्मारक है, वह सप्तरंगी धनुष है । (उत्पत्ति ९:१२-१७) जिसे आज भी हम देखते हैं । यह इस बात का स्मारक है कि परमेश्वर ने हमसे इतना प्रेम किया कि वह नहीं चाहता कि इस संसार को दोबारा जल प्रलय से नाश करे। उसने अपने लोगों के साथ जो वाचा बांधी उसका स्मरण दिलाता है, वह सप्तरंगी धनुष ।

२. आशा का स्तम्भ :- उत्पत्ति की पुस्तक २८ वें अध्याय में एक और स्मारक का वर्णन है। वहां पर याकूब के विषय में लिखा हुआ है । वह बेर्शेबा से हारान को जा रहा था। रास्ते में उसको नींद आ गई । उसने एक लम्बा रास्ता तय किया था । वह बहुत थक गया था । उसे बहुत गहरी नींद आई । वह एक स्वप्न देखता है कि पृथ्वी से स्वर्ग तक एक सीढ़ी है । परमेश्वर के दूत उन सीढ़ियों से चढ़ते और उतरते हैं । परमेश्वर उस ऊंची सीढ़ी के आखिरी सिरे पर खड़ा हुआ है । स्वप्न में दर्शन देकर परमेश्वर याकूब से वाचा बांधता है कि यह भूमि मैं तेरे वंश को दूंगा । मैं तेरे वंश को धूल के किनकों के समान बढ़ा दूंगा । उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम सब तरफ तेरा वंश फैलेगा । मैं तुझे आशीष दूंगा । मैं तेरे साथ रहूंगा । मैं तेरी रक्षा करूंगा। याकूब उस स्वप्न में परमेश्वर का दर्शन पाकर इतना प्रभावित हो गया, इतना उत्साहित हो गया कि उसने वहां पर एक स्तम्भ बनाया। उसने वहां पर एक स्मारक खड़ा किया । यह याद रखने के लिए कि इस स्थान पर उसको यहोवा का दर्शन मिला था । यह वह स्थान था, जहां परमेश्वर ने उस से अपनी वाचा बांधी थी ।

३. गिलगाल का स्मारक :- यहोशू की पुस्तक के चौथे अध्याय में एक और घटना का वर्णन है। यहोशू की अगुवाई में इस्राएली प्रतिज्ञा किए हुए देश की ओर बढ़ रहे थे । वे अपने साथ वाचा का सन्दूक लिए चल रहे थे। इस वाचा के सन्दूक को इस्राएल के १२ गोत्रों के १२ अगुवे अपने कन्धों पर रखकर ले जा रहे थे। सामने यरदन नदी आ गई। जैसे ही इन १२ गोत्र के लोगों के पैरों ने यरदन नदी के पानी को छुआ, यरदन नदी दो भागों में बंट गई । तब यहोशू ने उनसे कहा जहां-जहां तुम्हारे पैर पड़े हैं वहां से तुम उन पत्थरों को उठा लो । वे १२ लोग अपने साथ एक-एक पत्थर लेकर आए । उनको उन्होंने गिलगाल नामक स्थान मेें खड़ा किया। यहोशू ने उनसे कहा कि ये गवाही के पत्थर हैं । जब तुम्हारे बाल-बच्चे इन पत्थरों को देखें तो तुम उन्हें स्मरण दिलाना कि किस प्रकार से उनके पूर्वजों, उनके पुरखाआें पर परमेश्वर ने अपनी दया की, अपना अनुग्रह किया। वे स्मरण करेंगे कि किस प्रकार इस्राएलियों के साथ-साथ परमेश्वर चला । वे स्मरण करेंगे कि किस प्रकार से समुद्र दो भागों में बंट गया। वे स्मरण करेंगे कि परमेश्वर के आश्चर्यकर्म से यरदन नदी भी दो भागों में बंट गई ।

यहोशू ४:२१-२४ में लिखा है - ``तब उस ने इस्राएलियों से कहा, आगे को जब तुम्हारे लड़के वाले अपने अपने पिता से यह पूछें, कि इन पत्थरों का क्या मतलब है? तब तुम यह कहकर उनको बताना, कि इस्राएली यरदन के पार स्थल ही स्थल चले आए थे । क्योंकि जैसे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने लाल समुद्र को हमारे पार हो जाने तक हमारे साम्हने से हटाकर सुखा रखा था, वैसे ही उस ने यरदन का भी जल तुम्हारे पार हो जाने तक तुम्हारे साम्हने से हटाकर सुखा रखा; इसलिये कि पृथ्वी के सब देशों के लोग जान लें कि यहोवा का हाथ बलवन्त है; और तुम सर्वदा अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानते रहो'' ।

४. लोहू का खेत : यहूदा का स्मारक :- नया नियम में एक स्मारक का वर्णन है वह है यहूदा का स्मारक, लोहू का खेत। यहूदा को अपने किये पर पश्चात्ताप हुआ । वह ३० चांदी के सिक्के लेकर महायाजकों के पास गया । उनके सामने वे सिक्के फेंक दिए । उसने कहा - मैंने निर्दोष का रक्त बहाकर ग़लत काम किया है । मैं इन्हें वापिस करता हूं । उसके बाद यहूदा ने जाकर अपने आपको फांसी दे दी । महायाजकों ने कहा, यह तो लोहू का दाम है । इसको अपने पास रखना उचित नहीं है । उसके बाद उन्होंने उन ३० चांदी के सिक्कों में कुम्हार का खेत खरीद लिया कि वहां लावारिस लाशों को दफ्रनाया जा सके । लावारिस लाशों का वह खेत, यहूदा का स्मारक, आज भी इस संसार में मौजूद है । किसी ने कहा - जो जैसा जीवन जीता है, वैसा ही स्मारक छोड़कर जाता है।

५. प्रभु भोज का स्मारक :- फिर हम आते हैं प्रभु भोज की स्थापना के समय पर। यह यहूदियों के फसह के पर्व का समय था । यरूशलेम में उस समय बाहर से लगभग ३० लाख लोग आए थे । एक बड़ी भीड़ वहां पर फसह का पर्व मनाने के लिए मौजूद थी । फसह के इस पर्व के समय प्रभु यीशु मसीह ने अपने चेलों के साथ बैठकर इस ब्यारी की स्वयं स्थापना की। प्रभु यीशु मसीह स्वयं ऐसा चाहता था क्योंकि वह कहता है - मेरी बड़ी लालसा थी कि यह भोज मैं तुम्हारे साथ खाऊं। प्रभु यीशु मसीह जानता था कि इस संसार में उसके जीवनकाल का यह अन्तिम त्योहार का समय है, अन्तिम फसह का पर्व है । वह जानता था कि जल्दी ही उसे क्रूस पर चढ़ा दिया जाएगा ।

लूका २२:१४-२० में लिखा हुआ है - ``जब घड़ी पहुंची, तो वह प्रेरितों के साथ भोजन करने बैठा । और उस ने उन से कहा; मुझे बड़ी लालसा थी, कि दुख-भोगने से पहिले यह फसह तुम्हारे साथ खाऊं। क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि जब तक वह परमेश्वर के राज्य में पूरा न हो तब तक मैं उसे कभी न खाऊंगा । तब उस ने कटोरा लेकर धन्यवाद किया, और कहा, इस को लो और आपस में बांट लो । क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि जब तक परमेश्वर का राज्य न आए तब तक मैं दाख रस अब से कभी न पीऊंगा । फिर उस ने रोटी ली, और धन्यवाद करके तोड़ी, और उन को यह कहते हुए दी; कि यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये दी जाती है : मेरे स्मरण के लिये यही किया करो । इसी रीति से उस ने बियारी के बाद कटोरा भी यह कहते हुए दिया, कि यह कटोरा मेरे उस लोहू में जो तुम्हारे लिये बहाया जाता है नई वाचा है''।

प्रभु भोज के लिये विभिन्न नाम बाइबिल में आए हैं । इसमें से एक नाम है - रोटी तोड़ना । प्रेरितों के काम २:४२ में लिखा हुआ है - ``और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे''। प्रेरितों के काम २०:६ में भी प्रभु भोज को रोटी तोड़ना कहा गया है । १ कुरिन्थियों १०:२१ में इसको प्रभु की मेज कहा गया है - ``तुम प्रभु की मेज और दुष्टात्माआें की मेज, दोनों के सहभागी नहीं हो सकते''।

यह सम्भव नहीं है कि तुम्हारे जीवन में दोहरापन हो और तुम इस मेज में भी सहभागी हो । तुम दुष्टात्माआें की मेज और प्रभु की मेज दोनों में सहभागी नहीं हो सकते । हम इसको प्रभु भोज कहते हैं क्योंकि प्रभु ने इसकी स्थापना की । इसको प्रभु की ब्यारी भी कहा जाता है । ब्यारी का अर्थ होता है शाम का भोजन। इंग्लिश में कहते हैं - लॉर्ड्स सपर । सपर अर्थात् शाम का भोजन । लॉर्ड्स सपर अर्थात् प्रभु की ब्यारी ।

इसको कब लिया जाना चाहिए ? विभिन्न कलीसियाआें में, विभिन्न सन्दर्भों में बहुत से भिन्न-भिन्न मत हैं । इसका कारण यह है कि प्रभु यीशु मसीह ने इस सन्दर्भ में कोई भी स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिया कि इसको कब-कब लिया जाना चाहिए । प्रेरितों के काम २:४२ के अनुसार - वे लौलीन रहे, निरन्तर बने रहे । ग्रीक भाषा में इसके लिए जिस काल (ल्छक्ल्) का उपयोग हुआ है, वह वर्तमान काल (सड्डल्क्ल्छऱ् ेद्भछऱ्रूछट्टद्भट्टक् ल्छक्ल्) है कि उसमें निरन्तरता बनी रही । वे लौलीन रहना, रोटी तोड़ना नियमित रूप से करते रहे । वे प्रतिदिन रोटी तोड़ा करते थे (प्रेरितों के काम २:४६) । प्रतिदिन प्रभु भोज में सहभागी हुआ करते थे । प्रेरितों के काम २०:७ और १ कुरिन्थियों १६:२ में हमको वर्णन मिलता है - प्रति सप्ताह। सप्ताह के पहले दिन वे एकत्रित होते थे और रोटी तोड़ते थे और बड़े आनन्द से और मन की सीधाई से आराधना किया करते थे ।

कलीसिया के इतिहास में दो लेखकों का वर्णन है इनमें पहला है जस्टिन मार्टर। यूहन्ना का चेला था पोलीकार्प और पोलीकार्प का जो चेला था उसका नाम था जस्टिन मार्टर । वह प्रभु यीशु मसीह के १२० वर्ष बाद हुआ । जस्टिन मार्टर ने अपने लेखन में आराधनाआें का वर्णन करते हुए लिखा है कि सब मसीही अपने-अपने क्षेत्रों में एकत्र होते हैं। ऐसा हर रविवार की सुबह होता है । वचन का पाठ पढ़ा जाता है। उसकी व्याख्या की जाती है । फिर प्रार्थना की जाती है । प्रभु यीशु की स्मृति में रोटी तोड़ी जाती है । दाखरस लिया जाता है । दान एकत्र किया जाता है । धन्यवाद की प्रार्थना के बाद लोग अपने-अपने घरों को चले जाते हैं । यह वर्णन सन् १५० ईस्वी में जस्टिन मार्टर ने अपनी पुस्तक में लिखा था ।

एक और इतिहासकार है रॉबर्ट मिलेगन । अपनी पुस्तक `उद्धार की योजना' के पृष्ठ ४४० में उसने लिखा है कि सारे विश्व की कलीसियाआें में पहले २०० वर्षों तक और यूनानी कलीसियाआें की आराधनाआें में ७०० वर्षों तक निरन्तर, प्रति सप्ताह, सप्ताह के पहले दिन प्रभु भोज होता रहा ।

प्रभु भोज प्रभु यीशु मसीह का स्मारक है । दुनिया का सबसे महान स्मारक । प्रभु यीशु मसीह इस संसार से जा रहा था । वह जानता था कि क्रूस सामने है । वह जानता था कि कलवरी की यात्रा उसको करनी है । वह जानता था कि मृत्यु उसके निकट है । जैसे कोई पिता लम्बी विदेश यात्रा को जाने के पहले अपने परिवार के हाथ में कोई स्मृति चिन्ह छोड़कर जाता है, ठीक वैसे ही प्रभु यीशु की लालसा थी कि वह अपने चेलों के साथ, जिनके साथ उसका अन्तरंग सम्बन्ध था, जो उसके निकटतम थे; इस स्मारक की स्थापना करे । यह स्मारक है - रोटी और दाखरस । प्रभु यीशु मसीह को स्मरण करने के लिए, उसके बलिदान को स्मरण करने के लिए तुम्हें किसी स्थान की यात्रा नहीं करना पड़ेगी । तुम्हें कोई बड़ा प्रयास नहीं करना पड़ेगा। जिस प्रकार से उद्धार मुफ्त है उसी प्रकार से रोटी भी सब जगह उपलब्ध है। दाखरस उपलब्ध है । हर गांव में, हर कस्बे में, हर शहर में, हर महानगर में रोटी की प्रमुखता है । रोटी की आवश्यकता है । रोटी व्यक्ति से जुड़ी हुई है। उसके जीवन से जुड़ी हुई है ।

इस स्मारक में सबसे प्रमुख तत्व है लोहू । हम ग़ौर करेंगे लोहू के ऊपर। लूका २२:२० में प्रभु यीशु मसीह कहते हैं- ``यह कटोरा मेरे उस लोहू में जो तुम्हारे लिये बहाया जाता है, नई वाचा है'' । मेरा लोहू तुम्हारे लिए बहाया जाता है । मेरा जो सम्बन्ध तुमसे है, वह रक्त का सम्बन्ध है । यह कोई ऊ परी रिश्तेदारी या नातेदारी नहीं है, यह तो रक्त का सम्बन्ध है । यह ऐसा सम्बन्ध है जिसके लिए मैं अपना लोहू बहाता हूं, जिसके लिए मैं अपना प्राण देता हूं । यह त्याग का स्मारक है । यह प्रेम का स्मारक है । यह बलिदान का प्रतीक है। इसमें लोहू की प्रमुखता हम पाते हैं । उत्पत्ति की पुस्तक ३:२१ में वर्णन है कि यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अंगरखे बनाकर उनको पहना दिए ।

हमको मालूम है कि इसके पहले क्या हुुआ था। आदम और हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया था । तब परमेेश्वर आया और उनसे पूछा - हे आदम, तू कहां है ? हे हव्वा, तूने यह क्या किया ? उनकी आज्ञा उल्लंघन के कारण परमेश्वर उनसे नाराज़ हुआ और उनको श्राप दिया । परमेश्वर का दिल मानो टूट जाता है क्योंकि परमेश्वर की योजना को उन्होंने तोड़ दिया । उसकी इच्छा को उन्होंने तोड़ दिया । जब परमेश्वर ने आदम-हव्वा और इस धरती को श्राप दिया तब उसने आदम और उसकी पत्नी के लिए चमड़े के अंगरखे बनाकर उनको पहना दिए । उस स्थिति में भी परमेश्वर का प्रेम कम नहीं हुआ । उसके प्रेम के प्रगटीकरण की यह पहली घटनाथी । यह परमेश्वर के लोहू बहाने की, दुनिया में हुई पहली हत्या की, सबसे पहली मृत्यु की घटना थी । परमेश्वर ने सम्भवत: मेम्नों को बलिदान किया होगा और उसके बाद चमड़े के अंगरखे बनाकर आदम और हव्वा को पहना दिए ।

यह घटना इस बात का प्रतीक है कि परमेश्वर का प्रेम उनके लिए बना हुआ था । यह इस बात का भी प्रतीक है कि परमेश्वर ने अपने मन में निर्धारित कर लिया था कि इस पाप के प्रायश्चित के लिए, पाप की क्षमा के लिए उसको लोहू बहाना पड़ेगा । इस पाप को ढांपने के लिये अंगरखा बनाना पड़ेगा । प्रभु यीशु मसीह की देह को तोड़ना पड़ेगा, उसका लहू बहाना पड़ेगा, तब मनुष्य के पाप के लिए उद्धार का अंगरखा मिलेगा, तब मनुष्य के पाप की क्षमा मिलेगी । यह लोहू का सम्बन्ध है। यह त्याग का सम्बन्ध है। यह कोई साधारण बात नहीं वरन् गम्भीर बात है ।

निर्गमन १२:१२-१३ में हम पाते हैं कि किस प्रकार मिस्रियों पर विपत्तियां आइंर्। परमेश्वर यहोवा ने उनको आज्ञा दी कि तुम मेम्ने को बलिदान करना । उसका लोहू जिस दरवाज़े की चौखट पर लगा होगा, उस परिवार का पहिलौठा बच जाएगा । मेम्ना बलिदान होगा, उसका लोहू दरवाज़े की चौखट पर लगेगा और परमेश्वर का दूत जान लेगा कि ये परमेश्वर के लोग हैं । ये परमेश्वर की निज प्रजा हैं । एक बार फिर लोहू बहाया गया मेम्ने का और उसके द्वारा पहिलौठे बचा लिए गए । लोहू का यह सम्बन्ध हज़ारों वर्ष पुराना सम्बन्ध है । यह कोई नई बात नहीं है । परमेश्वर कहता है कि यह मेम्ने के बलिदान का जो चिन्ह है, यह मेरे लोगों की पहचान है । मेम्ने के इस रक्त में मेरे लोगों की पहचान है । मेरे प्रेम की पहचान है । मेरी सुरक्षा का कवच है।

यशायाह ४९:१५-१६ में लिखा है - ``क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पिउवे बच्चे को भूल जाए और अपने जन्माए हुए लड़के पर दया न करे ? हां, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता । देख, मैं ने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है; तेरी शहरपनाह सदैव मेरी दृष्टि के साम्हने बनी रहती है''।

मैंने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोद लिया है । जब हथेलियों को खोदा जाता है, इस पर चित्र बनाया जाता है तो लोहू निकलता है । परमेश्वर कहता है कि सम्भव है कि कोई माता अपने जन्माए को भूल जाए परन्तु मैं तुझे नहीं भूलूंगा। मैंने तुझसे इतना प्रेम किया है कि अपनी हथेलियों पर, इन दोनों हाथों पर, इनको खोदकर तेरा चित्र बनाया है । मैंने अपने खुद के लोहू से तुझको खरीदा है । इन हथेलियों को एक दिन क्रूस पर ठोंक दिया जाएगा, और तब मेरे और तुम्हारे प्रेम का चित्र भी पूरा होगा ।

परमेश्वर ने स्वयं अपना रक्त बहा दिया, मुझको और आपको खरीदने के लिए। परमेश्वर के रक्त से बढ़कर दुनिया में और किसी चीज़ की क्या क़ीमत होगी । परमेश्वर के रक्त की कोई क़ीमत हो ही नहीं सकती । जो सबसे बहुमूल्य था, जो सबसे अधिकतम था, जो सबसे बड़ा त्याग परमेश्वर कर सकता था वह यह कि उसने अपना रक्त बहाकर मुझको और आपको खरीदा है । अपने रक्त की छाप मेरी और आपकी आत्मा पर लगाई है । यह लोहू एक नई वाचा है । पुरानी वाचा समाप्त हो गई । पुरानी व्यवस्था जाती रही । यह नई वाचा का लोहू है । अनुग्रह की वाचा है । तुमको बचाए जाने की वाचा है । अनन्त जीवन की वाचा है । अनुग्रह क्या है? अनुग्रह अर्थात् वह, जिसके कि हम योग्य न हों और वह हमको मिल जाए । परमेश्वर का अनुग्रह हम पर हुआ है ।

इस स्मारक में एक और प्रमुख तत्व है रोटी । लूका २२:१९ में लिखा है - ``फिर उस ने रोटी ली, और धन्यवाद करके तोड़ी, और उन को यह कहते हुए दी; कि यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये दी जाती है''।

यह रोटी मेरी देह है जो तोड़ी जाएगी । मैं अपनी इच्छा से इस देह को तुड़वा रहा हूं । यह रोटी तोड़ी जाएगी । मेरी देह तोड़ी जाएगी । ताकि तुम्हारा सम्बन्ध परमेश्वर से जोड़ा जा सके । बिना इस देह के तोड़े हुए, बिना इस रोटी के तोड़े हुए, तुम्हारा सम्बन्ध परमेश्वर से जोड़ा नहीं जा सकता । गेहूं को पीसा जाएगा, जो दाना है उसको पीसा जाएगा । प्रभु यीशु मसीह की देह को मानो पीस दिया गया। उसकी देह तोड़ी गई। देह को तोड़े जाने की जो बात है वह त्याग की बात है । त्याग क्या है? यही कि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपने एकलौता पुत्र दे दिया।

किसी टीकाकार ने लिखा है कि यदि मैं परमेश्वर होता और आज का संसार जैसा है उसको देखता, तो मैं कभी ऐसे संसार से प्रेम नहीं करता । मैं तो उसको समाप्त कर देता । परन्तु परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया। क्या है इस जगत में कि परमेश्वर इस जगत से प्रेम करे ? आप टेलीविजन में न्यूज़ सुन लीजिए, पिछले दो चार दिनों के अखबार देख लीजिए । शायद आपको पढ़ने को मिलेगा कि एक छह-आठ वर्ष की बालिका के साथ आठ लोगों ने बलात्कार किया । हत्याआें का वर्णन मिलेगा। कहीं नरसंहार हो गया । कहीं किसी ने किसी को धोखा दे दिया । आज जब परमेश्वर इस संसार को देखता होगा तो इस संसार में है क्या कि परमेश्वर हमसे इतना प्रेम करे? इस संसार में जहां हत्याएं हैं, जहां छल है, जहां कपट है, जहां बलात्कार है, जहां धोखा है, जहां डाका है, जहां हर क़दम पर नई समस्या है; इस संसार में है क्या कि परमेश्वर हमसे प्रेम करे ?

बाइबिल का मेरा सबसे प्रिय संदर्भ भजन संहिता ८:३-४ है, जहां लिखा है - ``जब मैं आकाश को, जो तेरे हाथों का कार्य है, और चन्द्रमा और तारागण को जो तू ने नियुक्त किए हैं, देखता हूं; तो फिर मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखे, और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले''।

जब मैं तेरी हस्तकला के कार्यों को देखता हूं । जब मैं सोचता हूं कि तेरी वाणी मात्र से सारी सृष्टि की सृजना हो जाती है । जब मैं चन्द्रमा और तारागण को देखता हूं तब मुझे अपनी स्थिति का अहसास होता है ।

परमेश्वर ने जब मूसा को चुना तो सोचा होगा कि मूसा मेरे प्रेम की परिपूर्णता का इज़हार कर नहीं पाएगा । उसने २० लाख इस्राएलियों की, अगुवाई तो की परन्तु वह मेरे सम्पूर्ण प्रेम का इज़हार नहीं कर पाया । परमेश्वर ने देखा होगा एलिय्याह को। उसने देखा होगा बड़े-बड़े नबियों को । उसे अहसास हुआ होगा कि ये मेरे प्रेम की परिपूर्णता का इज़हार नहीं कर पाएंगे । तब परमेश्वर ने देखा और कहा कि मैं अपने एकलौते पुत्र, अपने प्रिय पुत्र, मेरे सह-अस्तित्व को भेजूंगा । परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, चाहे वह कैसा भी हो, वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए । हम में से हर एक को जीवन चाहिए । वह कहता है जीवन ही नहीं वरन् अनन्त जीवन पाए।

जब हम इस मेज में सहभागी होंे तो परमेश्वर हमको बताना चाहता है कि हम उसके कितने प्रिय हैं । क्योंकि वह हमको अपनी मेज में सहभागी होने के लिए बुलाता है । हम क्या हैं ? हमारी क्या औकात है ? हम परमेश्वर के सामने खड़े होने के योग्य नहीं हैं । परन्तु वह हमको निमंत्रण देता है कि आओ मेरी मेज में सहभागी हो। लिखा हुआ है कि ब्यारी के पहले उसने अपने चेलों के पैर धोए । वह सृष्टिकर्ता जिसने सारी सृष्टि को बनाया, वह सर्वज्ञानी, सर्वव्यापक, सर्वसामर्थी परमेश्वर हमसे इतना प्रेम करता है कि अपने आपको शून्य कर लेता है । दीन कर लेता है । इस संसार में आ जाता है । दास का सा स्वरूप धारण करता है और अपने चेलों के गन्दे पैरों को धोता है । अपने प्रेम के इज़हार के लिए किसी भी सीमा तक परमेश्वर जा सकता है।

अमेरिका के एक बहुत बड़े बाइबिल कॉलेज की गे्रजुएशन सर्विस में मैं मौजूद था । वहां बहुत से लोगों को डॉक्ट्रेट की उपाधि मिल रही थी। बहुत से लोगों को धर्म विज्ञान की बड़ी-बड़ी उपाधियां मिल रही थीं । उनके साथ उन्हें एक छोटा सा पैकेट भी दिया जा रहा था । उस छोटे से पैकेट में एक तौलिया दी गई थी, उन्हें इस बात का स्मरण दिलाने के लिए कि तुम्हें आदर तो मिल रहा है, उपाधि तो मिल रही है, परन्तु तुम एक सेवक हो । ठीक वैसे ही, जैसे प्रभु यीशु मसीह ने एक दास का सा स्वरूप धारण किया । यह तौलिया इसलिए मिल रहा है, कि इसे देखकर तुम याद रख सको, कि तुम उसके दास हो ।

परमेश्वर ने अपना सब कुछ हमको दे दिया । उसने अपने निज पुत्र को भी नहीं रख छोड़ा । उसने अपने लोहू से हमको खरीद लिया। हमारी खातिर अपनी देह तोड़ दी । सब प्रकार का अपमान सहा कि हमारा सम्मान हो जाए । प्रश्न यह है कि उसने तो अपना सब कुछ हमको दे दिया, क्या हम उसके लिए एक बात भी नहीं छोड़ सकते? क्या हम उसके लिए एक बुरी आदत भी नहीं छोड़ सकते ?

जब हम उसकी ब्यारी में सम्मिलित होते हैं, तो हम में से हर एक अपने-अपने मन में यह विचार करे, कि हमने उसके लिए क्या किया है ? आज मैं परमेश्वर के लिए क्या कर सकता हूं ? हो सकता है कि हमारे जीवन में कोई एक पाप हो । जैसा कि प्रभु यीशु मसीह ने उस धनी युवा प्रशासक से कहा, तुझमें एक बात की घटी है। इस ब्यारी में सम्मिलित होने से पहले हम अपने हृदयों को देखें कि वह कौन सी एक बात है जो हमारे जीवनों को नरक की ओर ले जा रही है ? वह कौन सी एक बात है जो भाई और भाई के बीच में दीवार पैदा कर रही है ? वह कौन सी एक बात है? वह घृणा की बात, वह जलन की बात, वह कपट की बात, वह छल की बात जो हम एक-दूसरे के प्रति अपने दिल में रखे हुए हैं । हम में से प्रत्येक इस बात पर विचार करे कि वह कौन सी एक बुरी आदत है जिसको मैं छोड़ नहीं सकता? कौन सा एक ऐसा पाप है जो मेरे दिल में है ? वचन हमें चुनौती देता है कि क्या उस एक बात को हम परमेश्वर के लिए छोड़ सकते हैं ? सिर्फ्र एक बात! हो सकता है हम में से किसी में क्रोध करने की समस्या हो । हो सकता है अपशब्द कहने की समस्या हो। क्या हम परमेश्वर के साथ इस स्मारक में, उसकी मेज में सहभागी होते हुए यह वाचा बांधेंगे कि परमेश्वर, उस एक बात को मैं तेरे चरणों के पास छोड़कर जाऊंगा। वह एक बात जो हमारे जीवन मेें कैंसर के समान, एक बुराई के समान है । हो सकता है किसी पाप का बोझ हो जो हमने अतीत में किया हो, जिसका बोझ हमारे दिल से न उतरता हो । परमेश्वर कहता है, सारे बोझ मेरे पास ले आओ । मैं तुम्हारे पापों को, चाहे वे लाही रंग के क्यों न हों, उन्हें हिम की नाइंर् श्वेत करूंगा । मैं तुम्हारे पापों को गहरे समुद्र में दफ्रन कर दूंगा । उसका वचन हमसे इस बात की प्रतिज्ञा करता है।

२ शमूएल २४:१८-२५ में दाऊ द और अरौना का ज़िक्र है । दाऊद ने परमेश्वर की दृष्टि में एक अपराध किया और परमेश्वर उस से नाराज़ हुआ । तब परमेश्वर ने कहा कि मैं तुझे तीन विपत्तियां बताता हूं (२४:१२ से आगे)। इन तीन में से कोई एक बात चुन ले । पहली बात तो यह कि सात वर्षों तक तेरे देश में अकाल पड़े, या तीन महीने तक तेरे शत्रु तेरा पीछा करें, या तीन दिन तक मरी फैली रहे। तब दाऊ द ने कहा - तीन दिन तक मरी फैली रहे, वही पर्याप्त है । उसके बाद हम १५ वें पद में पाते हैं कि उन तीन दिनों में प्रजा के ७० हजार पुरुष मर गए । उसके बाद यहोवा का वह दूत जो मार रहा था वह अरौना नाम के एक किसान के खेत में, खलिहान के पास रुक गया । परमेश्वर ने मरी को रोक दिया । तब दाऊद को पता चला और वह अरौना के उस खेत में आया, जहां परमेश्वर के दूत ने लोगों को मारना बन्द किया था। दाऊद को जब अरौना ने देखा तो कहा है कि मैं तो एक छोटा सा किसान हूं। मेरा राजा मुझसे मिलने के लिए आ रहा है । दाऊद ने कहा - मैं आया हूं कि यहां पर बलिदान चढ़ाऊं , परमेश्वर को धन्यवाद दूं । तब अरौना ने कहा - हे राजा, तू मेरे छोटे से खेत में आया, मेरे लिए कितनी बड़ी बात है। मैं तेरे लिए बलिदान की वेदी बनाऊंगा । मैं तुझको सब कुछ लाकर दूंगा । मैं बलिदान के लिए पशु लाकर दूंगा। मैं सब कुछ करूंगा । मेरा हृदय आज आनन्दित है । तब दाऊद उससे एक बात कहता है - ``मैं अपने परमेश्वर यहोवा को सेंतमेंत के होमबलि नहीं चढ़ाने का'' (२४-२५ पद) । अर्थात् मैं अपने परमेश्वर को ऐसी कोई वस्तु नहीं देना चाहता जिसका मूल्य मैंने नहीं चुकाया हो ।

निष्कर्ष :- दाऊ द की इसी बात की चुनौती, मैं आपके सामने रखना चाहता हूं । परमेश्वर, जिसने हमारे लिए सब कुछ किया, जो हमारे लिए बलिदान हो गया, जिसने अपनी देह हमारे लिए तोड़ दी, अपना लोहू हमारे लिए बहा दिया; क्या आज हम उसके लिए कोई क़ीमत चुकाने को लिए तैयार हैं ? वह एक बात, जो हमारे दिल में है, जो दिल में कांटे की तरह गड़ती है, जो हमारे दिल में बोझ है, जो हमारी बुराई है; क्या वह एक बात आज इस ब्यारी में उसके कदमों में छोड़कर जाएंगे? सब कुछ उसने दिया, हम उसको क्या देते हैं ? आज वह हमको बुलाता है कि हम उसकी इस मेज में शरीक हों । क्या हम सच्चे दिल से उसके पास आएंगे ?

काश ! परमेश्वर हम सभों को यह मन दे कि हम उसकी मेज में आएं और अपने हृदय की भेंट उसको चढ़ा सकें । लिखा हुआ है - टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है । क्या आज हम भी दाऊद के समान कह सकेंगे कि मैं अपने परमेश्वर को कोई ऐसी वस्तु नहीं देना चाहता, जिसका मूल्य मैंने नहीं चुकाया । परमेश्वर आपको आशीष दे ।