लूका 24:13-34 परिचय :- प्रति वर्ष संसार के अनेक स्थानों पर पुनरुत्थान का पर्व मनाया जाता है । यह पर्व किन्हीं मायनों में क्रिसमस से भी ज़्यादा प्रमुखता रखता है क्योंकि प्रभु यीशु का पुनरुत्थान ही सारे संसार के लिये अनन्त आशा का सन्देश लाता है। उसके बाद अब प्रश्न यह उठता है कि पुनरुत्थान के बाद क्या ? पुनरुत्थान के बाद कौन सी बात है जो परमेश्वर अपने वचन के माध्यम से हमें सिखाना चाहता है । पुनरुत्थान के पश्चात वह कौन सी घटना है जिसके माध्यम से परमेश्वर मुझसे और आपसे बातचीत करना चाहता है । पुनरुत्थान की घटना कलीसिया और हमारे मसीही विश्वास का आधार है । यह हमारी नींव है । पुनरुत्थान की घटना सबसे प्रमुख ऐतिहासिक घटना है । मृत्यु को परास्त करने के बाद प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान हुआ और परमेश्वर की योजना को उसने पूरा किया । एक विजयी के समान वह क़ब्र से निकला और आज भी जीवित है । इब्रानियों १३:८ में लिखा है - ``यीशु मसीह कल और आज और युगानुयुग एक सा है'' । पुनरुत्थान के बाद की एक घटना है जिस पर हम विचार करेंगे । यह उन दो लोगों की यात्रा की घटना है जो इम्माऊस नाम के गांव को जा रहे थे । इम्माऊस यरूशलेम से करीब ७ मील की दूरी पर है । इसी घटना के विभिन्न आयामों को हम देखेंगे । १. परमेश्वर जीवन की छोटी-छोटी बातों से हमें सन्देश देता है:-पद १३ से १६ में लिखा है - ``देखो, उसी दिन उन में से दो जन इम्माऊ स नाम एक गांव को जा रहे थे, जो यरूशलेम से कोई सात मील की दूरी पर था । और वे इन सब बातों पर जो हुइंर् थीं, आपस में बातचीत करते जा रहे थे । और जब वे आपस में बातचीत और पूछताछ कर रहे थे, तो यीशु आप पास आकर उन के साथ हो लिया। परन्तु उन की आंखें ऐसी बन्द कर दी गइंर् थीं, कि उसे पहचान न सके'' । साधारण से दो लोग हैं, साधारण सी यात्रा कर रहे हैं । सात मील की यात्रा है और वे पैदल चले जा रहे हैं । यह कोई बहुत बड़ी घटना नहीं है। यह उसी दिन की घटना है जिस दिन प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्थान हुआ था । ये लोग आपस में बातचीत कर रहे हैं और लिखा हुआ है कि प्रभु यीशु मसीह उनके साथ हो लेता है। अभी-अभी प्रभु यीशु मसीह ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है । प्रभु यीशु मसीह की पुनरुत्थित देह लोग देख रहे हैं । उसने अभी-अभी लोगों को दर्शन दिया है । यह प्रभु यीशु मसीह, जो संसार पर, जो मृत्यु पर, विजेता बनकर उभरा, उसने परमेश्वर की सबसे बड़ी योजना पूर्ण की । यही प्रभु यीशु मसीह उन दो लोगों के साथ-साथ चला जा रहा है, जो कि किसी गांव तक की एक साधारण सी यात्रा को प्रारम्भ कर रहे हैं । यदि हम सोचें तो लगता है कि प्रभु यीशु मसीह को तो रोमी सिपाहियों के पास जाना था । उन्हें जाकर दिखाना था कि देखो, तुमने तो मुझे मार डाला था, तुमने तो मुझे क्रूस पर ठोंक दिया था, तुमने तो मुझे मृत्यु दण्ड दे दिया था । मगर देखो, मैं जी उठा हूं । प्रभु यीशु मसीह को तो पीलातुस के पास जाना था । उससे कहना था कि तूने अन्याय किया था, तूने बरअब्बा को छोड़ दिया था और मुझे मार डाला था । परन्तु देख ! तेरी शक्ति समाप्त हो गई । मैं विजयी हो गया । मैं फिर से जी उठा । तेरा अन्याय मुझको कुचल नहीं सका । प्रभु यीशु मसीह को तो महायाजकों, शास्त्रियों और फरीसियों के पास जाना था कि, देखो ! तुमने षड़यंत्र रचा, तुमने मुझे क्रूस पर चढ़वा दिया, तुमने मेरे विरोध में झूठे आरोप लगाए । मगर अब देखो क़ब्र का पत्थर लुढ़का हुआ है । मैं मृत्यु पर जयवन्त हुआ हूं । देखो! मैं तुम्हारे सामने खड़ा हूं । प्रभु यीशु मसीह को तो उन लोगों के पास होना था जिन्होंने उसका अपमान किया था । जिन्होंने उसको थप्पड़ मारे थे । जिन्होंने उसको कांटों का ताज पहनाया था । जिन्होंने उसका मज़ाक उड़ाया था । जिन्होंने उसके मुंह पर थूका था । प्रभु यीशु मसीह को तो उनके पास जाना चाहिए था और उनसे कहना चाहिए था कि तुम्हारा अपमान, तुम्हारा थूक, तुम्हारे थप्पड़ और तुम्हारा षड़यंत्र सब कुछ व्यर्थ हो गया । प्रभु यीशु मसीह को तो यहूदियों की महासभा के सामने होना था । उनकी संसद में उसे होना था और कहना था कि देख लो ! सारी शक्तियां मेरे विरोध में थीं, लेकिन मैंने मृत्यु की शक्ति को परास्त कर दिया और मैं तुम्हारी संसद में खड़ा हूं। तुम्हारे अगुवे मुझको देख सकते हैं। मेरे पंजर को देख सकते हैं । मेरे शरीर को देख सकते हैं । देखो ! तुम्हारी शक्ति व्यर्थ हो गई । परन्तु प्रभु यीशु मसीह उन दो साधारण से लोगों के साथ जो किसी गांव की यात्रा कर रहे हैं, जो ख़ामोशी से एकान्त में चले जा रहे हैं; चुपचाप चला जाता है। हम जानते हैं कि प्रभु यीशु मसीह का कार्य करने का तरीका बड़ा भिन्न है । उसका जन्म भी कुछ इसी प्रकार हुआ था । उसके जन्म की घटना और इस घटना में भी यही समानता है । प्रभु यीशु मसीह का जन्म राजमहलों में नहीं हुआ। जब ज्योतिषी संसार के राजा को ढूंढने आए तो हेरोदेस के महल में जाकर पूछते हैं- संसार का राजा जिसकी खबर हमें मिली है, क्या वह यहां पैदा हुआ है? राजमहलों में उसे ढूंढा जा रहा है कि कोई राजकुमार पैदा हुआ है क्या ? परन्तु प्रभु यीशु मसीह एक छोटे से गांव बैतलहम के गौशाले में जानवरों के बीच एक चरनी में पड़ा है । वह बैतलहम की उस गुमनाम सी चरनी में पड़ा हुआ है । प्रभु यीशु मसीह के जन्म का सुसमाचार किसी महासभा में नहीं दिया जा रहा, किसी राजधानी की सड़कों पर नहीं सुनाया जा रहा । उसके जन्म का सुसमाचार तो साधारण से गड़ेरियों को दिया जा रहा है । प्रभु यीशु मसीह के कार्य करने का तरीका हमारे तरीकों से, हमारी सोच से और संसार के तरीकों से भिन्न है । उसके पुनरुत्थान की घटना घटी है लेकिन कहीं कोई शोर-शराबा नहीं हो रहा है । कोई जुलूस नहीं निकल रहा । कहीं कोई जय-जयकार नहीं हो रहा । दो साधारण से लोग चले जा रहे हैं और प्रभु यीशु मसीह बड़ी दीनता के साथ उनके पास आता है । आज भी यह प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवनों में बड़े साधारण तरीके से आता है । कोई हमसे मिलने आ गया और उससे हमने बात की, थोड़ी सी देर बैठकर उसने हमको प्रभु यीशु मसीह के विषय में बता दिया । कहीं कोई अकाल आ गया, लोगों ने कहा बच्चों को कहां ले जाएं । ढूंढने पर जगह नहीं मिली और फिर मिला तो एक छोटा सा अनाथालय । वहां लाकर बच्चे को डाल दिया । वहां उसने प्रभु का परिचय पाया । हॉलमेन हन्ट की पेन्टिंग में हम पाते हैं कि प्रभु यीशु मसीह दरवाज़े को खटखटा रहा है । वह खड़ा हुआ है और दरवाज़ा खटखटा रहा है । वचन भी हमें बताता है कि - वह दिल के द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता है । वह दरवाज़े को तोड़ता नहीं, अपने आपको लादता नहीं, किसी बड़े दबाव के साथ नही ंआता, जीवन में नाटकीयता के साथ नहीं आता, कोई नाटकीय परिवर्तन नहीं होता । एलिय्याह के विषय में हम पाते हैं कि वह पर्वत पर है और तब १ राजा १९:११ में लिखा है - ``यहोवा पास से होकर चला, और यहोवा के सामने एक बड़ी प्रचण्ड आंधी से पहाड़ फटने और चट्टानें टूटने लगीं, तौभी यहोवा उस आंधी में न था; फिर आंधी के बाद भंूईडोल हुआ, तौभी यहोवा उस भूंईडोल में न था । फिर भूंईडोल के बाद आग दिखाई दी, तौभी यहोवा उस आग में न था; फिर आग के बाद एक दबा हुआ धीमा शब्द सुनाई दिया'' । इस आंधी, और तूफान, और भूकम्प, और चट्टानों के तड़कने, पहाड़ के फटने में यहोवा नहीं है । वरन् लिखा है - एक धीमा शब्द हुआ। उसके आगे लिखा हुआ है - ``यह सुनते ही एलिय्याह ने अपना मुंह चादर से ढांपा, और बाहर जाकर गुफा के द्वार पर खड़ा हुआ । फिर एक शब्द उसे सुनाई दिया, कि हे एलिय्याह तेरा यहां क्या काम'' । नहेमायाह के बारे में हम जानते हैं कि वह अर्तक्षत्र राजा के महल में उसका पियाऊ था । वह नहीं जानता था कि क्या होने वाला है। वह नहीं जानता था कि यरूशलेम की जो शहरपनाह है, उसे उसको बनाना है क्योंकि वहां के फाटक जले हुए हैं और शहरपनाह टूटी हुई है । इस घटना का प्रारम्भ बड़े साधारण तरीके से होता है । लिखा हुआ है - ``तब हनानी नाम मेरा एक भाई और यहूदा से आए हुए कई एक पुरुष आए; तब मैं ने उन से उन बचे हुए यहूदियों के विषय जो बन्धुआई से छूट गए थे, और यरूशलेम के विषय में पूछा। उन्होंने मुझ से कहा, जो बचे हुए लोग बन्धुवाई से छूटकर उस प्रान्त में रहते हैं, वे बड़ी दुर्दशा में पड़े हैं, और उनकी निन्दा होती है; क्योंकि यरूशलेम की शहरपनाह टूटी हुई, और उसके फाटक जले हुए हैं'' (नहेमायाह १:२,३) । कुछ लोग उससे मिलने के लिए उस राजदरबार में आए, जहां नहेमायाह था। यह कुछ ऐसा है जैसे कि हमारे गांव से कोई आए, हम उन्हें बिठाएं और उनसे पूछें कि कैसे हैं हमारे गांव के लोग ? कैसे हैं हमारे अपने प्रिय लोग ? कैसे हैं हमारे मुहल्ले के लोग और कैसी है हमारे शहर की हालत ? फिर लिखा हुआ है कि - ``ये बातें सुनते ही मैं बैठकर रोने लगा और कितने दिन तक विलाप करता; और स्वर्ग के परमेश्वर के सम्मुख उपवास करता और यह कहकर प्रार्थना करता रहा'' (नहेमायाह १:४) । जब प्रभु यीशु मसीह हमारे जीवनों में आता है तो वह छोटी-छोटी घटनाआें से आता है । छोटी-छोटी मुलाकातों से आता है । छोटी-छोटी त्रासदियों से, जीवन के दु:खों के बीच; आता है । यह प्रभु यीशु मसीह हमारे दिल के दरवाज़े को खटखटाता है । दीनता के साथ, नम्रता के साथ, ख़ामोशी के साथ । वह किसी बड़ी आवाज़ के साथ नहीं आता । किसी बिग बैंग (धमाके) के साथ नहीं । हल्ले-गुल्ले के साथ नहीं परन्तु एक हल्की सी, दबी हुई धीमी आवाज़ के साथ। मुझे याद है सन् १९७१ की वह घटना । उन दिनों मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारे एक शिक्षक थे, श्री एलेग्ज़ेन्डर सिंग, एक दिन वे आए और कहने लगे कि दमोह में एक अर्न्तशालेय वाद-विवाद प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है । उसमें हाई स्कूल के छात्रों को भाग लेना है । विषय के पक्ष में बोलने के लिए तो छात्र तैयार हैं परन्तु विपक्ष में बोलने वाला कोई नहीं है । तब मेरा नाम सामने आया । उस समय उससे पहले मैंने कभी इस तरह की प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया था, कभी मंच पर बोला भी नहीं था । परन्तु शिक्षकों के प्रोत्साहन पर मैंने उस प्रतियोगिता में भाग लिया। जहां मुझे खड़ा होना था, वहां पर मुझे ऊंचा होकर खड़ा होना पड़ा क्योंकि अगर मैं ऊं चाई पर न खड़ा होता तो पुलपिट के पीछे पूरी तरह ढंक जाता । मैं वहां पर बोला और प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत भी हुआ । तब मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैं बोल सकता हूं। उस छोटी सी घटना में परमेश्वर की उपस्थिति थी । उस छोटी सी घटना में परमेश्वर की बड़ी प्रेरणा थी । एक और घटना का ज़िक्र करूंगा । यह सन् १९८८ की बात है । हम लोग छुटि्टयां मनाने मेरी ससुराल बैतलपुर गए हुये थे । हमें वहां सात दिन रुकना था । वापिस लौटने के दो दिन पहले मेरी पत्नी इन्दु ने कहा कि एक दिन पहले वापिस लौट जाएंगे । ऐसा सामान्यत: होता नहीं था और मेरी समझ में कुछ नहीं आया । मैं कहने लगा कि रिज़र्वेशन्स हो गए हैं । एक दिन पहले लौटने की क्या बात है । उसने कहा - नहीं, मुझे लगता है कि एक दिन पहले चले चलें तो ठीक रहेगा । हम लोग एक दिन पहले दमोह वापिस आ गए । उसके बाद समाचार सुना कि दूसरे दिन जिस ट्रेन में रिज़र्वेशन था, उसके एयर कंडीशन्ड कोच में आग लग गई और १२ लोग जलकर मर गए । जीवन की छोटी-छोटी बातों में, छोटी-छोटी घटनाआें में परमेश्वर हमको सन्देश देता है । प्रभु यीशु मसीह हमसे मिलता है । प्रभु यीशु मसीह हमसे बातचीत करता है । हो सकता है किसी प्रिय की मृत्यु का समय हो, और किसी प्रियजन का हाथ कन्धे पर हो । हो सकता है किसी की प्रार्थना हो । हो सकता है किसी के प्रेम के, प्रेरणा के शब्द हों । प्रभु यीशु मसीह अपने पुनरुत्थान के बाद दो लोगों के साथ चला जा रहा है। यह वही प्रभु यीशु मसीह है जो गौशाले में पैदा हुआ था। यह वही प्रभु यीशु मसीह है जिसने ऐसे ऐसों को चुन लिया जो निम्न समझे जाते हैं, जो तुच्छ हैं, जो नाकामयाब हैं, जिनकी संसार में कोई गिनती नहीं । उनको यह प्रभु यीशु मसीह चुनता है । मुझे और आपको चुनता है, और अपनी सेवा के लिए बुलाता है । अपने कार्य के लिए आगे बढ़ाता है । २. परमेश्वर मेरे और आपके लिए ठहरता है :- लूका २४:१७ से आगे हम पाते हैं - ``उस ने उन से पूछा; ये क्या बातें हैं, जो तुम चलते-चलते आपस में करते हो ? वे उदास से खड़े रह गए । यह सुनकर, उनमें से क्लियुपास नाम एक व्यक्ति ने कहा; क्या तू यरूशलेम में अकेला परदेशी है; जो नहीं जानता, कि इन दिनों में उस में क्या-क्या हुआ है ? उस ने उन से पूछा; कौन सी बातें ? उन्हों ने उस से कहा; यीशु नासरी के विषय में जो परमेश्वर और सब लोगों के निकट काम और वचन में सामर्थी भविष्यवक्ता था। और महायाजकों और हमारे सरदारों ने उसे पकड़वा दिया, कि उस पर मृत्यु की आज्ञा दी जाए, और उसे क्रूस पर चढ़वाया। परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्राएल को छुटकारा देगा, और इन सब बातों के सिवाय इस घटना को हुए तीसरा दिन है। और हम में से कई स्त्रियों ने भी हमें आश्चर्य में डाल दिया है, जो भोर को क़ब्र पर गई थंीं । और जब उस की लोथ न पाई, तो यह कहती हुई आइंर्, कि हम ने स्वर्गदूतों का दर्शन पाया, जिन्हों ने कहा कि वह जीवित है । तब हमारे साथियों में से कई एक क़ब्र पर गए और जैसा स्त्रियों ने कहा था, वैसा ही पाया; परन्तु उस को न देखा'' । प्रभु यीशु मसीह धैर्य से अपनी ही कहानी उनके मुख से सुन रहा है । वे कहते हैं - तू कैसा अजनबी व्यक्ति है ? क्या तू नहीं जानता कि यरूशलेम में क्या घटनाएं हुई हैं । प्रभु यीशु उनसे पूछता है - कौन सी घटनाएं हुई हैं ? तब वे सारी बातें उसे बताते हैं । प्रभु यीशु मसीह धैर्य से उनकी बात को सुनता है । वह तो इन सारी घटनाआें का नायक है । परन्तु साधारण लोगों से वह उनकी बातें सुनता है । मैं और आप अगर प्रभु यीशु मसीह की जगह होते तो शायद हम कहते - अरे ! तुम लोग क्या बात कर रहे हो ? किससे बात कर रहे हो, यह जानते भी हो ? अरे ! तुम्हें क्या मालूम ? तुमने तो ये बातें सुनी हैं लेकिन मैं तो उनसे गुज़रा हूं । मैं ही प्रभु यीशु मसीह हूं । परन्तु ऐसा नहीं हुआ । वह बड़े धैर्य और ख़ामोशी से उनकी बातों को सुनता रहा। परमेश्वर धैर्य रखने वाला परमेश्वर है । वह धीरज धरता है । मेरे और आपके लिए भी परमेश्वर धीरज धरता है । पुराना और नया नियम के बीच में लगभग ४०० वर्षों का अन्तराल है। आप कल्पना कीजिए कि इतने वर्षों तक परमेश्वर ख़ामोश रहा । टीकाकारों ने इसे अन्धकार और निराशा का काल कहा है। इन ४०० वर्षों तक परमेश्वर ने किसी भविष्यवक्ता के द्वारा लोगों से बात नहीं की । आप कल्पना कीजिए कि १२ पीढ़ियां इस ख़ामोशी में गुज़र गइंर् और परमेश्वर ठहरा रहा । परमेश्वर ठहरा रहा तब तक, जब तक कि यहूदी धर्म का सारे संसार में प्रचार नहीं हो गया । परमेश्वर ठहरा रहा तब तक, जब तक कि यूनानी भाषा सारे संसार की भाषा न बन गई । जब तक संसार में उस समय के लोग यूनानी भाषा को सुनने, समझने और बोलने नहीं लगे । परमेश्वर ठहरा रहा तब तक, जब तक कि रोमी सम्राट ने सारे विश्व पर राज्य न कर लिया और विश्व में सड़कें बनने लगीं । परमेश्वर ठहरा रहा कि प्रचारकों के लिए सड़कें बन जाएं, जिसके द्वारा सारे जगत में वचन का प्रचार हो सकेगा । गलतियों ४:४ में लिखा है - ``जब समय पूरा हुआ, तो परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा'' । समय की परिपूर्णता होने तक, वर्षों तक, सदियों तक, पीढ़ियों तक परमेश्वर ठहरा रहा । और तब प्रभु यीशु मसीह का जन्म हुआ, तब भी परमेश्वर ठहरा रहा। कुछ समय लगा होगा जब यीशु बोलने लगा होगा, कुछ समय लगा होगा जब वह चलने लगा होगा । प्रभु यीशु मसीह चाहता तो एक बड़ी आवाज़ के साथ किसी राजकुमार के समान आकाश से उतरता और कहता - परमेश्वर तुमसे क्या कहना चाहता है मैं तुम्हें बताता हूं । परन्तु वह तीस वर्षों तक ठहरा रहा, इससे पहले कि वह अपनी सेवकाई प्रारम्भ करे । क़ब्र के बन्ध में वह मेरे और आपके लिए तीन दिनों तक ठहरा रहा, इससे पहले कि वह पुनर्जीवित हो जाए । इम्माऊ स की राह पर भी कुछ घंटों तक ख़ामोशी से यह प्रभु यीशु मसीह उन दो अजनबियों के साथ ठहरा रहा। परमेश्वर मेरे और आपके लिए ठहरता है । परमेश्वर हमको मौका देना चाहता है । परमेश्वर हमारे लिए प्रतीक्षा करता है । एक-एक दिन वह हमारे लिए ठहरा हुआ है । २ पतरस ३:९ में लिखा है - ``प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता, कि कोई नाश हो; वरन् यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले'' । ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाआें को पूरी नहीं करता। परन्तु वह धीरज धरता है । क्योंकि वह मुझसे और आपसे प्रेम करता है । वह चाहता है कि कोई नाश न हो । वह चाहता है कि हर एक को पश्चात्ताप का अवसर मिले । इस धैर्य को हमें परमेश्वर की कमज़ोरी नहीं समझना है। परमेश्वर के धीरज को हमें परखना नहीं है कि हम लगातार पाप करते जाएं और यह सोचें कि उसका अनुग्रह बना रहेगा । हमें उसके धैर्य की परीक्षा नहीं करना है । क्योंकि प्रभु यीशु मसीह एक दिन आएगा और तब मेरे और आपके लिए समय नहीं होगा । वह हमारा न्याय करेगा। इसीलिए यशायाह लिखता है कि हम परमेश्वर के धैर्य को न परखें क्योंकि वह दिन अचानक से आ पड़ेगा । वचन में लिखा है कि वह चोर की नाईर्ं आ जाएगा। वह ऐसे समय में आ जाएगा जबकि हम सोचते भी नहीं । सदोम और अमोरा पर जब आग बरसी तो अचानक से बरसी । जब जल प्रलय आया तो अचानक से आ गया । उसी प्रकार प्रभु यीशु मसीह किसी भी दिन आ जाएगा । अभी वह मेरे और आपके लिए ठहरा हुआ है क्योंकि वह धीरज धरता है, अवसर देता है, समय देता है । ३. परमेश्वर का वचन अटल और सत्य है:- लूका २४:२५-२७ में लिखा हुआ है - ``तब उस ने उन से कहा; हे निर्बुद्धियों, और भविष्यवक्ताआें की सब बातों पर विश्वास करने में मन्दमतियो ! क्या अवश्य न था, कि मसीह ये दुख उठाकर अपनी महिमा में प्रवेश करे ? तब उस ने मूसा से और सब भविष्यवक्ताआें से आरम्भ करके सारे पवित्र शास्त्रों में से, अपने विषय में की बातों का अर्थ, उन्हें समझा दिया''। प्रभु यीशु मसीह उनसे बातें करता है । आप कल्पना कीजिए कि ये लोग बात कर रहे हैं और जानते नहीं कि उनके साथ कौन चल रहा है । तब प्रभु यीशु मसीह वचन की सारी बातों को, भविष्यवक्ताआें की बातों को उन्हें समझाता है । वह उनसे कहता है कि हे मन्दमतियो, हे निर्बुद्धियों, तुम इन बातों को जानते नहीं कि ये परमेश्वर के वचन में लिखी हुई बातें हैं । क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का वचन अटल और सत्य है । संभवत: उसने उन्हें बताया होगा उत्पत्ति ३:१५ में लिखी गई भविष्यवाणी के बारे में, जहां पर मूसा ने लिखा है कि किस प्रकार से वह सर्प को कुचलेगा । उसने उन्हें बताया होगा, मीका नबी की पुस्तक के बारे में, जहां पर लिखा है कि वह बैतलहम में पैदा होगा। प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें बताया होगा कि दाऊ द भजन संहिता में लिखता है कि किस प्रकार वह क्रूस पर चढ़ाया जाएगा । (बाइबिल में क्रूस पर प्रभु यीशु मसीह के चढ़ाए जाने के विषय में ३७ भविष्यवाणियां हैं, जो पूरी हुई हैं) । उसने बताया होगा कि किस प्रकार दाऊ द की यह भविष्यवाणी पूरी हुई कि लोग उसके कपड़ों को बांट लेंगे । उसने यशायाह भविष्यवक्ता के विषय में बताया होगा कि वह हमारे पापों के लिए मारा गया और उसके कोड़े खाने से हम शुद्ध हुए । इन सब भविष्यवक्ताआें की बातें प्रभु यीशु मसीह ने संभवत: बताई होंगी और तब कहा होगा कि क्या तुम जानते नहीं कि वचन में जो लिखा हुआ है वह सत्य है और उन बातों को अवश्य पूरा होना था । यीशु मसीह को दु:ख उठाना था । उसने उन्हें बताई होगी इब्राहीम और इसहाक की वह घटना, जब इसहाक को इब्राहीम परमेश्वर के सामने ले गया । वेदी बनाकर जब उसको मारने के लिए अपना हाथ उठाया तो परमेश्वर ने उसे रोक लिया। एक प्रकार से वह एक झलक थी प्रभु यीशु मसीह की । वह झलक थी इस बात की कि किस प्रकार परमेश्वर इब्राहीम से कहीं ज़्यादा आगे बढ़ जाता है। वह मेरे और आपसे अपने प्रेम के कारण प्रभु यीशु मसीह को बलिदान कर देता है । प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें बताया होगा कि दाऊद लिखता है कि उसकी देह कभी सड़ने नहीं पाएगी । उसने उन्हें प्रभु यीशु मसीह के जन्म के समय की भविष्यवाणियां बताई होंगी कि वह कुंवारी से जन्मेगा, वह बैतलहम में जन्मेगा, वह दाऊ द के घराने से होगा । प्रभु यीशु मसीह उनको समझाता है । मेरे और आपके लिए जो बात है वह यह कि प्रभु यीशु मसीह कहता है कि मेरा वचन अटल है । वह सत्य है । वह कभी टलेगा नहीं। आकाश और पृथ्वी भले टल जाएं परन्तु मेरी बातें कभी नहीं टलेंगी। इसीलिए आज भी परमेश्वर का वचन हमसे बातचीत करता है । अनन्त जीवन के विषय में हमको बताता है । प्रभु यीशु मसीह के दूसरे आगमन के विषय में हमको बताता है । वचन हमें बताता है कि पाप की मज़दूरी तो मृत्यु है परन्तु परमेश्वर का वरदान अनन्त जीवन है । वह हमको कल के लिए चिताता है कि हम चेत जाएं । हम पश्चात्ताप करें । हम उसके रास्ते पर लौट आएं । हम उसके वचन के अनुसार अपने जीवनों को बना सकें । आवश्यकता इस बात की है कि उस वचन के अनुसार हम चलें। अपने दिलों में, अपने जीवनों में, अपने कार्यों में उस वचन को उतारें और प्रभु यीशु मसीह के वचनों के अनुसार अपने जीवनों को बनाएं । अपनी मृत्यु के लिए तैयार रहें । अपने अन्त के लिए तैयार रहें। प्रभु यीशु मसीह के दूसरे आगमन के लिए तैयार रहें । ४. प्रभु यीशु परिवर्तन लाता है :- लूका २४:३० में लिखा हुआ है - ``जब वह उन के साथ भोजन करने बैठा, तो उस ने रोटी लेकर धन्यवाद दिया, और उसे तोड़कर उन को देने लगा । तब उनकी आंखें खुल गइंर्; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उन की आंखों से छिप गया । उन्होंने आपस में कहा; जब वह मार्ग में हम से बातें करता था, और पवित्र शास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हुई ? वे उसी घड़ी उठकर यरूशलेम को लौट गए, और उन ग्यारहों और उन के साथियों को इकट्ठे पाया। वे कहते थे, प्रभु सचमुच जी उठा है, और शमौन को दिखाई दिया है । तब उन्होंने मार्ग की बातें उन्हेें बता दीं और यह भी कि उन्होंने उसे रोटी तोड़ते समय क्योंकर पहचाना'' । इससे पहले के तीन पदों में हम पाते हैं कि प्रभु यीशु मसीह आगे बढ़ना चाहता था परन्तु उन्होंने उसको रोक लिया । वे उससे और बातें सुनना चाहते होंगे । उसके बाद वे भोजन करने बैठे । जब प्रभु यीशु मसीह ने उन्हें रोटी दी तो उनकी आंखें खुल गइंर् । मेरे विचार से ऐसा नहीं हुआ होगा कि कोई आश्चर्य कर्म हो गया हो । वरन् जब प्रभु यीशु मसीह ने रोटी तोड़ी और जैसे ही वह रोटी उनको देने लगा तो उन्होंने प्रभु यीशु मसीह के हाथ को देखा होगा । उस स्थान को देखा होगा जहां पर कीलें ठोंकी गइंर् थीं और उनकी आंखें खुल गइंर्। उसी समय प्रभु यीशु मसीह उनके पास से ओझल हो गया । उसके बाद लिखा हुआ है कि वे उसी घड़ी वहां से चल दिए। उसी रात वे दौड़कर यरूशलेम पहुंचे, जहां से वे लौटे थे । आधी रात को उठकर वे सात मील दूर वापस चले गए । वे जाकर लोगों को इकट्ठा करने लगे और उन्हें बताने लगे कि प्रभु यीशु जी उठा है । उसने शमौन को दर्शन दिया है । उसने मार्ग में हमसे बातें की हैं । वह जीवित प्रभु है । जो बात थी वह यह कि प्रभु यीशु मसीह ने उनको बदल दिया था । क्योंकि यह प्रभु यीशु मसीह बदल देने वाला प्रभु है । वह इस संसार में आया कि संसार को बदले । वह आज भी मुझे और आपको बदलता है । वह परिवर्तन लाने वाला प्रभु है । आइए, हम देखें कि प्रभु यीशु मसीह ने उनको किस प्रकार बदला । अ. वे निराश थे । परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने उनकी निराशा को आनन्द में बदल दिया । वे निराश थे लेकिन प्रभु से मिलकर आनन्दित हो गए । यह प्रभु यीशु मसीह है जो हमारे जीवन की निराशा को दूर करता है । वे प्रभु से कहते हैं कि हम सोचते थे कि इन सारी बातों से हमें यीशु मुक्ति दिलाएगा और राजा बन जाएगा। उसके द्वारा हमारे जीवनों में एक आशा आएगी। यीशु की मृत्यु से वे निराश थे । परन्तु लिखा हुआ है कि इम्माऊस के रास्ते पर जब पुनरुत्थित प्रभु यीशु मसीह उनके साथ आया, तो यह निराशा दूर हो गई। वे आनन्दित हो उठे । वे उत्साहित हो उठे। हमारे जीवनों की निराशा भी प्रभु यीशु मसीह दूर कर सकता है। हो सकता है, हम अपने जीवनों में निराश हों । अपने प्रियजनों से निराश हों । अपने आस-पास की परिस्थितियों से निराश हों । संसार की बातों से निराश हों । जो कुछ हमारे साथ घट रहा है उससे निराश हों । परन्तु जीवन के रास्ते पर जब प्रभु यीशु मसीह हमसे मिलता है और हमारे साथ आता है तो हमारे जीवन की निराशा को आनन्द में बदल देता है । ब. प्रभु यीशु से मिलकर उनकी मानसिकता बदल गई । उन लोगों के मनों में शंका थी । वे कहते हैं कि हमने ऐसा सुना है । हम देखने गए तो वह हमको मिला नहीं । ये सब बातें हम सुन रहे हैं । परन्तु जब प्रभु यीशु मसीह उनसे मिलता है तो इनकी सारी शंकाएं दूर हो जाती हैं और विश्वास पैदा हो जाता है । हमारे जीवनों में भी कई प्रकार की शंकाएं होती हैं । धीरे-धीरे ये हमारे जीवन में घर करती जाती हैं । ये शंकाएं हमको परमेश्वर से दूर ले जाती हैं । हमारे विश्वास को कमज़ोर करती हैं । परन्तु हमारे जीवन के रास्ते पर जब प्रभु यीशु मसीह आता है तो ये शंकाएं दूर हो जाती हैं, हमारा विश्वास मज़बूत हो जाता है । स. प्रभु यीशु मसीह से मिलकर उनकी योजना बदल गई। प्रभु यीशु मसीह ने उनके स्वभाव को बदल दिया । उनकी मानसिकता को बदल दिया । उनकी योजना बदल गई । रात बहुत बीत चुकी थी और भोजन करके शायद वे सोने जा रहे थे । उन्होंने तो अपनी यात्रा पूरी कर ली थी । शायद वे सोचते होंगे कि अब हम अपने बिस्तरों पर जाएंगे । परन्तु जब उन्होंने प्रभु यीशु मसीह को पहचान लिया तो उसी घड़ी वे उठते हैं और भागकर सात मील जाते हैं । यरूशलेम में लोगों को जमा करते हैं और बताते हैं कि प्रभु यीशु मसीह जीवित हो गया है । उसने हमें दर्शन दिया है । उसने हमसे बातें की हैं । द. प्रभु यीशु ने उनके लक्ष्य को बदल दिया । हमारे जीवनों में जब प्रभु यीशु मसीह आता है तो हमारे जीवनों की योजनाआें को बदलता है । हमारी मानसिकता को बदलता है । हम पाते हैं कि उसने उनके लक्ष्य को भी बदल दिया। उनका उद्देश्य तो रहा होगा कि बातचीत करेंगे । वे दो लोग थे । शायद वे रिश्तेदार रहे हों । हो सकता है मित्र हों । हो सकता है पड़ोसी हों । वे बातचीत कर रहे थे उन घटनाआें के बारे में, जो घट रही थीं । जैसे हम आपस में चर्चा करते हैं, न्यूज़ पेपर में पढ़ते हैं, टेलीविज़न में देखते हैं । परन्तु प्रभु यीशु मसीह से मिलकर उनका लक्ष्य बदल गया । अब लक्ष्य यह नहीं रह गया कि बैठकर चर्चा करें । अब लक्ष्य यह नहीं था कि वाद-विवाद करें कि वास्तव में यह प्रभु यीशु मसीह था या हमको धोखा हुआ। अब इनका लक्ष्य बदल गया । वे चले गए । उन्होंने लोगों को जमा किया और रात में ही जाकर प्रचार करने लगे कि प्रभु यीशु जीवित हो गया है । उसने हमें दर्शन दिया है । उसने हमसे बातें की हैं । उसने हमारे जीवन में क्रांति ला दी है । यह प्रभु यीशु मसीह है जो अपने जन्म से, अपने बचपन से लोगों को बदल रहा है । जिसने गड़ेरियों को बदल दिया । मरियम-यूसुफ को बदल दिया । ज्योतिषियों को बदल दिया । लिखा हुआ है कि जब ज्योतिषी प्रभु यीशु मसीह से मिलकर लौटे तो वे दूसरी राह से लौट गए । उनकी राह बदल गई । यह प्रभु यीशु मसीह है जो जीवन में परिस्थितियों को बदल देता है । यह प्रभु यीशु मसीह है जिसने अपनी मौत के समय भी क्रूस पर उस डाकू को बदल दिया । यह प्रभु यीशु मसीह है जो आज भी हमारे जीवनों को बदल सकता है । हमारे पत्थर के हृदयों को लेकर वह उन्हें पिघला सकता है । अभी तक हमारे जीवन में भौतिकता की प्राथमिकता है । परन्तु यह प्रभु यीशु मसीह जब हमारे जीवनों में आता है, हमसे बातचीत करता है, तो हमारी जीवन की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं । दुनिया में कितने ऐसे राजा हुए जिन्होंने अपने राज्य को बढ़ाने के लिए दूसरों के प्राण ले लिए । परन्तु हमारा राजा ऐसा है जो सबको बचाने के लिए खुद अपने प्राणों को देता है । कितने राजा हुए जो अधिकारी और तानाशाह बनकर आए और इस संसार पर राज्य किया। परन्तु यह हमारा ऐसा राजा है जो दास का सा स्वरूप धारण करता है । बड़े-बड़े राजाआें की मृत्यु हो गई । उनकी देह सड़ गई । वे मिट्टी में मिल गए । उनके राज्य धराशायी हो गए । परन्तु यह प्रभु यीशु मसीह आज भी ज़िन्दा है । उसकी कलीसिया (उसकी देह) सारे संसार में है । आज भी वह अपने वचन के द्वारा हमसे बातचीत करता है । यह प्रभु यीशु मसीह है, जो जीवन की परिस्थितियों के द्वारा हमको बदलता है । ऐरिक बार्कर नाम के एक मिशनरी थे जो इंग्लैण्ड से पुर्तगाल में सेवा करने के लिए आए । वचन का प्रचार करने के लिए वे ५० वर्षों तक पुर्तगाल में रहे । ऐरिक बार्कर के जीवन में बहुत सी समस्याएं आइंर् और जब दूसरा महायुद्ध प्रारम्भ हुआ तो उन्होंने निर्णय किया कि वे अपनी पत्नी और अपने ८ बच्चों को वापिस इंग्लैण्ड भेज देंगे। उस लम्बी यात्रा में मदद के लिए उन्होंने अपनी बहन को बुलाया । उनकी बहन और उसके ३ बच्चे साथ में आए। उन्होंने अपनी पत्नी, अपने ८ बच्चों, अपनी बहन और उनके ३ बच्चों को विदा किया । पानी के जहाज़ से यह यात्रा प्रारम्भ हुई। उन्हें रवाना करने के ५ दिन के बाद रविवार को ऐरिक बार्कर परमेश्वर का वचन सुनाने के लिए खड़े हुए । उन्होंने बताया कि मुझे अभी-अभी सन्देश मिला है कि मेरी पत्नी और मेरी बहन और ११ बच्चे, सबके सब सुरक्षित अपने घर पहुंच गए हैं । लोगों ने सोचा कि वे सुरक्षित इंग्लैण्ड अपने घर पहुंच गए होंगे परन्तु जब आराधना समाप्त हुई तो पता चला कि जब वे सब जहाज़ से लौट रहे थे तो समुद्री तूफान आया और जहाज़ डूब गया। ऐरिक बार्कर की पत्नी, उनकी बहन और वे ग्यारहों बच्चे उस हादसे में मारे गए । ऐरिक बार्कर जानते थे कि उन लोगों ने प्रभु यीशु मसीह को पहचाना है । त्रासदी ने मार तो दिया परन्तु वे अपने घर पहुंच चुके थे। अपनी यात्रा उन्होंने पूरी कर ली थी । अर्थात् वे अपने अनन्तकाल के घर पहुंच चुके थे । निष्कर्ष :- प्रभु यीशु मसीह है जो जीवन की त्रासदियों को भी बदलता है। प्रभु यीशु मसीह है जो मेरी और आपकी मृत्यु को भी बदल सकता है । जीवन का और मृत्यु का द्वार बदल सकता है । प्रभु यीशु मसीह इस संसार में आया कि हमको बदले, मुझको बदले, आपको बदले । प्रभु यीशु मसीह जब दीनता से हमारे पास आता है तो क्या उसको हम अपने जीवनों में स्थान देते हैं ? परमेश्वर आपको आशीष दे ।