लूका 8:1-3 परिचय :- ईस्टर सप्ताह के दौरान बहुत सी घटनाआें और लोगों के विषय में हम अध्ययन करते हैं। हम उन लोगों के विषय में जानकारी प्राप्त करते हैं जो उस समय प्रभु यीशु मसीह के साथ-साथ रहे । उनमें एक बहुत प्रमुख स्त्री थी मरियम मगदलीनी । मरियम मगदलीनी अन्तिम समय तक प्रभु यीशु मसीह के प्रति विश्वासयोग्य बनी रही । बाइबिल में मरियम मगदलीनी का वर्णन ६ स्थानों पर पाया जाता है। प्रभु यीशु मसीह ने उसमें से ७ दुष्टात्माएं निकाली थीं (लूका ८:२ और मरकुस१६:९ ) । मरियम मगदलीनी इसलिए और भी विशिष्ट हो जाती है क्योंकि प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान का सबसे पहला प्रगटीकरण इसी मरियम मगदलीनी पर हुआ था । मरियम मगदलीनी में ऐसी कौन सी बात थी कि प्रभु यीशु मसीह ने उसको यह गौरव दिया कि उसके पुनरुत्थान का प्रगटीकरण सर्वप्रथम उस महिला पर हो ? ऐसी कौन सी विशिष्टता थी मरियम मगदलीनी में कि जीवन के अन्तिम समय तक और हर प्रकार की विषमताआें में भी, वह प्रभु यीशु मसीह के प्रति विश्वासयोग्य बनी रही? उसके जीवन से सम्बन्धित तीन बातों को हम देखेंगे । हम इस बात पर भी विचार करेंगे कि इन तीन बातों के परिप्रेक्ष्य में अपने जीवन में हम कहां पर हैं। १. मरियम मगदलीनी के जीवन और उसके हृदय में धन्यवाद था:- प्रभु यीशु मसीह ने उस पर बड़ा उपकार किया था । वह दुष्टात्माआें से ग्रसित थी। प्रभु यीशु मसीह ने न सिर्फ्र इन ७ दुष्टात्माआें से मुक्ति दिलाई थी परन्तु उसे उद्धार भी दिया था, उसे पापों की क्षमा दी थी, उसे नया जीवन दिया था । प्रभु यीशु मसीह ने उसे न सिर्फ्रशारीरिक चंगाई दी थी परन्तु आत्मिक चंगाई भी दी थी । प्रभु यीशु मसीह के इस उपकार के प्रति मरियम हमेशा धन्यवादित बनी रही । मरकुस १५:४०-४१ में हम पाते हैं कि जब प्रभु यीशु मसीह को कलवरी की राह पर ले जाया जा रहा था तो ये स्त्रियां भी उसके पीछे-पीछे चल रही थीं जो उसकी सेवा टहल किया करती थीं । इन स्त्रियों में मरियम मगदलीनी का वर्णन है । वह कलवरी की राह पर भी प्रभु यीशु मसीह के साथ थी क्योंकि वह उसके प्रति धन्यवादित थी । यूहन्ना १९:२५ में हम देखते हैं कि क्रूस के पास जहां यीशु की माता मरियम खड़ी थी, वहीं उसके साथ मरियम मगदलीनी भी खड़ी थी । जब चेले भाग गए थे। जब चेलों का विश्वास समाप्त हो गया था । जब पतरस जैसे लोग मुकर गए थे । जब शारीरिक रूप से बहुत बलिष्ठ और हृष्ट-पुष्ट ये चेले प्रभु यीशु मसीह को छोड़कर चले गए थे, तब मरियम मगदलीनी क्रूस के पास, यीशु के पास; उस समय भी खड़ी थी। मत्ती २७:६१ में हम पाते हैं कि मरियम मगदलीनी प्रभु यीशु मसीह की क़ब्र के पास बैठी हुई थी । वह क़ब्र जिसमें प्रभु यीशु मसीह को दफन किया जाना था, उस क़ब्र के पास मरियम मगदलीनी बैठी हुई थी । उसका कोई बड़ा सन्देश इस सन्दर्भ में नहीं मिलता कि उसने कोई बड़ी भारी बात कही । उसके कोई बड़े-बड़े संवाद वहां पर लिखे हुए नहीं हैं कि उसने प्रभु यीशु मसीह के लिए कोई बहुत बड़े-बड़े नारे लगाए या बड़ी ऊं ची आवाज़ से उसकी स्तुति और महिमा की । परन्तु उसके जीवन के द्वारा, प्रभु यीशु मसीह के पीछे-पीछे उसके चलने के द्वारा, उसकी सेवा के द्वारा, कलवरी की राह पर यीशु के साथ चलने के द्वारा, क्रूस के नीचे खड़े रहने के द्वारा और क़ब्र पर बैठे रहने के द्वारा मरियम मगदलीनी ने अपना धन्यवाद प्रभु यीशु मसीह को प्रगट किया । हमारे जीवनों में भी परमेश्वर बहुत से उपकार करता है । उसने हमारे जीवनों में ऐसे बहुत से उपकार किए हैं, जिनके योग्य हम नहीं थे । हमारी अपेक्षाआें से बढ़कर उसने हमें आशीषित किया है । हमारी प्रार्थनाआें को सुना है । हमको कठिनाइयों से उबारा है । उसने हमें नया जीवन दिया है । उद्धार दिया है और मृत्यु के बाद अनन्त जीवन की आशा दी है । परन्तु क्या हम वास्तव में प्रभु यीशु मसीह के प्रति धन्यवादित हैं? क्या हमारा यह धन्यवाद मात्र हमारे शब्दों तक ही सीमित है या हम अपने जीवन के कार्यों, व्यवहार और आचरण में इस धन्यवाद को प्रगट करते हैं ? बाइबिल में हम पाते हैं कि दस कोढ़ी थे, जिन्हें प्रभु यीशु मसीह ने चंगाई दी थी । उनमें से एक कोढ़ी लौटकर आता है और प्रभु यीशु मसीह को धन्यवाद देता है । चंगाई तो दसों ने पाई थी, शुद्ध तो दसों हुए थे । परन्तु एक है, जो कृतज्ञ है । एक है, जो धन्यवादित है । यदि आज भी हम इस संसार में देखें तो वही स्थिति और वही अनुपात है । ९० प्रतिशत लोग जिन पर परमेश्वर ने उपकार किया है, वे धन्यवादित नहीं हैं । शायद सिर्फ्र १० प्रतिशत लोग ही धन्यवादित हैं । उन नौ और एक कोढ़ियों का जो अनुपात था वही आज भी मसीही समाज में कायम है । हमारे जीवन में परमेश्वर के प्रति धन्यवाद होना चाहिए । यह धन्यवाद निरन्तर हमारे जीवनों, हमारे शब्दों, हमारे आचार-व्यवहार और हमारी प्रतिक्रियाआें से दिखना चाहिए । अपने जीवन में कितना समय हम व्यर्थ की आलोचना करते हैं, चिड़चिड़ाते हैं, बड़बड़ाते हैं, एक-दूसरे पर छींटाकशी करते हैं ? परन्तु ऐसा समय कितना होता है जब वास्तव में हम परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं ? जब हम अपने जीवन से, अपने शब्दों से और अपनी प्रार्थनाआें से परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं ? उसकी महिमा करते हैं ? उसकी उपासना और उसकी स्तुति करते हैं ? यदि कोई प्रश्न करे कि परमेश्वर ने मनुष्य को क्यों बनाया ? तो इसका जवाब यही है कि परमेश्वर ने मनुष्य को इसलिए बनाया कि उसके द्वारा परमेश्वर की महिमा हो । जब हम परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं तो वास्तव हम उसकी उपासना करते हैं । ऐसा करके हम वास्तव में उसकी आराधना करते हैं, उसको महिमा देते हैं । बाइबिल में धन्यवाद के सन्दर्भ भरे पड़े हैं । भजन संहिता में पहले अध्याय से लेकर अन्तिम अध्याय तक धन्यवाद, धन्यवाद और हर समय धन्यवाद की बात की गई है। दानिय्येल, जिसे सिंहों की मांद में डाल दिया गया था, वह प्रार्थना करता है - हे मेरे पूर्वजों के परमेश्वर मैं तेरा धन्यवाद करता हूं । मैं तेरी स्तुति करता हूं क्योंकि तूने मुझे बुद्धि दी है । तूने मुझे शक्ति दी है । तूने इन सिंहों का मुख बन्द किया है । इसलिए इस परिस्थिति में मैं तेरा धन्यवाद करता हूं । बाइबिल में योना की प्रार्थना का वर्णन है । वह मगरमच्छ के पेट में है, मगरमच्छ समुद्र में, और योना प्रार्थना कर रहा है । योना की पुस्तक के दूसरे अध्याय में उसकी इस खूबसूरत प्रार्थना का वर्णन है, जहां लिखा है :``मैं ऊं चे शब्द से धन्यवाद करके तुझे बलिदान चढ़ाऊंगा'' (२:९)। मरियम मगदलीनी के जीवन में कलवरी की राह पर भी धन्यवाद था । क्रूस के पास भी धन्यवाद था, क़ब्र के पास भी धन्यवाद था । २. मरियम मगदलीनी के जीवन में बाधाआें के बावजूद भी विश्वास था :- मरियम मगदलीनी प्रभु यीशु मसीह के प्रति धन्यवादित थी, इस कारण से वह कलवरी की राह पर भी मौजूद थी । मरकुस १६:१-३ में हम पाते हैं कि मरियम मगदलीनी और कुछ स्त्रियां प्रभु यीशु मसीह की क़ब्र के पास तीसरे दिन जा रही थीं ताकि उसकी देह पर सुगन्धित वस्तुएं मल सकें । वे चर्चा कर रही थीं कि वहां पर तो एक बहुत बड़ा पत्थर है उसे कौन लुढ़काएगा ? वे जानती थीं कि क़ब्र के द्वार पर एक पत्थर रखा हुआ है। वे जानती थीं कि वहां पर रोमी सम्राट ने अपने पहरुए बिठा दिए हैं । वे जानती थीं कि एक बड़ी मुहर उस पत्थर पर लगी है । परन्तु फिर भी उनके हृदय में विश्वास था । इसके बावजूद भी वे उस क़ब्र की ओर जा रही थीं कि प्रभु यीशु मसीह को अपना प्रेम प्रदर्शित कर सकें । उन्हें मालूम था कि पत्थर बहुत बड़ा है और उनमें इतनी शक्ति नहीं है कि वे पत्थर को हिला भी सकें । परन्तु फिर भी वे जा रही थीं। हमारे जीवन में भी ऐसे पत्थर आते हैं । हम में से कोई ऐसा नहीं है जिसके जीवन में ये पत्थर न आए हों। हमारे जीवन में समस्याआें के पत्थर आते हैं । हमारे जीवन में चिन्ताआें के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में बीमारियों के पत्थर होते हैं। हमारे जीवन में अपने प्रियों की मृत्यु के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में अनिश्चित भविष्य के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में भय के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में असुरक्षा की भावना के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में आलोचनाआें के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में धमकियों के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में धोखे के पत्थर होते हैं । हमारे जीवन में अपमान के पत्थर होते हैं और हमारे जीवन में ज़िम्मेदारियों के पत्थर होते हैं । हम चिन्ता करते हैं कि इन पत्थरों को कैसे हटाएंगे? ये पत्थर बहुत बड़े हैं और हम बहुत सीमित हैं । हम बहुत छोटे हैं । हम इन पत्थरों को कैसे हटाएंगे? परन्तु मसीही जीवन और मसीही विश्वास यह है कि यद्यपि पत्थर हटाने की क्षमता हम में न हो परन्तु हम उस राह पर बढ़ते चले जाएं । हम अपना प्रयास करते चले जाएं । असम्भव से दिखने वाले लक्ष्यों को पूरा करने के प्रयास में लगे रहें। जब हम मसीही विश्वास की राह पर आगे बढ़ते हैं तो ये पत्थर परमेश्वर अपनी दया से हटाता है । जब इस्राएली मिस्र की बन्धुवाई से निकले तो उनके सामने लाल समुद्र था और पीछे फिरौन की सेना । सवाल यह था कि यह लाल समुद्र कैसे पार होगा । परन्तु वहां पर परमेश्वर की सामर्थ्य थी जिसने कहा कि तुम समुद्र में उतरो और समुद्र दो भागों में विभाजित हो जाएगा । यशायाह ४५:२-३ में लिखा है - ``मैं तेरे आगे-आगे चलूंगा और ऊं ची-ऊं ची भूमि को चौरस करूंगा, मैं पीतल के किवाड़ों को तोड़ डालूंगा और लोहे के बेड़ों को टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा । मैं तुझ को अन्धकार में छिपा हुआ और गुप्त स्थानों में गड़ा हुआ धन दूंगा, जिस से तू जाने कि मैं इस्राएल का परमेश्वर यहोवा हूं जो तुझे नाम लेकर बुलाता है'' । हमारे जीवन में पीतल के किवाड़ तो आएंगे और लोहे के बेड़े भी आएंगे । पर इन पीतल के किवाड़ों को परमेश्वर तोड़ेगा और लोहे के बेड़ों को वह टुकड़े-टुकड़े कर डालेगा । यह उसकी प्रतिज्ञा है। परन्तु उस दिशा में प्रयास हमें करना है । परमेश्वर कहता है कि अन्धकार में छिपा हुआ धन मैं तुझे दिखाऊं गा और गड़ा हुआ धन तुझे दूंगा । यह मेरी सामर्थ्य है जो मैं तुझ पर प्रगट करूंगा । इसलिए कि तू जान ले कि मैं इस्राएल का परमेश्वर यहोवा हूं । १ यूहन्ना ५:४ में लिखा है - ``क्योंकि जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है, हमारा विश्वास है'' । जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता जाता है, यह परमेश्वर के वचन में उसकी प्रतिज्ञा है । मरियम मगदलीनी के जीवन में बाधाआें के बावजूद विश्वास था । वह विश्वास के रास्ते पर चल रही थी। ३. सब प्रकार की निराशाआें के बावजूद भी उसके हृदय में प्रेम था :- मरियम मगदलीनी के हृदय में कलवरी की राह पर भी धन्यवाद था । बाधाआें के बावजूद भी विश्वास था और निराशाआें के बावजूद भी प्रेम था । विचार कीजिए कि मरियम मगदलीनी प्रभु यीशु मसीह की क़ब्र के पास खड़ी है । ईस्टर सप्ताह के दौरान जब हम अपने प्रियों की क़ब्रों पर जाते हैं, जब प्रभु वाटिका में जाते हैं और अपने पति या अपने बेटे या अपनी बेटी या अपनी माता या अपने पिता की क़ब्र के पास खड़े होते हैं तो वह बड़ा भावनात्मक समय होता है । जब आप उन क़ब्रों को साफ करते हैं, जब आप वहां पर फूल रखते हैं, जब आप वहां कुछ क्षण खामोश खड़े होते हैं तो यह बड़ा भावनात्मक समय होता है । उस क़ब्र की मिट्टी से आपको कोई आशा नहीं होती । उस क़ब्र की मिट्टी में आपको कोई विश्वास नहीं होता । परन्तु यह प्रेम है जिसकी वजह से आप वहां पर खड़े होते हैं । जो बात है वह यह कि मृत्यु भी प्रेम को परास्त नहीं कर सकती। बाइबिल में यह बात बार-बार आई है । १ कुरिन्थियों १३:१३ में लिखा हुआ है - ``विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थाई हैं, पर इन में सब से बड़ा प्रेम है'' । जब जीवन से विश्वास खत्म हो जाता है, जब आशा खत्म हो जाती है और यदि हमारे हृदय में प्रेम बचा रहता है तो समय के साथ वही प्रेम का बीज विश्वास भी पैदा करता है और आशा भी पैदा करता है । यही मसीही जीवन का सन्देश है। उस क़ब्र के पास प्रेम के कारण मरियम मगदलीनी खड़ी थी । प्रेम के विषय में जितना कहा जाए वह कम है । १ कुरिन्थियों तेरहवें अध्याय में पौलुस लिखता है कि कोई ऐसी बात है जो स्वर्गदूतों की बोलियां बोलने से उत्तम है । कोई ऐसी बात है जो भविष्यवाणियां करने और स्वप्न देखने और भविष्य की बातों को करने से ज़्यादा उत्तम है । कोई ऐसी बात है जो दुनिया के सारे भेदों से बढ़कर है । कोई ऐसी बात है जो सारे संसार के ज्ञान से बढ़कर है । कोई ऐसी बात है जो विश्वास से भी बढ़कर है जबकि विश्वास भी ऐसा हो कि पहाड़ों को हटाने की क्षमता रखता हो । कोई ऐसी बात है जो त्याग से भी बढ़कर है । कोई ऐसी बात है जो स्वर्गदूतों की बोलियां बोलने से बढ़कर है। इन सारी बातों से बढ़कर एक बात है और वह है - प्रेम । मात्र शब्दों तक मरियम मगदलीनी का यह प्रेम सीमित नहीं था क्योंकि उसने कोई बड़ा भारी सन्देश नहीं दिया, कोई बड़े नारे नहीं लगाए, कोई बड़े संवाद नहीं कहे । परन्तु लिखा है कि वह यीशु के साथ-साथ थी । वह यीशु की सेवा टहल करती थी और अन्तिम समय तक वह क्रूस के पास खड़ी रही । मरियम मगदलीनी क़ब्र पर इस आशा से नहीं गई थी कि उसको जीवित प्रभु मिल जाएगा । जब प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान का प्रकाशन हुआ तो वह इतनी घबरा गई कि प्रभु को पहचान नहीं पाई। वह क़ब्र के पास कोई बड़े विश्वास के साथ नहीं गई थी कि वहां से प्रभु यीशु मसीह जी उठेगा । परन्तु वह प्रेम था जो उसे उस क़ब्र के पास ले गया। मरियम मगदलीनी के जीवन में जो बात दिखाई देती है वह यह कि उसका प्रेम मात्र होठों तक सीमित नहीं था । उसका प्रेम उसके जीवन, उसके कार्यों और उसकी सेवा से दिखाई देता है । हम अपने जीवन को देखें तो पाएंगे कि हम में सात दुष्टात्माएं तो नहीं हैं परन्तु सात सौ, बल्कि शायद सात हज़ार, सत्तर हज़ार और सात लाख और सत्तर लाख पाप हैं जिन्हें प्रभु यीशु मसीह ने क्षमा किया है । जिनको प्रभु यीशु मसीह ने दूर करके हमें उद्धार दिया है । हमें अनन्त जीवन दिया है । क्या हमारे जीवन में धन्यवाद है? क्या हर समय हम परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं ? क्या हमारे जीवन में परमेश्वर के प्रति विश्वास है ? क्या हमारे जीवन में प्रेम है ? मरियम मगदलीनी तो पुनरुत्थान के उस तरफ थी लेकिन हम पुनरुत्थान के इस तरफ हैं । हम तो यह जानते हैं कि प्रभु यीशु मसीह ने कहा कि यदि कोई मुझ पर विश्वास रखता है, वह मर भी जाए तो भी जिएगा । प्रभु यीशु मसीह ने मृत्यु को परास्त करके और पुनर्जीवित होकर स्वयं इस कथन को सत्य करके दिखा दिया। अब हमारे पास प्रमाण है । हमारे पास आधार है कि हम पुनरुत्थान पर विश्वास करें। क्या हमारे जीवन के कार्य परमेश्वर के प्रति हमारा विश्वास दर्शाते हैं ? बातें पर्याप्त नहीं हैं । शब्द पर्याप्त नहीं हैं । जीवन में काम होना चाहिए जिनसे धन्यवाद प्रगट हो । जिनसे प्रेम प्रगट हो । जिनसे विश्वास प्रगट हो । अक्सर हम अपने जीवनों में भी पाते हैं कि राह में बड़े-बड़े पत्थर हैं । हम नहीं जानते कि उन पत्थरों को कैसे हटाएंगे । परन्तु परमेश्वर के वचन और उसके मार्ग पर यदि हम चलते जाएं तो परमेश्वर इन बड़े-बड़े पत्थरों को हटाएगा । आपको लगेगा सारे दरवाज़े बन्द हैं परन्तु कोई खिड़की का पट होगा, जो खुला होगा । यह परमेश्वर की प्रतिज्ञा है । निष्कर्ष :- कितनी बार हम भी मरियम मगदलीनी के समान अपने आपको क़ब्र पर खड़ा महसूस करते हैं । जहां जीवन में कोई आशा नहीं है । जहां जीवन में कोई विश्वास नहीं है । परन्तु यदि परमेश्वर के प्रति हमारा प्रेम बना हुआ है तो वह प्रेम विश्वास को पुनर्जीवित करता है और आशा को भी । क्या समस्याआें के बावजूद भी हमारा विश्वास दृढ़ है ? क्या जीवन की निराशाआें के बाद भी हमारा प्रेम वैसा ही है ? इसीलिए रोमियों ८:३८ में पौलिस बड़ी दृढ़ता और विश्वास के साथ लिखता है - ``क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊ ंचाई, न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह में है, अलग कर सकेगी''। काश ! हम भी मरियम मगदलीनी के समान प्रभु यीशु मसीह के पीछे-पीछे चलें। कलवरी की राह में भी हमारा विश्वास उस पर हो और क़ब्र के पास भी हमारा प्रेम उस में बना रहे । परमेश्वर आपको आशीष दे ।