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पुन: स्वप्न देखने का साहस

उत्पिŸा 45:1-7

परिचय :- हम में से कोई ऐसा नहीं है जिसने स्वप्न न देखा हो ! अपने लिए, अपने परिवार के लिए, अपनी सेवा के लिए स्वप्न न देखा हो ! जीवन में कुछ करने के लिए, उन नयी मंजिलों तक पहुंचने के लिए जहां तक कोई नहीं पहुंचा, मील के पत्थरों को छोड़कर और आगे तक पहुंच जाने के लिए स्वप्न न देखा हो । माता-पिता ने स्वप्न देखे हैं अपने बच्चों के लिए, उनके भविष्य के लिए । जवानों ने स्वप्न देखे हंै कि हमें क्या करना है ? किस दिशा में पहुंचना है ? किन उद्देश्यों तक पहुंचना है ? अक्सर हम बच्चों से पूछते हैं क्या करना चाहते हो ? किस क्षेत्र में बढ़ना चाहते हो ? हम सब के जीवन में कुछ स्वप्न होते हैं । इन स्वप्नों में बहुत सामर्थ्य होती है, बहुत शक्ति होती है । ये हमारे जीवनों को दिशा दे सकते हैं । ये हमारे जीवनों को प्रोत्साहित कर सकते हैं । ये हमारे जीवनों को सही उद्देश्य तक पहुंचाने में हमारी मदद कर सकते हैं ।

हम में से कोई ऐसा नहीं होगा जिसने अपने स्वप्नों को टूटते न देखा हो। आशाआें के महलों को ध्वस्त होते न देखा हो । कभी हमारी मेहनत पर पानी फिरता है और कभी उम्मीद की दीवारें गिरती हैं। इन स्वप्नों के टूटने का अनुभव हम में से प्रत्येक ने किया है । किसी प्रिय की मृत्यु अचानक से हो गई और जो स्वप्न हमने देखे थे, वे बिखर गए । किसी अपने ने, जिस पर हम निर्भर रहते थे, जिस पर हमारा विश्वास था, हमारे साथ विश्वासघात किया और हमारे स्वप्न टूट गए।

तो क्या किया जाए, जब स्वप्न टूट जाएं ?

क्या किया जाए, जब हमारी योजनाएं असफल हो जाएं ?

क्या किया जाए, जहां तक हमने पहुंचने का उद्देश्य बनाया था और हम पहुंच न पाएं ?

क्या किया जाए, जब कोई त्रासदी सामने आ जाए ?

क्या किया जाए, जब कुछ अनपेक्षित जीवन में आ जाए ?

क्या किया जाए, जब विश्वास और आस्था की बुनियाद टूट जाए ?

कुछ लोग निराशा में इतने घिर जाते हैं कि उन्हें कोई रास्ता नहीं दिखाई देता। तब वे स्वयं अपने जीवन को समाप्त कर लेते हैं ।

कुछ लोग हैं जो समझौता कर लेते हैं, और संसार के चौड़े मार्ग पर चले जाते हैं । हम जीवन में सांसारिकता से समझौता कर लेते हैं और अपनी आत्मा के विनाश का अच्छा खासा उपाय कर लेते हैं ।

कुछ लोग हैं जो नशे का सहारा लेते हैं, और नशे के इतने आदी हो जाते हैं, कि जीते हुए भी मर जाते हैं ।

कुछ लोगों के जब स्वप्न टूटते हैं तो वे सोच लेते हैं कि अच्छा है हमारी ज़िन्दगी में तो ज़हर घुल चुका है । अब हम चैन से क्यों बैठें । तब उन्हें दूसरों के स्वप्नों को तोड़ने में आनन्द आने लगता है । उन्हें दूसरों के जीवन में ज़हर घोलने की आदत हो जाती है ।

परन्तु स्वप्नों के टूटने के बाद क्या फिर से हम स्वप्न देखने का साहस कर सकते हैं ?

यूसुफ के चरित्र को देखें, जो जीवन भर प्रेरणा देता रहता है । जिसके जीवन के बहुत से सबक हम सीख सकते हैं । यूसुफ में हमें वह बात मिलती है और वह व्यक्ति मिलता है जिसमें स्वप्न टूटने और आशाआें के महलों के बिखरने के बाद फिर स्वप्न देखने की क्षमता है । जिसमें साहस है कि वह जीवन की हर परिस्थिति में फिर से स्वप्न देख सकता है । युवावस्था में यूसुफ के स्वप्न टूट जाते हैं । बहुत कम उम्र में उसकी माता की मृत्यु हो जाती है । उसके पिता की चार पत्नियां हैं । उसके भाई उस पर अविश्वास करते हैं । हम देखते हैं कि कैसे उसके सारे स्वप्न टूटते जाते हैं ? और उसकी उम्मीदों के महल धराशाही हो जाते हैं ।

यूसुफ के जीवन में हम पाते हैं कि वह स्वप्न देखने वाला था । वह स्वप्नों का अर्थ बताने वाला था । नींद में भी स्वप्न देखने वाला था और जागते हुए भी स्वप्न देखता था । निराशा में भी स्वप्न देखने वाला था और विजय के पथ पर भी स्वप्न देखने वाला था । अपने बाल्यकाल की अवस्था में ही उसने एक स्वप्न देखा कि एक दिन उसके सारे भाई और उसके लोग उसके सामने झुकंेगे और उसके पास अधिकार होगा । वह यह बात अपने भाइयों को बताता है । किसी को यह बात सुनना अच्छा नहीं लगता ।

उत्पत्ति ३७:८-९ -``तब उसके भाइयों ने उस से कहा, क्या सचमुच तू हमारे ऊपर राज्य करेगा ? वा सचमुच तू हम पर प्रभुता करेगा ? सो वे उसके स्वप्नों और उसकी बातों के कारण उस से और भी अधिक बैर करने लगे । फिर उस ने एक और स्वप्न देखा, और अपने भाइयों से उसका भी यों वर्णन किया, कि सुनो, मैं ने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा, और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत् कर रहे हैं''।

उसके भाई उससे जलन रखते थे और उसको मार डालने की योजना बना रहे थे । इन भाइयों ने उसके खिलाफ षड़यंत्र रचा और उसे गड़हे में डाल दिया । सत्रह वर्ष की आयु में यूसुफ को उसके भाइयों ने इश्माएलियों के हाथों में बेच दिया । फिर इश्माएलियों ने ले जाकर मिस्र के बाज़ार में यूसुफ को खड़ा कर दिया कि उसको फिर से बेच दिया जाए । इसके बाद उसको फिर गुलाम बनाकर बेच दिया गया ।

सत्रह वर्ष की उम्र में यूसुफ के जीवन में इतना सताव आया और उसने उसे सहा । दो बार उसे गुलाम बनाकर बेच दिया गया । जानवरों के समान उसकी बोली लगाई गई । जानवरों के समान स्तर पर लाया जाकर उस खरीदी का, उस बिक्री का, बोली का, उस अपमान का, उस ग्लानि का, उस शर्म का अनुभव उस जवान ने किया होगा। ज़रा सोचिए किन परिस्थितियों से वह गुज़रा होगा ?

उसके जीवन में बार-बार यह बात आती थी कि उसके जो स्वप्न हैं, जो इच्छाएं हैं, जो दर्शन है; वह टूट गया है । उसके स्वप्न बिखर गए हैं । उसकी उम्मीदों के महल टूट गए हैं । इसके बाद वह पोतीपर के घर में आता है जो उसका मालिक है, और अपनी विश्वासयोग्यता से वह अपना एक विशिष्ट स्थान बना लेता है, और उसका मालिक उसके हाथ में सब कुछ छोड़ देता है । इसके बाद पोतीपर की पत्नी उसके साथ अनैतिक सम्बन्ध बनाने का प्रयास करती है । लेकिन वह वहां से दौड़कर भाग जाता है । पोतीपर की पत्नी के हाथ में उसका अंगरखा रह जाता है लेकिन वह उसको छोड़कर वहां से भाग जाता है । शैतान जब हमको पकड़ता है तो आवश्यकता होती है कि तुरन्त वहां से भाग लिया जाए ।

उत्पत्ति ३९:९ -``भला मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्वर का अपराधी कैसेबनूं?''

यूसुफ के हृदय में अपने स्वामी के प्रति भय है । सबसे बढ़कर वह जानता है कि जो पाप वह करेगा, वह परमेश्वर के प्रति करेगा ।

उस पर झूठा दोष लगाकर, अन्याय कर के बन्दीगृह में डाल दिया जाता है। सत्रह वर्षीय युवा के साथ ये सारी चीज़ें घट जाती हंै । उसे अपने अधिकारी से धोखा होता है । उसके बाद उसके मित्रों से भी धोखा होता है । यूसुफ जब बन्दीगृह में ही था, राजा के पिलानेहारे और खिलानेहारे ने कुछ ग़लती कर दी । वे बन्दीगृह में आए। यूसुफ की मित्रता उनसे हो गयी । एक दिन वे दोनों स्वप्न देखते हैं और यूसुफ उनके स्वप्नों का अर्थ बताता है । तब वह राजा के पिलानेहारेे से कहता है कि जब तीन दिन में तेरा प्राण बच जाए, जब तू फिरौन के पास जाए, तो मेरी तू चर्चा करना, और फिरौन से चर्चा कर के मुझे बचा लेना । जैसा-जैसा उसने पिलानेहारे को बताया था, वैसा-वैसा उसके साथ होता है और उसकी जान बच जाती है ।

उत्पत्ति ४०:२३ - ``पिलानेहारों के प्रधान ने यूसुफ को स्मरण न रखा परन्तु उसे भूल गया''। हमारे जीवन में भी ऐसा ही होता है । जिनके साथ भलाई की जाए, जिन पर विश्वास किया जाए, जिनसे कुछ अपेक्षा की जाए; वे ही हमें भूल जाते हैं । यूसुफ का स्वप्न टूट गया ।

हम यूसुफ के समान कैसे उस स्थान पर पहुंच सकते हैं कि जीवन में स्वप्नों के टूटने के बाद भी, उम्मीदों के महल बिखरने के बाद भी हम में साहस हो कि हम फिर स्वप्न देख सकंे और परमेश्वर के मार्ग पर आगे बढ़ सकें । यह कैसे सम्भव है? हम कैसे यह साहस जुटा सकते हैं ? हम कैसे अपने चरित्र में इन बातों को विकसित कर सकते हैं कि हम पुन: स्वप्न देखने का साहस कर सकें ।

१. हम पुन: स्वप्न देखने का साहस कर सकते हैं, जब विश्वास करें, कि परमेश्वर हमारे साथ है :- जीवन की कैसी भी परिस्थिति में हम हों, जीवन के किसी भी गड़हे में हम हों, जीवन में हमारे साथ कैसी भी त्रासदी घट रही हो, जीवन की किसी भी दुर्घटना में हम हों, जीवन में कैसे भी षड़यंत्र का हम शिकार हांे, जीवन में किसी अन्याय का शिकार हों, परन्तु यदि हमारे हृदय में एक दृढ़ विश्वास हो, कि परमेश्वर हमारे साथ है, और वह अपने लोगों को कभी छोड़ेगा नहीं, तो हम में क्षमता होगी, कि हम फिर से स्वप्न देख सकें ।

उत्पत्ति ३९:२-४ - ``और यूसुफ अपने मिस्री स्वामी के घर में रहता था, और यहोवा उसके संग था; सो वह भाग्यवान् पुरुष हो गया । और यूसुफ के स्वामी ने देखा, कि यहोवा उसके संग रहता है, और जो काम वह करता है उसको यहोवा उसके हाथ से सुफल कर देता है । तब उसकी अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई, और वह उसकी सेवा टहल करने के लिये नियुक्त किया गया : फिर उस ने उसको अपने घर का अधिकारी बनाके अपना सब कुछ उसके हाथ में सौंप दिया''।

उत्पत्ति ३९:२३ - ``बन्दीगृह के दारोग़ा के वश में जो कुछ था; क्योंकि उस में से उसको कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती थी; इसलिये कि यहोवा यूसुफ के साथ था; और जो कुछ वह करता था, यहोवा उसको उस में सफलता देता था''।

यूसुफ बन्दीगृह में था । उसको वहां देखरेख करने की ज़िम्मेदारी दे दी गई। दरोगा ने देखा कि यहोवा यूसुफ के साथ है । यूसुफ जब गड़हे में है तो उसे अहसास है कि यहोवा उसके साथ है । गुलाम बनाकर बेच दिया गया है तो उसे इस बात का विश्वास है कि यहोवा उसके साथ है । बन्दीगृह में भी विश्वास है कि यहोवा उसके साथ है । बाइबिल में कई उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि परमेश्वर हमारे साथ है ।

यशायाह ४१:१० - ``मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग हूं, इधर उधर मत ताक, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूं; मैं तुझे दृढ़ करूंगा और तेरी सहायता करूंगा, अपने धर्ममय दहिने हाथ से मैं तुझे सम्हाले रहूंगा''। परमेश्वर की प्रतिज्ञा है कि वह हमारे साथ-साथ है । कितने हैं जो उसको सुनकर उस पर विश्वास करते हंै कि मत डर, क्योंकि मैं तेरे संग-संग हूं । इधर-उधर मत ताक क्योंकि मैं तेरे साथ हूं । मैं तुझे सम्भालूंगा, तेरी सहायता करूंगा ।

मत्ती २८:२० - ``और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं''। उसने कहा कि जगत के अन्त तक मैं सदैव तुम्हारे संग रहूंगा । परमेश्वर अपने लोगों को नहीं छोड़ता। हमारे जीवन में चाहे कैसी भी असफलताएं हों हमें इस बात का अहसास होना चाहिए कि परमेश्वर हमारे साथ-साथ है ।

कभी आप कठिनाई से गुज़र रहे हों, लम्बी यात्रा में जा रहे हों या कभी ख़तरे से भरी हुई राहों से होकर जा रहे हों, कभी आपको अन्धकार से होकर गुज़रना पड़ा हो । ऐसे समय में अगर आपको इस बात का अहसास हो कि आपके साथ कोई है, और वह आपसे प्रेम करता है, जिस पर आप विश्वास कर सकते हैं, जिस पर आप निर्भर रह सकते हैं । तो क्या ही राहत की बात होगी ! कितनी बार ऐसा होता है कि बच्चों को यात्रा करनी होती है या फिर वे बीमार होते हैं । जब माता या पिता कहते हैं कि बेटा मैं तुम्हारे साथ चलूंगा, मैं तुम्हारे साथ हूं, तो सारी सोच बदल जाती है। यह हमारा परमेश्वर यहोवा है जो हमसे प्रेम रखता है, जिस पर हम विश्वास कर सकते हैं, और जिस पर हम निर्भर रह सकते हैं।

२. हम पुन: स्वप्न देखने का साहस कर सकते हैं, जब विश्वास करें कि परमेश्वर के हाथों में सब बातों का नियंत्रण है :- जीवन की हर परिस्थिति में, जीवन के हर मोड़ पर, जीवन के हर दोराहे पर, जीवन की मृत्यु से भरी तराई से होकर गुज़रने पर जब हमें इस बात का अहसास हो कि सब कुछ परमेश्वर के हाथ में है, जो सर्वज्ञानी है, सर्वव्यापक है और सर्वसामर्थी है ।

उत्पत्ति ४५:५-७ - ``अब तुम लोग मत पछताओ, और तुम ने जो मुझे यहां बेच डाला, उस से उदास मत हो; क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे प्राणों के बचाने के लिये मुझे आगे से भेज दिया है । क्योंकि अब दो वर्ष से इस देश में अकाल है; और अब पांच वर्ष ऐसे ही होंगे, कि उन में न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा । सो परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे आगे इसी लिये भेजा, कि तुम पृथ्वी पर जीवित रहो, और तुम्हारे प्राणों के बचने से तुम्हारा वंश बढ़े''।

यूसुफ अपने भाइयों को इतने सालों के बाद देखता है । भाई तो सोचते थे कि वह मर गया होगा, या फिर गुलाम होगा । वे कभी सोच नहीं सकते थे कि मिस्र के राज सिंहासन पर प्रधानमंत्री की गद्दी पर यूसुफ बैठा होगा । तब फिर वह अपने भाइयों से मिलता है । विचार कीजिए, यदि आप उस स्थिति में होते तो क्या करते? शायद आपकी प्रतिक्रिया होती कि तुमने तो मुझको बेच दिया था, तुमने तो योजना बना ली थी कि मैं मर जाऊं, तुमने तो मुझे गड़हे में डाल दिया था, अब मेरी बारी है । परन्तु यूसुफ भाइयों से कहता है, अब तुम लोग मत पछताओ, और तुमने जो किया उस से उदास मत हो । क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे प्राणों को बचाने के लिए मुझे भेज दिया है । दो वर्ष से इस देश में अकाल है और पांच वर्ष ऐसे ही होंगे कि उनमें न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा । इसलिए परमेश्वर ने मुझे भेजा कि तुम जीवित रहो। तुम्हारे प्राणों के बचाए जाने से तुम्हारा वंश बच जाए।

यूसुफ कहता है, जिन पीड़ाआें से मैं गुज़रा हूं, तुम्हारे जिन षड़यंत्रों का मैं शिकार हुआ हूं, तुमने जो कुछ भी मेरे साथ किया है, जो मेरी पीड़ाएं थीं, जो मेरी निराशाएं थीं, जो मेरी कठिन यात्रा थी, जो मेरा बेचा जाना था; यह सब परमेश्वर की योजना के लिए था और यह सब भलाई के लिए था । प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचने के लिए यह सब मेरा प्रशिक्षण था और अकाल की स्थिति मंे सब चीज़ों को समायोजित करने के लिए मुझको प्रशिक्षण दिया जा रहा था ।

भजन संहिता १०३:१९ - ``यहोवा ने तो अपना सिंहासन स्वर्ग में स्थिर किया है, और उसका राज्य पूरी सृष्टि पर है''। जब हमारे जीवनों में हमारे स्वप्न टूटते हैं। जब हमें निराशा, पराजय से गुज़रना पड़ता है तो इस बात को जानें कि यह भी परमेश्वर की योजना का अंग है ।

आश्चर्यकर्म कब होता है ?

आश्चर्यकर्म तब होता है, जब तूफान आते हैं, जब किसी कार्य को करना असम्भव दिखाई देता है ।

प्रभु यीशु मसीह ने पांच रोटियों और दो मछलियों से हज़ारों को कैसे खिलाया?

आश्चर्यकर्म तब होता है जब लाल समुद्र सामने आते हैं और फिरौन की सेना पीछे होती है ।

आश्चर्यकर्म तब होता है, जब सब तरफ अन्धकार हो जाता है, कोई द्वार मानवीय दृष्टिकोण से दिखाई नहीं देता है ।

आश्चर्यकर्म तब होता है, जब मांदों में हमको डाला जाता है और सिंहों से हम घिर जाते हैं ।

आश्चर्यकर्म तब होता है, जब संसार में कोई आशा नहीं होती ।

हो सकता है आप आज इन परिस्थितियों से गुज़र रहे हों । जब आप इन परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं तो परमेश्वर को धन्यवाद दें कि आश्चर्यकर्म पाने के लिए आप योग्य पात्र बन गए । आपने सारे मापदण्डों और मानकों को पूरा कर लिया है। अब परमेश्वर का आश्चर्यकर्म होना है आपके जीवन में ।

३. हम पुन: स्वप्न देखने का साहस कर सकते हैं, जब विश्वास करें कि परमेश्वर जो कुछ भी हमारे जीवनों में करता है, वह हमारे भले के लिए करता है :- जब हमें विश्वास हो कि जो कुछ भी परमेश्वर हमारे जीवन में करता है, जिस बात की भी अनुमति परमेश्वर देता है, वह भलाई के लिए करता है, यद्यपि यह हमें उस समय दिखाई नहीं देता ।

उत्पत्ति ५०:२० - ``यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं''।

रोमियों ८:२८ - ``और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं''।

- क्या यह भला था कि उसके भाई उससे घृणा करते थे ? नहीं ।

- क्या यह भला था कि उन्होंने उसे मारना चाहा ? नहीं ।

- क्या यह भला था कि यूसुफ के भाई उसे गड़हे में डाल दें ? नहीं ।

- क्या यह भला था कि यूसुफ के भाई उसे गुलाम बनाकर उसे बेच दें ? नहीं।

- क्या यह भला था कि पोतीपर की पत्नी उस पर आरोप लगाए ? नहीं ।

- क्या यह भला था कि यूसुफ पर अन्याय करके उसको कैद में डाल दिया जाए ? नहीं ।

ये बातें अच्छी नहीं थीं, ये बातें सुखद नहीं थीं, ये बातें आनन्ददायक नहीं थीं, परन्तु ये सब बातें परमेश्वर की योजना का अंग थीं । इन सारी बातों ने अन्त में मिलकर यूसुफ के लिए भलाई उत्पन्न की । यूसुफ के भाइयों के लिए भलाई उत्पन्न की । यूसुफ के वंश के लिए भलाई उत्पन्न की, सारे मिस्र देश के लिए भलाई उत्पन्न की । राजा के लिए भलाई उत्पन्न की । मेरे और आपके लिए भी भलाई को उत्पन्न किया । क्यों ? क्योंकि जिस वंश को यूसुफ ने बचा लिया उसी वंश से प्रभु यीशु मसीह निकला । उसी वंश से मेरा और आप का उद्धारकर्त्ता निकला । उसी प्रभु यीशु मसीह ने हमको बचाया । उसी प्रभु यीशु मसीह ने हमारी आत्मा को बचाया । उसी प्रभु यीशु मसीह ने हमको अनन्त जीवन दिया ।

प्रसव की पीड़ा से गुज़रने के बाद परमेश्वर की आशीष हमको मिलती है । मोती भी बड़ी पीड़ा के बाद बनता है । सोना भी तपाने के बाद ही चोखा और शुद्ध होता है ।

४. हम पुन: स्वप्न देखने का साहस कर सकते हैं जब विश्वास करें कि परमेश्वर अपनी योजना को पूरी करने में हमारा उपयोग करना चाहता है :- परमेश्वर की हमारे लिए एक योजना है ।

उत्पत्ति ५०:२० - ``यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं''।

यिर्मयाह २९:११ - ``क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएं मैं तुम्हारे विषय करता हूं उन्हें मैं जानता हूं, वे हानि की नहीं, वरन् कुशल ही की हैं, और अन्त में तुम्हारी आशा पूरी करूंगा''।

वचन में इस बात के ढेरों उदाहरण हैं कि किस प्रकार परमेश्वर ने साधारण से साधारण लोगों का उपयोग अपनी योजना को पूरी करने के लिए किया ।

निष्कर्ष :- हो सकता है आज आप किसी असफलता से गुज़र रहे हों, कोई निराशा आपके मन में हो, बीमारी हो, कोई डिप्रेश्न की बात हो, किसी षड़यंत्र के आप शिकार हांे। हो सकता है आपके जीवन में पापों की ग्लानि का बोझ हो, अतीत के पाप हों, किसी परीक्षा में आप फंसे हों । ग़लत निर्णयों का नतीजा आप भुगत रहे हों । कोई बात आप अपनी प्रिय लोगों से छिपा रहे हों । हो सकता है आपको लगता हो कि सब कुछ चला गया । अब क्या करूं ?

यदि हम इस बात को स्मरण करें, इस बात पर दृढ़ विश्वास करें कि,

१. परमेश्वर हमारे साथ है ।

२. परमेश्वर के हाथों में सब बातों का नियंत्रण है ।

३. परमेश्वर जो भी हमारे जीवनों में करता है, वह हमारे भले के लिये करता है।

४. परमेश्वर अपनी योजना पूरी करने में हमारा उपयोग करना चाहता है ।

तो हम पुन: स्वप्न देखने का साहस कर सकेंगे । अपने जीवन में आगे बढ़ सकेंगे। परमेश्वर की योजना में आगे बढ़ सकेंगे । परमेश्वर की योजना को पूरा कर सकेंगे। हमारे जीवनों से दूसरों को आशीष मिलेगी । जिन्होंने हमारे खिलाफ षड़यंत्र किए थे, उनके जीवन भी हमारे जीवन से आशीषित होंगे और परमेश्वर की गवाही होगी । परमेश्वर हमें आशीष देगा । परमेश्वर हमारी रक्षा करेगा । परमेश्वर हमें सामर्थ्य देगा । परमेश्वर हमें विजय देगा ।

पुन: स्वप्न देखने के साहस की क्षमता हम में पैदा हो सकेगी, परमेश्वर का ऐसा अनुग्रह और ऐसी आशीष हमारे जीवनों में होगी ।

परमेश्वर हम सभी को आशीष दे ।