प्रकाशितवाक्य 2:1-5 परिचय :- यह संदेश प्रेम से सम्बन्धित है । इस सन्देश में हम इफिसुस की कलीसिया को आधार बनाकर प्रेम के विषय में कुछ बातों पर विचार करेंगे । मनुष्य जब इस संसार में आता है तो वह सम्बन्धों के दायरे में आगे बढ़ता है। वह सम्बन्धों के दायरे में जीता है । हमारे पारिवारिक सम्बन्ध होते हैं । समान उद्देश्यों वाले लोगों से हमारे सम्बन्ध होते हैं । समान रुचि रखने वालों से हमारे सम्बन्ध होते हैं । समाज में लोगों से हमारे सम्बन्ध होते हैं । सहकर्मियों से हमारे सम्बन्ध होते हैं। इन्हीं सम्बन्धों के दायरे में रहते हुए हम जीते हैं । किसी समाजशास्त्री ने मनुष्यों के सम्बन्ध की तुलना एक मकड़ी के जाले से की है । मकड़ी जाले में रहती है । यदि जाले को तोड़ दिया जाए तो मकड़ी नीचे गिर जाती है । मनुष्य इन सम्बन्धों से अलग-थलग होकर, अकेला रहकर जी नहीं सकता । जब परमेश्वर ने आदम को बनाया, तो उत्पत्ति २:१८ में लिखा हुआ है - ``फिर परमेश्वर ने कहा, आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं '' इसलिए उसने हव्वा को बनाया । परमेश्वर जानता था कि इन सम्बन्धों की मनुष्य को आवश्यकता है । जब हम दूसरे स्थान पर काम करने जाते हैं, या विदेश जाते हैं और कुछ समय बाद हमारा मन वहां ऊ बने लगता है, तो लौट कर आ जाते हैं । हम कहते हैं कि हम अपने लोगों के बीच में आ गए । उन लोगों के बीच में, जो हमारी चिन्ता करते हैं, हमसे प्रेम करते हैं । जब कोई पीड़ित हो या रोग से ग्रसित हो जाए और उसे लगे कि उसका जीवन थोड़ा सा ही बचा है, तो वह कहता है कि मेरी मृत्यु हो जाने पर मेरे शरीर को मेरे लोगों के बीच में भेज दिया जाए । मुझे मेरे लोगों के बीच में ही दफना दिया जाए । सम्बन्ध बहुत ज़रूरी होते हैं । जब नए सम्बन्ध बनते हैं तो उनमें बड़ा उत्साह होता है। जब हमारे नए मित्र बनते हैं तो बड़ी उमंग होती है । जब नए रिश्ते कायम होते हैं तो बड़ा उन्माद होता है । परन्तु कुछ समय बीतने पर हमें ऐसा लगने लगता है कि अब उनमें वह बात नहीं रह गई । अब उनमें वह नयापन नहीं रह गया। अब उनमें वह उत्साह नहीं रह गया । हमें लगने लगता है कि रिश्तों में कुछ फीकापन सा आ गया है । कुछ दूरियां बन गइंर् हैं । जब हम किसी के यहां मेहमान बनकर जाते हैं तो हमारा बड़ा स्वागत होता है । हम उस परिवार के साथ रहते हैं । एक दिन बीतता है, दूसरा दिन बीतता है, तीसरा दिन बीतता है । उसके बाद उत्साह और प्रेम ठण्डा पड़ता जाता है । मेरे पिता कहा करते थे कि तीन दिनों के बाद मछली और मेहमान में कुछ सड़ाहट आ जाती है । किसी समाजशास्त्री ने लिखा है कि जब हमारे सम्बन्ध बनते हैं तो पहली सीढ़ी में हमारे सम्बन्ध बहुत गाढ़े होते हैं । दूसरी सीढ़ी में हम कहते हैं कि हमारे आपस में बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं । तीसरी सीढ़ी में हम कहते हैं कि हमारे सम्बन्ध सामान्य हैं । उसके बाद हम कहते हैं कि हमारे सम्बन्धों में कुछ ठण्डापन सा आ गया है । उसके बाद हम कहते हैं कि अपने सम्बन्धों में बस मात्र औपचारिकताएं निभा रहे हैं। उसके बाद धीरे-धीरे यही ठण्डापन और औपचारिकताएं हमें उन सम्बन्धों के विच्छेद की ओर ले जाती हैं । इसका समानान्तर उदाहरण हम पतरस के जीवन में पाते हैं । पतरस, प्रभु यीशु मसीह के साथ-साथ था, उसके निकट था। उसके बाद प्रभु यीशु मसीह गुलगुता की यात्रा के समय यही पतरस उनसे थोड़ी दूरी बनाकर चलने लगा। उसके बाद पतरस मसीह के विरोधियों के साथ मिलकर आग तापने लगा। फिर उसने प्रभु यीशु का इन्कार किया । यही उदाहरण हम यहूदा इस्करियोती के जीवन में भी पाते हैं । हर कोई एक दूसरे से जुड़ा हुआ है । एक दूसरे पर निर्भर है । परमेश्वर ने हमें बनाया है कि कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि मैं इतना आत्मनिर्भर हूूं कि मुझे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं । किसी के प्रेम की ज़रूरत नहीं । किसी के प्रोत्साहन की ज़रूरत नहीं । हम कितने भी सक्षम हों हमें एक-दूसरे की आवश्यकता होती है । जब हमारा सम्बन्ध स्वार्थ पर आधारित होता है तो वह अस्थायी होता है । परन्तु जब हमारा सम्बन्ध प्रेम पर आधारित होता है तो वह बहुत दृढ़, मज़बूत और स्थाई होता है । १ कुरिन्थियों १३:४-८ पद में जो बातें लिखी हैं, वे उस प्रेम के सम्बन्ध में हैं जो निस्वार्थ है । यदि हमारा प्रेम प्रभु यीशु मसीह के प्रेम पर आधारित है, तो वह स्थायी होगा। परमेश्वर चाहता है कि हमारा उससे सम्बन्ध स्थायी हो । वह अस्थायी सम्बन्ध पसंद नहीं करता । होशे ६:४ में लिखा है - ``हे एप्रैम, मैं तुझ से क्या करूं ? हे यहूदा, मैं तुझ से क्या करूं ? तुम्हारा स्नेह तो भोर के मेघ के समान, और सबेरे उड़ जाने वाली ओस के समान है'' । उसके बाद छठे पद में लिखा है - ``क्योंकि मैं बलिदान से नहीं, स्थिर प्रेम ही से प्रसन्न होता हूं, और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूं कि लोग परमेश्वर का ज्ञान रखें''। हम सोचते हैं कि शायद बड़ा त्याग करें तभी परमेश्वर हमसे प्रसन्न होगा। परन्तु वह कहता है कि मैं बलिदान से नहीं पर स्थिर प्रेम से ही प्रसन्न होता हूं। इसके समानान्तर में १ कुरिन्थियों के १३ वें अध्याय में प्रेम की विवेचना करते हुए पौलुस कहता है कि यदि मैं अपनी देह भी जलाने के लिए दे दूं और प्रेम न रखूं तो मैं कुछ भी नहीं । बलिदान और त्याग से बढ़कर परमेश्वर स्थिर प्रेम से ही प्रसन्न होता है। हम इफिसियों की कलीसिया पर विचार करें । इफिसुस एशिया का एक प्रमुख शहर था । वहां पर डायना देवी का एक बहुत बड़ा मन्दिर था । वहां प्रभु यीशु मसीह के जन्म से ३५६ वर्ष पूर्व सिकन्दर महान का जन्म हुआ था । वहां पर यूनान की सबसे भव्य और सबसे बड़ी इमारत थी । वहां पर पहली शताब्दी की बहुत बड़ी और प्रमुख कलीसिया की स्थापना हुई थी । प्रेरितों के काम १९:१७-२० में लिखा हुआ है- ``यह बात इफिसुस के रहने वाले यहूदी और यूनानी भी सब जान गए, और उन सब पर भय छा गया; और प्रभु यीशु के नाम की बड़ाई हुई । और जिन्हों ने विश्वास किया था, उन में से बहुतेरों ने आकर अपने-अपने कामों को मान लिया और प्रगट किया। जादू करने वालों में से बहुतों ने अपनी-अपनी पोथियां इकट्ठी करके सब के साम्हने जला दीं, और जब उन का दाम जोड़ा गया, तो पचास हज़ार रुपये की निकलीं। यों प्रभु का वचन बल पूर्वक फैलता गया और प्रबल होता गया'' । पौलुस ने इफिसुस में जो सेवा की उसका प्रभाव यह पड़ा कि यूं प्रभु का वचन बल पूर्वक फैलता और प्रबल होता गया । उसके बाद तीमुथियुस और यूहन्ना ने वहां पर कार्य किया । इफिसुस के क्षेत्र में पहली शताब्दी के दौरान ६ कलीसियाआें की स्थापना हुई । इसी इफिसुस की कलीसिया के सम्बन्ध में सात अच्छी बातें प्रभु यीशु मसीह कहता है (प्रकाशित वाक्य २:२-५) । पहली बात, यह कार्य करने वाली कलीसिया है । दूसरी बात, यह बहुत परिश्रम से कार्य करने वाली कलीसिया है । वास्तव में कार्य करना एक बात होती है परन्तु परिश्रम से कार्य करना उससे भी ज़्यादा प्रमुख बात है । तीसरी बात, यह धीरज धरने वाली कलीसिया है । चौथी बात, यह अच्छे बुरे लोगों की पहचान करने वाली कलीसिया है । पांचवीं बात, यह अनुशासित कलीसिया है । पापों को न सहने वाली कलीसिया है । छठवीं बात, यह प्रेरितों को परखने वाली कलीसिया है । झूठे शिक्षकों को परखने वाली कलीसिया है । सातवीं बात, यह बहुत सहनशील कलीसिया है । दु:ख उठाने वाली कलीसिया है । परन्तु इन सब अच्छाइयों के बावजूद इफिसुस की कलीसिया से प्रभु यीशु मसीह कहता है कि मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है । हमारे जीवनों को जब प्रभु यीशु मसीह देखता है तो क्या वह हमसे भी यही कहता है कि तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है ? कितनी बड़ी बात होगी कि कोई पत्नी अपने पति के लिए यह कह सके कि जो हमारा प्रेम था वह बढ़ता गया, जो पहली नज़र में हमारा प्रेम हुआ था, वह बढ़ता गया और मज़बूत होता गया । हमारे सम्बन्ध और गहरे होते गए । हम एक-दूसरे के निकट आते गए । हमारे दिल में एक-दूसरे के प्रति आदर बढ़ता गया। कितनी बड़ी बात होगी यदि कोई पत्नी और पति एक-दूसरे के लिए यह बात कह सकें । कितनी बड़ी बात होगी कि यदि दो मित्र एक-दूसरे की मित्रता के सम्बन्ध में यह बात कह सकें कि हमारी मित्रता हुई तो यह बढ़ती गई, मज़बूत होती गई, परिपक्व होती गई । कितनी बड़ी बात होगी कि कोई बेटा या बेटी अपने माता-पिता के लिए यह बात कह सके । कितनी बड़ी बात होगी यह कि हम स्वयं परमेश्वर के प्रति यह बात कह सकें । जब हमने परमेश्वर को जाना और पहचाना, जब हमारा बपतिस्मा हुआ, जब हमने पहली बार प्रभु भोज लिया, उस समय हमारे दिल में कितना उत्साह था। हमने अपने मित्रों को, रिश्तेदारों को भोजन के लिए बुलाया था । उस दिन जो उमंग, उत्साह और आग हमारे हृदय में थी वह आज भी है। कितनी बड़ी बात होगी कि यदि हम कह सकें कि हमारा वह उत्साह, परमेश्वर से वह प्रेम निरन्तर बढ़ता गया । जो लोग दूसरे धर्मों से आते हैं और प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्त्ता ग्रहण करके मसीहियत को अपनाते हैं उनमें बहुत उत्साह होता है । हम कहते हैं कि उनके दिल में एक आग सी है । वे प्रचार करना चाहते हैं, वचन सुनाना चाहते हैं । परन्तु धीरे-धीरे समय के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वह जोश, वह आग, वह प्रेम, वह उत्साह ठण्डा पड़ता जाता है । परमेश्वर जब हमको देखता है तो कहीं वह यह तो नहीं कहता ? तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया है, सो चेत जा नहीं तो मैं आकर तेरी दीवट को हटा दूंगा। हम क्यों और कब अपना पहला सा प्रेम छोड़ देते हैं ? अपने पति के साथ, अपनी पत्नी के साथ, अपने मित्रों के साथ, अपने सहकर्मियों के साथ, अपने प्रियों के साथ और सबसे बढ़कर परमेश्वर के साथ; १. हम पहला सा प्रेम तब छोड़ देते हैं जब हमारा नज़रिया नकारात्मक हो जाता है :- हम ऐसे संसार में रहते हैं जहां अधिकांश बातें नकारात्मक होती हैं । अखबार पढ़ने से, टेलीविजन देखने से, दूसरों की समस्याआें को सुलझाने से, लोगों से मिलने से दिन भर में अनेक नकारात्मक बातें सामने आती हैं । इसलिए यह आसान है कि हमारी मानसिकता भी नकारात्मक हो जाए । जब हमारा नज़रिया नकारात्मक हो जाता है तो हम दूसरों में बुराई देखना शुरू कर देते हैं । हम दूसरों की कमियां देखना शुरू कर देते हैं । हम दूसरों में खोट निकालना शुरू कर देते हैं । इससे हमारा पहला सा प्रेम खत्म हो जाता है । प्रमुख बात यह है कि हमें अपने जीवन में शैतान की ताकतों से बढ़कर परमेश्वर की आशीषों पर ध्यान लगाना चाहिए । यदि हम पौलुस का उदाहरण देखें तो नकारात्मक परिस्थितियों में वह एक सकारात्मक व्यक्ति के रूप में हमारे सामने आता है । प्रेरितों के काम के १७ वें अध्याय में हम पाते हैं कि पौलुस अथेने नामक शहर में पहुंचा । जब उसने वहां मूर्तियों को देखा तो उसका जी जल गया । उसके हृदय में परमेश्वर के वचन की आग थी इस कारण उसका जी जल गया। उसने जब मूर्तिपूजकों को देखा, तो उसका जी जल गया । जब उसने अथेने के लोगों के बीच में प्रचार किया तो उनसे कहा कि हे अथेने के लोगो मैं देखता हूं कि तुम बहुत धार्मिक हो, तुम बड़ी धार्मिक प्रवृत्ति के हो । उसने उनको नकारात्मक बात नहीं कही बल्कि उनकी एक अच्छाई को सामने रखते हुए अच्छे ढंग से अपनी बात कही और उन्हें उनकी ग़लती के विषय में चिताया । फिलिप्पियों ४:८ में एक बहुत अच्छी बात लिखी हुई है - ``निदान, हे भाइयो, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो जो सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन्हीं पर ध्यान लगाया करो'' । मुझे ध्यान आता है कि मैं अक्सर जब हमारे समाज में विवाह के विदाई समारोहों में अपने पिता के साथ जाया करता था तब वे अपने सन्देश में अक्सर यही सन्दर्भ इस्तेमाल करते थे और पति पत्नी से कहते थे कि तुम्हारे सम्बन्ध स्थाई नहीं होंगे, यदि हर बात में तुम एक दूसरे की बुराई देखोगे, एक दूसरे को टोकोगे, एक दूसरे को बुरा बोलोगे । परन्तु जब तुम इन बातों पर ध्यान लगाओगे कि दूसरे में कौन सी बातें अच्छी हैं, आदरणीय हैं, उचित हैं, सुहावनी हैं, सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं, सच्चाई की बातें हैं तो तुम्हारे सम्बन्ध विकसित और मज़बूत होंेगे । किसी शहर में एक पास्टर था । उसके जीवन में एक विशेष बात यह थी कि वह कभी किसी के लिए बुरा नहीं बोलता था । लोग चाहते थे कि ऐसी परिस्थिति बने कि वह पास्टर उसमें फंस जाए और तब किसी के लिए बुरा बोले । उसी समाज मेें एक वृद्ध आदमी रहता था, जो सब प्रकार की बुराइयों में लिप्त था । वह बहुत भ्रष्ट था । एक दिन इस व्यक्ति की मृत्यु हो गई । जब उस व्यक्ति का फ्यूनरल था तो लोगों ने कहा कि आओ देखें कि पास्टर साहब ऐसे व्यक्ति के लिए कौन सी अच्छी बात कहते हैं क्योंकि वे तो किसी के लिए बुरा नहीं बोलते । जब अन्तिम संस्कार की विधि हुई तो पास्टर ने कहा कि इस व्यक्ति के जीवन से हमें एक बड़ी शिक्षा यह मिलती है कि हमें कौन-कौन सी बातों से सावधान रहना चाहिए। उस परिस्थिति में भी उन्होंने ऐसी बात बोली जो नकारात्मक न होकर एक सकारात्मक शिक्षा लिए हुए थी । हम अपने जीवन और सम्बन्धों में देखें कि कौन सी बातें ऐसी हैं जिनसे हम एक -दूसरे को प्रोत्साहित कर सकते हैं । हम एक-दूसरे की अच्छी बातों को देखें । एक-दूसरे की अच्छी बातों को सीखें। यदि हमारा रवैया और नज़रिया नकारात्मक होगा तो निश्चित रूप से हम अपना पहला सा प्रेम छोड़ देंगे। २. हम अपना पहला सा प्रेम तब छोड़ देते हैं जब हमारा हृदय क्षमाशील नहीं रह जाता :- यदि मसीही जीवन में आगे बढ़ना है तो उसके दो पहिए हैं । एक है प्रेम और दूसरा है क्षमा। यदि ये बातें हमारे जीवन में नहीं तो हम मसीहियत में आगे नहीं बढ़ सकते । अक्सर हम कहते हैं कि इसने हमारे साथ बहुत बुरा सुलूक किया । हम इस बात को नहीं भूल सकते जब तक कि इससे बदला न ले लें। हम सब मानव हैं और शायद हमारी ऐसी सोच होना स्वाभाविक है । परन्तु यदि मसीही जीवन में आगे बढ़ना है तो इन बातों से ऊ पर उठकर दूसरों को क्षमा करना है। क्षमा पाना मनुष्य की आवश्यकता है । यदि परमेश्वर हमें क्षमा न करे तो हमारा उद्धार नहीं होगा । हमारे उद्धार का जो आधार है वह क्षमा है । यह बड़ी सीधी सी बात है । यदि हमने अभी तक इस बात को नहीं अपनाया तो बाइबिल के इस पद के नीचे एक रेखा खींच लें और उसे मानो अपने हृदय की पटिया पर लिख लें। मत्ती ६:१४-१५ में बड़े स्पष्ट रूप से लिखा है - ``इसलिये यदि तुम मनुष्य के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा। और यदि तुम मनुष्यों के अपराध क्षमा न करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा न करेगा'' । यह बात बड़ी स्पष्ट है और इस सम्बन्ध में कोई और व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है । हम प्रभु की प्रार्थना में कहते हैं कि जैसे हमने अपने अपराधियों को क्षमा किया, वैसे तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर । यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ग़लती करता रहे, और बार-बार परेशान करने के लिए गलती करता रहे तौ भी क्या उसे क्षमा करते जाएं ? इस विषय में रोमियों ६:१ में स्पष्ट लिखा हुआ है - ``क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो? कदापि नहीं'' ! यदि जानबूझकर हम बार-बार हम ग़लतियां करते रहें तो एक सीमा है जहां पर परमेश्वर कहता है कि यदि हम पाप करते रहें तो हम पर अनुग्रह कदापि नहीं होगा। मत्ती १८:१५-१७ में लिखा हुआ - ``यदि तेरा भाई अपराध करे, तो जा और अकेले में बातचीत करके उसे समझा; यदि वह तेरी सुने तो तू ने अपने भाई को पा लिया । यदि वह न सुने, तो और एक दो जन को अपने साथ ले जा, कि हर एक बात दो या तीन गवाहों के मुंह से ठहराई जाए । यदि वह उनकी भी न माने, तो कलीसिया से कह दे, परन्तु यदि वह कलीसिया की भी न माने, तो तू उसे अन्य जाति और महसूल लेने वाले के ऐसा जान'' । एक सीमा है जिसके बाहर अनुग्रह नहीं है । एक सीमा है जिसके बाहर क्षमा नहीं है । एक सीमा है जहां पर परमेश्वर का अनुग्रह समाप्त होता है । उसका न्याय आने वाला है और वह सीमा खत्म होने वाली है । हमें इस बात का ध्यान रखना है। यदि उद्धार चाहिए तो हमें क्षमा की आवश्यकता है । हमें यदि क्षमा चाहिए तो यह बात भी आवश्यक है कि हम दूसरों को क्षमा करें । यदि हम दूसरों को क्षमा नहीं करेंगे तो हमारा पहला सा प्रेम जाता रहेगा । हम प्रेम में कभी बढ़ नहीं सकते यदि हम में क्षमा न हो । प्रेम की ज्वाला में क्षमा एक इंर्धन के समान है । जब तक प्रेम की ज्वाला में क्षमा का इंर्धन होगा, प्रेम की ज्वाला जलती रहेगी । ३. हम अपना पहला सा प्रेम तब छोड़ देते हैं जब अपने अतीत को पूरी तरह से छोड़ने को तैयार नहींं होते :- मसीही जीवन में जो विशिष्ट बात है वह यह कि हमारा अतीत खत्म हो गया । परमेश्वर ने हमारे पापों को क्षमा कर दिया । उसने उन्हें भुला दिया और समुद्र की गहराई में दफना दिया । उसने हमें नया जीवन दिया । उसने कहा है कि यदि तुम्हारे पाप लाही रंग के क्यों न हों तो भी मैं उन्हें हिम की नाइंर् श्वेत कर दूंगा । परन्तु हमारे साथ समस्या यह होती है कि हम अपने अतीत को लेकर जीते रहते हैं । हम अतीत की यादों को लेकर रोते रहते हैं। सबसे ज़्यादा दुख की बात यह होती है कि अच्छी बात तो हम जल्दी भूल जाते हैं परन्तु बुरी बात हमें याद रहती है । किसी ने हमारे साथ अच्छाई की तो उसे भूलने में ज़्यादा समय नहीं लगता परन्तु यदि किसी ने हमारे साथ बुराई की तो उसको हम नहीं भूलते । मसीही जीवन भविष्य का जीवन है । मसीही जीवन ऊंचाइयों पर उठने का जीवन है । मसीही जीवन परिपक्व होने का जीवन है । मसीही जीवन बढ़ते जाने का जीवन है । यह ठहराव का जीवन नहीं है। इसीलिए पौलुस लिखता है कि मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं । वह बूढ़ा पौलुस जेल में है । उसे हथकड़ियां लगी हैं। परन्तु लिख रहा है कि मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं । मसीही जीवन में वह बढ़ता चला जाता है । पत्रियां लिखता चला जाता है । परमेश्वर की गवाही देता चला जाता है । वचन में लिखा है कि जो मसीह में है, वह नई सृष्टि है । पुरानी बातें बीत गइंर्, देखो वे सब नई हो गइंर्। परमेश्वर ने हमारे पापों को समुद्र की गहराइयों में दफ्रन कर दिया है । यदि परमेश्वर हमारे अतीत और हमारे पापों को ध्यान रखे तो हमारा उद्धार कैसे होगा ? मसीही जीवन पूर्णविराम का जीवन है । उसमें कोई अल्पविराम नहीं है । उसमें नई राह है । नए द्वार हैं । नई संभावनाएं हैं । नई प्रतिज्ञाएं हैं । नए वरदान हैं और नया जीवन है । मसीही जीवन का अर्थ आगे देखना है । उसमें नई सृष्टि है । नया स्वर्ग है । नई धरती है । नया आकाश है और मृत्यु के पार नई देह है । रोमियों ६:३ में लिखा हुआ है - ``क्या तुम नहींं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का बपतिस्मा लिया'' । हम अपने पापों के साथ उस पानी की समाधि में दफ्रना दिए गए। आगे वह लिखता है कि हम नए जीवन की सी चाल चलें। हमारा जीवन हमारी आत्मा सब कुछ परमेश्वर नई कर देता है । अगर हम अतीत के बोझ को ढोते हुए जिएंगे तो अपने सम्बन्धों को कभी बना नहीं सकते । हम अपना पहला सा प्रेम छोड़ देंगे और हमारा पहला सा प्रेम जाता रहेगा । ४. हम अपना पहला सा प्रेम तब छोड़ देते हैं, जब अपनी ग़लतियों को नहीं स्वीकारते :- अक्सर हम अपनी ग़लती मानने को तैयार नहीं होते । किसी ने कहा है कि तर्क से आप कभी जीत नहीं सकते । यदि तर्क में आप जीत गए तो सम्बन्धों में हार जाएंगे। हो सकता है आपकी बात तर्कपूर्ण हो, वज़नदार हो और आप लड़ते-लड़ते तर्कों के आधार पर जीत भी जाएं । आपको लगे कि हमने सही बात बोल दी और वह हमारी बात का वह जवाब नहीं दे पाया । परन्तु वास्तव में सम्बन्धों में हम हार जाते हैं । तर्क के द्वारा हम कभी भी मसीही जीवन में किसी सम्बन्ध को बनाने के लिए जीत नहीं सकते । हमें अपनी ग़लतियां स्वीकार करना सीखना चाहिए। हमें यह कहना आना चाहिए कि क्षमा करना मुझसे ग़लती हो गई । आप सोचते हैं कि यदि अपनी ग़लती किसी के सामने स्वीकार कर लेंगे तो हार जाएंगे। परन्तु मैं आपसे कहना चाहता हूं कि यदि जो कोई अपनी ग़लती को मान लेगा, क्षमा मांग लेगा; वह परमेश्वर की दृष्टि में जीत जाएगा । अगर हम अपनी ग़लतियां नहीं स्वीकारेंगे तो फिर पश्चात्ताप भी नहीं करेंगे । अगर हम पश्चात्ताप नहीं करेंगे तो हमारा उद्धार भी नहीं होगा । इसलिए ज़रूरी है कि हम अपनी ग़लतियां स्वीकारें और उन्हें सुधारें । ऐसे लोग जो अपने आपको बड़ा धर्मी समझते हैं, उनको कभी मसीह के लिए जीता नहीं जा सकता । क्योंकि अपनी दृष्टि में धार्मिक ऐसे लोग अपनी ग़लती को स्वीकार नहीं करते । इस कारण वे पश्चात्ताप भी नहीं करते और उद्धार से वंचित रह जाते हैं। सोए हुए को तो जगाया जा सकता है पर जो नींद का बहाना करके लेटा है, उसको कैसे उठाओगे ? बाइबिल में वर्णन है कि दो व्यक्ति वेदी के पास खड़े हैं । एक व्यक्ति बड़े घमण्ड से प्रार्थना कर रहा है । वह कह रहा है कि देख मैंने तेरे लिए क्या-क्या किया है । मैं कितना अच्छा हूं । मैं इस दूसरे व्यक्ति से अच्छा हूं।जबकि दूसरा व्यक्ति वेदी के सामने विनम्रता से खड़ा है और कहता है कि हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर। पहले की प्रार्थना अस्वीकार हो जाती है और दूसरे की प्रार्थना स्वीकार हो जाती है। एक स्त्री आती है, संगमरमर का पात्र तोेड़ती है, प्रभु यीशु मसीह के पैरों को धोती है । वह अपने बालों से उसके पैरों को पोंछती है, आंसू बहाती है । दूसरी ओर प्रभु यीशु मसीह का चेला है जो बैठकर आलोचना करता है । उस स्त्री का प्रेम स्वीकार लिया जाता है परन्तु उस चेले की आलोचना अस्वीकार कर दी जाती है । एक डाकू है, जो कहता है कि तू कैसा परमेश्वर का पुत्र है ? यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो हमें बचा और अपने आप को बचा । दूसरा डाकू कहता है कि हम तो अपने पापों की सज़ा पा रहे हैं परन्तु इसने तो कोई पाप नहीं किया । पहला अस्वीकार कर दिया जाता है, और दूसरा स्वर्ग के राज्य का वारिस हो जाता है । ५. जब हम दूसरे से तुलना करने लगते हैं तो हम अपना पहला सा प्रेम छोड़ देते हैं :- हमें परमेश्वर ने एक देह के समान बनाया है । हर एक अंग का कार्य अलग-अलग है और सबको परमेश्वर के लिए मिलकर कार्य करना है । ६. हम अपना पहला सा प्रेम तब छोड़ देते हैं, जब दूसरों से ज़्यादा अपने आपको महत्वपूर्ण समझने लगते हैं :- जब दूसरे को हीनता की दृष्टि से देखने लगते हैं । सिर्फ्र इसलिए कि हमारे पास ऊं चा पद है । सिर्फ्र इसलिए कि हमारे पास धन ज़्यादा है । ७. हम अपना पहला सा प्रेम तब छोड़ देते हैं, जब हमारे बीच में संवाद नहीं होता:- जब हम अपने जीवन में ग़लत निर्णय करते हैं । ग़लत मित्र बनाते हैं । ग़लत व्यक्ति से विवाह करते हैं । स्थिति सम्हालना बड़ा मुश्किल होता है। हम अपनी तरफ से पूरा प्रयास करें, परन्तु दूसरा न करे, मित्र न करे, जीवन साथी न करे, तो कहां तक एक हाथ से ताली बजेगी ? अंतत: हमें हमारे ग़लत निर्णय का परिणाम मिलता है । यहूदा इस्करियोती के विषय में भजन संहिता ४१:९ में लिखा हुआ है - ``मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, जो मेरी रोटी खाता था, उस ने भी मेरे विरुद्ध लात उठाई है'' । प्रभु यीशु मसीह के साथ यहूदा इस्करियोती की निकटता थी । वह उसका परम मित्र था । वे एक थाली में, एक रोटी से खाते थे । वह भरोसेमन्द था परन्तु धीरे-धीरे सम्बन्ध दूर होते गए और उसका परिणाम यह हुआ कि यहूदा ने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया । यूहन्ना भी प्रभु यीशु मसीह का प्रिय शिष्य था परन्तु उसने अपना पहला सा प्रेम नहीं छोड़ा। पतरस ने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया था । मगर प्रभु यीशु मसीह ने उसको दूसरा अवसर दिया । प्रभु यीशु मसीह उससे कहते हैं - जा, मेरी भेड़ों को चरा । प्रभु यीशु मसीह हमें दूसरा मौका देता है । उसके द्वारा दूसरा अवसर हमको जीवन में मिलता है । पतरस के समान हम तो मुकर जाते हैं, हम तो पहचानने से भी इन्कार कर देते हैं परन्तु प्रभु यीशु मसीह फिर से मौका देता है । वह कहता है - जा, मेरी भेड़ों को चरा। निष्कर्ष :- जब हमारे जीवन को परमेश्वर देखता है तो हो सकता है वह कहे कि यह बहुत काम करने वाला व्यक्ति है । यह बहुत मेहनत करने वाला व्यक्ति है। यह बहुत धीरज धरने वाला व्यक्ति है । यह बहुत सहने वाला व्यक्ति है । इसमें बहुत सहनशीलता है । यह अच्छे और बुरे की पहचान करने वाला व्यक्ति है । परन्तु क्या परमेश्वर हमसे यह कहता है कि - मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तूने अपना पहला सा प्रेम छोड़ दिया । प्रेम से बढ़कर और कोई बात नहीं है । इसी कारण १ कुरिन्थियों १३:१-३ में लिखा है - ``यदि मैं मनुष्यों और स्वर्गदूतों की बोलियां बोलूं, और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल और झनझनाती हुई झांझ हूं । और यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकंू, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं, और मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो, कि मैं पहाड़ों को हटा दूं, परन्तु प्रेम न रखूं, तो मैं कुछ भी नहीं । और यदि मैं अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति कंगालों को खिला दूं, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूं, और प्रेम न रखूं, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं''। हम अपने जीवन को देखें और इस बात पर विचार करें कि ऐसा तो नहीं कि हमने अपना पहला सा प्रेम त्याग दिया है; लोगों से और सबसे बढ़कर परमेश्वर से। यदि ऐसा है तो परमेश्वर हमको दूसरा मौका देता है । हमारे लिए आज भी अवसर है। परमेश्वर आपको आशीष दे ।