लूका 12:13-21 परिचय :- लूका रचित सुसमाचार के बारहवें अध्याय के प्रारम्भिक पदों में आप पाएंगे कि यह एक ऐसा समय है, जब हज़ारों की भीड़ प्रभु यीशु मसीह के पीछे-पीछे चल रही है । वह भीड़ में इन लोगों से अपनी बातें कह रहा है । वहां ऐसे लोग आते हैं जिनके पास विभिन्न समस्याएं होती हैं, जिनके पास विभिन्न प्रश्न होते हैं। वे प्रभु यीशु मसीह से प्रश्न करते हैं और वह उनकी समस्याओं का समाधान करता है, उनके प्रश्नों का उत्तर देता है । हज़ारों लोगों की उस भीड़ में से किसी ने एक बड़ा सामान्य सा प्रश्न उससे किया । किसी ने उससे कहा - हे गुरू, मेरे भाई से कह कि पिता की सम्पत्ति मुझे बांट दे । उन दिनों जो फरीसी, महायाजक, शास्त्री और अगुवे होते थे, उन्हें यह अधिकार होता था कि वे अपने समाज के लोगों की समस्याओं को सुलझाएं । ऐसे लोगों को रब्बी कहा जाता या गुरू माना जाता था । ये व्यक्ति अधिकारी होते थे। उनके उसी अधिकार को स्वीकार करते हुए, उसी रूप में अधिकार को मानते हुए यह व्यक्ति प्रभु यीशु मसीह के पास पहुंचा और उससे कहा - हे गुरू, मेरे भाई से कह कि मेरे पिता की सम्पत्ति मुझे बांट दे । प्रभु यीशु मसीह उसकी इस बात से थोड़ा नाराज़ हुआ और उससे कहा कि कौन मुझको तेरे ऊपर न्यायी ठहराता है या बांटने वाला नियुक्त करता है । तब प्रभु यीशु मसीह ने दो बातें उस व्यक्ति से कहीं । उसने कहा कि हर प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो और उसके साथ-साथ यह भी कि किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति की बहुतायत से नहीं होता । जो बात वास्तव में प्रभु यीशु मसीह कह रहा था, वह न केवल उस व्यक्ति से कह रहा था, न केवल उस व्यक्ति के प्रश्न का समाधान कर रहा था परन्तु साथ ही साथ सारे समुदाय से भी, हज़ारों लोगों की उस भीड़ से भी वह बात कह रहा था। वह उनको शिक्षा दे रहा था कि हर प्रकार के लोभ से अपने आपको बचाए रखो और उसी के साथ-साथ यह भी कि किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति की बहुतायत से नहीं होता। इस संसार के तराजू और मेरे मापदण्डों में बहुत अन्तर है । मनुष्य के नज़रिये और परमेश्वर के नज़रिये में एक अन्तर होता है । मनुष्यों के मापदण्डों और परमेश्वर के तराजू में एक अन्तर होता है । हमें इस अन्तर को समझना है । हो सकता है कि कोई व्यक्ति संसार की दृष्टि में बहुत धनवान हो, बहुत ज्ञानवान हो, उसका बहुत बड़ा नाम हो, उसके पास बड़े-बड़े पद हों । परन्तु वास्तव में परमेश्वर की दृष्टि में वह व्यक्ति धनवान नहीं गरीब है । वह ज्ञानवान नहीं वरन् निरा मूर्ख है । प्रकाशित वाक्य 3:17 में लिखा है - ``तू जो कहता है, कि मैं धनी हूं, और धनवान हो गया हूं, और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं, और यह नहीं जानता, कि तू अभागा और तुच्छ और कंगाल और अन्धा, और नंगा है'' । प्रभु यीशु मसीह कहता है कि तू अपने आपको तो बहुत समझता है । इसका कारण यह है कि तू अपने आपको संसार के नज़रिये से देखता है। तू अपने आपको मनुष्यों के मापदण्डों से तौलता है । तू सोचता है कि मैं बहुत धनवान हूं । बहुत धनी हो गया हूं । मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं । परन्तु वास्तव में तू अभागा है । परमेश्वर की दृष्टि में और मेरी दृष्टि में तू अभागा है । तुच्छ और कंगाल है । अन्धा और नंगा है । दुख की बात तो यह है कि तू इसको जानता नहीं। तू भ्रम में है । त्रासदी की बात यह नहीं है कि तू अभागा, तुच्छ, कंगाल, नंगा व अन्धा है । त्रासदी की बात यह है कि तू इस बात को जानता नहीं । जब कोढ़ हो जाता है तो जिस अंग में उसका प्रभाव होता है, उस अंग को अनुभूति नहीं होती । उसमें दर्द का अहसास नहीं होता। स्पर्श का अहसास नहीं होता। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह इन शब्दों का प्रयोग करता है । आज यदि इस संसार में हम देखें तो कितने लोग हैं जो अपने आपको बहुत कुछ समझते हैं । परन्तु वास्तव में वे परमेश्वर की दृष्टि में कुछ नहीं हैं । पुराने नियम में हम बेलशस्सर राजा के विषय में पाते हैं । उसने परमेश्वर का अपमान किया । परमेश्वर के मन्दिर के पात्रों में उसने दाखमधु पिया और मतवाला हो गया। जब वह सब प्रकार के सांसारिक उन्माद और नशे में बहका हुआ था तब एक हाथ आता हैऔर दीवार पर लिखता है कि - तू तौला गया और हल्का पाया गया। परमेश्वर की दृष्टि में तू बहुत हल्का पाया गया । आज कितने लोग हैं इस संसार में, जो अपने आपको बहुत कुछ समझते हैं परन्तु वास्तव में वे कुछ हैं नहीं । आज बहुत से लोग हैं जो धन और पद के आवरण में अपने आपको बहुत ऊंचा समझते हैं परन्तु वास्तव में उनमें भीतर से खोखलापन है । क्योंकि उन्हें अपनी आत्मा की चिन्ता है नहीं । आज हम कितने ही ऐसे लोगों को टेलीविजन पर देखते हैं या उनका नाम सुनते हैं जो बड़े फिल्मस्टार हैं, राजनेता हैं, राजनायक हैं । जो देश में और संसार में शांति की बात करते हैं । जो संसार की दृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण लोग हैं । परन्तु वास्तव में हम नहीं जानते कि इनमें कितना उथलापन है । कितने हल्के हैं ये लोग । यदि हम वास्तव में देखें तो इनमें से अधिकांश लोग, जिन्होंने बड़ी प्रतिष्ठा और यश इस संसार में कमाया है; वे परमेश्वर की दृष्टि में भूखे, निर्धन, नंगे, अभागे और तुच्छ हैं । वे इस बात को जानते नहीं । परमेश्वर के वचन में ऐसे अनेक लोगों का वर्णन है जो संसार की दृष्टि में तो ज्ञानवान थे परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख ठहरे । प्रभु यीशु मसीह उस युवक की बात का जवाब देते हुए एक धनवान मूर्ख का दृष्टान्त बताता है । धनवान की भूमि में बहुत उपज हुई । वह विचार करने लगा कि मैं क्या करूं? मेरे यहां जगह नहीं कि मैं इसको रखूं । मैं अपनी बखारियों को तोड़ूंगा, और बड़ी बखारियां बनाऊंगा और वहां पर अपनी सम्पत्ति को रखूंगा । ऐश करूंगा और अपने प्राण से कहूंगा कि हे मेरे प्राण आनन्द कर और सुख मना । खा-पी और चैन से रह । तब परमेश्वर उसको देखता है और कहता है - हे मूर्ख ! इसी रात तुझसे तेरा प्राण ले लिया जाएगा । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि ऐसा ही वह मनुष्य भी है जो अपने लिए धन बटोरता है परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में धनी नहीं। धनवान मूर्ख के इस दृष्टान्त से परमेश्वर हमारे लिए कौन सी बुद्धिमानी की बात बताना चाहता है ? इस मूर्ख के दृष्टान्त से हमारे लिए क्या शिक्षा है ? क्या हम परमेश्वर की दृष्टि में बुद्धिमान हैं ? या परमेश्वर जब हमें देखता है तो हम भी उसको मूर्ख के समान दिखाई देते हैं ? हम परमेश्वर की दृष्टि में कैसे ग्रहणयोग्य हो सकते हैं ? हम परमेश्वर की दृष्टि में कैसे समझदार हो सकते हैं ? इस दृष्टान्त से हमें तीन बातें सीखने को मिलती हैं। 1. इस व्यक्ति ने भौतिक वस्तुओं को जीवन की उपलब्धि मान लिया:- इस व्यक्ति ने सोचा कि जीवन में यदि कुछ हासिल करना है तो यही वे भौतिक वस्तुएं हैं जिन्हें हासिल किया जाए । जीवन का उद्देश्य मात्र यह है कि इन सारी सांसारिक-भौतिक वस्तुओं को प्राप्त कर लिया जाए। आज संसार जिन बातों से हमें तौलता है वे हमारी डिग्रियां हैं । संसार हमें हमारे मकान के नाप से तौलता है । वह हमारी सम्पत्ति के आधार पर हमें तौलता है । इस धनवान ने सोचा कि जीवन में जो कुछ है वह मात्र यह कि भौतिक वस्तुओं को उपलब्धि मान लिया जाए । इस व्यक्ति के लिए लिखा हुआ है कि वह धनवान था । उपज होने के बाद वह धनवान नहीं हो गया बल्कि वह पहले ही से धनवान था और उसके यहां बहुत उपज हुई । तब उसने कहा कि अब मैं और अधिक बखारियां बनाऊंगा । इस व्यक्ति के जीवन में बहुत सी अच्छी बातें भी हमें देखने को मिलती हैं । वह बहुत होशियार भी रहा होगा क्योंकि वह एक अच्छा किसान था । उसने काफी मेहनत की होगी तब तो इतनी उपज हुई । सांसारिक दृष्टि से वह बहुत होशियार रहा होगा क्योंकि जो कुछ उसके पास था उसने उसको बढ़ाया। बाइबिल में धन कमाने की बात को कभी ग़लत नहीं कहा गया परन्तु ग़लत तरीके से धन कमाना और उसे ग़लत तरीके से खर्च करना ग़लत है । जो कुछ हमारे पास है वह सब हमारा है; यह मान लेना ग़लत है । जो कुछ हमारे पास है वह परमेश्वर का दिया हुआ नहीं है और जो निर्णय हम करेंगे वही उचित है; ऐसा मान लेना ग़लत है। उसने कहा कि इन बखारियों को तोड़कर मैं और बड़ी बखारियां बनवाऊंगा । तब उन बखारियों में अपनी सम्पत्ति रखूंगा। फिर अपने प्राण से कहूंगा चैन कर, खा-पी और सुख से रह, तेरे पास तो अब सब कुछ है । अब दुख की तो कोई बात है नहीं, कमी की तो कोई बात है नहीं, असुरक्षा की तो कोई बात है नहीं; तेरे पास तो सब कुछ है । इसलिए हे मेरे प्राण, चैन कर, खा-पी और सुख से रह। ऐसा लगता है जैसे वह व्यक्ति अपनी सम्पत्ति के नशे में ये बातें कह रहा हो । उसकी बात से ऐसा लगता है कि जैसे उसमें भौतिकवाद का स्वर है, कुछ अहं का स्वर है, कुछ घमण्ड का स्वर है। वास्तव में उसका सम्पूर्ण ध्यान, उसका सम्पूर्ण प्रयास और उसका सम्पूर्ण उद्देश्य मात्र भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने में था । नीतिवचन 27:1-2 में लिखा है - ``कल के दिन के विषय में मत फूल, क्योंकि तू नहीं जानता कि दिन भर में क्या होगा । तेरी प्रशंसा और लोग करें तो करें परन्तु तू आप न करना; दूसरा तुझे सराहे तो सराहे, परन्तु तू अपनी सराहना न करना''। घमण्ड की बात परमेश्वर को स्वीकार्य नहीं है इसीलिए नीतिवचन 6:16 में लिखा हुआ है - ``छह वस्तुओं से यहोवा बैर रखता है, वरन् सात हैं जिन से उसको घृणा है : अर्थात् घमण्ड से चढ़ी हुई आंखें, झूठ बोलने वाली जीभ, और निर्दोष का लोहू बहाने वाले हाथ, अनर्थ कल्पना गढ़ने वाला मन, बुराई करने को वेग से दौड़ने वाले पांव, झूठ बोलने वाला साक्षी और भाइयों के बीच में झगड़ा उत्पन्न करने वाला मनुष्य'' । इस सन्दर्भ में जो सबसे पहली बात लिखी हुई है - वह है घमण्ड से चढ़ी हुई आंखें । कितनी बार ऐसा होता है कि इस संसार में रहते हुए सांसारिकता के दृष्टिकोण से यदि कुछ प्राप्त कर लेते हैं तो हम घमण्ड से भर जाते हैं । हम सोचते हैं कि हमारे पास बहुत कुछ हो गया, हमने खुद ये चीज़ें प्राप्त कर लीं, हमने इन बातों को अपने आपसे जुटा लिया; और हम घमण्ड से भर जाते हैं । हमारा स्वर बदल जाता है । हमारी आंखें चढ़ जाती हैं । हमारे बोलने का अंदाज़ बदल जाता है । परन्तु हम भूल जाते हैं कि इन बातों से परमेश्वर घृणा करता है । जीवन का सारा उद्देश्य यदि सांसारिक सम्पत्ति प्राप्त करना हो तो यह बड़े दुख की बात है । जीवन में यदि हम सांसारिक वस्तुओं में अपनी खुशी ढूंढें, अपने जीवन की संतुष्टि ढूंढें, अपने जीवन का अर्थ ढूंढें, अपने परिवार की सार्थकता को ढूंढें, तो हमें कुछ हाथ लगेगा नहीं । हम परमेश्वर की दृष्टि में अभागे, नंगे, तुच्छ, कंगाल और अन्धे होंगे । इस व्यक्ति के जीवन से जो बात हमें सीखने के लिए मिलती है वह यह कि ऐसा मनुष्य जो भौतिक वस्तुओं को अपनी उपलब्धि समझता है; वह परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख है । 2. इस व्यक्ति ने धन को भविष्य की सम्पूर्ण सुरक्षा समझ लिया था:- इस व्यक्ति ने सोचा था कि अगर बहुत धन-सम्पत्ति हो जाएगी, बड़े गोदाम बन जाएंगे, तो मेरा जीवन सुरक्षित हो जाएगा, मेरा जीवन चैन से रहेगा । मुझे किसी बात की चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी । 19 वीं आयत में वह कहता है - और अपने प्राण से कहूंगा कि तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत सम्पत्ति रखी है । अब चिन्ता की बात नहीं । अब बहुत बैंक बैलेंस है, अब चिन्ता की बात नहीं । बहुत सम्पत्ति है, अब चिन्ता की बात नहीं । बहुत ज़मीन है, अब चिन्ता की बात नहीं । अब तो सुख ही सुख, आनन्द ही आनन्द है। संतोष ही संतोष है, चैन ही चैन है । कभी-कभी जीवन में हम सोच लेते हैं कि यदि हमारी सम्पत्ति और धन है तो भविष्य की सुरक्षा है । परमेश्वर के वचन में इस बात को ग़लत नहीं ठहराया गया कि अपने भविष्य के लिए कुछ जमा करके रखो । परन्तु यदि हम यह सोच लें कि भविष्य की सम्पूर्ण सुरक्षा रुपए, पैसे और सम्पत्ति मंत ही निहित है तो हम परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख ठहरेंगे । व्यवस्था विवरण 6:10-12 में लिखा है - ``और जब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उस देश में पहुंचाए जिसके विषय में उसने इब्राहीम, इसहाक और याक़ूब नाम, तेरे पूर्वजों से तुझे देने की शपथ खाई, और जब वह तुझ को बड़े-बड़े और अच्छे नगर, जो तू ने नहीं बनाए, और अच्छे-अच्छे पदार्थों से भरे हुए घर, जो तू ने नहीं भरे, और खुदे हुए कूएं, जो तू ने नहीं खोदे और दाख की बारियां और जलपाई के वृक्ष, जो तू ने नहीं लगाए, ये सब वस्तुएं जब वह दे, और तू खाके तृप्त हो, तब सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि तू यहोवा को भूल जाए, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया है'' । वचन चेतावनी देता है कि कहीं ऐसा न हो कि तू अपने प्रतिज्ञा किए हुए देश में पहुंचकर अपने परमेश्वर यहोवा को भूल जाए । यह तेरे जीवन के लिए सबसे बड़ी त्रासदी होगी कि तेरा ध्यान तेरी सम्पत्ति में लग जाए, तेरा ध्यान तेरी सम्पन्नता में लग जाए, और जब तेरा पेट भरा रहे, जब तेरे सिर के ऊपर छत हो, जब तेरे पास फलदायी वृक्ष हों, जब तेरे पास खाने को, पीने को, पहनने को, रहने को, सब कुछ हो, जिसके लिए तूने कोई परिश्रम नहीं किया, जो परमेश्वर ने अपनी आशीष और अपने अनुग्रह की बहुतायत से तुझे दिया है, तो सावधान रहना । कहीं ऐसा न हो कि तू यहोवा को भूल जाए, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकालकर लाया है। कितनी बार ऐसा होता है कि जब जीवन में हमें कुछ प्राप्त हो जाता है, जब हम कुछ अर्जित कर लेते हैं, तो हमारा ध्यान उन वस्तुओं में इतना लग जाता है कि हम परमेश्वर को भूल जाते हैं । इसीलिए यहां परमेश्वर का वचन हमको सावधान करता है । हमारा ध्यान सांसारिकता में इतना लग जाता है कि हम भूल जाते हैं कि यहोवा परमेश्वर है, जिसने अपने बेटे प्रभु यीशु मसीह के रक्त से, जिसने अपने बेटे के बलिदान से हमें उस मिस्र अर्थात पाप की गुलामी से छुड़ाया है, और प्रतिज्ञा किए हुए देश अर्थात् अनन्त जीवन की ओर; हमें बढ़ाया है । हमारी सम्पूर्ण सुरक्षा, जीवन की संतुष्टि और आनन्द सांसारिक बातों में नहीं है । यह सब इन भौतिक वस्तुओं में नहीं है । परन्तु इसका वास्तविक आनन्द तो परमेश्वर की व्यवस्था पर चलने में, उसको स्मरण करने में, उससे प्रार्थना करने में है । उसके वचन का अध्ययन करने में, उसकी कलीसिया की संगति करने में ही हमको सच्चा आनन्द प्राप्त होता है । हमें संतुष्टि मिलती है । संतृप्ति और शान्ति मिलती है और अनन्त जीवन की आशा को दृढ़ता प्राप्त होती है । व्यवस्था विवरण 32:15ब में लिखा है - ``तू मोटा और हृष्ट-पुष्ट हो गया, और चर्बी से छा गया है; और तब उस ने अपने सृजनहार ईश्वर को तज दिया, और अपने उद्धारमूल चट्टान को तुच्छ जाना''। इस्राएलियों के जीवन में हम बार-बार यह बात देखते हैं कि जब इस्राएलियों को मिस्र की गुलामी से छुड़ाया गया, जब मूसा उनकी अगुवाई कर रहा था; उस समय जब उनको कुछ घटी रहती थी, जब उनके जीवन में कुछ कमी रहती थी, जब उन्हें कुछ वस्तुएं प्राप्त करनी होती थीं, तो वे परमेश्वर के निकट आते थे। जब समस्याएं आती थीं, जब मृत्यु का भय आता था, तो वे परमेश्वर के निकट आ जाते थे । परन्तु जब सम्पन्नता आ जाती थी, जब वे परमेश्वर की आशीषों से परिपूर्ण हो जाते थे, मन्ना खाकर तृप्त हो जाते थे, तो परमेश्वर से दूर चले जाते थे । यहां तक कि अपने लिए सोने का बछड़ा बनाकर उसकी पूजा करने लगते थे । हमारे लिए यह चेतावनी की बात है कि सावधान ! जब तू प्रतिज्ञा किए हुए देश में चला जाए और तुझे वे चीज़ें मिल जाएं जिसके लिए तूने परिश्रम नहीं किया, जो परमेश्वर ने अपने अनुग्रह से, अपनी आशीषों से तुझे दी हैं, तो सावधान! कहीं तू उसकी कृपा को न भूल जाना। 1 तीमुथियुस 6:10 में लिखा है - ``रुपये का लोभ सब प्रकार की बुराइयों की जड़ है, जिसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए कितनों ने विश्वास से भटककर अपने आपको नाना प्रकार के दुखों से छलनी बना लिया है'' । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह बड़ी सरलता से अपने पर्वतीय उपदेश में कहते हैं - ``स्वर्ग में अपने लिए धन इकट्ठा करो'' (मत्ती 6:20)। इस पृथ्वी पर धन इकट्ठा करोगे तो मूर्ख कहलाओगे । परमेश्वर की दृष्टि में तो मूर्ख ही रहोगे । क्या हमने स्वर्ग में अपने लिए धन इकट्ठा किया है? हम स्वर्ग में धन कैसे इकट्ठा कर सकते हैं ? इस बारे में बहुत सी चर्चा की जा सकती है । कुछ छोटी-छोटी परन्तु बड़ी प्रमुख बातें हैं । जब हम अपने स्वार्थ से ऊपर हटकर जिएंगे । जब हम अपने हितों के अलावा दूसरों के हितों का ध्यान रखेंगे । जब हम कलीसिया में दसवां अंश देंगे । जब हम अपने त्याग से दूसरों का भला करेंगे । जब कोई हमसे कुर्ता मांगे और हम दोहर भी दे देंगे । जब हमें कोई एक कोस बेगार में ले जाए और हम चार कोस भी चले जाएंगे । तब स्वर्ग में धन इकट्ठा करेंगे । जो समय और धन परमेश्वर ने दिया है, जब वह हम उसके कार्यों के लिए देते हैं और इन दो बातों को हम दूसरों के हितों के लिए भी बांटते हैं । तब स्वर्ग में धन इकट्ठा करते हैं । किसी ने कहा है कि अपने जीवन में हम परमेश्वर के प्रति कितने समर्पित हैं, इसके लिए दो बड़े टेस्ट हैं कि हम अपना धन कैसे खर्च करते हैं और अपना समय कैसे खर्च करते हैं । ये बहुत बड़े टेस्ट हैं । यदि हम परमेश्वर के लिए अपने समय को लगाएंगे तो स्वर्ग में अपने लिए धन जमा करेंगे । यदि हम परमेश्वर के कार्य के लिए देंगे तो स्वर्ग में अपने लिए धन जमा करेंगे । जब हम दूसरों के हितों का ध्यान रखेंगे, जब हम दूसरे के हित के लिए अपना अहित बर्दाश्त करने की क्षमता रखेंगे, तो स्वर्ग में धन जमा करेंगे । इसीलिए जब प्रभु यीशु मसीह के पास वह युवा धनी प्रशासक आता है तो प्रभु यीशु मसीह उससे कहते हैं कि तुझमें एक बात की घटी है; जा और जितना तेरे पास है, सब बेचकर कंगालों को दे दे; तो तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा । जितना तू देगा उससे बढ़कर धन तुझे स्वर्ग में मिलेगा । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि जो कुछ तुमने छोटों से छोटों में किसी एक के साथ किया, वह मेरे साथ किया । इस दृष्टान्त से जो शिक्षा हमें मिलती है वह यह कि जो मनुष्य धन को भविष्य की सम्पूर्ण सुरक्षा समझता है, वह परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख है । 3. यह व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख था क्योंकि उसको अपनी आत्मा की परवाह न थी :- इस व्यक्ति का सारा प्रयास और ध्यान, सम्पत्ति पर केन्द्रित था । मैं कितना उपजा सकता हूं, मैं कितने गोदाम बना सकता हूं, मैं कितने गोदामों को भर सकता हूं, मैं कितने वर्षों के लिए सम्पत्ति इकट्ठा कर सकता हूं; केवल इसी ओर उसका सारा ध्यान और प्रयास था । हम अपने आपसे प्रश्न करें कि दिनभर में कितना प्रयास अपने शरीर के लिए करते हैं, और कितना प्रयास हमारा अपनी आत्मा के लिए होता है ? कितना समय हम देते हैं अपने शरीर के लिए, और कितना समय हम देते हैं अपनी आत्मा के लिए? कितना खर्च करते हैं हम अपने शारीरिक लाभ के लिए और कितना खर्च करते हैं अपने आत्मिक लाभ के लिए? कितना ध्यान हम देते हैं सांसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, और कितना ध्यान हम देते हैं आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए? इस पृथ्वी पर हमने कितनी सम्पत्ति जमा की है, और कितना धन हमने स्वर्ग में जमा किया है? हम अपने शरीर की चिन्ता करते हैं । हम अपनी कमाई की चिन्ता करते हैं । दिन भर परिश्रम करते हैं और उसके बाद कुछ समय अपने मनोरंजन की चिन्ता करते हैं । शायद टेलीविजन देखते हैं । अपने परिवार के लोगों के साथ बैठते हैं । अपने मित्रों के साथ बैठते हैं ताकि हमारा कुछ मनोरंजन हो जाए । काम के बोझ की ओर से हमारा ध्यान हट जाए और फिर हम थककर इतने चूर हो जाते हैं कि भोजन करके हम सो जाते हैं । एक घंटे में 60 मिनिट होते हैं और एक दिन में 24 घंटे । यानि एक दिन में कुल 1440 मिनिट होते हैं । एक दिन के इन 1440 मिनिटों में से क्या 10 मिनिट भी हम अपनी आत्मा की चिन्ता में बिताते हैं ? क्या 1440 मिनिटों में से 10 मिनिट भी हम अपने आत्मिक लाभ का प्रयास करते हैं? क्या 1440 मिनिटों में से 10 मिनिट भी हम अपनी आत्मिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए कोई प्रयास करते हैं? क्या 1440 मिनिटों में से 10 मिनिट भी हम स्वर्ग में धन जमा करने का प्रयास करते हैं? शायद 10 मिनिट भी हमको नहीं मिलते कि हम प्रार्थना कर सकें, 10 मिनिट भी नहीं मिलते कि हम परमेश्वर से संगति कर सकें । 10 मिनिट भी नहीं मिलते कि हम किसी का भला कर सकें, कि हम किसी के लिए अनुग्रह के शब्द कह सकें । इसीलिए परमेश्वर उस व्यक्ति को आवाज़ देता है, जो यह कह रहा था कि - हे मेरे प्राण, तू खा-पी और चैन से रह क्योंकि तेरे पास बहुत है । परमेश्वर उससे कहता है - हे मूर्ख, इसी रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा । याकूब जो कि प्रभु यीशु मसीह का भाई था वह अपनी पत्री में लिखता है - ``तुम जो यह कहते हो, कि आज या कल हम किसी और नगर में जाकर वहां एक वर्ष बिताएंगे, और व्यापार करके लाभ उठाएंगे । और यह नहीं जानते कि कल क्या होगा : सुन तो लो, तुम्हारा जीवन है ही क्या ? तुम तो मानो भाप समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है'' (याकूब 4:13) । यह शरीर तो नाश होने वाला है । इस धनवान मूर्ख का सारा ध्यान देखे हुए सच की ओर था । ऐसी बातों की ओर था जो समाप्त हो जाएंगी । उसका सारा ध्यान अपने शरीर की ओर था, अपने सुख के लिए था, अपने चैन के लिए था । परन्तु आत्मा के लिए कोई प्रयास नहीं था । आत्मा जो अनन्त की है । आत्मा जो स्थाई है । आत्मा जो कभी समाप्त नहीं होगी । आत्मा जो बीत नहीं जाएगी । जो रीत नहीं जाएगी । उस आत्मा की उसे कोई परवाह नहीं थी । इसीलिए प्रभु यीशु मसीह 21 वीं आयत में कहते हैं - ``ऐसा ही वह मनुष्य भी है जो अपने लिये धन बटोरता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में धनी नहीं'' । नीति वचन 14:12 में लिखा है - ``ऐसा मार्ग है, जो मनुष्य को ठीक देख पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु ही मिलती है'' । क्या होगा अगर आधी रात को हमारा प्राण हमसे ले लिया जाए? क्या होगा अगर आज हमारे जीवन का अन्तिम दिन हो? हो सकता है हम अपने जीवन में ऐसे मार्ग पर चल रहे हों जो हमको ठीक दिखाई देता है । परन्तु क्या वास्तव में परमेश्वर की दृष्टि में वह उचित है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह वही मार्ग है जो ठीक तो दिखाई देता है परन्तु जिसके अन्त में अनन्त मृत्यु है । जिसके लिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं - ``यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे और अपनी आत्मा की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ?'' हो सकता है कि आज हमें बड़ा अच्छा लग रहा हो कि सब कुछ ईश्वर ने दिया है । हमारे रेफ्रिजरेटर भरे हुए हैं। हमारा अच्छा खासा बैंक एकाउन्ट है । हमारे बच्चे नालायक भी निकल जाएं तो क्या, चार पीढ़ियां बैठकर खा सकती हैं । बहुत ज़मीन है हमारे पास । सब कुछ बड़ा अच्छा चल रहा है । परन्तु क्या यह वही मार्ग है जिसमें हमें आज तो सब कुछ ठीक दिखाई दे रहा है परन्तु अन्त में आत्मा का विनाश है, जिसमें अन्त में मृत्यु ही मिलती है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम परमेश्वर की दृष्टि में मूर्ख नहीं परन्तु बुद्धिमान बनें । इस व्यक्ति के जीवन में देखें कि परमेश्वर ने इसे मूर्ख क्यों कहा? परमेश्वर ने इसलिए मूर्ख कहा क्योंकि इस व्यक्ति ने सोचा कि भौतिकता की उपलब्धि ही इस जीवन में सब कुछ है । इस व्यक्ति ने समझा कि धन से भविष्य की सम्पूर्ण सुरक्षा हो सकती है । इस व्यक्ति ने आत्मा की परवाह नहीं की, इसीलिए परमेश्वर की दृष्टि में यह व्यक्ति मूर्ख ठहरा । निष्कर्ष :- हमें परमेश्वर ने अवसर दिया है कि हम परमेश्वर की दृष्टि में बुद्धिमान बनें। हम परमेश्वर की दृष्टि में ऐसे मार्ग पर चलें जिसका अन्त मृत्यु नहीं वरन् अनन्त जीवन है। परमेश्वर ने हमको मौका दिया है कि हम एक ऐसे मार्ग पर चलें, जहां पर प्रभु यीशु मसीह का बलिदान है । हमारे पापों की क्षमा है । जहां अनन्त जीवन का दान है । हम उस कलवरी के मार्ग पर चलें जो हो सकता है कि संसार को तो ठीक न दिखाई दे परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में वह ठीक है । हमें परमेश्वर की दृष्टि में बुद्धिमान बनना है । हमें संसार में समझदारी से चलना है तो हमको अपने स्वार्थों से ऊपर उठना होगा। इस भौतिकवाद के आकर्षण से ऊपर हटना होगा । हमको देना सीखना होगा । हमको दूसरों का हित देखना होगा, दूसरों का ध्यान रखना होगा । हमें इस बात का अहसास होना चाहिए कि हमारी सुरक्षा धन में नहीं वरन् प्रभु यीशु मसीह में हमारी अनन्त सुरक्षा है । हम अपनी आत्मा की चिन्ता करना सीखें। हम दिन भर में थोड़ा समय दें और अपनी आत्मा की चिन्ता करें । अपनी आत्मा का हित करें । परमेश्वर के वचन का अध्ययन करें। परमेश्वर की संगति में जुड़े रहें । परमेश्वर के लोगों से संगति बनाए रखें । उसके वचन पर चलें । उसकी कलीसिया से जुड़े रहें तो परमेश्वर हमसे कहेगा कि - हे अच्छे, सच्चे, विश्वासयोग्य दास तू थोड़े में विश्वासी रहा। आ, अपने मालिक के आनन्द में सहभागी हो जा। परन्तु यह बड़ी त्रासदी की बात होगी यदि परमेश्वर हमसे कहे - ``हे मूर्ख, आज रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा ।'' निर्णय हम पर है । परमेश्वर ने हमको दिशा दी है । परमेश्वर ने हमको प्रकाश दिया है । उस दिशा में हम चलें या न चलें, यह हमारी इच्छा है । हम अपने जीवन को विनाश की ओर ले जाएं या अपनी आत्मा को परमेश्वर की ओर ले जाएं, यह हमारी इच्छा है, हमारा निर्णय है । परमेश्वर आपको आशीष दे ।