याकूब 4:2-3; 13-18 परिचय :- किसी ने कहा है कि प्रार्थना अन्तिम पड़ाव नहीं है। प्रार्थना प्रथम और आधारभूत बात है । प्रार्थना प्राथमिक तथ्य है । प्रार्थना हमारे मसीही जीवन की बुनियाद है । अक्सर हमारे जीवनों में होता यह है कि प्रार्थना अन्तिम पड़ाव होती है । आपने अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए कई कोशिशें की होंगी । हो सकता है लोन लेकर कुछ खरीदना चाहा हो । बीमार होने पर कोशिश की हो किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाने की । परन्तु वास्तव में जिन बातों की आप को आवश्यकता है क्या सच्चे मन से उन बातों को परमेश्वर से मांगा है ? यदि हम देखें तो पाते हैं कि हमारा मांगने का तरीका ग़लत होता है । परमेश्वर हमारी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे नीचे स्थान पर होता है । प्रार्थना हमारे जीवन का अन्तिम पड़ाव होता है इसलिए याकूब कहता है कि तुम्हें इसलिए नहीं मिलता क्योंकि मांगते नहीं । प्रार्थना के सम्बन्ध में कुछ आधारभूत बातों पर हम विचार करेंगे कि क्या कारण है कि हमारी प्रार्थनाएं नहीं सुनी जातीं । 1. हमारा उद्देश्य ग़लत होता है :- याकूब 4:3 में लिखा हुआ है - ``तुम मांगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से मांगते हो, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो'' । जीवन में जो बात हमको सीखना है वह यह कि हम इस बात में अन्तर कर सकें कि वास्तव में हमारी आवश्यकताएं क्या हैं ? और हमारी मांगें क्या हैं ? अक्सर जो हमारी मांगें हैं उन्हें हम अपनी आवश्यकताएं समझ लेते हैं । जब हमारी मांगें पूरी नहीं होतीं तो हम निराश हो जाते हैं । वास्तव में यह ज़रूरी नहीं कि हमारी आवश्यकताएं परमेश्वर की दृष्टि में उचित हों । हम में से शायद हर कोई चाहता है कि हमारे पास गाड़ी हो, हमारे पास बहुत सी सुविधाएं हों । परन्तु हमारी आवश्यकताएं क्या हैं और हमारी मांगें क्या हैं इनमें अन्तर करना सीख जाएं तो निश्चित रूप से यह पता चलेगा कि हम अपने स्वार्थों को मांग बनाकर परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करते हैं । परमेश्वर हमारे दिल को देखने वाला परमेश्वर है । वह हमारे दिल को जानने वाला परमेश्वर है। परमेश्वर के लिए यह तो प्रमुख है कि आप प्रार्थना कर रहे हैं पर उससे भी प्रमुख यह है कि किस बात के लिए प्रार्थना कर रहे हैं । परमेश्वर के वचन में लिखा है, दया करो तो हर्ष से करो, दान दो तो उदारता से दो, पहुनाई करो तो उत्साह से करो । क्यों ? क्योंकि परमेश्वर हमारे दिलों को देखता है । योना नबी की पुस्तक के दूसरे अध्याय को यदि हम पढ़ें तो पाएंगे कि वह मगरमच्छ के पेट में था और प्रार्थना कर रहा था । यदि मैं और आप में से कोई मगरमच्छ के पेट में होते तो घुटनों पर जाते और कहते कि - हे हमारे परमेश्वर किसी भी प्रकार से हमको यहां से निकाल दे । हम तेरा गुणानुवाद करेंगे, हम धन्यवाद करेंगे, हम सब कुछ तुझे दे देंगे। हमें किसी प्रकार से इस समुद्र के तल में से, मगरमच्छ के पेट से निकाल । परन्तु योना की प्रार्थना बड़ी भिन्न है । उसकी प्रार्थना, धन्यवाद की प्रार्थना है । नौंवें पद में वह कहता है - ``मैं ऊंचे शब्द से धन्यवाद करके तुझे बलिदान चढ़ाऊंगा । जो मन्नत मैंने मानी है, उसे मैं पूरा करूंगा । उद्धार यहोवा से ही होता है ।'' सम्पूर्ण प्रार्थना में कहीं भी योना की व्यक्तिगत आवश्यकता का उल्लेख नहीं है। वह परमेश्वर का गुणानुवाद कर रहा है । परमेश्वर का धन्यवाद कर रहा है। परमेश्वर की महानता को सराह रहा है । उसकी प्रार्थना में परमेश्वर की आराधना हो रही है। उसकी स्वयं की जो आवश्यकता है वह गौण हो गई है, शून्य हो गई है । योना प्रार्थना में इतना विलीन हो जाता है कि उसके मुख से केवल परमेश्वर के लिए गुणानुवाद, धन्यवाद, आदर और महिमा निकलती है । याकूब 4:3 में लिखा है - ``मांगते तो हो पर पाते नहीं। क्योंकि बुरी इच्छा से मांगते हो ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो'' । 2. यदि हमारे मन में दुर्भावना और कटुता है तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी :- भजन संहिता 66:18 में लिखा है - ``यदि मैं मन में अनर्थ बात सोचता, तो प्रभु मेरी न सुनता'' । यदि मैं अपने मन में अनर्थ बात सोचता, किसी के लिए बुराई सोचता, किसी के लिए षड़यंत्र रचता तो प्रभु मेरी नहीं सुनता । भाई से अगर बैर है, तो भेंट स्वीकार नहीं की जाएगी । मत्ती 5:23-24 में लिखा है - ``इसलिये यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहां तू स्मरण करे कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ दे । और जाकर पहिले अपने भाई से मेल-मिलाप कर; तब आकर अपनी भेंट चढ़ा'' । यदि हमारे मन में दुर्भावना है तो हमारी प्रार्थना स्वीकार नहीं की जाएगी । प्रभु यीशु मसीह कहते हैं - धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे। धन्य हैं वे लोग जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर को देख सकते हैं । उनका सीधा सम्बन्ध परमेश्वर से है । उनका सीधा सम्पर्क परमेश्वर से जुड़ा हुआ है। यदि हमारे मन में कटुता है, दुर्भावना है, जलन है, बुराइयां हैं, ग़लत विचार हैं, षड़यंत्र है, तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी । 3. यदि हम प्रभु में बने नहीं रहते तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी:- यदि हम किसी व्यक्ति का विरोध करें, उसके विरोध में षड़यंत्र रचें, उसकी बदनामी करें, उसके शत्रु हो जाएं और उसके बाद हम चाहें कि वह व्यक्ति हमारा भला करेगा तो यह सम्भव नहीं है । यूहन्ना 15:7 में लिखा है - ``यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा'' । उसकी आशीषों की कोई सीमा नहीं है । जकर्याह 7:13 - ``और सेनाओं के यहोवा का यह वचन हुआ, कि जैसे मेरे पुकारने पर उन्हों ने सुना, वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी न सुनूंगा'' । जब मैंने पुकारा, जब मैंने वचन दिया, जब मैंने अपना वचन दिया तो तुमने नहीं सुना । जब तुमने मेरा संदेश नहीं सुना, जब तुमने मेरे वचन का तिरस्कार किया, जब वचन की शिक्षाओं को अपने जीवन में नहीं लिया तब (परमेश्वर कहता है कि) जैसे मेरे पुकारने पर उन्होंने नहीं सुना वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी नहीं सुनूंगा। परमेश्वर हमको पुकारता है, हमको आवाज़ देता है, अपने वचन की शिक्षा देता है, हमको चेतावनियां देता है; और हम नहीं सुनते । परन्तु उसके बाद भी अपेक्षा करते हैं कि परमेश्वर हमारी सुने । लेकिन परमेश्वर स्पष्ट कहता है कि जैसे मेरे पुकारने पर उन्होंने नहीं सुना वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी नहीं सुनूंगा । 4. यदि हमारी प्राथमिकताएं ग़लत हों तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी :- मत्ती 6:33 में लिखा है - ``इसलिये पहिले तुम उसके राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी'' । पहले वस्तुएं प्राप्त करना चाहते हैं, उसकी आशीषें प्राप्त करना चाहते हैं और तब हमें अपने कर्त्तव्यों और ज़िम्मेदारियों का स्मरण आता है । पहले हम सांसारिक वस्तुओं को खोजते हैं और फिर सोचते हैं कि धर्मी बन जाएंगे। हम सोचते हैं कि अभी तो बहुत समय है जब रिटायर होंगे तो परमेश्वर का भजन करेंगे, उसकी आराधना में आएंगे, उसके विषय में सोचेंगे, जो भी सेवा हमसे हो सकेगी, उसे करेंगे। वास्तव में हमारा चिन्तन उल्टा हो जाता है, हमारी प्राथमिकताएं उल्टी हो जाती हैं। वह कहता है कि पहले तुम उसके राज्य और उसके धर्म की खोज तो करो । उसके राज्य को तो समझो, उसकी धार्मिकता को तो जानो, उसके वचन में खोज तो करो, उसके वचन को अपने जीवनों में तो उतारो । फिर मेरी प्रतिज्ञा है कि ये सब वस्तुएं तुम्हें मिल जाएंगी । इसीलिए याकूब 5:16 में लिखा हुआ है - ``धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है'' । धर्मी जन कौन है ? वह, जिसने उसके राज्य की खोज की । इसलिए उसकी प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है । हो सकता है कि हमारी धार्मिकता में कुछ कमी हो । एक व्यक्ति प्रार्थना करता है तो उसकी सुन ली जाती है, दूसरा प्रार्थना करता है तो उसकी नहीं सुनी जाती । परमेश्वर के वचन में उदाहरण है कि दो व्यक्ति मन्दिर में पहुंचकर प्रार्थना करते हैं, एक स्वीकार कर लिया जाता है, दूसरा अस्वीकार कर दिया जाता है । दो व्यक्ति भेंटें चढ़ाने के लिए आते हैं, एक की भेंट स्वीकार कर ली जाती है, दूसरे की भेंट अस्वीकार कर दी जाती है । क्यों ? क्योंकि जिस व्यक्ति के जीवन में धार्मिकता है, जिसने परमेश्वर की धार्मिकता और उसके वचन की खोज की उसके लिए परमेश्वर का वचन है कि ये सारी वस्तुएं उसे मिल जाएंगी । धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है । यदि हमारी प्राथमिकताएं ग़लत होंगी तो हमारी प्रार्थनाएं नहीं सुनी जाएंगी । 5. यदि हमारा अपने जीवनसाथी के साथ व्यवहार ठीक नहीं है तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी :- यह बात सुनने में शायद कुछ अजीब सी लगे परन्तु हमारी प्रार्थनाएं सुनी नहीं जातीं क्योंकि हमारा अपने जीवनसाथी के साथ व्यवहार ठीक नहीं । 1 पतरस 3:7 में लिखा है - ``हे पतियो, तुम भी बुद्धिमानी से पत्नियों के साथ जीवन निर्वाह करो और स्त्री को निर्बल पात्र जानकर उसका आदर करो, यह समझकर कि हम दोनों जीवन के वरदान के वारिस हैं, जिस से तुम्हारी प्रार्थनाएं रुक न जाएं'' । यहां पर यह पद पतियों कोसम्बोधित है । शायद पति अपनी पत्नियों के साथ ज़्यादा दुर्व्यवहार करते हैं, ज़्यादा आक्रामक हो जाते हैं, जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, जल्दी क्रोधित हो जाते हैं । हो सकता है हमारे जीवन साथी के साथ हमारा व्यवहार ठीक नहीं हो । इस कारण हम चाहे कितनी भी प्रार्थनाएं करें, वे नहीं सुनी जाएंगी। यशायाह 58:4 में लिखा हुआ है - ``सुनो, तुम्हारे उपवास का फल यह होता है कि तुम आपस में लड़ते और झगड़ते और दुष्टता से घूंसे मारते हो । जैसा उपवास तुम आजकल रखते हो, उस से तुम्हारी प्रार्थना ऊपर नहीं सुनाई देगी'' । जब आपस में तुम लड़ते-झगड़ते हो, दुष्टता करते हो, घूंसे मारते हो और उसके बाद भी यह अपेक्षा करते हो कि तुम्हारी प्रार्थनाएं सुनी जाएं तो यह सम्भव नहीं है। हमें स्मरण रखना है कि यदि अपने जीवन साथी के साथ हमारा व्यवहार ठीक नहीं है तो हमारी प्रार्थनाएं नहीं सुनी जाएंगी । 6. यदि हम कंगाल की दुहाई नहीं सुनते तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी :- नीति वचन में लिखा हुआ है ``जो कंगाल की दुहाई पर कान न दे, वह आप पुकारेगा और उसकी सुनी न जाएगी'' । हो सकता है आप कहें कि मेरा जीवन तो बड़ा अच्छा है । मैं कलीसिया में आता हूं । मेरे बच्चे धार्मिकता के विषय में सीख रहे हैं। मेरा जीवन बहुत अच्छा है, मैं वचन की शिक्षा भी देता हूं । हो सकता है आप किसी अच्छे पद पर भी हों। परन्तु यदि कंगाल की दुहाई पर आपने कान नहीं दिया तो लिखा हुआ है कि ऐसा व्यक्ति जब पुकारेगा तब उसकी सुनी न जाएगी । 7. यदि हम सन्देह करते हैं तो हमारी प्रार्थना नहीं सुनी जाएगी :- याकूब 1:5-8 में लिखा है - ``पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उस को दी जाएगी । पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्देह न करे; क्योंकि सन्देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है । ऐसा मनुष्य यह न समझे, कि प्रभु से मुझे कुछ मिलेगा। वह व्यक्ति दुचित्ता है, और अपनी सारी बातों में चंचल है'' । यदि मन में विश्वास नहीं वरन् सन्देह है । प्रार्थना तो कर रहे हैं परन्तु मात्र शब्द हैं, उसमें हमारा दिमाग और दिल नहीं शामिल नहीं है तो वहां पर सन्देह होगा । वहां पर विश्वास नहीं होगा । इस कारण से वहां परमेश्वर का काम भी नहीं होगा । डी.एल.मूडी ने लिखा है कि - प्रभु यीशु मसीह ने अपने चेलों को प्रचार करना नहीं सिखाया । उसने अपने चेलों को काउन्सिलिंग करने की शिक्षा नहीं दी । उसने अपने चेलों को चंगाई करने के तरीके नहीं सिखाए परन्तु उसने अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखाया । प्रार्थना हमारे मसीही जीवन की, हमारे मसीही विश्वास की, हमारे जीवन की गवाही की बुनियाद है । किसी व्यक्ति ने मुझसे बहुत पहले जब मैं बहुत छोटा था एक बात कही थी। उसकी वह बात मेरे दिमाग में घर कर गयी थी । उस बात ने मेरे दिमाग में बहुत ज़हर घोला कि बाइबिल में लिखा हुआ है कि जब वह तुम्हारे मांगने के पहले ही जानता है कि तुम्हें किन बातों की आवश्यकता है । परमेश्वर भरपूरी से देता भी है इसलिए प्रार्थना करने की ज़रूरत नहीं है । परन्तु वास्तव में यह बात बिल्कुल ग़लत है । क्योंकि जब हम प्रार्थना करते हैं तो इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि हमारी निर्भरता किस पर है। हमारी प्रार्थना यह प्रदर्शित करती है कि हमारी निर्भरता परमेश्वर पर है । परमेश्वर हमारा दृढ़ गढ़ और हमारी चट्टान है । उस पर हमारी निर्भरता है । उस पर हमारी आशा है । वह हमारे जीवन का आधार है। जब हम प्रार्थना करते हैं तो इस बात को प्रदर्शित करते हैं कि हमारे जीवन का प्रमुख कौन है ? क्या धन हमारे जीवन को संचालित करता है ? क्या राजनैतिक लोग हमारे जीवन को संचालित करते हैं? क्या जीवन की समस्याएं हमारे जीवन को संचालित करती हैं ? क्या हमारी मजबूरियां हमारे जीवन को संचालित करती हैं ? जब हम प्रार्थना करते हैं तो यह इस बात का प्रदर्शन होता है कि हमारा प्रमुख, हमारा स्वामी, हमारा पिता; परमेश्वर है । जब हम प्रार्थना करते हैं तो इस बात को प्रगट करते हैं कि हमारा विश्वास किस पर है ? और हमारा विश्वास कितना मज़बूत है ? जब हम प्रार्थना करते हैं तो इस बात को प्रगट करते हैं कि हमारे जीवन में हमारा निकटतम सम्बन्धी कौन है ? हमारा सम्बन्ध किससे है ? क्योंकि जब हम प्रार्थना करते हैं तो परमेश्वर से बातचीत करते हैं । किसी ने कहा है - श् सड्डीएल्ड्डड्यल्क्क् ेस्ड्डरूक्ऱ्रूीछ रूक् ी सद्भञ्ल्ड्डड्यल्क्क् ेस्ड्डरूक्ऱ्रूीछ. अर्थात् प्रार्थना रहित मसीही, सामर्थ्य रहित मसीही है । परमेश्वर के वचन में प्रार्थना के सैकड़ों उदाहरण पाए जाते हैं । प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की और पांच रोटियों और दो मछलियों से पांच हज़ार लोगों को भोजन खिलाया । नाइन नगर में प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की और जो शव यात्रा थी वह विजय जुलूस में बदल गई क्यों्कि वह जवान जी उठा । प्रभु यीशु मसीह ने प्रार्थना की और चार दिनों का मुर्दा लाज़र क़ब्र में से निकल आया । मूसा ने प्रार्थना की और सूखी चट्टान में से जल का सोता बह निकला । एलिय्याह ने प्रार्थना की और आकाश से आग बरसी । साढ़े तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई । दानिय्येल ने प्रार्थना की और परमेश्वर ने भूखे सिंहों के मुंह को बन्द कर दिया । यहोशू ने प्रार्थना की और सूर्य ठहर गया । बड़े-बड़े शोधकर्ताओं ने इस बात को स्वीकार किया है कि सूर्य थम गया था । समय ठहर गया था । हिजकिय्याह ने प्रार्थना की और परमेश्वर की योजना बदल गई । गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस में लिखा हुआ है कि विश्व की सबसे बड़ी धार्मिक सभा महाकुम्भ की होती है । सम्पूर्ण महाकुम्भ के समय लगभग 2 करोड़ लोग उपस्थित होते हैं । जब भी महाकुम्भ होते थे तो हरिद्वार में और दूसरे स्थानों में बहुत से प्रार्थना योद्धा जमा होते थे । मसीही कार्यकर्त्ता जमा होते थे और वे स्टॉल्स लगाते थे । उनके पास पर्चे होते थे, न्यू टेस्टामेंट्स होते थे, बाइबिल होती थी । बहुत से प्रचारक थैला लटकाकर वहां जाते थे, लोगों से बात करते थे और उन्हें प्रभु यीशु मसीह के बारे में बताते थे। वे ट्रेक्ट्स बांटते और साधुओं से चर्चा करते थे । जब पिछला महाकुम्भ हुआ तो मसीही अगुवे हरिद्वार में जमा हुए । उन्होंने कहा कि हम इस बार ऐसा कुछ नहीं करेंगे । हम वहां कोई स्टॉल नहीं लगाएंगे । हम एक भी पर्चा वहां नहीं बांटेंगे । हम नया नियम और बाइबिल नहीं वितरित करेंगे । हम किसी के पास जाकर उसे प्रभु यीशु मसीह के बारे में नहीं बताएंगे । परन्तु हम एक काम करेंगे और वह यह कि जहां कुम्भ का मेला होता है, वहां तम्बू लगाएंगे । सारे भारत से पांच हज़ार मसीही योद्धा वहां जमा होंगे और 50-50 की श्रृंखला में हाथ बांधकर उस कुम्भ मेले के चारों तरफ प्रार्थना करते हुए, जयजयकार करते हुए और परमेश्वर की महिमा करते हुए घूमते जाएंगे; चाहे दिन हो, चाहे रात हो, चाहे बदली हो, चाहे धूप हो, चाहे आंधी हो, चाहे तूफान हो, चाहे बारिश हो । वहां पर पांच हज़ार मसीही प्रार्थना योद्धा जमा हुए। उन्होंने लगातार प्रार्थनाएं कीं । उस वर्ष उस कुम्भ मेले के दौरान कई अजीबो-गरीब घटनाएं हुइंर्, जैसी पहले कभी नहीं हुई थीं और लोगों को यह स्वीकार करना पड़ा कि जीवित परमेश्वर की सामर्थ्य के द्वारा उस स्थान में ये बातें घटित हुइंर् । तब बहुतेरे प्रभु यीशु मसीह के विषय में जानने के लिए उन प्रार्थना योद्धाओं के सम्पर्क में आए । निष्कर्ष :- यह प्रार्थना की शक्ति है, जो आज हमारे लिए जीवित है । यह प्रार्थना की शक्ति है, जो दुनिया के किसी भी परमाणु बम से बड़ी है। मसीहियों के पास एक ऐसा हथियार है, जो दुनिया के किसी भी अणु बम और परमाणु बम से बड़ा है । इसका उपयोग करना हम नहीं जानते, इसका उपयोग करना हमने नहीं सीखा। आज हमारे पास पांच मिनिट का भी समय नहीं है कि हम प्रार्थना करें। 2 इतिहास 7:14-15 में लिखा है - ``तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं, दीन होकर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी होकर अपनी बुरी चाल से फिरें, तो मैं स्वर्ग में से सुनकर उनका पाप क्षमा करूंगा और उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा । अब से जो प्रार्थना इस स्थान में की जाएगी, उस पर मेरी आंखें खुली और मेरे कान लगे रहेंगे'' । परमेश्वर कहता है कि मैं उनके देश को जहां का तहां कर दूंगा । मैं उनके घाव को चंगा करूंगा, मैं स्वर्ग में सुनकर उनका पाप क्षमा करूंगा, मेरी आंखें उन पर लगी रहेंगी और मेरे कान उन पर लगे रहेंगे । परन्तु यह कब होगा ? यह तब होगा जब मेरी प्रजा के लोग दीन होकर प्रार्थना करें । अरे ! ये तो मेरी प्रजा के लोग हैं, जो मेरे कहलाते हैं, पर प्रार्थना नहीं करते । उनके मन में तो घमण्ड है, अहंकार है । उन्हें धन का, पद का, प्रतिष्ठा का लोभ है और उसी ओर उनका ध्यान लगा हुआ है । परन्तु परमेश्वर यहोवा का जीवित वचन कहता है कि यदि मेरी प्रजा के लोग, जो मेरे कहलाते हैं दीन होकर प्रार्थना करें, मेरे दर्शन के खोजी हों और अपनी बुरी चाल से फिरें तो मैं स्वर्ग से सुन कर उनका पाप क्षमा करूंगा । उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा। अब से जो प्रार्थनाएं इस स्थान में की जाएंगी, उस पर मेरी आंखें खुली और मेरे कान लगे रहेंगे । परमेश्वर हम सभों को अपने जीवन से उन बातों को निकालने की अगुवाई दे जो हमारी प्रार्थना के सुने जाने में रुकावट हैं । परमेश्वर आपको आशीष दे ।