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प्रभु यीशु के सात पत्र - प्रारम्भ और समापन

परिचय :- प्रकाशितवाक्‍य में वर्णित सात कलीसियाओं का अध्‍ययन वर्तमान कलीसियाओं के लिए भी सामयिक है। यह अध्‍ययन हमारी व्‍यक्‍तिगत जीवन यात्रा में सांसारिकता से आत्‍मिकता की ओर बढ़ने के लिये भी प्रेरणादायक है। अक्‍सर हमारे लिए यह ज़्‍यादा सरल हो जाता है कि हम अपनी कलीसिया के बारे में अच्‍छा सोचें, हम अपनी कलीसिया की स्‍थिति देख कर सन्‍तुष्‍ट हो जाएं और यह सोचने लगें कि हमने तो एक आदर्श कलीसिया बना ली है, हम ने एक मिसाल कायम कर ली है। परन्‍तु प्रमुख बात यह नहीं है कि हम कलीसिया के विषय में क्या सोचते हैं या दूसरे लोग हमारी कलीसिया के बारे में क्‍या कहते हैं; वास्‍तव में आधारभूत बात यह है कि प्रभु यीशु मसीह जब हमारी कलीसियाओं को देखता है, जब हमारे जीवनों को देखता है तो वह हमारे विषय में क्‍या सोचता है। यही बात प्रमुख है; और इसी बात पर हमें ध्‍यान देना है।

प्रकाशितवाक्‍य के दूसरे एवं तीसरे अध्‍यायों में हम पाते हैं कि उन दिनों के एशिया माइनर में, जो अब तुर्किस्‍तान के दक्षिण-पश्‍चिम का भाग है, सात कलीसियाएं थीं। यह प्रभु यीशु के पुनरुत्‍थान के लगभग 40 वर्ष बाद की बात है। इन सात कलीसियाओं को प्रभु यीशु मसीह देखता है और इन की विवेचना करता है, उनकी अच्‍छाइयों और उनके गुणों का वर्णन करता है और उनकी प्रशंसा करता है। उसके बाद वह कलीसिया को यह बताता है कि उन में क्‍या कमी है और उसके बाद अगले भाग में प्रभु यीशु उन्‍हें चेतावनी देता है कि वे अपनी कमियों और ग़लतियों को सुधार लें। वह उन्‍हें चेतावनी देता है कि यदि उन्‍होंने इन ग़लतियों को नहीं सुधारा तो उसके क्‍या दुष्‍परिणाम उन्‍हें भुगतने होंगे। वह यह भी बताता है कि यदि वे इन ग़लतियों को सुधार लेंगे तो उन्‍हें क्‍या आशीषें प्राप्‍त होंगी।

इन्‍हीं सात कलीसियाओं में से पहली कलीसिया के विषय में हम इस अध्‍याय में अध्‍ययन करेंगे। बाइबिल की सबसे अन्‍तिम पुस्‍तक प्रकाशितवाक्‍य है, जिसे लगभग 100 ईस्‍वी में लिखा गया है या यूं कहें कि इसे पहली सदी के अन्‍त में लिखा गया है। इस समय तक यीशु मसीह के सभी चेलों की हत्‍या की जा चुकी थी। केवल यूहन्‍ना बचा था जो रोमी राज्‍य की कैद में था।

जिस प्रकार हमारे देश में अंग्रेज़ों के शासन काल में काला-पानी की सज़ा दी जाती थी और क़ैदियों को अण्‍डमान-निकोबार के निर्जन टापूओं पर भेज दिया जाता था, उसी प्रकार यूहन्‍ना को निर्जन पतमुस टापू पर आजीवन सज़ा भुगतने के लिए भेज दिया गया। यूहन्‍ना जो कि प्रभु यीशु मसीह के प्रति विश्‍वासयोग्‍य रहा, जिस पर प्रभु यीशु मसीह ने भी विश्‍वास किया था और क्रूस पर अपनी मृत्‍यु से पूर्व अपनी माता की ज़िम्‍मेदारी उस को सौंपी थी। हम पाते हैं कि यूहन्‍ना ने मरियम की मृत्‍यु तक उसकी देखभाल की। वही यूहन्‍ना अब अपने जीवन की वृद्धावस्‍था में है और पतमुस के निर्जन टापू में सज़ा काट रहा है। इस स्‍थान पर, उस अकेलेपन में प्रभु यीशु का दर्शन उसको मिलता है। यीशु उससे बातचीत करता है, उसे निर्देश देता है, और इस बात की चेतावनी देता है कि आने वाले समयों में व जगत के अन्‍त में क्‍या होगा। इन सारी बातों का दर्शन यूहन्‍ना देखता है। ऐसा नहीं है कि प्रभु यीशु ने यूहन्‍ना को ये सारी बातें केवल बताईं बल्‍कि इन बातों को यूहन्‍ना ने स्‍वयं देखा और अनुभव किया। तब इन सारी बातों को उसने प्रकाशितवाक्‍य की पुस्‍तक के रूप में लिखा। क्‍योंकि प्रकाशितवाक्‍य में भविष्‍य की बातों का दर्शन है; इस कारण बहुत सी बातें समझने में कठिन प्रतीत होती हैं परन्‍तु इस पुस्‍तक का जो सार है, जो आधारभूत बात है वह यह कि प्रभु यीशु मसीह और उसके पीछे चलने वाले लोग विजयी होंगे और अन्‍त में उनकी विजय होगी।

इन सात कलीसियाओं के क्रम में पहली कलीसिया इफिसुस की कलीसिया है, जिस के विषय में लिखा है;

“इफिसुस की कलीसिया के दूत को यह लिख, कि जो सातों तारे अपने दहिने हाथ में लिए हुए है, और सोने की सातों दीवटों के बीच में फिरता है, वह यह कहता है कि मैं तेरे काम, और परिश्रम, और तेरा धीरज जानता हूं; और यह भी, कि तू बुरे लोगों को तो देख नहीं सकता; और जो अपने आप को प्रेरित कहते हैं, और हैं नहीं, उन्‍हें तू ने परखकर झूठा पाया। और तू धीरज धरता है, और मेरे नाम के लिये दुख उठाते-उठाते थका नहीं। पर मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तू ने अपना पहिला-सा प्रेम छोड़ दिया है। सो चेत कर, कि तू कहां से गिरा है, और मन फिरा और पहिले के समान काम कर; और यदि तू मन न फिराएगा, तो मैं तेरे पास आकर तेरी दीवट को उस स्‍थान से हटा दूंगा। पर हां तुझ में यह बात तो है, कि तू नीकुलइयों के कामों से घृणा करता है, जिन से मैं भी घृणा करता हूं। जिस के कान हों, वह सुन ले कि आत्‍मा कलीसियाओं से क्‍या कहता है : जो जय पाए, मैं उसे उस जीवन के पेड़ में से जो परमेश्‍वर के स्‍वर्गलोक में है, फल खाने को दूंगा” (प्रकाशितवाक्‍य 2:1-7)।

इफिसुस की कलीसिया के लिए प्रभु यीशु मसीह प्रमुखत: जिस बात को कहता है वह यह है कि “मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तूने अपना पहिला-सा प्रेम छोड़ दिया है”।

यदि हम इतिहास में इफिसुस के बारे में देखें तो पाते हैं कि यह एशिया माइनर का सबसे बड़ा शहर था। वहां एक बन्‍दरगाह था, समुद्र का किनारा कटा-फटा था, जहां से 3 दिशाओं को समुद्री जहाज़ जाते थे। यह व्‍यापार का बहुत बड़ा केन्‍द्र था। इफिसुस को रोमी सम्राट ने यह अधिकार दिया था कि शहर की अपनी एक अलग सरकार हो सकती है, जो शहर को चला सकती है। यदि आज की परिस्‍थितियों के अनुसार देखें तो इफिसुस की नगर पालिका को स्‍वतंत्रता थी कि वे शहर को संचालित कर सकें। इफिसुस इस बात के लिये भी प्रसिद्ध था कि वहां एक बहुत बड़ा स्‍टेडियम था, जहां पर हज़ारों लोग बैठ सकते थे। इफिसुस के इतिहास को देखें तो अक्‍विल्‍ला और प्रिसकिल्‍ला जो पौलुस के मित्र थे, जिन्‍होंने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया था, उन्‍होंने अपने घर में इफिसुस की कलीसिया को प्रारम्‍भ किया था। पौलुस प्रेरित ने अपनी दूसरी मिशनरी यात्रा के दौरान इफिसुस में आकर 2 वर्ष तक कलीसिया की अगुवाई की और वहां रहकर सेवकाई की।

दूसरे अध्‍याय में लिखा हुआ है - इफिसुस की कलीसिया के दूत को यह लिख कि जो सातों तारे दाहिने हाथ में लिए हुए है। ये सातों तारे प्रभु यीशु मसीह अपने दाहिने हाथ में लिए हुए है और ये सात तारे सातों कलीसियाओं के पासबान हैं। ये प्रभु यीशु मसीह के प्रवक्‍ता हैं, ये उसके सेवक हैं और ये प्रभु यीशु मसीह के हाथ में हैं। परमेश्‍वर का जो सच्‍चा सेवक है वह परमेश्‍वर के हाथ में रहता है। और आगे लिखा है जो सातों तारे दाहिने हाथ में लिए हुए है। दाहिना हाथ जो निकटता का अहसास दिलाता है, जिसमें शक्‍ति का अहसास है, जिसमें प्रमुखता का अहसास है। आगे लिखा हुआ है सोने की सातों दीवटों के बीच में फिरता है। सात कलीसियाओं के लिए इन सात दीवटों का उल्‍लेख किया गया है। ये सात कलीसियाएं हैं; इफिसुस, स्‍मुरना, पिरगमुन, थुआतीरा, सरदीस, फिलादेलफिया और लौदीकिया की कलीसिया; ये सात दीवटें हैं। लिखा है सोने की सात दीवटों के बीच में फिरता है। यह प्रभु यीशु मसीह है जो अपनी कलीसियाओं के बीच में फिरता है, जो अपनी कलीसियाओं की चिन्‍ता करता है, इन कलीसियाओं की जो उसकी निज देह है, जो उसकी दुल्‍हिन है, वह उसकी देखरेख करता है। वह अपनी कलीसिया की फ़िक्र करता है। इफिसुस की कलीसिया के लिए प्रभु यीशु मसीह के सन्‍देश को हम तीन भागों में हम बांट सकते हैं।

1. प्रभु यीशु मसीह ने इफिसुस की कलीसिया की प्रशंसा की :- प्रभु यीशु इफिसुस की कलीसिया के नाम अपने संदेश में सीधे उनकी ग़लतियां उन्‍हें नहीं बताने लगता बल्‍कि उससे पहले वह उनकी प्रशंसनीय बातों हेतु उनकी सराहना करता है। वह कहता है; “मैं तेरे काम, परिश्रम और तेरा धीरज जानता हूं”। यीशु मसीह कहता है मैं तुझे जानता हूं। यह प्रभु यीशु मसीह है जो हमको जानता है, केवल ऊपरी तौर पर नहीं किन्‍तु भीतर से जानता है, जो हमारे कामों को जानता है। जो हमारे मन की

भावनाओं को जानता है, जो यह जानता है कि हमारे दिल में कौन-सी अच्‍छाइयां हैं। इफिसुस की कलीसिया के लिए जो पहली बात थी वह यह कि यह कार्य करने वाली कलीसिया थी, यह एक सक्रिय कलीसिया थी। वहां कलीसिया द्वारा बहुत सारे कार्य किये जाते थे।

इफिसुस की कलीसिया के विषय में दूसरी अच्‍छी बात जिसकी यीशु मसीह प्रशंसा करता है; वह थी उनका परिश्रम। वास्‍तव में काम कर लेना एक सामान्‍य बात होती है परन्‍तु परिश्रम के साथ काम करना अधिक प्रमुख है, और परिश्रम से काम हम तब करते हैं जब हमारा समर्पण हो, जब हम अपने कार्य के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हों।

जिस तीसरी बात की यीशु मसीह प्रशंसा करता है वह थी; कलीसिया का धीरज। वह कहता है मैं तेरा धीरज जानता हूं। उन दिनों में मसीही जीवन अत्‍यन्‍त कठिन था, मसीही अगुवों को सताया जाता था। उन पर सताव आता था। मसीही अगुवों को मार डाला जाता था, भूखे शेरों के सामने छोड़ दिया जाता था, जानवरों की ताज़ी खालों में सिलकर मरूस्‍थल की तपती रेत में फेंक दिया जाता था। मसीही अगुवों के हाथों-पैरों को काट दिया जाता था, विशाल स्‍टेडियमों में भारी भीड़ के सामने उन्‍हें यातनाएं दी जाती थीं। नीरो बादशाह के विषय में हम पाते हैं कि जब उसकी महफिलें जमती थीं तो वे खम्‍भे जिनमें मशालें जलाई जाती थीं, उन खम्‍भों में मशालों की जगह मसीही अगुवों को बांधकर नीरो उनके जीवित शरीर जलवाता था और उनसे जो रोशनी निकलती थी उससे वह अपनी महफिलों को रोशन करता था।

ऐसे समय में इफिसुस की कलीसिया के लिए प्रभु यीशु मसीह कहता है “मैं तेरा धीरज जानता हूं” अर्थात्‌ यह एक दुःख उठाने वाली कलीसिया थी। वह कहता है; तू धीरज धरता है, और मेरे नाम के लिए दुःख उठाते-उठाते थका नहीं। न केवल यह धीरज धरने वाली कलीसिया थी बल्‍कि दुःख उठाने वाली कलीसिया भी थी, जिसका अर्थ यह है कि दुःख में और पीड़ाओं में भी इस कलीसिया के लोग परमेश्‍वर पर विश्‍वास रखने वाले लोग थे, ऐसा नहीं था कि जब सब कुछ अच्‍छा हो तभी परमेश्‍वर पर विश्‍वास हो परन्‍तु पीड़ाओं और दुःखों में भी उनकी अपने विश्‍वास में दृढ़ता बनी रही थी।

दूसरे पद के दूसरे भाग में यीशु कहता है जो अपने आपको प्रेरित कहते हैं; और हैं नहीं, उन्‍हें तूने परखकर झूठा पाया। यह एक परखने वाली कलीसिया थी, यह झूठे शिक्षकों को पहचानती थी, और ये झूठे शिक्षक कौन थे इनके विषय में हम छठवें पद में पाते हैं जब यीशु कहता है तू निकुलाइयों के कामों से घृणा करता है। निकुलाइयों का पंथ लोगों को झूठी शिक्षा देता था, वे दो बातें मानते थे या उनमें दो प्रकार के लोग पाये जाते थे - पहले प्रकार के लोग वे थे जो यह विश्‍वास करते थे कि; शरीर और आत्‍मा हैं। जो शरीर है वह भ्रष्‍ट है, और सब प्रकार की बुराइयां शरीर में पाई जाती हैं और आत्‍मा पवित्र है, इसीलिए कुछ मानते थे कि शरीर को प्रताड़ित करना चाहिए, कई दिनों तक उपवास रखकर, कांटों की सेज पर सोकर, अंगारों पर चलने के द्वारा इस भ्रष्‍ट और श्रापित और पाप से भरे हुए शरीर को पीड़ा देना चाहिए क्योंकि जब इस पीड़ा से होकर गुज़रेंगे तो आत्‍मा पवित्र हो जाएगी। दूसरे प्रकार के लोगों का यह मानना था कि शरीर भ्रष्‍ट है और आत्‍मा पवित्र है, इसलिए जो मन में आये वह करते रहो, जैसी इच्‍छा हो, जो करना हो, जिसमें सुख का अनुभव हो, वह सब कुछ करो क्‍योंकि भ्रष्‍ट तो शरीर है, पाप से ग्रसित है, इसमें कुछ होने वाला नहीं है, यह तो बर्बाद हो जाने वाला है। दूसरी ओर आत्‍मा है जो शरीर से अलग है और पवित्र है। इसलिए शरीर की भ्रष्‍टता से आत्‍मा की पवित्रता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। ऐसे लोग इफिसुस की कलीसिया में आ गये थे और वे कलीसिया को भड़काना चाहते थे परन्‍तु प्रभु यीशु कहता है ऐसे लोग जो अपने आपको विश्‍वासी कहते हैं, परन्‍तु हैं नहीं, तू ऐसी झूठी शिक्षा देने वालों को परखना जानता है और तू उनसे बचकर रहता है, तू उनसे घृणा करता है।

आज हम देखें तो पाते हैं कि बहुत-सी कलीसियाओं में झूठे शिक्षक आ गये हैं जो प्रभु यीशु मसीह के ईश्‍वरत्‍व को नहीं मानते। वे परमेश्‍वर का नाम तो लेते हैं, उनके कार्यक्रम बहुत आकर्षक होते हैं परन्‍तु भीतर से उनमें खोखलापन है। वे कहते हैं कि प्रभु यीशु मसीह एक साधारण मानव के समान था, वह वैसा ही था जैसे हम और आप हैं, जैसे हम परमेश्‍वर के पुत्र और पुत्रियां हैं, वैसे ही वह भी था। कुछ दूसरे लोग यह कहते हैं कि प्रभु यीशु मसीह भी पाप में गिर गया था। उसके नाम से एक फिल्‍म बनाई गई जिसमें उसका ग़लत चित्रण भी किया गया। कितने लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि बपतिस्‍मा की कोई आवश्‍यकता नहीं, बपतिस्‍मा चाहे कैसा भी हो ठीक है, बपतिस्‍मा की कोई अनिवार्यता नहीं है। कुछ यह शिक्षा देते हैं कि प्रभु भोज हर सप्‍ताह नहीं होना चाहिए जबकि ऐसी कलीसियाओं में दान प्रति सप्‍ताह लिया जाता है। उनका कहना है कि; वर्ष में एक या दो बार या माह में एक बार प्रभु भोज लेने से ही प्रभु भोज की गरिमा बनी रहती है; परन्‍तु बाइबिल में लिखा हुआ है; जब-जब तुम एकत्रित होते हो।

यदि हम कलीसिया के पहले तीन वर्षों के इतिहास को देखें तो पाते हैं कि जब-जब कलीसिया में विश्‍वासी एकत्र होते थे तो वे प्रभु की मेज़ में शामिल होते थे और प्रभु भोज को बड़ी गम्‍भीरता से लेते थे।

आज कितने लोग हैं; जो हमें बाइबिल की सही शिक्षाओं से भटकाते हैं परन्‍तु प्रभु यीशु इफिसुस की कलीसिया के लिए कहता है तू कार्य करने वाली कलीसिया है, न केवल कार्य करने वाली बल्‍कि परिश्रम से, समर्पण से कार्य करने वाली कलीसिया है। इफिसुस सातों कलीसियाओं में से सबसे बड़ी कलीसिया थी, और यीशु उसकी सराहना करता है, उसकी प्रशंसा करता है, उसके कार्यों, परिश्रम, धीरज, दुःख उठाने की भावना और झूठे शिक्षकों को पहचानने वाली कलीसिया के रूप में।

2. प्रभु यीशु इफिसुस की कलीसिया में पहला-सा प्रेम नहीं पाता:- इफिसुस की कलीसिया की जिस बात से यीशु को आपत्ति है वह यह कि;

“मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तूने अपना पहिला सा प्रेम छोड़ दिया है”।

प्रभु यीशु वास्‍तव में यह कह रहा है कि; तुम्‍हें कार्यों से तो प्रेम है, तुम्‍हें व्‍यस्‍तता से तो प्रेम है; परन्‍तु मेरे प्रति तुम्‍हारे दिल में जो प्रेम होना चाहिए वह कहां है? तुम्‍हारे लिए कार्य प्रमुख हो गये हैं परन्‍तु सम्‍बन्‍ध शून्‍य हो गये हैं। व्‍यस्‍तता तो है परन्‍तु भावनाएं समाप्‍त हो गई हैं। फूल है, उसमें रंग भी है परन्‍तु सुगन्‍ध चली गई है। हाथ में शादी की अंगूठी तो है परन्‍तु हाथ में हाथ नहीं रहा। शब्‍द तो हैं परन्‍तु भाव समाप्‍त हो गये। पुस्‍तक तो है परन्‍तु पन्‍ने कोरे हैं। गीत तो है पर संगीत चला गया। आकाश तो है परन्‍तु सितारे डूब गये हैं। तुमने अपना पहिला-सा प्रेम छोड़ दिया है।

भजन संहिता 41:9 में बहुत प्रमुख बात लिखी है - “मेरा परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, जो मेरी रोटी खाता था, उसने भी मेरे विरुद्ध लात उठाई है”।

यह बात यहूदा इस्‍करियोती के बारे में लिखी गई है। यहूदा के बारे में प्रभु यीशु मसीह की यह भविष्‍यवाणी है कि मेरा वह परम मित्र जिस पर मैं भरोसा रखता था, अब उसने मेरे विरुद्ध लात उठाई है अर्थात्‌ जो पहिला-सा प्रेम था, वह चला गया है अब वह मेरा विरोधी हो गया है।

होशे नबी की पुस्‍तक में लिखा है;

“हे एप्रैम, मैं तुझसे क्‍या करूं? हे यहूदा, मैं तुझसे क्‍या करूं ? तुम्‍हारा स्‍नेह तो भोर के मेघ के समान है, और सवेरे उड़ जाने वाली ओस के समान है..... क्‍योंकि मैं बलिदान से नहीं, स्‍थिर प्रेम ही से प्रसन्‍न होता हूं, और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूं कि लोग परमेश्‍वर का ज्ञान रखें” (होशे 6:4,6)।

हम कितना भी बड़ा बलिदान कर दें और सोचें कि हमने बहुत बड़ा कार्य किया परन्‍तु बलिदान से भी बढ़कर जो बात है, त्‍याग से भी बढ़कर जो बात है, विश्‍वास से भी बढ़कर जो बात है, आशा से भी बढ़कर जो बात है; वह प्रेम है। परमेश्‍वर कहता है तुम्‍हारा प्रेम मानो सुबह की ओस की बूंद के समान है, मेघ के समान है। परमेश्‍वर स्‍थिर प्रेम से ही प्रसन्‍न रहता है। यीशु कहता है;

“उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्‍या हमने तेरे नाम से भविष्‍यवाणी नहीं की... और तेरे नाम से बहुत अचम्‍भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैंने तुमको कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:22, 23)।

तुम सोचते हो कि जो कार्य हैं; वही प्रेम है। परन्‍तु तुम्‍हारे काम, तुम्‍हारी धार्मिकता परमेश्‍वर की दृष्‍टि में फटे-चीथड़ों के समान है (यशायाह 64:6)। वह प्रेम कहां है? हम अपना पहिला-सा प्रेम कैसे छोड़ देते हैं? हम अपने हृदयों को टटोलें और देखें कि क्‍या हम वास्‍तव में प्रभु से प्रेम करते हैं? या केवल अपने कामों की सूची लेकर प्रभु के सामने पहुंच जाते हैं। क्‍या वास्‍तव में हमारे हृदय में प्रभु के प्रति प्रेम भरा हुआ है? इस सम्‍बन्‍ध में कुछ बातों को हम देखें जिनसे हमें यह पता चलेगा कि हम अपना पहिला-सा प्रेम कब छोड़ देते हैं?

1. हम अपना पहिला-सा प्रेम तब छोड़ देते हैं जब हम ज़्‍यादा समय सांसारिकता में बिताते हैं:- प्रभु के प्रति हमारा पहिला-सा प्रेम तब छूट जाता है; जब उसके लिए हमारे पास समय नहीं रहता और सांसारिकता हम पर हावी हो जाती है (1यूहन्‍ना 2:15)।

यीशु ने कहा - “किसी मनुष्‍य ने बड़ी जेवनार की और बहुतों को बुलाया। जब भोजन तैयार हो गया, तो उस ने अपने दास के हाथ नेवतहारियों को कहला भेजा, कि आओ; अब भोजन तैयार है। पर वे सब के सब क्षमा मांगने लगे, पहिले ने उस से कहा, मैंने खेत मोल लिया है; और अवश्‍य है कि उसे देखूं : मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा कर दे। दूसरे ने कहा, मैंने पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं; और उन्‍हें परखने जाता हूं : मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा कर दे। एक और ने कहा; मैंने ब्‍याह किया है, इसलिये मैं नहीं आ सकता। उस दास ने आकर अपने स्‍वामी को ये बातें कह सुनाईं, तब घर के स्‍वामी ने क्रोध में आकर अपने दास से कहा, नगर के बाज़ारों और गलियों में तुरन्‍त जाकर कंगालों, टुण्‍डों, लंगड़ों और अंधों को यहां ले आओ। दास ने फिर कहा; हे स्‍वामी, जैसे तू ने कहा था, वैसे ही किया गया; और फिर भी जगह है। स्‍वामी ने दास से कहा, सड़कों पर और बाड़ों की ओर जाकर लोगों को बरबस ले ही आ ताकि मेरा घर भर जाए। क्‍योंकि मैं तुम से कहता हूं, उन नेवते हुओं में से कोई मेरी जेवनार को न चखेगा” (लूका 14:16-24)।

हमारे साथ भी यही बात है। आज के जीवन की सबसे बड़ी समस्‍या आराम नहीं वरन्‌ व्‍यस्‍तता है। यह व्‍यस्‍तता इतनी भयानक है कि हमारे सम्‍बन्‍धों को खोखला कर देती है। पति-पत्‍नी के बीच में जो सम्‍बन्‍ध होना चाहिए, जो प्रेम होना चाहिए, उसको खोखला कर देती है। हमारे प्रियों के लिए, हमारे बुजु़र्गों के लिए, उन वरिष्‍ठ लोगों के लिए जिन्‍होंने हमारे परिवार की आधारशिला रखी, जिन्‍होंने वर्षों मेहनत की, तपस्‍या की, त्‍याग किया, कि हम अपने जीवन में सफल हो सकें; आज उनके लिए हमारे पास समय नहीं है।

हमारा परमेश्‍वर से जो सम्‍बन्‍ध होना चाहिए, व्‍यस्‍तता उस सम्‍बन्‍ध को खोखला कर देती है। हमारे पास समय नहीं है कि हम प्रभु के साथ समय बिता सकें। हमारे पास समय नहीं है कि हम प्रार्थना कर सकें। हमारे पास समय नहीं है कि हम वचन का अध्‍ययन कर सकें। हमारे पास समय नहीं है कि हम कलीसिया की आराधना में आएं। अगर आराधना सवा घण्‍टे में ख़त्‍म हो जाती है तो ठीक है लेकिन अगर डेढ़ घण्‍टा या दो घण्‍टा हो जाए तो शायद अगले सप्‍ताह से उपस्‍थिति घट जाएगी।

परमेश्‍वर चाहता है कि हम उसके भवन में आएं। वह चाहता है कि हम अपने प्रेम का इज़हार करें, उसकी आराधना करें, उसकी स्‍तुति के गीत गाएं। परमेश्‍वर चाहता है कि हम उसकी मेज़ में शामिल हों क्‍योंकि यह हक़ उसने हमको दिया है, कि हम मेज़ में शामिल होने के द्वारा उसको धन्‍यवाद के साथ सराह सकें। आराधना ज़रूरी है, प्रार्थना ज़रूरी है, वचन का अध्‍ययन ज़रूरी है, आराधना में उपस्‍थिति ज़रूरी है।

यदि हम प्रश्‍न करें कि परमेश्‍वर ने मनुष्‍य को क्‍यों बनाया? तो उसका पहला कारण यह है कि मनुष्‍य के द्वारा परमेश्‍वर की आराधना की जाए। परमेश्‍वर चाहता है कि हम उससे प्रेम करें और यह इसलिए कि उसने हमसे पहले प्रेम किया क्‍योंकि हम जब पापी ही थे तभी प्रभु यीशु मसीह इस संसार में आया और हमें पापमोचन देने के लिए, मृत्‍यु के बन्‍धनों से मुक्‍त कराने के लिए उसने अपना सब-कुछ न्‍योछावर कर दिया, यहां तक कि अपना प्राण भी दे दिया। परमेश्‍वर ने तो अपने प्रेम का इज़हार कर दिया परन्‍तु हम क्‍या करते हैं? हम कितना समय देते हैं परमेश्‍वर के लिये?

2. पहिला-सा प्रेम हम तब छोड़ देते हैं जब हम अपने पापों को न्‍यायोचित ठहराने लगते हैं :- हम अपनी कमज़ोरियों को स्‍वीकार करने के बजाय अपने पापों को न्‍यायोचित ठहराने लगते हैं (रोमियों 10:2-3) और ऐसा करके हम परमेश्‍वर के प्रति अपना पहिला-सा प्रेम छोड़ देते हैं। हम कहने लगते हैं कि चर्च नहीं भी जाएंगे तो क्‍या हुआ, क्‍या हम घर में ही आराधना नहीं कर सकते? अरे! बाइबिल भी तो बताती है कि जहां दो या तीन मेरे नाम से उपस्‍थित होते हैं मैं वहां उपस्‍थित होता हूं तो फिर चर्च जाने की ज़रूरत ही क्‍या है? हम ऐसे कारण ढूंढ़ने लगते हैं जिनसे हम अपनी कमज़ोरियों को उचित ठहरा सकें। हम कहते हैं कि हम तो एक भ्रष्‍ट संसार में रहते हैं जहां सब कुछ करना ही पड़ता है, झूठ बोले बिना प्रमोशन नहीं मिलेगा, हमारे अधिकारियों को भी तो देखो वे भी तो भ्रष्‍ट हैं, तो फिर थोड़ी सी रिश्‍वत हम भी ले लें, ऐसा करना जायज़ है।

सुप्रसिद्ध मसीही विद्वान एडमंड बर्क ने लिखा है कि ऐसा नहीं होता कि मसीही लोग एक दम से दुष्‍कर्म में कूद जाएं, कि जो आज धर्मी है वह अचानक से कल अधर्म की सीमा को लांघ जाए। परन्‍तु धीरे-धीरे, मानो एक-एक क़दम, एक-एक इंच यह काम चलता जाता है और कुछ समय बाद यह अहसास होता है कि हमने एक लम्‍बी यात्रा कर ली है और उस यात्रा के बाद हम प्रभु यीशु मसीह से बहुत दूर हैं।

किसी ने कहा; अच्‍छी बातों की आदत डालना तो कठिन होता है परन्‍तु दुष्‍कर्मों की आदत बहुत आसानी से आ जाती है।

शिमशोन को परमेश्‍वर ने नाज़ीर करके ठहराया था। माता के गर्भ से ही परमेश्‍वर का हाथ उसके जीवन पर था। परमेश्‍वर ने उसके लिए निर्देश दिए थे, वह विशिष्‍ट अभिषिक्‍त जन था परन्‍तु फिर उसका पहिला-सा प्रेम चला गया, वह पाप में लिप्‍त हो गया और तब लिखा हुआ है;

“वह तो न जानता था, कि यहोवा उसके पास से चला गया है” (न्‍यायियों 16:20) ।

एक-एक क़दम, एक-एक इंच हम ग़लत दिशा में बढ़ते हैं, प्रार्थना के लिए समय न देते हुए हमें पता ही नहीं चलता कि कब परमेश्‍वर हमारे पास से चला जाता है।

1 शमूएल 16:14 में लिखा है; “और यहोवा का आत्‍मा शाऊल पर से उठ गया”।

यहोवा का आत्‍मा शाऊल पर से इसलिए उठ गया क्‍योंकि शाऊल के हृदय में दाऊद के प्रति जलन, घृणा, बुराई, कुढ़न, बदले और उसे समाप्‍त करने की भावनाएं भर गई थीं और इन सारी दुर्भावनाओं को लेकर शाऊल जी रहा था और तब एक समय आता है कि यहोवा का आत्‍मा शाऊल पर से उठ गया।

डॉ. बिली ग्राहम ने अपनी पुस्‍तक में लिखा है कि; “जिस दिन परमेश्‍वर का हाथ मेरे ऊपर से उठ जाएगा, उस दिन मेरे होंठ मिट्टी के हो जावेंगे”।

कहीं ऐसा तो नहीं हो गया कि हमको पता ही नहीं चला और परमेश्‍वर का हाथ और उसका आत्‍मा हम पर से उठ गया, हम से दूर चला गया।

रूसी साहित्‍य में एक विश्‍वविख्‍यात नाटक है : इसमें एक व्‍यक्‍ति और उसकी पत्‍नी रोज़ा जो बहुत गरीब हैं, वे रूस में बर्फ से ढंके पहाड़ों की तलहटी में बने एक झोपड़े में रहते हैं। उनकी पांच लड़कियां हैं और इस नाटक में यह दिखाया गया है कि कितनी कठिनाई से वह व्‍यक्‍ति अपनी लड़कियों का विवाह करता है। जिस दिन उनकी पांचवीं बेटी की शादी होती है उसी दिन उस व्‍यक्‍ति और उसकी पत्‍नी रोज़ा के विवाह की चालीसवीं वर्षगांठ भी होती है। ढेर से लोग जमा हैं, बेटी की शादी और विवाह की चालीसवीं वर्षगांठ का जश्‍न मनाया जा रहा है। और तब वह अपनी पत्‍नी के पास जाता है; और पूछता है कि - रोज़ा क्‍या तुम मुझसे प्‍यार करती हो? उसकी पत्‍नी उसकी तरफ देखती है और मुस्‍कराती है, और कहती है, मैं चालीस वर्षों से तुम्‍हारे साथ हूं, मैंने तुम्‍हारे पांच बच्‍चों को जन्‍म दिया है और तुम मुझसे पूछ रहे हो कि क्‍या तुम मुझसे प्‍यार करती हो। चालीस वर्षों से मैं तुम्‍हारे कपड़े धो रही हूं, मैं तुम्‍हारे घर की सफाई कर रही हूं और चालीस वर्षों में मैंने तुम्‍हारे लिए बहुत कुछ किया है, फिर भी तुम मुझसे पूछ रहे हो कि क्‍या मैं तुमसे प्‍यार करती हूं। वह व्‍यक्‍ति कोई जवाब नहीं देता और फिर पूछता है कि क्‍या तुम मुझसे प्‍यार करती हो? रोज़ा क्‍या तुम मुझसे प्‍यार करती हो? और तब रोज़ा को इस बात का अहसास होता है कि इन सारे कामों से वास्‍तव में हृदय का प्रेम व्‍यक्‍त नहीं किया जा सकता और तब वह कहती है कि, ‘सम्‍भवत: मैं तुमसे हृदय से प्रेम करती हूं’।

आज जब प्रभु यीशु मसीह हमसे पूछता है कि क्‍या तुम मुझसे प्रेम करते हो? क्‍या तुम मुझसे प्रेम करती हो? तो हो सकता है कि शायद हम कहें कि हां, प्रभु तू तो जानता है कि मैं सुबह से उठता हूं, तेरे काम में लग जाता हूं, दिन भर आॉफिस में काम करता हूं, दौड़-भाग करता हूं, कितने लोगों की मदद करता हूं, यहां-वहां जाता हूं, बहुत परिश्रम करता हूं, बोझ उठाता हूं, अपने बॉस की ज़्‍यादतियों को सहता हूं। परन्‍तु प्रभु यीशु मसीह कहता है, क्‍या तुम मुझसे प्रेम करते हो ?

3. प्रभु यीशु न सिर्फ़ अच्‍छाइयों और कमज़ोरियों को बताता है वरन्‌ वह चेतावनी भी देता है :- प्रकाशितवाक्‍य 2:5 में प्रभु यीशु मसीह कहता है; “सो चेत कर कि तू कहां से गिरा है, और मन फिरा और पहिले के समान काम कर; और यदि तू मन न फिराएगा, तो मैं तेरे पास आकर तेरी दीवट को उस स्‍थान से हटा दूंगा”।

यह प्रभु यीशु मसीह हमें एक और अवसर देने वाला है। वह मात्र यह नहीं कहता कि तुम में ये अच्‍छाइयां हैं, या ये कमज़ोरियां हैं परन्‍तु उससे पहले वह कहता है इससे पहले कि, मैं आऊं और तुम्‍हारी दीवट को हटा दूं उससे पूर्व मैं तुम्‍हें एक और मौका देता हूं। यह प्रभु यीशु मसीह हमको एक और मौका देता है; चाहे हमने कैसे भी पाप किए हों, चाहे हमारा जीवन कैसा भी रहा हो, चाहे हमने अपने जीवन में कैसे भी अपराध किए हों। प्रभु यीशु मसीह एक और, एक और....... मौका देने वाला प्रभु है।

होशे नबी की पुस्‍तक में लिखा है; “चलो, हम यहोवा की ओर फिरें; क्‍योंकि उसी ने फाड़ा और वही चंगा भी करेगा; उसी ने मारा, और वही हमारे घावों पर पट्टी बांधेगा” (होशे 6:1)।

यह परमेश्‍वर यहोवा है जो मारता भी है और पट्टी भी बांधता है। यह परमेश्‍वर यहोवा है जो फाड़ता भी है और चंगा भी करता है। यह परमेश्‍वर यहोवा है जो ताड़ना देता है और आंसू भी पोंछता है। यह परमेश्‍वर यहोवा है, जिसको हम छोड़ देते हैं परन्‍तु वह बाहें पसारे हुए हमारी राह देखता है। फिर वह कहता है; चेत जा........कि तू कहां पर था ? तू कहां से गिरा और फिर मन फिरा। तू ने अपना पहिला-सा प्रेम छोड़ दिया है। वचन में लिखा है; “प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्‍हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता कि कोई नाश हो; वरन्‌ यह कि सबको मन फिराव का अवसर मिले” (2 पतरस 3:9)।

योना नबी की पुस्‍तक में हम पाते हैं कि वह मछली के पेट में है और वहां से वह प्रार्थना कर रहा है; “तब मैंने कहा, मैं तेरे साम्‍हने से निकाल दिया गया हूं; तौभी तेरे पवित्र मन्‍दिर की ओर फिर ताकूंगा” (योना 2:4)।

क्‍योंकि तू अवसर देने वाला परमेश्‍वर है।

प्रभु कहता है; इससे पहले कि मैं आऊं और तेरी दीवट को हटा दूं, तू चेत जा क्‍योंकि यदि तेरे पास सब कुछ है, पर प्रेम नहीं है; तो कुछ नहीं है। इससे पहले कि परमेश्‍वर हमको दण्‍डित करे, वह हमको अवसर देता है, बार-बार मौके देता है। जब हमारे प्रिय लोग उठा लिए जाते हैं और जब हम उनकी क़ब्र के चारों ओर जमा होते हैं, तो हमको परमेश्‍वर एक बार और अवसर देता है यह सोचने का कि हमारी नियति क्‍या होगी, कहीं हमारी आत्‍मा का विनाश तो नहीं होगा ? रविवार को जब हम आराधना के लिए चर्च भवन में आते हैं तो वह एक और अवसर देता है। बीमारियां आती हैं और वह हमको चंगाई देता है, इस प्रकार एक बार और वह हमको अवसर देता है।

अन्‍त में जो प्रमुख बात है वह यह कि आज अगर आप इफिसुस जाएंगे तो पाएंगे कि यह शहर जो कभी तुर्किस्‍तान के दक्षिण पूर्व में था वहां पर आज इफिसुस की कलीसिया नहीं है। उस क्षेत्र में कोई कलीसिया नहीं है और जो बात है वह यह कि जब इफिसुस की कलीसिया समाप्‍त हो गई तो एक भयंकर प्रकोप आया और सारा का सारा शहर भी समाप्‍त हो गया।

कलीसिया शहर की आशा है। कलीसिया क्षेत्र की आशा है। यह कलीसिया यदि प्रभु यीशु का नाम ऊंचा नहीं उठाएगी तो फिर कौन उठाएगा? यह कलीसिया यदि आत्‍माओं को बचाने का, मन फिराव का, अनन्‍त जीवन का सन्‍देश नहीं देगी तो फिर कौन देगा ? परन्‍तु वह प्रेम तो हो, वह भावना तो हो, वह उत्‍साह तो हो, मन में वह ललक तो हो, दिल में वह तड़प तो हो।

कितनी बड़ी बात होगी; यदि कोई पत्‍नी अपने पति के विषय में कह सके कि विवाह के बाद हमारा प्रेम बढ़ता गया, बढ़ता गया.........कभी हमने अपना पहिला-सा प्रेम नहीं छोड़ा। कितनी बड़ी बात होगी कि कोई अपने भाई के लिए यह कह सके कि विवाह हुए वर्षों बीत गए, बहुत-सी मंज़िलें पार कर लीं, बहुत से मील के पत्‍थरों से निकल आए परन्‍तु हमारा प्रेम जो बचपन में था, वह आज भी बना हुआ है और यह बढ़ता जाता है, हमने अपना पहिला-सा प्रेम कभी त्‍यागा नहीं।

कितनी बड़ी बात होगी कि कोई सहकर्मी अपने अधिकारी के लिए कहे कि हमारा पहिला-सा प्रेम बना हुआ है। कितनी बड़ी बात होगी कि कोई विश्‍वासी परमेश्‍वर के विषय में कह सके कि जब मैंने परमेश्‍वर को पाया था, जब मैंने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया था, जब मुझे पापों से क्षमा प्राप्‍त हुई थी, जब मुझे उद्धार का अनुभव हुआ था; तब से वह प्रेम, उत्‍साह और लगन आज भी बनी हुई है, मैंने अपना पहला-सा प्रेम कभी नहीं त्‍यागा।

परन्‍तु सबसे प्रमुख बात यह होगी कि जब प्रभु यीशु मसीह हमको देखे और हमसे यह बात कह सके। परन्‍तु साथ ही सबसे बड़ी दुखद बात यह होगी कि प्रभु यीशु मसीह हमसे कह दे कि तू ने अपना पहला-सा प्रेम छोड़ दिया है।

इसीलिए जब प्रभु यीशु मसीह इफिसुस की कलीसिया में जाता है और चेतावनी देने के बाद जब कलीसिया नहीं चेतती तो वह दीवट को ठोकर मारकर हटा देता है और सब कुछ समाप्‍त हो जाता है।

वह कहता है “जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले”। जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले कि आत्‍मा कलीसिया से क्‍या कहता है और यदि तू चेतता है और अपने पहले से प्रेम को जागृत करता है तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा। तू मेरी जेवनार में शामिल हो सकेगा, मेरे अनन्‍त जीवन में सहभागी हो सकेगा। नहीं तो, मैं आऊंगा और तेरी दीवट को गिरा दूंगा।

हमारी कलीसिया के लिए प्रभु यीशु मसीह क्‍या कहेगा ? हमें खुद को जांचना है कि हमारे जीवनों में सब कुछ तो है; पर कहां है प्रभु यीशु मसीह के प्रति प्रेम? प्रभु यीशु मसीह कहता है कि मुझे तेरे विरुद्ध यही कहना है कि तूने अपना पहला-सा प्रेम छोड़ दिया है।

आज जब वह मेरे और आपके दिलों को देखता है तो क्‍या कहता है? कहां हैं हम? किस स्‍थान पर हैं हम? कितना प्रेम है हमें अपने लोगों से, और कितना प्रेम है हमें प्रभु से?

आज भी अवसर है एक और मौका है - “चेत जा - लौट आ - मन फिरा” क्‍या हम सुन रहे हैं उसकी पुकार ?