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प्रभु यीशु के सात पत्र - अन्धकार के उपहार

परिचय :- सन्‍देशों की श्रृंखला में हम प्रकाशितवाक्‍य में वर्णित सात कलीसियाओं का अध्‍ययन कर रहे हैं। ये सात कलीसियाएं उन दिनों के एशिया माइनर में पाई जाती थीं। जिस समय यह पुस्‍तक लिखी गई, उस समय तक प्रभु यीशु के लगभग सारे चेलों की हत्‍या की जा चुकी थी, केवल यूहन्‍ना जीवित बचा था। यूहन्‍ना अपनी वृद्धावस्‍था में था और ऐसे समय में उसे सज़ा के रूप में पतमुस टापू पर ले जाकर छोड़ दिया गया था । उस निर्जन स्‍थान में परमेश्‍वर की ओर से उसे विशेष दर्शन मिलता है और प्रभु यीशु उससे बातचीत करता है। आने वाले समय में जो घटनाएं होनी हैं उन बातों का प्रकाशन यूहन्‍ना पर होता है, और तब उन बातों को यूहन्‍ना इस पुस्‍तक में लिखता है।

सात का अंक बाइबिल में परिपूर्णता का अंक माना गया है और जब यहां पर सात कलीसियाओं की बात करते हैं तो प्रभु यीशु का वचन संसार की सार्वभौमिक कलीसिया के लिए है, संसार की हर एक कलीसिया के लिए है। इन सात कलीसियाओं के नाम यीशु अपने सन्‍देश में उनकी उन बातों की प्रशंसा करता है जो उसकी दृष्‍टि में ग्रहण योग्‍य हैं। इन बातों के आधार पर ही एक कलीसिया के रूप में हमें भी आगे बढ़ना है। इसके साथ प्रभु यीशु मसीह अपने सन्‍देश में इन कलीसियाओं को, उन बातों के लिए जो उनमें कमियां थीं, चेतावनी भी देता है। ये बातें हमें बताती हैं कि हमको अपने जीवन और अपनी कलीसिया में परिवर्तन लाना है क्‍योंकि प्रभु यीशु मसीह चाहता है कि उसकी कलीसिया निष्‍पाप, निष्‍कलंक, तेजस्‍वी, ओजस्‍वी और पवित्र कलीसिया हो। इसी कारण से प्रभु यीशु मसीह इफिसुस की कलीसिया के कार्य और उनके परिश्रम की सिर्फ़ तारीफ नहीं करता बल्‍कि जो केन्‍द्रीय बात प्रभु यीशु मसीह इस कलीसिया से कहता है वह यह कि तूने अपना पहिला-सा प्रेम छोड़ दिया है। न केवल प्रभु यीशु मसीह उन्‍हें समस्‍या का विवरण देता है परन्‍तु उसके साथ-साथ यह भी बताता है कि अब क्‍या करना है जिससे कि उनका पहला-सा प्रेम फिर से जागृत हो जाए।

इसी श्रृंखला में प्रभु यीशु मसीह जिस दूसरी कलीसिया को अपना सन्‍देश देता है; वह है स्‍मुरना की कलीसिया जिसका विवरण प्रकाशितवाक्‍य 2:8-11 में पाया जाता है;

“और स्‍मुरना की कलीसिया के दूत को यह लिख, कि, जो प्रथम और अन्‍तिम है; जो मर गया था और अब जीवित हो गया है, वह यह कहता है कि मैं तेरे क्‍लेश और दरिद्रता को जानता हूं; (परन्‍तु तू धनी है); और जो लोग अपने आप को यहूदी कहते हैं और हैं नहीं, पर शैतान की सभा हैं, उन की निन्‍दा को भी जानता हूं। जो दुख तुझ को झेलने होंगे, उन से मत डर : क्‍योंकि देखो, शैतान तुम में से कितनों को जेलखाने में डालने पर है ताकि तुम परखे जाओ; और तुम्‍हें दस दिन तक क्‍लेश उठाना होगा : प्राण देने तक विश्‍वासी रह; तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा। जिस के कान हों, वह सुन ले कि आत्‍मा कलीसियाओं से क्‍या कहता है : जो जय पाए, उस को दूसरी मृत्‍यु से हानि न पहुंचेगी”।

यदि हम इतिहास में देखें तो स्‍मुरना इफिसुस से चालीस मील उत्तर की दिशा में था और उन दिनों में वह न सिर्फ़ एशिया माइनर का सबसे सुन्‍दर शहर था बल्‍कि उसे सारी दुनिया का सबसे सुन्‍दर शहर कहा जाता था। बहुत से लेखकों और कवियों ने स्‍मुरना के लिए जो शब्‍द इस्‍त्‍ोमाल किया है, उसमें स्‍मुरना को एशिया का ताज, एशिया का पुष्‍प और यहां तक कि एशिया का कंगन भी कहा गया है।

आज यदि हम देखना चाहें कि स्‍मुरना किस स्‍थान पर है तो जिस स्‍थान पर स्‍मुरना की कलीसिया थी आज वह स्‍थान तुर्किस्‍तान में पाया जाता है; जिसे अंग्रेज़ी भाषा में टर्की कहते हैं। टर्की की राजधानी इस्‍ताम्‍बूल से 210 मील दक्षिण में वह स्‍थान है; जिसे कभी स्‍मुरना कहा जाता था, वर्तमान में इस स्‍थान का नाम इज़मीर है। आज स्‍मुरना (इज़मीर) की आबादी लगभग तीन लाख है और वहां पर एक बन्‍दरगाह है। भौगोलिक दृष्‍टि से देखें तो जब रोम से फारस (पर्शिया) की ओर जहाज़ के द्वारा भारत से होते हुए यात्रा की जाती है तो उस मार्ग पर इज़मीर नामक बन्‍दरगाह में वे जहाज़ आज भी रुकते हैं।

स्‍मुरना में पहला रोमी मन्‍दिर बनाया गया था, जिसे तिबिरियुस का मन्‍दिर कहा जाता था और इस मन्‍दिर में कैसर की पूजा की जाती थी। रोमी शासन का न सिर्फ़ शासन तंत्र पर कब्‍ज़ा था, परन्‍तु धर्म पर भी उनका कब्‍ज़ा था। उनका कहना था कि धर्म, कलीसिया और राज्‍य को आप अलग नहीं कर सकते। उनका कहना था कि चर्च, धर्म और राज्‍य एक साथ है। इस कारण से रोमी शासन मन्‍दिर बनवाता था और उस मन्‍दिर में रोम के सम्राट कैसर की पूजा होती थी। रोमी कानून के अन्‍तर्गत प्रत्‍येक नागरिक को बाध्‍य किया जाता था कि वह कैसर की उपासना करे। हर एक नागरिक को सार्वजनिक रूप से यह स्‍वीकार करना पड़ता था कि कैसर ही परमेश्‍वर है, कैसर ही प्रभु है और कैसर ही राजा परमेश्‍वर है। यदि कोई यह स्‍वीकार कर लेता था तो उसको इस बात की छूट थी कि वह इसके बाद अन्‍य किसी भी देवी-देवता की उपासना कर सकता था। बहुत से ऐसे लोग जो देवी-देवताओं पर विश्‍वास करते थे उनको यह बात स्‍वीकार करने में कोई परेशानी नहीं होती थी क्‍योंकि उनका कहना था कि जिस प्रकार से अन्‍य सैकड़ों देवी-देवता हैं वैसे ही कैसर भी देवता है और वह खुलकर उसकी उपासना करते थे और यह स्‍वीकार करते थे कि कैसर हमारा परमेश्‍वर है।

परन्‍तु वे सच्‍चे मसीही लोग जिन्‍होंने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया था उनको समस्‍या होती थी क्‍योंकि वे यह नहीं कह सकते थे कि कैसर ही परमेश्‍वर है। रोमी शासन के अधिकारी कहते थे कि आप सिर्फ़ यह कह दीजिए कि कैसर ही परमेश्‍वर है और उसके बाद आप प्रभु यीशु मसीह का गुणगान कीजिए, हमें कोई आपत्ति नहीं है। आप प्रभु यीशु मसीह की आराधना कीजिए, उसकी स्‍तुति के गीत गाएं परन्‍तु सबसे पहले आपको यह कहना होगा कि कैसर ही हमारा परमेश्‍वर है और अधिकांश मसीही लोग यह बात नहीं कहते थे। जो यह बात नहीं कहता था दूसरे शब्‍दों में वह रोमी सम्राट का कानून तोड़ता था। इसी कारण से 9 वें पद में प्रभु यीशु मसीह कहता है;

“मैं तेरे क्‍लेश और दरिद्रता को जानता हूं।”

मसीहियों का कहना था कि हम यह नहीं कहेंगे कि कैसर ही परमेश्‍वर है और उनकी इस बात पर यह माना जाता था कि उन्‍होंने रोमी कानून तोड़ा है। जो कानून तोड़ता था, उसको उसके दुष्‍परिणाम भुगतना पड़ते थे। उसे कैद में डाला जाता था, उसे रोमी साम्राज्‍य में नौकरी नहीं मिलती थी और उसकी सम्‍पत्‍ति भी लूट ली जाती थी क्योंकि ऐसे व्‍यक्‍ति की सम्‍पत्‍ति लूटना कानूनन जायज़ था। स्‍मुरना के मसीही बहुत ग़रीब थे और वे इसलिए ग़रीब हो गए थे क्‍योंकि उन्‍होंने यह नहीं कहा था कि कैसर ही परमेश्‍वर है।

आप कल्‍पना कर सकते हैं कि उन मसीहियों की क्‍या स्‍थिति रही होगी। प्रभु यीशु मसीह के स्‍वर्गारोहण के बाद और उसके सौ वर्षों के अन्‍तराल में दो पीढ़ियों के बीच में करीब पांच लाख मसीहियों की हत्‍या कर दी गई। मसीही अगुवों को स्‍टेडियम में लाकर भूखे शेरों के सामने छोड़ दिया जाता था।

8वें पद में लिखा है; “स्‍मुरना की कलीसिया के दूत को यह लिख कि जो प्रथम और अन्‍तिम है; जो मर गया था और अब जीवित है, वह यह कहता है”।

जिसने पृथ्‍वी की सृजना की, जो सृष्‍टिकर्त्ता है; वह अन्‍तिम भी है। जब शैतान को अन्‍त में नरक की आग और गन्‍धक की झील में डाल दिया जाएगा, तब भी प्रभु यीशु मसीह होगा। तब भी प्रभु यीशु मसीह का पराक्रम युगानुयुग, अनादिकाल तक बना रहेगा। इसीलिये वह कहता है कि मैं प्रथम और मैं ही अन्‍तिम हूं। जिसने क्रूस पर अपने प्राण दिए, जिसका पुनरुत्‍थान हुआ और वह पहला फल ठहरा। 9वें पद में वह कहता है;

“मैं तेरे क्‍लेश और दरिद्रता को जानता हूं” (परन्‍तु तू धनी है) ।

जिसके पास प्रभु यीशु मसीह है, जिसके पास जीवन है, जिसके पापों की क्षमा हुई है, जिसका उद्धार हुआ है; उसके पास संसार के सबसे बड़े धन से कहीं ज़्‍यादा सम्‍पत्ति है और इसलिए प्रभु यीशु मसीह कहता है कि ‘मैं तेरे क्‍लेश और दरिद्रता को जानता हूं परन्‍तु तू धनी है’। 10वें पद में वह यहूदियों से कहता है। ये यहूदी लोग बड़ी कट्टरता से धर्म का पालन करते हैं, वे आज भी यह नहीं मानते कि प्रभु यीशु ही मसीहा है, वे आज भी मसीहा की राह देख रहे हैं। इसीलिए वे पुराने नियम को तो मानते हैं परन्‍तु प्रभु यीशु मसीह को नहीं मानते। स्‍मुरना के यहूदी भी यह कहते थे कि कैसर ही परमेश्‍वर है। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह 10वें पद में कहता है;

“और जो लोग अपने आप को यहूदी कहते हैं और हैं नहीं” ।

यदि वे यहूदी हैं, पुराने नियम की बातों को मानते हैं तो पुराने नियम में यह आज्ञा भी दी गई है कि “तू मुझे छोड़ किसी दूसरे को ईश्‍वर करके न मानना”। इसीलिए यीशु कहता है कि जो लोग अपने आप को यहूदी कहते हैं और हैं नहीं पर शैतान की सभा हैं, मैं उनकी निन्‍दा को भी जानता हूं। इनकी कथनी और करनी में अन्‍तर है और जिनकी कथनी और करनी में अन्‍तर है, वे शैतान की सभा हैं; वे पाखंडी हैं, वे कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। वे विश्‍वास किसी बात पर करते हैं परन्‍तु उनके जीवन से कुछ और दिखाई देता है। ये लोग शैतान की सभा हैं क्‍योंकि ये पाखंडी हैं, इनके हृदय में सच्‍चाई नहीं है। ये सच्‍चे परमेश्‍वर का नाम तो लेते हैं, 10 आज्ञाओं को मानने की बात तो करते हैं परन्‍तु मानते नहीं, इस कारण ये पाखंडी हैं (रोमियों 2:28-29; 9:7-8)। रोमी लोग तो मसीहियों पर सताव लाते ही थे परन्‍तु यहूदी लोग भी मसीहियों पर सताव लाते थे। उसके बाद प्रभु यीशु मसीह कहता है;

“जो दुख तुझ को झेलने होंगे, उन से मत डर : क्‍योंकि देखो, शैतान तुम में से कितनों को जेलखाने में डालने पर है ताकि तुम परखे जाओ; और तुम्‍हें दस दिन तक क्‍लेश उठाना होगा : प्राण देने तक विश्‍वासी रह; तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा। जिस के कान हों, वह सुन ले कि आत्‍मा कलीसियाओं से क्‍या कहता है : जो जय पाए, उस को दूसरी मृत्‍यु से हानि न पहुंचेगी”।

मसीही टीकाकार विलियम बार्कले बताते हैं, कि उन दिनों में मसीहियों पर 6 दोष लगाए जाते थे।

1. ये लोग मनुष्‍यों का मांस खाते और उनका लहू पीते हैं क्‍योंकि वे प्रभु भोज में सहभागी होते थे और कहते थे कि यह प्रभु यीशु मसीह का लोहू है जो तुम्‍हारे लिए बहाया गया, यह उसकी देह है जो तुम्‍हारे लिए तोड़ी गई।

2. दूसरा आरोप जो मसीहियों पर लगाया जाता था वह यह कि ये बहुत गहरे प्रेम की बात करते हैं और गहरे प्रेम का जो अर्थ है वह अनैतिक सम्‍बन्‍धों से है, वह व्‍यभिचार और शारीरिक सन्‍तुष्‍टि की बात है। इस प्रकार मसीही विरोधी लोग ग़लत ढंग से गहरे प्रेम के अर्थ को प्रस्‍तुत करते थे।

3. जब कोई प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण कर लेता था तो उसको घर से निकाल दिया जाता था। मसीही विरोधियों का कहना था कि वे घर तोड़ने वाले लोग हैं, इनसे दूर रहना नहीं तो ये घर उजाड़ देंगे।

4. मसीही लोग कैसर को परमेश्‍वर नहीं कहते थे इसलिए मसीही विरोधियों का कहना था कि ये तो एक मनुष्‍य अर्थात्‌ यीशु को परमेश्‍वर मानते हैं इस कारण ये अनीश्‍वरवादी लोग हैं।

5. मसीही विरोधियों का कहना था कि ये कानून तोड़ने वाले लोग हैं, वे कानून का आदर नहीं करते।

6. उनका कहना था कि ये आग लगाने वाले लोग हैं और ऐसा इसलिए कहा जाता था क्‍योंकि नीरो बादशाह ने सन्‌ 60 ईस्‍वी में रोम में आग लगवा थी और सारा रोम आग से जलकर राख हो गया था। इस भयानक आग का सारा दोष नीरो ने मसीहियों पर मढ़ दिया था।

इन 6 अफवाहों के कारण मसीही लोग बदनाम थे।

सात कलीसियाओं को जब प्रभु यीशु मसीह सन्‍देश देता है तो उनकी कमज़ोरियां भी उन्‍हें बताता है परन्‍तु यहां प्रमुख बात यह है कि स्‍मुरना की कलीसिया पर प्रभु यीशु मसीह कोई दोष नहीं लगाता और यह तथ्‍य दूसरी कलीसियाओं से बिल्‍कुल भिन्‍न है। स्‍मुरना की कलीसिया और वहां के मसीहियों की जानकारी की पृष्‍ठभूमि के आधार पर हम उन तीन बातों को देखेंगे जो हमारे लिए शिक्षाप्रद हैं।

1. परमेश्‍वर का सारी सृष्‍टि पर सदैव नियंत्रण है:- हमें अपने जीवन में कठिन परिस्‍थितियों से गुज़रते हुए मृत्‍यु की छाया में, तनाव में यह बात स्‍मरण रखना है कि परमेश्‍वर का नियंत्रण सारी सृष्‍टि और सारे समय पर है। प्रभु यीशु मसीह कहता है जो प्रथम और अन्‍तिम है, जो अल्‍फा और ओमेगा है, जो मारा गया था और जो फिर से जी उठा है; वह कलीसिया को लिखता है कि यह कलीसिया उसकी है और कलीसिया के लोग उसके हैं।

अक्‍सर कहा जाता है और यह बिल्‍कुल झूठी बात है कि परमेश्‍वर की इच्‍छा के बिना एक पत्‍ता भी नहीं खड़कता। इस विचारधारा को लेकर हम यह कहते हैं कि जो कुछ हमारे साथ बीत रहा है उसमें परमेश्‍वर की इच्‍छा है, परमेश्‍वर की योजना है। अगर कोई बीमारी हो जाती है, परिवार के किसी सदस्‍य की मृत्‍यु हो जाती है तो कहने लगते हैं कि परमेश्‍वर ने ऐसा किया, उसकी इच्‍छा नहीं थी कि वह व्‍यक्‍ति जीवित रहे। हम अपनी ग़लत आदतों के कारण मुश्‍किल में पड़ सकते हैं (याकूब 1:13-15)।

यदि हममें कोई बुरी आदत है तो हमें कैंसर हो सकता है, एड्‌स की बीमारी हो सकती है। ऐसे समय में हो सकता है कि यदि हम परमेश्‍वर के पास जाएं तो परमेश्‍वर हमारे पापों को क्षमा कर देगा, हमें उद्धार दे देगा परन्‍तु जो ग़लतियां हमने की हैं उसकी परिणिति तो हमें भुगतना पड़ेगी। इसका दोष हम परमेश्‍वर पर नहीं डाल सकते क्‍योंकि हमारे ग़लत निर्णयों के कारण इसे भुगत रहे हैं। अक्‍सर ऐसा भी होता है कि दूसरों के ग़लत निर्णयों का दुष्‍परिणाम ऐसे लोगों को भुगतना पड़ता है जो निर्दोष होते हैं।

हमारे जीवन की समस्‍याओं और कठिनाइयों के लिए हम परमेश्‍वर को दोष नहीं दे सकते। एक विश्‍वासी के रूप में हमें सदैव इस बात का स्‍मरण रखना है कि परमेश्‍वर का नियंत्रण सारे संसार पर और हमारे जीवन पर, सदैव है और यदि हमारा विश्‍वास उस पर है तो परमेश्‍वर हमको सम्‍भालेगा, वही हमको सामर्थ्‍य देगा, वही हमको बचाएगा, वही हमको उस दुःखद परिस्‍थिति से निकालेगा। परमेश्‍वर हमको प्रेरणा देगा, वही हमको अपने दाहिने हाथ से सम्‍भालेगा क्‍योंकि वह विश्‍वासयोग्‍य परमेश्‍वर है।

उदाहरणार्थ - नूह के विषय में हम देखें तो पाते हैं कि नूह को नाव बनाने में 120 वर्ष लगे और इन वर्षों के दौरान वह प्रचार करता रहा। परन्‍तु किसी ने उसकी बात नहीं मानी और तब जल प्रलय आ गया।

मसीही इतिहासकार डॉ. हेनरी मॉरिस का मानना है कि; जब जल प्रलय आया उस समय संसार की आबादी 8 अरब थी जो अभी की आबादी से ज़्‍यादा है।

जब जल प्रलय आया होगा तो चारों तरफ सब प्रकार की अव्‍यवस्‍था होगी, भाग दौड़, अफरा-तफरी मची होगी। पानी बढ़ता जा रहा होगा, लोगों की और घरों की क्‍या हालत रही होगी, सब तरफ तबाही मच गई होगी परन्‍तु सब प्रकार की अव्‍यवस्‍था के बीच में परमेश्‍वर का नियंत्रण है। धर्मियों के जीवन पर परमेश्‍वर का नियंत्रण है, नूह की उस नाव पर परमेश्‍वर का नियंत्रण है।

मूसा मिस्र की बन्‍धुवाई से 20 लाख इस्राएलियों को निकालकर लाया। इतने लोगों के लिए कितना भोजन लगता होगा, उनका भोजन बनाने में कितना पानी लगता होगा और जब वे नहाते होंगे तो कितना पानी लगता होगा, इस सबकी आप और हम कल्‍पना नहीं कर सकते। क्‍या इन सबकी योजना मूसा ने बनाई होगी? नहीं! मूसा ने तो सिर्फ़ फिरौन से यह कहा था, मेरे लोगों को जाने दो और 20 लाख लोगों के काफिले को लेकर वह निकल पड़ा। इस सारी अव्‍यवस्‍था के बीच में, 20 लाख लोगों की भूख को तृप्‍त करने के प्रयासों के बीच में, उनके वस्‍त्रों को साफ रखने, उनकी शारीरिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने के प्रयासों के बीच में; सब बातों में परमेश्‍वर का नियंत्रण बना हुआ था।

दानिय्‍येल को सिंहों की मांद में डाल दिया गया और वहां पर परमेश्‍वर की सामर्थ्‍य से सिंहों के मुंह बंद हो गए। दानिय्‍येल सिंहों की मांद में पड़ा है लेकिन सिंहों के मुख पर परमेश्‍वर का नियंत्रण है।

एलिय्‍याह निर्जन स्‍थान पर करीत के नाले के पास पड़ा है और कौवे राजमहल से भोजन लाकर उसे दे रहे हैं। उन कौवों पर भी परमेश्‍वर का नियंत्रण है।

योना को समुद्र में फेंक तो दिया गया पर उस मछली पर भी परमेश्‍वर का नियंत्रण है, उस मगरमच्‍छ पर भी परमेश्‍वर का नियंत्रण है। उसके पेट में योना सुरक्षित है, वहां पर भी परमेश्‍वर का नियंत्रण है।

शद्रक, मेशक और अबेद-नगो को आग में डाल दिया जाता है परन्‍तु उस आग में इन तीन के अलावा चौथा व्यक्ति भी दिखाई देता है। वह आग का भट्टा, जिसको कई गुना धधका दिया गया था। वहां आग की तपन है परन्‍तु उस तपन के बीच परमेश्‍वर का नियंत्रण बना हुआ है।

इसलिए हम जो विश्‍वासी लोग हैं, जब हमारे परिवार में मृत्‍यु आती है, जब हमारे सामने त्रासदी आती है, जब हमारे जीवन में पीड़ा आती है, जब हमारे जीवन में निराशा आती है तो हमको सारा ध्‍यान, सारा विश्‍वास परमेश्‍वर यहोवा पर रखना है क्‍योंकि सब कुछ परमेश्‍वर के हाथ में नियंत्रित है। वह हमको सम्‍भालेगा; यह उसकी प्रतिज्ञा है।

मनुष्‍य होने के कारण और क्‍योंकि हम सांसारिक हैं, हमको ऐसा लगता है कि जो चीज़ दृश्‍य है, जो चीज़ दिखाई दे रही है अगर वह नाश हो गई तो इसका अर्थ यह है कि वह समाप्‍त हो गई। हमारा भाई, जिसकी मृत्‍यु हो गई तो वह समाप्‍त हो गया। परन्‍तु ऐसा नहीं है; समापन नहीं हुआ, अन्‍त नहीं हुआ। परमेश्‍वर की दृष्‍टि में तो उसके विश्‍वासियों की मृत्‍यु अनमोल है, वह मृत्‍यु तो एक प्रारम्‍भ है, वहां एक बेहतर स्‍थान है, एक बेहतर देह है, इसलिए लिखा है;

“यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्‍यों से अधिक अभागे हैं” (1 कुरिन्‍थियों 15:19) ।

यदि हम इसी जीवन में सब कुछ पाना चाहते हैं, सारी आशा इसी जीवन में है, इसी देह पर सारा ध्‍यान केन्‍द्रित है तो हम सब मनुष्‍यों में सबसे अधिक अभागे हैं। हमें स्‍मरण रखना है कि प्रभु यीशु मसीह ही प्रथम है, अन्‍तिम है। वह सर्व-ज्ञानी है, सर्वव्‍यापक और सर्वसामर्थी है। वह आज भी जीवित है। हमारे जीवन का नियंत्रण उसके हाथ में है।

2. हर विश्‍वासी को पीड़ा उठाना है और यह आशीष की बात है:- प्रकाशितवाक्‍य 2:10 में लिखा है;

“क्‍योंकि देखो, शैतान तुम में से कितनों को जेलखाने में डालने पर है ताकि तुम परखे जाओ; और तुम्‍हें दस दिन तक क्‍लेश उठाना होगा : प्राण देने तक विश्‍वासी रह; तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा”।

प्रकाशितवाक्‍य की पुस्‍तक में 7,10 और 12 अंक पूर्णता के प्रतीक हैं। यहां दस दिन तक क्‍लेश उठाने का अर्थ है परमेश्‍वर द्वारा निर्धारित समय।

हर एक विश्‍वासी को पीड़ा उठाना है। कई बार यह कहा जाता है कि यीशु मसीह को ग्रहण कर लो तो जीवन से सब दुःख दूर हो जाएंगे। प्रभु यीशु को मान लो तो सारी समस्‍याओं से छुटकारा मिल जाएगा, उसको मान लो तो चंगाई मिल जाएगी परन्‍तु वास्‍तव में यह सत्‍य नहीं है। हैल्‍थ और वैल्‍थ का यह सोशल गॉस्‍पल बिल्‍कुल ग़लत है। प्रभु यीशु मसीह कोई जादू की पुड़िया नहीं है। प्रभु यीशु मसीह में जब लोग आते हैं तो उन्‍हें इस संसार में शैतान की शक्‍तियों से जूझना पड़ता है। क्‍योंकि जब तक हम शैतान के थे तो शैतान को कोई चिन्‍ता नहीं थी परन्‍तु अब जब हम प्रभु यीशु मसीह के हो गए, उसके रक्‍त की मुहर लग गई तो अब शैतान हमको तोड़ेगा, अब शैतान हमको परीक्षा में डालेगा, अब हम पर कष्‍ट आएंगे और इसीलिए लिखा है;

“जितने मसीह यीशु में भक्‍ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं, वे सब सताए जाएंगे” (2 तीमुथियुस 3:12) ।

सताव कभी-कभी दिखाई देता है परन्‍तु कभी दिखाई नहीं भी देता। मारपीट करना, घर जला देना, हत्‍या कर देना, यह एक प्रकार का दिखाई देने वाला सताव है। परन्‍तु एक प्रकार का सताव वह है कि जब आप मानसिक यंत्रणा से गुज़रते हैं और अपनी व्‍यथा किसी को सुना नहीं सकते। अक्‍सर दुश्‍मनों से सताव नहीं आता वरन्‌ सताव आता है; अपने लोगों से, जिनसे आप प्रेम करते हैं, जिन पर आप विश्‍वास करते हैं, जो अपने लोग हैं उनसे जीवन में सताव आता है। यूहन्‍ना रचित सुसमाचार में लिखा है; “जो बात मैं ने तुम से कही थीं, कि दास अपने स्‍वामी से बड़ा नहीं होता, उसको याद रखो: यदि उन्‍होंने मुझे सताया, तो तुम्‍हें भी सताएंगे” (यूहन्‍ना 15:20) ।

मैंने इन्‍टरनेट पर देखना चाहा कि वर्तमान में मसीहियों पर जो सताव हो रहा है उनका वर्णन मिल सके, तो ऐसी ढ़ेरों घटनाओं की जानकारी मौजूद हैं। ये सारी घटनाएं अभी हाल ही में घटी हैं।

म्‍यानमार (बर्मा) में 22 गांवों में आदिवासी लोगों ने मसीह को स्‍वीकार कर लिया। एक सप्‍ताह के बाद वहां सेना के जवान भेजे गये और ऐसे करीब 8 हज़ार लोगों को गोली से उड़ा दिया गया जिन्‍होंने प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण किया था।

सूडान में अभी-अभी जो कुछ हुआ उसमें मसीहियों के ऊपर बहुत अधिक सताव आया। हज़ारों मसीही सताए जा रहे हैं और उन्‍हें आराधना की कोई अनुमति नहीं है। सूडान में पचास हज़ार मसीही परिवारों के बच्‍चों को सरकारी अधिकारियों द्वारा ले लिया गया और इनमें से हर बच्‍चे को गुलाम बनाकर बाईस सौ रुपये की क़ीमत में बेच दिया गया। सूडान में ही 700 मसीहियों को कैद करके तब तक भूखा रखा गया जब तक वे मर नहीं गए। हाल ही में आठ मसीही अगुवों को पाकिस्‍तान में मार डाला गया।

चीन में प्रति सप्‍ताह पांच हज़ार से अधिक मसीहियों को जेल में भरा जा रहा है। पिछले वर्ष की घटना है कि एक सप्‍ताह में दो हज़ार मसीहियों को मार डाला गया। उन्‍हें गोली मारी गई और उसके तुरन्‍त बाद उनके गुर्दे निकालकर बाज़ार में बेच दिए गए। सबसे बड़ा गुर्दों का व्‍यापार चीन की राजधानी में होता है।

इसीलिए जब प्रभु यीशु मसीह स्‍मुरना की कलीसिया को पत्र लिखता है तो वह कहता है कि; ‘मैं तुम्हारे क्‍लेश को जानता हूं’। क्‍यों? क्‍योंकि प्रभु यीशु मसीह पर भी झूठा आरोप लगाया गया कि यह शैतान के नाम से आश्‍चर्य-कर्म करता है, इसलिए प्रभु यीशु मसीह जानता है कि झूठे आरोपों से गुज़रना क्‍या होता है। उसके अपनों ने उसे छोड़ दिया इसलिए वह जानता है कि विश्‍वासघात की पीड़ा कैसी होती है। उसको मारा गया, उस पर थूका गया, उसको नग्‍न किया गया, इसलिए वह जानता है कि अपमान का दर्द कैसा होता है।

उसे क्‍लेश का अनुभव है इसलिए वह कहता है कि अगर तुम्‍हें दर्द नहीं होगा तो मेरी चंगाई का अनुभव भी नहीं होगा। अगर तुम्‍हारे जीवन में समस्‍याएं नहीं आएंगी तो तुम मेरे आश्‍चर्यकर्मों को कैसे समझ सकोगे। यदि तुम्‍हें संघर्ष नहीं करना पड़ा तो तुम मेरी विजय को कैसे समझोगे। यदि तुम्‍हारे जीवन में समस्‍या नहीं आएगी तो तुम्‍हें कैसे पता चलेगा कि समस्‍याओं का समाधान करने वाला मैं हूं। यदि तुमने पीड़ा नहीं सही तो तुम मेरे पीछे चलने के योग्‍य कैसे बनोगे, तुम क्रूस का भार कैसे समझोगे। तुम यदि आग से नहीं गुज़रे तो शुद्ध कैसे हो पाओगे। यदि तुम कमज़ोर न होगे तो मुझ पर निर्भर होना कैसे सीखोगे। यदि तुम अकेलेपन के दर्द से नहीं गुज़रोगे तो मेरी ज़रूरत का अहसास कहां होगा, इस कारण हर विश्‍वासी को पीड़ा उठाना है ।

3. यह प्रमुख नहीं है कि प्रारम्‍भ कैसा रहा परन्‍तु प्रमुखता इस बात की है कि अन्‍त कैसा रहा:- प्रभु यीशु मसीह कहता है, प्राण देने तक विश्‍वासी रह तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा। जीवन के मील के पत्‍थर तक, जीवन की अन्‍तिम दौड़ तक विश्‍वासयोग्‍य रह तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा। हो सकता है कि हमारा प्रारम्‍भ बहुत बढ़िया हो, महिमामय हो। परन्‍तु प्रश्‍न यह नहीं है कि प्रारम्‍भ कैसा रहा वरन्‌ परमेश्‍वर की दृष्‍टि में प्रमुख बात यह है कि अन्‍त कैसा रहा। चाहे मैराथन दौड़ हो, चाहे क्रिकेट का मैच हो, चाहे खरगोश और कछुवे की कहानी हो; बात यह नहीं है कि प्रारम्‍भ कैसा हुआ परन्‍तु बात यह है कि अन्‍त क्‍या हुआ।

यहूदा के जीवन को देखें तो वह बहुत योग्‍य और अनुभवी था और इसी कारण जब वह चेला बना तो प्रभु यीशु मसीह ने तुरन्‍त उसको कोषाध्‍यक्ष की महत्‍वपूर्ण ज़िम्‍मेदारी सौंप दी, और यहूदा के लिए भजन संहिता में लिखा हुआ है;

“जो मेरा परम मित्र था और जो मेरी थाली में से खाता था, उसने मेरे विरुद्ध लात उठाई” (भजन संहिता 41:9) ।

यहूदा यीशु मसीह का परम मित्र था, वह उस पर विश्‍वास करता था परन्‍तु प्रश्‍न यह है कि अन्‍त क्‍या हुआ? यहूदा ने तीस चांदी के सिक्कों में प्रभु यीशु मसीह को बेच दिया और जाकर आत्‍महत्‍या कर ली और उसके लिए यीशु कहता है कि भला होता कि ऐसे मनुष्‍य का जन्‍म ही न होता।

क्रूस पर जो डाकू था उसने बहुत से अपराध, हत्‍याएं, डकैती, बलात्‍कार किये होंगे। इसलिए वह कहता है कि हम तो अपने किये की सज़ा पा रहे हैं, हमको तो मृत्‍यु दण्‍ड मिलना चाहिए परन्‍तु इस (यीशु) ने तो कोई अपराध नहीं किया। और तब वह जानता है कि प्रभु यीशु मसीह का जो राज्‍य है, वह इसकी मृत्‍यु के बाद आएगा और वह प्रभु यीशु मसीह से कहता है - जब तू अपने राज्‍य में आए तो मेरी सुधि लेना और तब यीशु उसकी ओर देखकर कहता है - तू आज ही मेरे साथ स्‍वर्गलोक में होगा।

प्रभु यीशु मसीह को उद्धारकर्त्ता ग्रहण करने के बाद हम अपने मसीही जीवन का प्रारम्‍भ अक्‍सर बड़े उत्‍साह से करते हैं। हमारी सेवकाई बहुत अच्‍छी होती है, स्‍वप्‍न होते हैं, सम्‍भावनाएं होती हैं, रगों में जोश होता है परन्‍तु प्रमुख यह नहीं है कि हमने प्रारम्‍भ कैसे किया वरन्‌ समाप्‍त कैसे किया, यह बात अधिक प्रमुख है। मरते हुए डाकू को स्‍वर्ग के राज्‍य में प्रवेश मिला।

राजा शाऊल के लिए परमेश्‍वर ने कहा, इसका राज्‍याभिषेक होगा, बड़ी भीड़ होगी, हज़ारों-लाखों लोग जमा होंगे और तब बड़ा महिमामय कार्यक्रम हुआ। लोगों ने जयजयकार के नारे लगाये और बड़ी शानो-शौकत से शाऊल का अभिषेक हुआ। परन्‍तु एक समय ऐसा आया जब शाऊल ने परमेश्‍वर की आज्ञा का उल्‍लंघन किया। तब परमेश्‍वर का आत्‍मा शाऊल पर से चला गया और शाऊल को पता ही नहीं चला और शैतान का दुष्‍टात्‍मा उस में समा गया। इसके बाद वह युद्ध में इतना त्रस्‍त हो जाता है कि अपने क्रोध, अपनी कुण्‍ठा, जलन की भावना से छलनी होकर युद्ध के अन्‍त में वह अपने सैनिक से कहता है कि मुझको मार डाल और जब वह नहीं मारता तो शाऊल खुद आत्‍महत्‍या कर लेता है।

प्रभु यीशु मसीह जब इस संसार में आया तो साधारण सी गौशाला, साधारण बढ़ई के घर, एक छोटे से गांव में उसने जन्‍म लिया। उसने परमेश्‍वर का वचन लोगों को सुनाया, लोगों को चंगाई दी, मृतकों को जिलाया। यहां तक कि शास्‍त्री और फरीसी भी उसके आगे ठहर नहीं पाते थे परन्‍तु यदि प्रभु यीशु ने सब कुछ किया होता और अन्‍त बिगड़ जाता तो क्‍या होता? यदि प्रभु यीशु मसीह का पुनरुत्‍थान नहीं हुआ होता तो क्‍या होता? हमारा क्‍या होता? हम कहां होते? हमारे लिए क्‍या आशा होती? (1 कुरिन्‍थियों 15:14) यदि प्रभु यीशु मसीह नहीं होता तो हमारे जीवन का सबसे अच्‍छा विकल्‍प शायद आत्‍महत्‍या ही होता। कल्‍पना करें क्‍या परिस्‍थिति होती। जहां कोई आशा नहीं, जहां कोई सम्‍भावना नहीं, जहां कोई उद्धार नहीं, जहां कोई क्षमा नहीं, जहां ग्‍लानि से कोई मुक्‍ति नहीं, जहां अनन्‍त जीवन की ओर देखने की कोई सम्‍भावना नहीं। इसीलिए पौलुस प्रेरित कहता है; “यदि मसीह नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्‍यर्थ है; और तुम्‍हारा विश्‍वास भी व्‍यर्थ है .......और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो”(1 कुरिन्‍थियों 15:14,17)।

इसका मतलब यह है कि हम तो समय बर्बाद कर रहे हैं परन्‍तु इसके आगे 20 वें पद में वह कहता है;

“परन्‍तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं उनमें पहिला फल हुआ”।

इसके बाद 55, 56, 57वें पद में वह कहता है;

“हे मृत्‍यु! तेरी जय कहां रही? हे मृत्‍यु तेरा डंक कहां रहा? मृत्‍यु का डंक पाप है; और पाप का बल व्‍यवस्‍था है। परन्‍तु परमेश्‍वर का धन्‍यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्‍त करता है”।

निष्‍कर्ष :- प्रभु यीशु मसीह हमको जय का जीवन देता है, हमको अनन्‍त जीवन देता है। और वह कहता है;

“जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले कि आत्‍मा कलीसिया से क्‍या कहता है। जो जय पाए उसको दूसरी मृत्‍यु से हानि न पहुंचेगी” (प्रकाशितवाक्‍य 2:11) ।

अक्‍सर हम मृत्‍यु के विषय बड़ी चिन्‍ता करते हैं और इस कारण अपने शरीर को स्‍वस्‍थ रखने का प्रयास करते हैं। मृत्‍यु से कभी भयभीत भी होते हैं परन्‍तु मृत्‍यु से जो बड़ी बात है वह दूसरी मृत्‍यु की बात है। शारीरिक मृत्‍यु तो ठीक है परन्‍तु आत्‍मिक मृत्‍यु विनाश है और यह आत्‍मिक मृत्‍यु जो है वह दूसरी मृत्‍यु है और इसीलिए जो जय पाए उसको दूसरी मृत्‍यु से हानि न होगी।

क्‍या आपको इस बात की निश्‍चितता है कि दूसरी मृत्‍यु से हम बचाये जाएंगे। प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलने में पीड़ाएं भी हैं परन्‍तु उसके जो प्रतिफल हैं, पुरस्‍कार हैं, जो उसके परिणाम हैं, वे अनन्‍त के हैं, वे दूरगामी हैं, और हम उस आनन्‍द की इन सतावों से कोई तुलना नहीं कर सकते। क्‍या हमको इस बात की निश्‍चितता है ? यदि नहीं है तो हो सकता है कि हमको कुछ बातें बदलना पड़ें। हमें अपना चिन्‍तन बदलना पड़ेगा, हमें अपना व्‍यवहार बदलना पड़ेगा, हमें अपना जीवन बदलना पड़ेगा। प्रभु यीशु मसीह से कहना पड़ेगा तू मेरे दिल में आ और प्रभु मैं तुझसे शपथ खाता हूं, मैं निश्‍चित रूप से तुझसे वाचा बांधता हूं कि जीवन के अन्‍त तक मैं विश्‍वासयोग्‍य रहूंगा। क्‍योंकि प्रभु यीशु मसीह की यह प्रतिज्ञा है कि मृत्‍यु तक विश्‍वासयोग्‍य रह तो मैं तुझे जीवन का मुकुट दूंगा।