परिचय :- हम सात कलीसियाओं को प्रभु यीशु द्वारा लिखे गये पत्रों का अध्ययन कर रहे हैं, जिसमें चौथी कलीसिया है थुआतीरा की कलीसिया। ये पत्र हमारे लिए भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने उस समय में थे। रोमी साम्राज्य के अन्तर्गत थुआतीरा शहर पिरगमुन से 40 मील दक्षिण पूर्व में स्थित था, यह एक बहुत सामान्य सा कस्बा था। जिन सातों कलीसियाओं को पत्र लिखे गए हैं उन सभी में से सबसे छोटा स्थान थुआतीरा ही था। परन्तु विचार करने की बात यह है कि सबसे छोटे स्थान की कलीसिया को प्रभु यीशु मसीह सबसे लम्बा पत्र लिखता है। थुआतीरा में कपड़े बनाने और उन्हें रंगने का व्यवसाय प्रमुख था। यह इसलिये भी प्रसिद्ध था क्योंकि यहां मिट्टी, पीतल और तांबे के बर्तन बनाए जाते थे। यहां के लोग सूर्य देवता (अपोलो) की उपासना करते थे। आज थुआतीरा की भौगोलिक स्थिति के विषय में देखें तो पाएंगे कि यह तुर्किस्तान में है और आज इसको अखीसार के नाम से जाना जाता है। आज इस शहर की जनसंख्या एक लाख बावन हज़ार है। आज यहां का प्रमुख व्यवसाय तम्बाकू उत्पादन और जैतून का तेल बनाने का है। इन्टरनेट पर यदि अखीसार के विषय में जानकारी प्राप्त की जाए तो वह एक बहुत ही ख़ूबसूरत शहर है और वहां पर बहुत से पहाड़ों पर आवासीय भवन बने हुए हैं। यहां बहुत ही खूबसूरत इमारतें हैं और शहर बहुत ही सुनियोजित ढ़ंग से सेक्टरों में बंटा हुआ है। इंटरनेट पर ही हमें थुआतीरा के पुराने चित्र भी देखने को मिलते हैं। मेरे एक मित्र जो कुछ समय पूर्व तुर्किस्तान गए थे, उन्होंने बताया कि वहां पर मसीहियों पर बहुत अधिक सताव आता है और लाखों मसीही पिछले दस वर्षों में टर्की को छोड़कर चले गए। आज उस देश में सिर्फ़ नौ सौ मसीही पाए जाते हैं जिनकी जानकारी शासन के पास है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो है वह यह कि थुआतीरा की कलीसिया वहां पर नहीं है, आज अखीसार में कोई भी कलीसिया नहीं पाई जाती। बाइबिल में प्रकाशितवाक्य के अलावा केवल एक ही सन्दर्भ है जहां पर थुआतीरा का वर्णन पाया जाता है और वह है प्रेरितों के काम 16:14-15, जहां लिखा है; “और लुदिया नाम थुआतीरा नगर की बैंजनी कपड़े बेचने वाली एक भक्त स्त्री सुनती थी, और प्रभु ने उसका मन खोला, ताकि पौलुस की बातों पर चित्त लगाए। और जब उसने अपने घराने समेत बपतिस्मा लिया, तो उसने विनती की, कि यदि तुम मुझे प्रभु की विश्वासिनी समझते हो, तो चलकर मेरे घर में रहो; और वह हमें मनाकर ले गई”। वह लुदिया थी जिसने थुआतीरा की कलीसिया को आरम्भ किया था, उसी के घर से थुआतीरा की कलीसिया प्रारम्भ हुई। इस कलीसिया को प्रभु यीशु मसीह के पत्र को चार भागों में बांट कर हम उसका अध्ययन करेंगे। इन कलीसियाओं के द्वारा प्रभु यीशु मसीह हमारी कलीसियाओं और हमें क्या बताना चाहता है, हम देखेंगे कि वह कलीसिया को किन बातों के लिए आगाह कर रहा है जो हमारे व्यक्तिगत जीवन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। 1. प्रभु यीशु मसीह अपना परिचय देता है:- प्रभु यीशु मसीह लोगों को यह बताता है कि यह जो पत्र मैं लिख रहा हूं, मैं किस अधिकार से लिख रहा हूं? मेरी क्या हैसियत है? इस पत्र के लिखने से पहले वह अपना परिचय देता है, वह कहता है; “और थुआतीरा की कलीसिया के दूत को यह लिख कि, परमेश्वर का पुत्र जिसकी आंखें आग की ज्वाला की नाईं, और जिसके पांव उत्तम पीतल के समान हैं, यह कहता है” (प्रकाशितवाक्य 2:18) । जब हमारे पास पत्र आते हैं तो उनमें यह बात प्रमुख होती है कि उन का लिखने वाला कौन है? जब हमारे पास शासन की तरफ से कोई पत्र आता है तो हम उसको प्राथमिकता देते हैं। यदि हमारे पास किसी विशिष्ट व्यक्ति का पत्र आता है तो हम उसे पहले खोलते हैं। इसलिए प्रभु यीशु मसीह अपना परिचय देता है कि पत्र का लिखने वाला कौन है ? पत्र का लिखने वाला सबसे प्रमुख होता है इसलिए वह बताता है कि यह बात परमेश्वर का पुत्र कह रहा है और जो बातें पुत्र कहता है वे परमेश्वर की ओर से हैं, उनमें परमेश्वर का वचन है। वह लिखता है कि जिसकी आंखें ज्वाला के समान हैं। यह साधारण आंखों वाला यीशु मसीह नहीं है, इसकी आंखें आग की ज्वाला के समान हैं। जब हम आराधना में आते हैं तो कुछ ऐसे पाप हैं जो हमारे हृदय में छुपे हुए होते हैं। जब हम अपने प्रियों से बातें करते हैं तो वे पाप हमारे जीवनों में छुपे हुए होते हैं। हम निकट से निकट लोगों को भी वे बातें नहीं बताते क्योंकि वे हमारे गुप्त के पाप हैं। हमारे जीवन के अतीत के कुछ ऐसे पाप हैं, पाप के ऐसे धब्बे हैं जिन्हें हम दूसरों के सामने लाना नहीं चाहते। परन्तु यीशु मसीह जिसकी आंखें आग की ज्वाला के समान हैं, वह हमारे हृदयों को, वह हमारे मनों को और हमारे विचारों को जानता है, उससे कोई भी बात छिपी नहीं। 1शमूएल 16:7 में लिखा है; “यहोवा का देखना मनुष्य का सा नहीं है; मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है परन्तु यहोवा की दृष्टि मन पर रहती है”। यह परमेश्वर यहोवा है जो मन को देखता है, यह परमेश्वर यहोवा है जो मन को बदलता है। इस यहोवा परमेश्वर के लिए यह प्राथमिक नहीं कि हमारा बाहरी आवरण कैसा है, हमारे पास कितना धन है, हम कैसे दिखते हैं, हमारी शक्ल कैसी है? परमेश्वर यहोवा तो हमारे मनों को देखता है। यदि प्रभु यीशु मसीह के बारे में हम देखें तो बहुत से सन्दर्भ हमें मिलते हैं कि किस प्रकार प्रभु यीशु ने व्यक्ति को देखा और उसने उसके हृदय को जान लिया, उसके विचारों यहां तक कि उसके मन को जान लिया। जब धनी युवा प्रभु के पास आया तो, मरकुस रचित सुसमाचार 10:21 में लिखा है; “उस पर दृष्टि करके उससे कहा तुझ में एक बात की घटी है”। जब झोले के मारे को कुछ लोग लेकर आते हैं तो प्रभु यीशु उससे कहता है तेरे पाप क्षमा हुए। और लिखा हुआ है कि जो लोग वहां बैठे हुए थे प्रभु यीशु मसीह ने उनके मन की बात जान ली थी। फरीसियों, शास्त्रियों और महायाजकों से जब प्रभु यीशु का सामना होता है तो प्रभु मात्र उनके शब्दों को नहीं वरन् मन की बात को जानता है। यह प्रभु यीशु मसीह हमारे मन की बातों को भी जान लेता है, और आज हमारे लिये जो प्रश्न है वह यह कि जब प्रभु यीशु मसीह हमारे हृदय को देखता है तो उसको कौन सी बात दिखाई देती है? क्या जलन दिखाई देती है? घृणा दिखाई देती है? कटुता दिखाई देती है? दोहरापन दिखाई देता है? प्रेम दिखाई देता है? क्षमा दिखाई देती है? परमेश्वर का प्रेम दिखाई देता है? यह प्रभु यीशु हमारे हृदयों को देखता है, हमारे विचारों को जानता है। प्रभु यीशु के परिचय के सम्बन्ध में जो दूसरी बात है वह यह कि उसके पांव उत्तम पीतल के समान हैं। थुआतीरा में पीतल का एक बड़ा व्यवसाय था, एक बहुत बड़ी फैक्ट्री थी जहां पर पीतल की प्रतिमाएं भी बनाई जाती थीं और लोग यह जानते थे कि पीतल क्या होता है। बाइबिल में यदि हम पुराने नियम में देखें तो पाएंगे कि पीतल परमेश्वर के न्याय का प्रतीक है। यदि बलिदान की वेदी की बनावट को देखें कि किस प्रकार से वह वेदी बनाई गई थी जहां पर लोग बलिदान चढ़ाते थे। निर्गमन 27:2-4 में इस बात का वर्णन है कि किस प्रकार उसे पीतल से मढ़ा गया था। निर्गमन 29:36 में यह पाया जाता है कि उस पीतल की वेदी में प्रतिदिन पाप बलि चढ़ाई जाती थी। गिनती 21:9 में लिखा है; “सो मूसा ने पीतल का एक सांप बनवाकर खम्भे पर लटकाया; तब सांप के डसे हुओं में से जिस-जिस ने उस पीतल के सांप की ओर देखा वह जीवित बच गया”। प्रभु यीशु मसीह न सिर्फ़ हमारे हृदयों को देखने वाला है परन्तु गम्भीर बात यह है कि वह हमारा न्याय करने वाला है, वह हमारा न्यायी है। एक दिन आएगा जब वह न्याय के सिंहासन पर बैठेगा और हमारे अनन्त का निर्णय करेगा। 2 थिस्सलुनीकियों 1:7-9 में लिखा है; “उस समय जबकि प्रभु यीशु अपने सामर्थी दूतों के साथ, धधकती हुई आग में स्वर्ग से प्रगट होगा। और जो परमेश्वर को नहीं पहचानते, और हमारे प्रभु यीशु के सुसमाचार को नहीं मानते उनसे पलटा लेगा। वे प्रभु के सामने से और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड पाएंगे”। मत्ती 25:31-32 में लिखा है; “जब मनुष्य का पुत्र अपनी महिमा में आएगा और सब स्वर्गदूत उसके साथ आएंगे तो वह अपनी महिमा के सिंहासन पर विराजमान होगा। और सब जातियां उसके सामने इकट्ठी की जाएंगी; और जैसा चरवाहा भेड़ों को बकरियों से अलग कर देता है, वैसा ही वह उन्हें एक दूसरे से अलग करेगा”। प्रभु यीशु हमारे हृदयों को देखता है, वह हमारा न्यायी है और एक दिन हमारा न्याय करने के लिए आने वाला है। 2. प्रभु यीशु इस कलीसिया की प्रशंसा करता है:- इस कलीसिया में प्रभु यीशु मसीह कुछ बातें देखता है जिन्हें हमें भी अपनी कलीसिया में लाना है। वह इस कलीसिया की छ: बातों के लिए उसकी प्रशंसा करता है। प्रकाशितवाक्य 2:19 में लिखा है; “मैं तेरे कामों, और प्रेम, और विश्वास, और सेवा, और धीरज को जानता हूं और यह भी कि तेरे पिछले काम पहिलों से बढ़कर हैं”। प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि तू कार्य करने वाली कलीसिया है, प्रेम करने वाली कलीसिया है, विश्वास करने वाली कलीसिया है और सेवा करने वाली कलीसिया है। यहां पर सेवा करने के विषय में जो शब्द इस्त्ोमाल हुआ है, यदि हम उसे मूल ग्रीक भाषा में देखें तो वह शब्द है डायकोनियन, जिसका अर्थ होता है प्रचार की सेवा। यह कलीसिया न सिर्फ़ कार्य करने वाली, प्रेम, विश्वास करने वाली कलीसिया थी बल्कि वह प्रचार का कार्य करने वाली कलीसिया थी। इनके कार्य और इनकी सेवा पहले से बेहतर होती जाती थी और हर बात में वे परिपक्वता की ओर आगे बढ़ते जाते थे। परन्तु यदि हम आगे बढ़ें तो हम पाते हैं कि अच्छे कार्य करने का अर्थ यह नहीं कि कुछ ग़लत बातें भी उनके साथ जीवन में बनी रहना उचित होगा। यदि हममें कुछ अच्छाइयां हैं और उनके साथ कुछ बुराइयां भी बनी रहें और हम सोचें कि परमेश्वर उनकी अवहेलना कर देगा, उन बातों के लिए हमें दण्डित नहीं किया जाएगा, तो हमारा ऐसा सोचना ग़लत है। अक्सर इस संसार में रहते हुए हमारी मानसिकता ऐसी हो जाती है कि हम प्रभु यीशु के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं। हम उसकी आराधना कर रहे हैं, उसकी सेवा कर रहे हैं, उसके नाम से हम बहुत से भले काम कर रहे हैं तो कुछ ग़लत बातें भी चल जाएंगी। हम पाते हैं कि यदि किसी अधिकारी से हमारे अच्छे सम्बन्ध हैं और वह हमसे खुश है तो हम कुछ भी कर सकते हैं। यदि फॉरेस्ट अफसर से हमारे सम्बन्ध हैं तो हम जंगल में शिकार खेल सकते हैं। यदि हमारे किसी अधिकारी से अच्छे सम्बन्ध हैं और वह हमसे प्रसन्न है तो उन सम्बन्धों के कारण हम कुछ अनुचित कार्य भी कर सकते हैं, यह संसार का सोच हो सकता है। परन्तु परमेश्वर के सम्बन्ध में जब हम इस तथ्य को देखते हैं तो पाते हैं कि परमेश्वर ऐसा नहीं है, वह हमारी हर एक बुराई, हमारे हर एक पाप का हमसे लेखा लेने वाला है। मेरे पिता के एक परिचित थे वे कहा करते थे, कि मैं घूस लेना ग़लत नहीं समझता क्योंकि जितनी रिश्वत मैं लेता हूं उसका पचास प्रतिशत मैं कलीसिया को दान में दे देता हूं। यह लगभग 20 वर्ष पुरानी बात है और उस समय वे लाखों रुपये दान स्वरूप कलीसिया में देते थे। शायद हो सकता है चर्च की आराधनाओं में हम नियमित रूप से भाग लेते हों, हम चर्च काउंसिल के सदस्य हों, हम मसीही संस्था में कार्य करते हों, हम परमेश्वर के कार्य को त्याग के साथ करते हों और हम सोचने लगें कि हमारे जीवन में कुछ ग़लत बातें भी साथ-साथ चलती रहें तो उनसे कोई अन्तर नहीं पड़ता। परन्तु रोमियों 6:1-4 में लिखा है; “सो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो? कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं? क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का बपतिस्मा लिया? सो उस मृत्यु का बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें”। 3. प्रभु यीशु मसीह कलीसिया को चेतावनी देता है:- प्रकाशितवाक्य 2:20 में प्रभु यीशु कहता है; “पर मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि, तू उस स्त्री इज़ेबेल को रहने देता है जो अपने आप को भविष्यद्वक्तिन कहती है, और मेरे दासों को व्यभिचार करने और मूरतों के आगे के बलिदान खाने को सिखलाकर भरमाती है। मैंने उसको मन फिराने के लिए अवसर दिया, पर वह अपने व्यभिचार से मन नहीं फिराना चाहती”। यह प्रभु यीशु मसीह की चेतावनी है जो वह कलीसिया को देता है। यह इज़ेबेल कौन थी? इसके सम्बन्ध में बहुत-सी व्याख्याएं की गई हैं, जो प्रमुख बात उसके बारे में कही गई है कि वह एक बहुत ही कुकर्मी व भ्रष्ट स्त्री थी और जो कलीसिया पर ग़लत निर्णयों के लिये दबाव डालती थी। इसकी तुलना आहाब राजा की स्त्री इज़ेबेल से की गई है। बहुत से टीकाकारों का यह मत है कि आहाब राजा की स्त्री, इज़ेबेल जिसका वर्णन पुराने नियम में किया गया है, जो अपने आप को भविष्यद्वक्तन कहती थी, जो सब प्रकार के कुकर्म और अनैतिक बातों को धार्मिकता का अंग बताती थी, उसी इज़ेबेल से इस स्त्री की तुलना की गई है। प्रमुख टीकाकार विलियम बार्कले ने अपने शोध और तत्कालीन इतिहास के आधार पर और जो दस्तावेज उनके पास हैं, उनके आधार पर यह कहा है कि उन दिनों में जो थुआतीरा की कलीसिया के बिशप थे सम्भवत: उनकी पत्नि का नाम इज़ेबेल था। और यहां पर जो बात प्रभु यीशु मसीह कह रहा है वह यह कि तू इस स्त्री को रहने देता है। हो सकता है कि हम कहें कि हम तो उसके समान पाप नहीं करते, हम तो ग़लत कामों में सहभागी नहीं होते। परन्तु जो प्रमुख बात है वह उदासीनता के पाप की बात है। प्रभु कहता है कि पाप के प्रति, ग़लत बातों के प्रति, अनैतिकता के प्रति तू ख़ामोश बना हुआ है, और यह उदासीनता का पाप है। कलीसिया में कहां है; अनुशासन? क्या किया गया उस स्त्री के साथ? प्रभु यीशु मसीह आगे कहता है कि मैंने उसे मन फिराव का अवसर दिया है, परन्तु उसने नहीं फिराया और यह अनदेखा करने का यह पाप है। हमें यह मालूम है कि कोई समस्या है परन्तु उसको अनदेखा किया जा रहा है। चलने दो जैसा चल रहा है, टालने का पाप है, तटस्थता का पाप है। याकूब 4:17 में लिखा है; “इसलिए जो कोई भलाई करना जानता है और नहीं करता, उसके लिये यह पाप है”। प्रभु यीशु कहता है कि तू ऐसी स्त्री को अपने बीच में रहने देता है। उसके खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाता, उसके खिलाफ़ अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं करता, ऐसी स्त्री को तू रहने देता है, जो अपने आप को कलीसिया का अंग बताती है मगर उसके कार्य शैतान के जैसे हैं। हमारे जीवन में क्या कुछ ऐसे पाप हैं, जिनके प्रति हम उदासीन बने हुए हैं। हम कहते हैं कि हम तो मनुष्य हैं, हम तो कमज़ोर हैं इसलिए कुछ न कुछ पाप तो बने रहते हैं, उनसे कोई अंतर नहीं पड़ता। हमारी कलीसिया में कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनके खिलाफ़ कोई निर्देश नहीं हैं, जिनके खिलाफ़ हम कोई अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं कर रहे हैं। यदि ऐसी बात है तो प्रभु यीशु मसीह हमसे कह रहा है - मुझे तेरे विरुद्ध यह कहना है कि तू उस स्त्री इज़ेबेल को अपने बीच में रहने देता है। ऐसे लोग जो विभिन्न पंथों पर चलते हैं जो मिथ्या और कहानियों पर आधारित बातों को मानते हैं, उनके समाजों में भी कठोर अनुशासन देखने को मिलते हैं परन्तु हम क्या कर रहे हैं? हमने, जिन्होंने सच्चे परमेश्वर को जाना है। प्रभु यीशु मसीह ने अपना रक्त बहाकर हमको खरीदा है। हमारी कलीसिया की पवित्रता की ज़िम्मेदारी हमारे सामने है और हम क्या कर रहे हैं? क्या हम उन बातों के प्रति उदासीन हैं, उन बातों के प्रति ख़ामोश हैं। अपनी कलीसिया में, व्यक्तिगत जीवन में, परिवार में अनुशासन की बात है। मसीही अनुशासन में यह बात नहीं है कि यदि किसी ने ग़लत किया तो उसे मन फिराने का अवसर न दिया जाए। वास्तव में मसीही अनुशासन में अवसर देने की बात है। प्रभु यीशु मसीह कहता है “मैंने उसको भी मन फिराने का अवसर दिया पर वह व्यभिचार से मन फिराना नहीं चाहती”। यह प्रभु यीशु मसीह जो प्रेम करने वाला है, जो अनुग्रह करने वाला, क्षमा करने वाला, आंसू बहाने वाला, अपना रक्त बहाने वाला और पापियों के लिए जान देने वाला प्रभु है, वही प्रभु कहता है; “मैं उसके बच्चों को मार डालूंगा; और तब सब कलीसियाएं जान लेंगी कि हृदय और मन का परखनेवाला मैं ही हूं” (प्रकाशितवाक्य 2:23) । मैं उसके बच्चों को मार डालूंगा - यह बड़ा कठोर शब्द लगता है। अक्सर ऐसा होता है कि हमको लगने लगता है कि मसीही जीवन और विश्वास बड़ी आसानी की बात है, इसमें कोई गम्भीरता नहीं है। यह तो अनुग्रहकारी परमेश्वर है, यह तो क्षमा करने वाला परमेश्वर है परन्तु हम यह भूल जाते हैं कि यह वह परमेश्वर है, जिसकी एक सीमा रेखा है। जो अनुशासित करने वाला है, जो न्याय करने वाला है, जो पाप का दण्ड देने वाला परमेश्वर है। यह परमेश्वर प्रेम करने वाला तो है परन्तु क्रोध करने वाला परमेश्वर भी है। यह जो धैर्य रखने वाला परमेश्वर है, वह नाश करने वाला परमेश्वर भी है। जो स्वर्ग के राज्य का वारिस बनाने वाला परमेश्वर है, वही आग और गंधक से दण्डित करने वाला परमेश्वर भी है। यह अनुग्रह करने वाला परमेश्वर है, और जलन रखने वाला परमेश्वर भी है। व्यवस्थाविवरण 32:22 में लिखा है; “क्योंकि मेरे कोप की आग भड़क उठी है, जो पाताल की तह तक जलती जाएगी, और पृथ्वी अपनी उपज समेत भस्म हो जाएगी, और पहाड़ों की नेवों में भी आग लगा देगी”। यह परमेश्वर के क्रोध की आग है और हम अक्सर इस बात को भूल जाते हैं। गिनती की पुस्तक 11:1 में उस समय का वर्णन है जब इस्राएली बड़बड़ाने लगे, शिकायत करने लगे, नकारात्मक मानसिकता हो गई; तो लिखा है कि यहोवा की आग उनके मध्य में जल उठी और छावनी को एक किनारे से भस्म करने लगी। यह वह परमेश्वर है जो इस्राएलियों को बंधुवाई से निकालना भी जानता है और उनकी छावनी को भस्म करना भी जानता है। परमेश्वर के वचन में इस विषय में हम अनेक सन्दर्भ को पाते हैं, जहां लिखा है; “तब मेरा क्रोध भड़केगा, और मैं तुमको तलवार से मरवाऊंगा, और तुम्हारी पत्नियां विधवा और तुम्हारे बालक अनाथ हो जाएंगे” (निर्गमन 22:24) । “और मैंने स्वयं हाथ बढ़ाकर बलवन्त भुजा से, और क्रोध और जलजलाहट और बड़े क्रोध में आकर तुम्हारे विरुद्ध लडूंगा। और मैं इस नगर के रहनेवालों को क्या मनुष्य, क्या पशु सब को मार डालूंगा; वे बड़ी मरी से मरेंगे। और उसके बाद यहोवा की यह वाणी है, हे यहूदा के राजा सिद्किय्याह, मैं तुझे, तेरे कर्मचारियों और लोगों को वरन जो लोग इस नगर में मरी, तलवार और महंगाई से बचे रहेंगे, उनको बाबुल के राजा नबूकदनेस्सर और उनके प्राण के शत्रुओं के वश में कर दूंगा। वह उनको तलवार से मार डालेगा; उन पर न तो वह तरस खाएगा न कुछ कोमलता दिखाएगा और न कुछ दया करेगा” (यिर्मयाह 21:5-7)। “परमेश्वर धर्मी और न्यायी है, वरन् ऐसा ईश्वर है जो प्रति दिन क्रोध करता है” (भजन संहिता 7:11)। “धोखा न खाओ परमेश्वर ठट्ठों में नहीं उड़ाया जाता क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है वही काटेगा” (गलतियों 6:7) । बीस लाख इस्राएली मिस्र की बंधुवाई से निकले थे, उन्होंने परमेश्वर के आश्चर्य कर्म को देखा तो था, बीस लाख इस्राएली लाल समुद्र पार तो हुए थे परन्तु उनमें से केवल दो लोग प्रतिज्ञा किये हुए देश में पहुंचे (जिनका वर्णन गिनती 26:65 में पाया जाता है)। क्योंकि यह परमेश्वर न्याय करने वाला परमेश्वर है, दण्डित करने वाला परमेश्वर है, क्रोध करने वाला परमेश्वर है इसलिए हमें उसके भय में चलना चाहिए, उसके भय में निर्णय लेना चाहिए। 4. प्रभु यीशु मसीह अवसर और आशा देता है:- जैसा लिखा है मैंने उस इज़ेबेल को मन फिराने का अवसर भी दिया परन्तु उसने व्यभिचार से मन नहीं फिराया। 22 वें पद के दूसरे भाग में लिखा है; “यदि वे भी उसके कामों से मन न फिराएंगे तो उन्हें बड़े क्लेश में डालूंगा” (प्रकाशितवाक्य 2:22) । 26वें और 28वें पद में प्रभु यीशु दो प्रतिज्ञाएं करता है। पहली प्रतिज्ञा कि मैं उन्हें जाति-जाति के लोगों के ऊपर अधिकारी ठहराऊंगा। 1 कुरिन्थियों 6:2 में लिखा हुआ है; “क्या तुम नहीं जानते, कि पवित्र लोग जगत का न्याय करेंगे?” ये उसके पवित्र लोग हैं, ये स्वर्ग में स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे, ये पवित्र लोग हैं जो जगत का न्याय करेंगे, मैं उनके ऊपर अधिकारी ठहराऊंगा; दूसरी प्रतिज्ञा यीशु मसीह करता है कि; मैं उसे भोर का तारा दूंगा। किसी वैज्ञानिक ने लिखा है यदि हम तारों को गिनें तो साधारण आंख से 1029 तारे गिने जा सकते हैं। उसके बाद विज्ञान का विकास हुआ और गैलिलियो की दूरबीन आई और उससे लगभग 4,000 तारे दिखाई देने लगे। आज की स्थिति में जो दूरबीनें हैं उनसे जब वैज्ञानिकों ने उन तारों को देखा तो वे आश्चर्य में पड़ गए। एक गैलेक्सी में 10,000 तारे होते हैं और आज तक जो ज्ञात हैं, ऐसी 10,000 से अधिक गैलेक्सीज़ हैं। परन्तु सुबह होने के पहले अन्धकार के अन्तिम पड़ाव में जो सबसे चमकदार तारा होता है, वह भोर का तारा होता है। हमारा प्रभु यीशु मसीह प्रकाशितवाक्य 22:16 में कहता है; “मैं भोर का चमकता हुआ तारा हूं”। और यह भोर का तारा मैं तुमको दूंगा। इस प्रभु यीशु मसीह का प्रकाश भोर के तारे के समान है। करोड़ों तारों में वह सबसे चमकदार तारा है, भोर का तारा (वीनस) जब चमकता है तब इस बात का अहसास होता है कि अब सुबह होने वाली है। वह भोर का तारा जो अन्धकार के अन्तिम पड़ाव को हटाता है, वह प्रभु यीशु मसीह जो इस संसार के सारे देवताओं से, विद्वानों से, सारे शिक्षकों से कहीं अधिक चमकदार है, जो भोर का तारा है; वह कहता है मैं तुम्हें भोर का तारा दूंगा। अपना अधिकार मैं तुम्हें दूंगा, मेरा प्रकाश तुम्हें मिलेगा। क्या हमारे जीवन के हर आयाम में; यह प्रभु है? क्या हमारे कार्य, हमारे व्यवहार, हमारी इच्छा, हमारे सम्बन्धों, हमारे निर्णयों, हमारे चुनाव, हमारे ख़ाली समय, हमारे स्रोतों और हमारे फुरसत के क्षणों में; उसका प्रभुत्व हम पर है। प्रभु यीशु मसीह चाहता है कि वह हमारे जीवन का प्रभु सम्पूर्णता से हो, और यदि नहीं है तो वह पश्चात्ताप करने का अवसर देने वाला प्रभु है। हमारे जीवनों में कहीं उदासीनता तो नहीं? वे पाप जिनको हम सोचते हैं कि वे गुप्त हैं, उनके प्रति हम सजग हैं कि नहीं? हमको उन्हें अपने जीवनों से दूर करना है, परमेश्वर से क्षमा मांगना है। यदि पाप को बढ़ने देंगे तो उस पाप का असर हमारी आत्मा पर होगा। यदि हाथ में ज़हर का इंजेक्शन लगा दिया जाए तो उसका प्रभाव हाथ तक नहीं रहता, उसका प्रभाव सारी देह में होता है। कलीसिया में यदि ऐसी बातें हैं, जो कमियां हैं तो उनसे सारी कलीसिया और सारा समाज प्रभावित होता है और सबसे बढ़कर प्रभु यीशु मसीह की गवाही प्रभावित होती है, उसकी गवाही धूमिल होती है। हमको प्रभु यीशु ने बचाया है क्योंकि वह चाहता है कि हम भोर के तारे की नाईं चमकें। हमें अपने जीवनों से अपने प्रभु की शोभा दिखाई दे। न सिर्फ़ वह हमारा प्रभु है, न सिर्फ़ वह हमारा अधिकारी है, न सिर्फ़ वह हमसे प्रेम करता है, परन्तु हमको चेतावनी भी देता है, अवसर भी देता है और यदि उसके बाद भी हम न चेतें तो उसके क्रोध का सामना हमको करना पड़ेगा। आइये, हम अपने जीवन के पापों को देखें, हम अपनी कलीसिया की कमज़ोरियों को देखें और प्रभु यीशु मसीह के वचनों को देखते हुए, उसके वचन के अनुसार अपने जीवन को बनाएं ताकि उसकी शोभा हमारे जीवनों में दिखाई दे।