सन्दर्भ : 1 कुरिन्थियों 13:11; इब्रानियों 5:12 परिचय :- समय गुज़रने के साथ व्यक्ति में परिपक्वता आती है। उसके जीवन में परिवर्तन आते हैं, इन से वह कुछ सीखता है, बहुत कुछ बढ़ता है। इब्रानियों की पत्री का लेखक इसी से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण बात कहता है कि; “समय के विचार से तो तुम्हें गुरू हो जाना चाहिए था, तो भी क्या आवश्यक है कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए? और ऐसे हो गये हो कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए।” (इब्रानियों 5:12) और इस के आगे वह कहता है; “..... आओ मसीह की शिक्षा की आरम्भ की बातों को छोड़कर, हम सिद्धता की ओर बढ़ते जाएं।” (इब्रानियों 6:1) आज नये वर्ष के संदर्भ में मैं आपसे कहना चाहता हूं कि हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। मसीही परिवार, मसीही वातावरण, मसीही संस्थाओं में रहते हुए वर्षों गुज़र जाते हैं, पर हमारा विकास एकांगी ही होता है। शरीर बढ़ता है, सांसारिकता बढ़ती है परन्तु आत्मिकता में हम बौने रह जाते हैं। अपने नाम, पद और धन की बैसाखियां लगाकर सोचते हैं कि हम कितने ऊंचे हो गए परन्तु वास्तविकता में हम अभी भी वही हैं के वहीं हैं। उतने ही बौने, उतने ही सीमित। कूप-मण्डूक, लकीर के फकीर; हमें अभी भी अन्न के बदले दूध ही चाहिए। आज इस बात की आवश्यकता है कि जीवन से जुड़ी सच्चाइयों को समझने में हम परिपक्व हों, हम उनसे गहराई से परिचित हो सकें, और आज जीवन के एक ऐसे ही पहलू पर मैं आपसे चर्चा करना चाहता हूं और मेरा उद्देश्य है कि इस पहलू पर चर्चा करने से जीवन के प्रति हमारे नज़रिये में कुछ बदलाव आए, हम जीवन को एक नये परिप्रेक्ष्य में देख सकें। नये वर्ष का एक नये उत्साह और चुनौती से स्वागत कर सकें। जिस विषय पर मैं चर्चा करना चाहता हूं, वह हमारे जीवन से बहुत करीब से जुड़ा हुआ है। वह हमारी दिनचर्या का अंग है, हमारे बहुत करीब है; और वह विषय है दर्द। आप सोचेंगे कि ऐसे आनन्द के उत्सव पर, नये वर्ष पर मैं दु:ख और दर्द की बात कर रहा हूं, बहुत अजीब सी बात है? परन्तु मेरा ऐसा मानना है कि हमारे जीवन का दर्द, एक वरदान है; हमारे लिए परमेश्वर की आशीष है, परमेश्वर का दान है। दर्द के बिना सब कुछ अधूरा है, अपूर्ण है। उस व्यक्ति को अभागा कहा जा सकता है, वह व्यक्ति असफल है, जिसके जीवन से दर्द का कोई नाता नहीं। अभी हमने क्रिसमस मनाया। ध्यान दीजिये, बैतलेहम की एक सराय में एक गौशाला की चरनी की ओर। यह पिता का प्रेम है, जो उसने चरनी में दिखाया है। परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसका एकलौता पुत्र उसके प्रेम का प्रतीक , बैतलेहम के एक गौशाले की चरनी में पैदा होता है। परन्तु परमेश्वर के प्रेम का एक और चित्र है, जो नज़र आता है यीशु के कलवरी के क्रूस पर लटके होने में; खून से लथपथ, कांटो के ताज, तिरस्कार, कोड़ों की मार, भालों से लगे घावों का यह चित्र भी परमेश्वर का प्रेम है। कितना विरोधाभास है इन दोनों चित्रों में, परन्तु परमेश्वर का प्रेम अधूरा है, अपूर्ण है, उसके उद्धार की योजना अधूरी है यदि बैतलेहम की चरनी के साथ कलवरी नहीं, गुलगुता नहीं। परमेश्वर के प्रेम और दर्द के सम्बन्ध के विषय में कुछ बातें हम पाते हैं :- 1. दर्द के बिना परमेश्वर का प्रेम पूरा नहीं हो सकता:- दर्द के बिना परमेश्वर का प्रेम अधूरा है। दाऊद भजन संहिता 23 में लिखता है; “तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है।” पौलुस के शरीर में भी एक कांटा चुभाया गया और पीड़ा इतनी कि जैसे शैतान का दूत घूंसे मार रहा हो, सदैव दर्द बना रहता है। उस ने तीन बार पमरेश्वर से प्रार्थना की, कि ये कांटा निकाला जाए पर हर बार उत्तर मिला कि तेरे लिए मेरा अनुग्रह ही काफी है। (2 कुरिन्थियों 12:9 के अनुसार) दर्द और कांटे की चुभन तो है, परन्तु इस चुभन में मेरे अनुग्रह को याद रख। कांटे का दर्द अनुग्रह की अनुभूति में, अहसास में बदल सकता है। 2. दर्द के बिना परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती:- सल्वाडोर डाली की एक पेंटिंग है, जिसमें बढ़ई की दुकान से बालक यीशु झांक रहा है और उस पर क्रूस की छाया है। बारह वर्ष के किशोर पर क्रूस की छाया है। यह उसके लिए आवश्यक था कि वह गुलगुता की यात्रा पूरी करे; कि जो निष्पाप है, वह पाप बन जाए; जो आनन्द का समाचार था, वह लोहू की धार बनकर बहे। स्वर्गदूतों के गीत और उनका उल्लास, उस बालक राजा के लिए था; परन्तु अब यह ज़रूरी था कि वे स्वर्गदूत उसे छटपटाता देखें, मृत्यु को पाता देखें और उसकी मदद न करने के लिए अपने हाथ पैरों को बांध लें। अय्यूब कहता है; “क्या हमें जो सुख देता है, उसके हाथ से दुख लेने को तैयार न रहें?” (अय्यूब 2:10) कितनी क्षमता है हमारी? पानी से भरे गिलास या झील के समान या फिर समुद्र के समान। कितना दुख ले सकते हैं हम भीतर, खामोश, शान्त और सन्तुलित होकर। यीशु ने आह्वान दिया; “जो मेरे पीछे आना चाहे वह अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।” (मत्ती 10:38 के अनुसार) दर्द के बिना परमेश्वर का प्रेम पूरा नहीं हो सकता। दर्द के बिना परमेश्वर की योजना पूरी नहीं हो सकती। 3. दर्द हमारे जीवन को दिशा देता है :- अक्सर हम दर्द सहते-सहते पीड़ा झेलते-झेलते ऊब जाते हैं, उकता जाते हैं; परन्तु स्मरण करें इस्राएलियों को। 40 वर्ष की भटकन, पीड़ा ने ही उन्हें बंधुवाई से निकलकर प्रतिज्ञा की हुई भूमि तक पहुंचने की दिशा दी। स्तिफनुस का वध, पौलुस ने अपनी आंखों से देखा, उसे मसीह के लिए शहीद होते देखा; तब दर्द की चरम सीमा अनुभव की। दमिश्क के मार्ग पर प्रभु का दर्शन पाने के बाद तीन दिन तक पौलुस अंधा रहा, मूर्च्छित हो गया और जब आंखें खुलीं, पीड़ा दूर हुई तो जीवन को एक नयी दिशा मिली। हबक्कूक परमेश्वर से पूछता है कि धार्मिकता का खून क्यों, अधर्म की विजय क्यों? दर्द से मूर्च्छित हो जाता है और तब उसे परमेश्वर का उत्तर मिलता है। उसके बाद वह एक नई दिशा को प्राप्त करता है, और कहता है; “क्योंकि चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जलपाई के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए, और खेतों में अन्न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़-बकरियां न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, तौभी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूंगा, और अपने उद्धारकर्त्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूंगा।” (हबक्कूक 3:17-18) दर्द से, मूर्च्छा से पैदा हुई हबक्कूक के विश्वास की गवाही, उसके विश्वास का गीत। दर्द से गुज़रकर हबक्कूक के जीवन को दिशा मिली। 4. दर्द से हमारा जीवन आशीषित होता है :- हव्वा ने परमेश्वर की आज्ञा को ठुकराकर पाप किया। परमेश्वर ने स्त्री को शापित किया, उस से कहा मैं तेरे प्रसव की पीड़ा को बढ़ाऊंगा, परन्तु प्रसव की पीड़ा सहने पर परमेश्वर स्त्री को आशीषित करेगा। मनुष्य को शाप दिया कि मेहनत करने पर, कठिनाई से गुज़रने पर ही रोटी कमा सकेगा, परन्तु परमेश्वर श्रम को आशीषित करता है। दर्द में परमेश्वर की सामर्थ्य हम में कार्य करती है। पौलुस लिखता है; “मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा, कि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे।” (2 कुरिन्थियों 12:9) 5. दर्द हमारे जीवनों की गवाही बन जाता है :- सागर शहर में मेरी मुलाकात एक बुज़ुर्ग प्रचारक से हुई। उनके पैर-हाथ कटे थे, जीभ भी कटी हुई थी। परन्तु इसी पीड़ा ने उनके विश्वास की गवाही को मज़बूत किया। पौलुस अपनी पीड़ाओं, दर्दों का वर्णन करते हुए 2 कुरिन्थियों 11:23 से 27 में अपने विश्वास की गवाही देता है वह लिखता है; “(मैं पागल की नाईं कहता हूं) मैं उन से बढ़कर हूं! अधिक परिश्रम करने में; बार-बार कैद होने में, कोड़े खाने में; बार-बार मृत्यु के जोखिमों में। पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए। तीन बार मैंने बेंतें खाईं; एक बार पत्थरवाह किया गया; तीन बार जहाज़ जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा। मैं बार बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जोखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में। परिश्रम और कष्ट में; बार बार जागते रहने में; भूख-पियास में; बार-बार उपवास करने में; जाड़े में; उघाड़े रहने में।” पौलुस जेल में बंद कर दिया गया, रोमी शासन ने उस पर अत्याचार किए; अनेकों पीड़ाएं उसने सहीं। आज पौलुस की लेखनी, उसकी पीड़ा उसके विश्वास की गवाही देती है, हमें आशीषित करती है। उसके जीवन का दर्द हमारे लिए प्रेरणा बन जाता है क्योंकि वह लिखता है; “मुझ पर जो बीता है उस से सुसमाचार की बढ़ती ही हुई है।” (फिलिप्पियों 1:12) निष्कर्ष :- आज नये वर्ष के आनन्द का उत्सव मनाते हुए दर्द को मत रोकिए, स्वयं को दोष मत दीजिए कि आपके जीवन में कोई दर्द/कोई पीड़ा क्यों है? क्योंकि, यदि आपके जीवन में दर्द है तो ये जान लें; - दर्द के बिना परमेश्वर की योजना की परिपूर्णता नहीं। - दर्द के बिना परमेश्वर का प्रेम आपके जीवन में, अधूरा है। - दर्द हमारे जीवन को एक दिशा देता है। - दर्द से हमारा जीवन आशीषित होता है। - दर्द हमारे जीवनों की गवाही बन जाता है। परन्तु ऐसा केवल तभी होता है। जब हम अपने जीवन में परमेश्वर के साथ चलते हैं। जब हम उसकी इच्छाओं को अपने जीवनों में पूरा करते हैं।