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भयमुक्त नव वर्ष

सन्दर्भ : नीतिवचन 1:7
परिचय :- हर नया वर्ष हमारे लिए उत्साह, उमंग, आनन्द और एक नया जीवन जीने का अवसर लाता है। परन्तु साथ-साथ लाता है भविष्य की चिन्ता, आने वाले कल का भय। माता-पिता को चिन्ता होती है तेज़ी से बढ़ते बच्चों की, उनकी सुरक्षा की और अपनी आने वाली वृद्धावस्था की। भय, चिन्ता हमारे जीवन के अंग हैं, एक ऐसा पहलू है, जिससे बचा नहीं जा सकता।‍‍‍‌‍
कई वर्ष पूर्व अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व के वैज्ञानिकों के सम्मेलन हुआ जिस में एक वैज्ञानिक ने भाषण दिया था कि आज पैदा हुए बालक को अपने जीवन में देखने को मिलेगा ....... विश्व में ऊर्जा संकट, समृद्ध देशों में अकाल, जो तोड़ देगा सारी अर्थ व्यवस्था को। भुखमरी, कंगाली की चरम सीमा, अमेरिका के 1/4 भाग में भीषण भूकंप, विध्वंस।
अर्थात् अंधकार से भरा हुआ भविष्य। भय और चिन्ता से भरा हुआ भविष्य।
भय, सफलता को असफलता की ओर मोड़ सकता है, जीवन को तोड़ सकता है। मानसिकता को रोगी बना सकता है। व्यक्तित्त्व को नष्ट कर सकता है। जीवन को जीवित नरक बना सकता है। शब्दकोष के अनुसार भय - “पीड़ा से भरी मानसिक स्थिति है।” बाइबिल के अनुसार भय हमारे सबसे पुराने पाप से जुड़ा है। जब आदम और हव्वा ने अदन की वाटिका में वर्जित फल को खाया, उसके बाद उन्हें अपने पाप का अहसास हुआ और परमेश्वर से भयभीत होकर उन दोनों ने छुपने की कोशिश की। तब से लेकर आज तक संसार के हर व्यक्ति को भय से होकर गुज़रना पड़ा है। परन्तु सभी प्रकार के भय हानिकारक नहीं होते। बालक भय के कारण भीड़ भरी सड़क पर नहीं जाते। भय के कारण हम खुद को आग आदि से बचाकर रखते हैं। भय के कारण ही सावधानी से वाहन चलाते हैं।
परन्तु सब प्रकार के भय से बढ़कर, सबसे अच्छा भय, परमेश्वर का आत्मिक भय है।
सुलैमान राजा नीतिवचन में लिखता है, देखें; “यहोवा का भय मानना बुद्धि का मूल है।” (नीतिवचन1:6)
एक ऐसा भय जिसके द्वारा जीवन आशीषित होते हैं, समृद्ध होते हैं, सामर्थी होते हैं।
दूसरे प्रकार का भय सांसारिक भय है, जो कि परमेश्वर की दृष्टि में बुरा है, जिसके लिए वह कहता है “मत डर, मैं तेरे संग हूं।” बाइबिल बताती है कि चिन्ता से भरा हुआ सांसारिक भय पाप है।
वचन में लिखा है; “पर डरपोकों का भाग उस झील में मिलेगा, जो आग और गंधक से जलती रहती है। यह दूसरी मृत्यु है।” (प्रकाशित वाक्य 21:8) हम दाऊद का वर्णन पाते हैं जो राजा शाऊल से भयभीत था क्योंकि वह उसकी जान लेना चाहता था। दाऊद का यह भय एक लम्बे समय से बना हुआ था, परन्तु जब वह परमेश्वर के पास गया तो अपने अनुभव को लिखते हुए वह कहता है;
“मैं यहोवा के पास गया, तब उसने मेरी सुन ली, और मुझे पूरी रीति से निर्भय किया।” (भजन संहिता 34:4)
“यहोवा के डरवैयों के चारों ओर उसका दूत छावनी किए हुए उनको बचाता है।” (भजन संहिता 34:7)
“चाहे मैं घोर अंधकार से भरी हुई तराई में होकर चलूं तौ भी हानि से न डरूंगा।” (भजन संहिता 23:4)
“यहोवा मेरे जीवन का उजाला, वही मेरा मार्ग, उद्धार वही है तो मैं किससे डरूं, किसका भय खाऊं।” (भजन संहिता 27:4 के अनुसार)
“तू मेरे छिपने का स्थान है, तू संकट से मेरी रक्षा करेगा, तू मुझे छुटकारे के गीतों से घेर लेगा।” (भजन संहिता 32:7)
“.... उसके डरवैयों को किसी बात की घटी नहीं होती। जवान सिंहों को तो घटी होती और वे भूखे भी रह जाते हैं।”(भजन संहिता 34:9,10)
अत: भय से मुक्त होने के लिए एक ही रास्ता है और वह है, परमेश्वर पर भरोसा रखना।
सांसारिक चिन्ताएं, भय शैतान की ओर से हैं, उसके जाल हैं; मनुष्य को मार्ग से भटकाने के तरीके हैं परन्तु परमेश्वर चाहता है कि हम ऐसे भय से मुक्त हो जाएं। वचन हमसे पूछता है;
“क्या हम चिन्ता करके अपने जीवन का एक पल भी बढ़ा सकते हैं?” नहीं, कदापि नहीं।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार चार प्रकार के भय ऐसे हैं जो मनुष्य को विध्वंस और विनाश की ओर ले जाते हैं।

1. हानि का भय :- कई प्रकार की हानियों के भय होते हैं; कहीं नौकरी न छूट जाए, तनख्वाह कम न हो जाए, परिवार में कोई गम्भीर रूप से अस्वस्थ न हो जाए, व्यापार में घाटा न हो जाए।
विश्व के एक प्रसिद्ध समाचार पत्र की सलाहकार श्रीमती ए. लेन्डर्स जिनके पास समस्याओं से ग्रसित लोग पत्र लिखते हैं, के अनुसार उनके पास प्रति माह दस हज़ार पत्र आते हैं, जिनमें से 85% पत्र भयभीत लोगों के होते हैं, जो अपने स्वास्थ्य, संपत्ति की हानि के प्रति, परिवार में किसी की मृत्यु न हो जाए, के विषय में सोचकर भयभीत हैं। परन्तु परमेश्वर के वचन में इस भय से मुक्त होने के संदर्भ में बहुत खूबसूरती से लिखा है;
“इस लिये जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में
झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहिनाता है, तो हे अल्प विश्वासियों, तुम को वह क्योंकर न पहिनाएगा? इसलिये तुम चिन्ता करके यह न कहना, कि हम क्या खाएंगे, या क्या पीएंगे, या क्या पहिनेंगे? क्योंकि अन्य जाति इन सब वस्तुओं की खोज में रहते हैं, और तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएं चाहिए।” (मत्ती 6:30-32)
दाऊद राजा भजन संहिता 37:25 में कहता है; “मैं लड़कपन से लेकर बुढ़ापे तक देखता आया हूं परन्तु न तो धर्मी को कभी त्यागा हुआ और न उसके वंश को टुकड़े मांगते देखा है।”
परमेश्वर पर, उसके वचन पर भरोसा करें, हम कभी हानि के भय से न डरेंगे।

2. दर्द और दु:खों का भय :- मैं स्वयं मिशन के कार्यों से बहुत यात्रा करता हूं। जब दुर्घटनाएं देखता हूं, तो कुछ घबराहट भी होती है। घर से बाहर निकलता हूं, तो पत्नी कहती है, संभलकर जाना। मेरे पिता कहते थे, बेटा कार धीरे ड्राइव करना। हमें हमेशा ही इन शारीरिक दु:खों, दुर्घटनाओं का भय बना रहता है, परन्तु न सिर्फ़ शारीरिक बल्कि मानसिक दुख भी होते हैं। अपने लोगों की बातों से मिला दर्द, मित्रों के छल से, अपनों के विश्वासघात से मानसिक दुख होता है। मानसिक अशान्ति के कारण मानसिक दुख होता है। परन्तु परमेश्वर हमारे जीवन के दुख दर्द को लेकर उन्हें आशीष बना देता है। जीवन की नकारात्मक परिस्थितियों को लेकर उन्हें हमारे जीवन का सहारा और आशीष बना देता है। काफी वर्ष पहले की घटना है, सागर में चर्च में प्रचार के दौरान मुझे एक व्यक्ति मिला जिसके हाथ पैर कटे थे परन्तु उसका विश्वास प्रभु में दृढ़ था। और परमेश्वर के लिए उसकी गवाही, उसके कटे हाथ पैरों की ख़ामोश गवाही, से न जाने कितने जीवन प्रभु यीशु मसीह के पास आए। मैंने स्वयं अपने जीवन में अनुभव किया है कि जब परिवार में दुख-दर्द आते हैं तो परिवार की एकता और मज़बूत हो जाती है।
पौलुस को एक अज्ञात बीमारी थी, उसके शरीर में एक कांटा चुभाया गया और उसने इसे दूर करने के लिए प्रभु से विनती की, तो 2 कुरिन्थियों 12:9 में वह लिखता है; “और उसने मुझसे कहा, मेरा अनुग्रह तेरे लिए बहुत है।”
इस शारीरिक दुख-दर्द, भय से मुक्त करने के लिए परमेश्वर का मात्र अनुग्रह ही काफी है।

3. असफलताओं का भय :- हम जीवन में आगे बढ़ना चाहते हैं, सफल होना चाहते हैं। अपने क्षेत्र में उच्चतम शिखर पर चढ़कर आसमान छूना चाहते हैं लेकिन हमें असफलताओं का सामना करना पड़ता है और हम उनसे भयभीत रहते हैं लेकिन ये असफलताएं हमारे जीवनों में तब आती हैं, जब हम परमेश्वर की इच्छानुसार नहीं चलते।
इब्रानियों के 11 वें अध्याय में ऐसे महान लोगों का वर्णन है, जो परमेश्वर पर विश्वास रखते थे और इसी अध्याय में उनकी सफलताओं की कथाएं भी हैं। वे सफल हुए तो मात्र इस कारण कि वे परमेश्वर की इच्छानुसार चले और जिये।
यहोशू 1:1 से 9 पद हमें सफलता के तीन सूत्र बताता है, इस संदर्भ को देखें, जहां लिखा है;
“यहोवा के दास मूसा की मृत्यु के बाद यहोवा ने उसके सेवक यहोशू से जो नून का पुत्र था कहा, मेरा दास मूसा मर गया है; सो अब तू उठ, कमर बान्ध, और इस सारी प्रजा समेत यरदन पार होकर उस देश को जा जिसे मैं उनको अर्थात् इस्राएलियों को देता हूं। उस वचन के अनुसार जो मैंने मूसा से कहा, अर्थात् जिस जिस स्थान पर तुम पांव धरोगे, वह सब मैं तुम्हें दे देता हूं। जंगल और उस लबानोन से लेकर परात महानद तक, और सूर्यास्त की ओर महासमुद्र तक हित्तियों का सारा देश तुम्हारा भाग ठहरेगा। तेरे जीवन भर कोई तेरे साम्हने ठहर न सकेगा; जैसे मैं मूसा के संग रहा वैसे ही तेरे संग भी रहूंगा; और न तो मैं तुझे धोखा दूंगा, और न तुझ को छोड़ूंगा। इसलिये हियाव बान्धकर दृढ़ हो जा; क्योंकि जिस देश के देने की शपथ मैं ने इन लोगों के पूर्वजों से खाई थी, उसका अधिकारी तू इन्हें करेगा। इतना हो कि तू हियाव बान्धकर और बहुत दृढ़ होकर जो व्यवस्था मेरे दास मूसा ने तुझे दी है उन सब के अनुसार करने में चौकसी करना; और उस से न तो दहिने मुड़ना और न बाएं, तब जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा काम सुफल होगा। व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए। इसी में दिन रात ध्यान दिए रहना, इसलिये कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सुफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा। क्या मैं ने तुझे आज्ञा नहीं दी? हियाव बान्धकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा।”
सफलता के ये सूत्र हैं;
- हियाव से आगे बढ़।
- परमेश्वर पर विश्वास कर। - वचन के मार्गदर्शन में चल या परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार चल।

4. मृत्यु का भय :- सारी चिन्ताओं, सब प्रकार के भय में सबसे बड़ा भय,मृत्यु का भय है। व्यक्ति चाहे कितना भी आत्मिक क्यों न हो, अक्सर वह भी मृत्यु के भय से कांप उठता है।
1 कुरिन्थियों 15:26 हमें बताता है कि “ मृत्यु हमारा अंतिम बैरी है।”
लोगों को अपनी मृत्यु का भय होता है कि अगर मेरी मृत्यु हो गई तो मेरे परिवार, पत्नी और बच्चों का क्या होगा? यही सोचकर वे अधिक से अधिक धन कमाने, व्यापार जमाने की चेष्टा करते हैं ताकि अपने परिवार को सुरक्षित कर सकें। कुछ लोगों को अपने प्रियों, अपने मित्रों की मृत्यु का भय होता है क्योंकि उनसे अलगाव, विछोह की मात्र कल्पना से ही वे सिहर उठते हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार मनुष्य औसतन हर दस मिनट में एक बार मृत्यु के बारे में सोचता है। परन्तु प्रभु यीशु में मौत का उत्तर है,वह कहता है “ इसलिए कि मैं जीवित हूं, तुम भी जीवित रहोगे।” (यूहन्ना 14:19)
प्रभु यीशु ने मृत्यु को परास्त किया। एक युद्ध था, एक संघर्ष था परन्तु प्रभु यीशु ने मृत्यु को पराजित कर हमारे लिए अनन्त जीवन का मार्ग खोल दिया।इसीलिए पौलुस कहता है कि “ मेरे जीना मसीह है और मर जाना लाभ है।” वह मृत्यु की हंसी उड़ाते हुए कहता है कि “ हे मृत्यु तेरी जय कहां, तेरा डंक कहां?” और यह इस कारण क्योंकि हमारा परमेश्वर विश्वासयोग्य है, वह हमें हर प्रकार के भय से मुक्त कराने वाला प्रभु है।
निष्कर्ष :- सो, यदि आज आपके जीवन में कुछ भय हैं, जो आप को डरा रहे हैं तो परमेश्वर की ओर देखें :
- आज यदि हृदय में किसी हानि का भय है, तो उसके वचन पर भरोसा करें।
- यदि जीवन में दर्द और दुखों का भय है, तो याद रखें परमेश्वर का अनुग्रह हमारे लिए पर्याप्त है।
- यदि असफलताओं के भय से बचना चाहते हैं, तो परमेश्वर की इच्छानुसार जियें।
- मृत्यु का भय कदापि न करें क्योंकि हमारा प्रभु मृत्यु पर जयवंत हुआ है।
मेरी प्रार्थना है कि यह नया वर्ष आपके लिए आनन्द से पूर्ण हो। निर्भयता से भरा हो। परमेश्वर का उजाला, उसकी दया, उसका अनुग्रह आप सब पर बना रहे।