सन्दर्भ : इफिसियों 3:20,21; यहूदा 1:24,25 परिचय :- एक चर्चित पुस्तक है जिसका नाम है “यॉर गॉड इज़ टू स्मॉल”। अर्थात् “तुम्हारा परमेश्वर बहुत छोटा है”। इस पुस्तक के लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार से हम परमेश्वर की सामर्थ्य को सीमित कर देते हैं, हम परमेश्वर को छोटा बना देते हैं। जब कठिन परिस्थितियां, लाइलाज बीमारियां, असम्भव से लगने वाले लक्ष्य सामने आते हैं तो हम कहने लगते हैं कि परमेश्वर अब कुछ नहीं कर सकता, वह यह बात पूरी नहीं कर सकता। अपनी प्रार्थनाओं में भी हम छोटी-छोटी चीज़ें मांगते हैं। बड़ी चीज़ों, बड़ी बातों को मांगते ही नहीं क्योंकि समझते हैं कि ये बातें पूरी होना तो असम्भव है। परन्तु परमेश्वर के द्वारा सब कुछ सम्भव है क्योंकि वह सर्वसामर्थी, सर्वशक्तिमान, असीमित, आदि और अन्त, अल्फा और ओमेगा है। उसने जब सृष्टि की सृजना की तो कहा “यह हो जाए” और वैसा हो गया। सिर्फ़ उसके कहने भर से सारी सृष्टि की रचना हो गई। उसकी वाणी में ऐसी सामर्थ्य है कि गरजता-उफनता समुद्र शान्त हो जाता है, आंधी थम जाती है, मृत्यु वापस लौट जाती है। पुराने नियम में दूसरा राजा के उन्नीसवें अध्याय में एक घटना का वर्णन पाया जाता है। जब अश्शूर के राजा सन्हेरीब ने अपनी सेना के साथ यहूदा के राजा हिजकिय्याह पर आक्रमण कर दिया और उसके पास ख़बर भेजी, उसका उपहास करते हुए परमेश्वर की सामर्थ्य को ललकारा। तब हिजकिय्याह मन्दिर में गया और यहोवा से प्रार्थना की और तब लिखा है; “उसी रात में क्या हुआ, कि यहोवा के दूत ने निकलकर अश्शूरियों की छावनी में एक लाख पचासी हजार पुरुषों को मारा, और भोर को जब लोग सबेरे उठे, तब देखा, कि लोथ ही लोथ पड़ी है। तब अश्शूर का राजा सन्हेरीब चल दिया, और लौटकर नीनवे में रहने लगा।”(2 राजा 19:35,36) एक लाख पचासी हज़ार अश्शूरियों को यहोवा परमेश्वर की सामर्थ्य ने समाप्त कर दिया। आज विज्ञान की उन्नति के इस युग में वैज्ञानिक कहते हैं कि परमाणु बम सबसे ज़्यादा शक्तिशाली है। अमेरिका की पत्रिका टाइम में छपे एक विवरण के अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति के पीछे एक व्यक्ति सदैव एक डिस्क लेकर चलता है। जिसमें एक नम्बर है, एक कोड दिया हुआ है और इस डिस्क में इस कोड के फोन के समान डायल करने पर समस्त विश्व मात्र कुछ सेकेण्ड में ध्वस्त हो सकता है, समाप्त हो सकता है। परन्तु ईश्वर सर्वसामर्थी है; वह शक्तिशाली है हर बम से, हर डिस्क से, हर वैज्ञानिक उपकरण से। वह चाहे तो लाल समुद्र दो भागों में बंट सकता है, वह चाहे तो ध्वस्त सृष्टि पुन: निर्मित हो सकती है। परमेश्वर की सामर्थ्य सृष्टि के आरम्भ से कार्यरत है और आज भी काम कर रही है और वचन के आधार पर देखें कि उसकी सामर्थ्य आज हमारे जीवनों में कैसे कार्य करती है। 1. उसकी सामर्थ्य हमें पाप से छुटकारा दिलाती है :- पौलुस प्रेरित ने लिखा; “यीशु पापियों को बचाने को आया, जिनमें मैं सबसे बड़ा पापी हूं।”(1 तीमुथियुस 1:15) पौलुस के विषय में हम जानते हैं कि वह एक ऐसा व्यक्ति था जिसने मसीहियों और मसीहियत से इस हद तक घृणा की कि वह उनको नष्ट करने वाला बन गया। परन्तु जब वह प्रभु यीशु के सम्पर्क में आया तो उसका जीवन सम्पूर्णता से बदल गया। यूहन्ना अपनी पत्री में लिखता है; “उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है।” (1 यूहन्ना 1:7) यीशु के द्वारा परमेश्वर की सामर्थ्य हमारे पापों से हमें छुटकारा दिलाती है। जब हम यीशु को ग्रहण करते हैं, बपतिस्मा लेते हैं, उसे अपना मुक्तिदाता स्वीकार करते हैं तो हम उसके लोहू के द्वारा मोल लिये जाते हैं, शुद्ध किये जाते हैं और हमारे पाप हमसे उतनी ही दूर हो जाते हैं जैसे पूरब से पश्चिम की दूरी हो। परमेश्वर की सामर्थ्य हमें पाप से छुटकारा दिलाती है। 2. परमेश्वर की सामर्थ्य जीवनों को परिवर्तित करती है :- परमेश्वर की सामर्थ्य न केवल हमें पापों से छुटकारा दिलाती है वरन् यह हमारे जीवनों को भी सम्पूर्ण रूप से परिवर्तित करती है। यह पत्थर के हृदय के बदले मांस और लोहू का हृदय देती है। वचन में लिखा है “परमेश्वर का वचन हमारे गांठ-गांठ, गूदे-गूदे को छेदता है।” जीवन में अनेक ऐसे अवसर आते हैं जब हम स्वयं कुछ कर पाने में असमर्थ हो जाते हैं। स्वयं पर हमारा नियंत्रण नहीं रहता, कुछ कर पाने में हम खुद को बेबस महसूस करते हैं। ऐसे समय में यदि हम परमेश्वर को अवसर दें तो उसकी सामर्थ्य से परिस्थितियां बदल जाती हैं। दु:ख सुख में बदल जाता है, विलाप हर्ष में परिवर्तित हो जाता है। जीवन में ऐसा परिवर्तन आता है कि पतरस परमेश्वर की सामर्थ्य से पानी पर चलने लगता है, अड़तीस वर्ष का अपंग हर्ष से उछलने-कूदने लगता है। परमेश्वर की सामर्थ्य से जब जीवन में परिवर्तन आता है तो हमारी मानसिकता परिवर्तित हो जाती है, जीवन को देखने का नज़रिया बदल जाता है। इस बात का अनुभव हो जाता है कि जो कुछ इस जीवन में है वह तो क्षणिक है, कुछ समय का है। इसीलिए पतरस लिखता है; “हे प्रियो, जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिए तुम में भड़की है, इससे यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है।” (1 पतरस 4:12) 3. परमेश्वर की सामर्थ्य गिरने से बचाती है :- हम इस संसार में रहते हैं, जहां पर अनेकों आकर्षण, परीक्षाएं, लोभ और स्वार्थ हैं। एक मानव होने के नाते इनका सामना करते हुए या इनसे गुज़रते हुए हम गिर सकते हैं, टूट सकते हैं। हम सोचने लगते हैं कि हम यह नहीं कर सकते, हम इसे नहीं सह सकते। हम इस कठिनाई, मौत की छाया के रास्ते पर नहीं चल सकते; परन्तु यदि हम विश्वास में दृढ़ रहें तो परमेश्वर की सामर्थ्य हमें गिरने और टूटने से बचाती है। प्रकाशित वाक्य के तीसरे अध्याय में फिलादेल्फिया की कलीसिया के नाम परमेश्वर का वचन कहता है। “तूने मेरे धीरज के वचन को थामा है, इसलिये मैं भी तुझे परीक्षा के उस समय बचा रखूंगा, जो पृथ्वी पर रहने वालों के परखने के लिये सारे संसार पर आने वाला है।”(3:10) 4. परमेश्वर की सामर्थ्य हमें उसकी सेवा योग्य बनाती है :- कुरिन्थियों की कलीसिया के नाम अपनी पत्री में पौलुस लिखता है; “परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञानवानों को लज्जित करें और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करें और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्छों को, वरन् जो हैं भी नहीं उन को भी चुन लिया कि उन्हें जो हैं व्यर्थ ठहराए। ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के साम्हने घमण्ड न करने पाए।”(1 कुरिन्थियों 1:27-29) हम मनुष्य तो कुछ भी नहीं हैं परन्तु जब परमेश्वर हमें अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए चुनता है तो उसकी सामर्थ्य हमें उसकी सेवा के योग्य बनाती है। हम पाते हैं कि मूसा, जो कि हकलाता था, बोलने में भद्दा था, परमेश्वर की सामर्थ्य से लाखों इस्राएलियों को मिस्र की बंधुवाई से निकाल लाने वाला महान अगुवा बना। भेड़-बकरियां चराने वाला बालक परमेश्वर की सामर्थ्य से राजा दाऊद बना। मछली पकड़ने वाले साधारण, अनपढ़ मछुवारे महान प्रचारक बन गए। इसी कारण पौलुस यह लिखता है; “परन्तु हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों में रखा है कि यह असीम सामर्थ्य हमारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे। हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते, निरुपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते, गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते। हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं, कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो”(2 कुरिन्थियों 4:7-10) पौलुस को इस बात का गहराई से अहसास था कि परमेश्वर की सामर्थ्य ही हमें उसकी सेवा के योग्य बनाती है और इसीलिए उसने ये बातें लिखीं। 5. परमेश्वर समर्थ है कि वह अपने वायदों को पूरा करे :- कभी अपने जीवन में हमें ऐसा लगता है कि यह बात होना तो असम्भव है, परन्तु यदि हमारा विश्वास परमेश्वर पर है तो हमें यह स्मरण रखना है कि वह इतना समर्थ है कि अपने वायदों को पूरा कर सके। हम पाते हैं कि इब्राहीम से परमेश्वर ने वाचा बांधी थी कि मैं तेरा वंश बालू के किनकों के समान बहुत अधिक बढ़ाऊंगा। परन्तु इब्राहीम और सारा दोनों वृद्ध थे और सारा बांझ भी थी। चालीस वर्ष की लंबी खामोशी के बाद परमेश्वर ने अपना वायदा पूर्ण किया और सारा से इसहाक उत्पन्न हुआ। इब्राहीम से परमेश्वर की वाचा थी कि उसका वंश इस्राएल प्रतिज्ञा किये हुए कनान देश में पहुंचेगा और परमेश्वर का यह वायदा तब पूर्ण हुआ जब सैकड़ों वर्षों बाद इस्राएली मूसा की अगुवाई में मिस्र की बंधुवाई से निकल कर प्रतिज्ञा किये हुए देश पहुंच सके। परमेश्वर ने अपने लोगों के लिए यह कहा कि समस्त मानव जाति को पाप के बंधनों से आज़ाद करवाने, अनन्त जीवन दिलाने के लिए वह एक उद्धारकर्त्ता भेजेगा। सैकड़ों वर्षों बाद परमेश्वर का वह वायदा उसके एकलौते पुत्र यीशु में पूर्ण हुआ। हमारा परमेश्वर इतना सामर्थी है कि अपने वायदों को वह पूरा कर सकता है परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि हम उसके ऊपर विश्वास करें और उसके वायदों पर भरोसा रखें। 6. परमेश्वर की सामर्थ्य हमें मृत्यु पर जयवन्त करती है :- प्रभु यीशु ने कहा; “मेरे भेजने वाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उस में से मैं कुछ न खोऊं परन्तु उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊं। क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है कि जो कोई पुत्र को देखे और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए, और मैं उसे अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊंगा।”(यूहन्ना 6:39,40) परमेश्वर इतना समर्थ है कि वह मृत्यु पर हमें जय दिलाता है, उसके पुत्र यीशु में होकर मृत्यु भी अनन्त जीवन का द्वार बन जाती है। उसकी उपस्थिति में हर परिस्थिति बदल जाती है। लाजर की मृत्यु का शोक उसके पुन: जी उठने के हर्ष में बदल जाता है। नाइन नगर की विधवा के पुत्र की शव यात्रा विजय जुलूस में बदल जाती है; नकारात्मक परिस्थितियां सकारात्मक हो जाती हैं। एक कर्नल था जो कि मसीही था परन्तु उसका पुत्र मसीही नहीं था। उस पुत्र को मृत्यु से बहुत डर लगता था। जब कर्नल मरने पर था तो उसने इच्छा प्रकट की कि उसे उसके पुत्र के पास भेज दिया जाए ताकि वह पुत्र अपने पिता की मृत्यु की गवाही देख सके, वह देख सके कि एक मसीही की मौत कितनी सुखद और शांतिप्रद होती है। परमेश्वर की सामर्थ्य एक मसीही विश्वासी को मृत्यु पर जयवन्त बनाती है। क्रूस पर प्रभु यीशु की मौत में भी गवाही थी, जिसे देखकर सूबेदार ने कहा “यह सचमुच परमेश्वर का पुत्र था।” यीशु की मृत्यु की गवाही से सामर्थ्य पाकर ही पौलुस लिख सका “मेरे लिये जीना मसीह और मर जाना लाभ है।” निष्कर्ष :- परमेश्वर की यह सामर्थ्य आज भी उपलब्ध है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उस पर विश्वास करें और अपना जीवन उसे सौंप दें और अपनी सामर्थ्य से वह; --- हमें पापों से छुटकारा देगा। --- हमारा जीवन परिवर्तित करेगा। --- हमें गिरने से बचाएगा। --- हमें अपनी सेवा के योग्य बनाएगा। --- हमारे जीवनों से अपनी प्रतिज्ञाएं पूर्ण करेगा। --- और सबसे प्रमुख और अन्तिम बात कि परमेश्वर अपनी सामर्थ्य से हमें मृत्यु पर जयवन्त करेगा।