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गर्भपात, एक भयानक पाप है

सन्दर्भ : भजन संहिता 139:13,14

परिचय :- गर्भपात, यह शब्द आज मानव समाज के लिए कोई नया या अपरिचित शब्द नहीं है। सभी व्यक्ति इससे परिचित हैं, अलग-अलग विधाओं में इसे संदर्भित किया गया है। धर्मशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, नैतिक शास्त्र, तर्कशास्त्र, विधि विज्ञान, समाज शास्त्र इत्यादि अध्ययन की शाखाओं में गर्भपात की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की गई है। सैद्धान्तिक रूप से इसकी व्याख्याएं जितनी मज़बूत और स्पष्ट हैं, व्यवहारिक रूप में ये उतना ही जटिल और उलझन- पूर्ण शब्द है; क्योंकि ये जुड़ा है व्यक्ति के जीवन, मृत्यु, उसके दर्द, हृदय की भावनाओं, और मानव की एक शारीरिक आवश्यकता काम जैसे विषय से।
वर्तमान संदर्भ में यह विषय बहुत प्रमुख है, एक सच्चा मसीही इसे हल्के रूप में नहीं ले सकता, इसकी अवहेलना नहीं कर सकता। इसके प्रति समझौते का रूख अपनाते हुए परमेश्वर के न्याय से बच नहीं सकता।
हमारा देश जो कि एक पुरुष-प्रधान देश है, जहां परिवार में पुत्र को प्रमुखता दी जाती है; वहां गर्भपात को कानूनी रूप से मान्यता दी गई है। और तो और अब तो भ्रूण-परीक्षण के द्वारा काफी पहले ही पता लगा लिया जाता है कि गर्भ में पलने वाला बच्चा लड़का है अथवा लड़की। मगर इसके बावजूद न सिर्फ़ भारत में अपितु सारे संसार में; यहां तक कि आधुनिकता की दौड़ में सबसे आगे कहे जाने वाले देशों में भी यह विषय चर्चा का केन्द्र बना हुआ है।
अपने इस सन्देश में मैं आपके सामने चन्द महत्वपूर्ण तथ्य रखना चाहूंगा जिससे आप समझ सकें कि आज गर्भपात कितनी आसानी से, अधिकता से हो रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 40% बच्चों की हत्या गर्भपात के नाम पर की जाती है। इंग्लैंड में 25% बच्चे गर्भपात के द्वारा समाप्त कर दिये जाते हैं, चीन में जन्म लेने वाली 60% लड़कियों को पैदा होते ही या पैदा होने के साथ मार डाला जाता है। अमेरिका में प्रतिदिन 4,500 गर्भपात होते हैं।
गर्भ, जो बालक के लिए सबसे सुरक्षित स्थान है, परमेश्वर की योजना के अनुसार सबसे सुरक्षित, सुविधापूर्ण स्थान है, आज संसार में सबसे अधिक असुरक्षित बन गया है, जहां सबसे ज़्यादा हत्याएं होती हैं।
आज एक निर्दोष बच्चे की हत्या करना सबसे अधिक आसान हो गया है। एक डाकू, बलात्कारी और हत्यारे को भी मृत्युदण्ड प्राप्त होने के पूर्व अपना पक्ष न्यायाधीश के सामने रखने का अधिकार दिया जाता है, अपने जीवन को बचाने की याचना के मौके दिये जाते हैं परन्तु एक मासूम बालक की स्थिति आज उससे भी बदतर हो गई है।
औसतन हर 20 सेकेण्ड में पूरे संसार में एक गर्भपात हो जाता है। एक घंटे में 180 बच्चों की हत्या कर दी जाती है। डेढ़ घंटे की संक्षिप्त चर्च आराधना के दौरान 270 बच्चों की हत्या हो चुकती है। जितनी देर में आप ये सन्देश सुनेंगे उतने समय में अनुमानत: 90 बच्चे गर्भ में ही समाप्त कर दिये जा चुके होंगे।
इस विषय में और अधिक स्पष्टता से समझने के लिये हमें ये भी देखना पड़ेगा कि आज सारे संसार में गर्भपात के संदर्भ में लोगों की क्या प्रतिक्रियाएं, हैं; उनके क्या मत हैं :-

1. गर्भपात के सम्बन्ध में पहला मत यह है कि गर्भपात करवाना ग़लत नहीं है। :-
पहली बात- इस मत के मानने वालों के अनुसार गर्भ के भ्रूण से अधिक व्यक्ति की स्वयं की परिस्थिति अधिक प्रमुख होती है।
दूसरी बात- कि माता को अधिकार होना चाहिए कि वह जो निर्णय करे उसे उचित माना जाये, चाहे वह गर्भपात की स्वीकृति क्यों न हो। परिस्थितियों के अनुसार, माता की इच्छा के अनुसार, गर्भपात को उचित माना जा सकता है। इस मत को मानने वाले तर्क ये देते हैं कि गर्भपात उचित है क्योंकि;
घर में वैसे ही बहुत बच्चे हैं।
अनचाहे बच्चे के जन्म से समस्याएं बढ़ेंगी।
परिवार की आय कम है।
कार्य नया-नया शुरू किया है, बच्चे का जन्म होने पर उसे छोड़ना पड़ेगा।
माता की शिक्षा जारी है, वह कैसे दोनों ज़िम्मेदारियों को वहन कर सकेगी।
पति मारपीट करने वाला है, शराब पीकर बच्चों को मारता है। नये जन्मे
बच्चे को भी उसी यंत्रणा से गुज़रना पड़ेगा।
यदि इन तर्कों को देखें तो लगता है कि माता का निर्णय, परिस्थितियां प्रमुख हैं और गर्भपात उचित है। परन्तु इस मत को मानने वाले वे लोग हैं जो मसीही नहीं। जो न ईश्वर पर विश्वास करते हैं न ही उन्हें उसके न्याय का भय है और न प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास। बहुत दुखद परिस्थिति है यह। परन्तु इससे भी अधिक दुखद और त्रासदीपूर्ण बात ये है कि कुछ लोग जो अपने को मसीही कहते हैं वे भी गर्भपात को मान्यता देते हैं।

2. दूसरा मत गर्भपात के प्रति असहमति का है :- गर्भपात का विरोध करने वाले वे लोग हैं जो यह विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने मनुष्य को अपनी समानता में बनाया है। ईश्वर के वचनों पर चलने वाले, प्रभु यीशु मसीह के पीछे चलने वाले ये वे लोग हैं जो परिस्थितियों से बढ़कर ईश्वर के वचन को मानते हैं और जो परिस्थितियों के दबाव में समझौता नहीं करते। वे यह मानते हैं कि जैसे ही शुक्राणु गर्भ में प्रविष्ट होता है उसमें जीवन आ जाता है, ईश्वर की श्वास आ जाती है।
गर्भपात के सम्बन्ध में हम पवित्र वचन से संबंधित कुछ तथ्यों को देखें। ताकि हम जान सकें कि गर्भ में बच्चे की स्थिति क्या होती है और बाइबिल के वचनों के आधार पर ही हम ये जानने का प्रयास करेंगे कि वास्तव में गर्भपात करवाना परमेश्वर की दृष्टि में अनुचित क्यों है? भजन संहिता और अय्यूब की पुस्तक के आधार पर हम कुछ बातें देखें।
1. प्रत्येक मनुष्य की रचना परमेश्वर द्वारा की गई है :- दाऊद लिखता है; “मेरे मन का स्वामी तो तू है; तूने मुझे माता के गर्भ में रचा। मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अदभुत रीति से रचा गया हूं। तेरे काम तो आश्चर्य के हैं, और मैं इसे भली-भांति जानता हूं।” (भजन संहिता 139:13-14)
इन पदों में “रचना” शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका इब्रानी और ग्रीक भाषा में अर्थ होता है, “बनाया जाना” (जैसे कुम्हार या कलाकार कुछ बनाता है) और “बुना जाना” (जैसे बुनकर दरी अथवा अन्य कोई चीज़ बुनता है)। 14वें पद में दाऊद लिखता है कि उसे परमेश्वर ने अद्भुत, भयानक आश्चर्यपूर्ण रीति से रचा।
2. मनुष्य के रचे जाने की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है :- दाऊद एक युवा पुरुष था, वह अतीत की ओर देखकर कहता है “तूने मुझे माता के गर्भ में रचा” (13वां पद) दाऊद कहता है तूने मुझे रचा, और यह प्रक्रिया निरंतर बनी हुई है क्योंकि इस अध्याय के तीसरे चौथे पद में वह कहता है “तू मेरे चाल-चलन को जानता है” (यह वाक्य उसके वर्तमान को इंगित करता है)। इसी अध्याय के 10वें पद में वो कहता है “अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा” (यह वाक्य उसके भविष्य काल को इंगित करता है)। इस प्रकार दाऊद अपनी रचना (प्रत्येक मनुष्य के रचे जाने को) तीनों अवस्थाओं में एक निरंतरता के साथ पाता है। और यह निरंतरता अपनी माता के गर्भ में उसके आने के साथ प्रारम्भ हो गई थी। न सिर्फ़ प्रत्येक मनुष्य की रचना परमेश्वर द्वारा की गई है, वरन् रचे जाने की ये प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।”
3. प्रत्येक व्यक्ति का परमेश्वर से व्यक्तिगत सम्बन्ध है :- परमेश्वर का व्यक्ति से जो सम्बन्ध है वह नितांत व्यक्तिगत है, जिसका उल्लेख दाऊद भजन संहिता के 139वें अध्याय के लगभग हर पद में करता है। इस सम्बन्ध के प्रकटीकरण के रूप में वह अपने भजन में मैं, मेरा, मेरी शब्दों का 46 बार एवं तू, तेरा, तेरी शब्दों का 32 बार प्रयोग करता है। मानव से परमेश्वर का यह व्यक्तिगत सम्बन्ध गर्भ में उसके भ्रूण रूप में विकसित होने के साथ ही प्रारम्भ हो जाता है। क्योंकि भ्रूण एक बढ़ता हुआ मानव जीवन है।
हम यह नहीं कह सकते कि भ्रूण मानव जीवन नहीं है क्योंकि यह बोल नहीं सकता, देख नहीं सकता, चल नहीं सकता, भावनाएं व्यक्त नहीं कर सकता अत: यह मानव नहीं है। यदि हम ऐसा मानकर चलें तो फिर हमें यह मानना पड़ेगा कि कोई भी छोटा बच्चा, अंधा, गूंगा, विकलांग, विक्षिप्त व्यक्ति भी मानव नहीं है।
भ्रूण तो पूर्ण मानव जीवन है। परमेश्वर द्वारा रचित है, परमेश्वर की समानता में है। भ्रूण के विकसित होने की प्रक्रिया गर्भ से बाहर आने के बाद पूर्ण जीवन में मृत्यु तक मानव रूप में चलती रहती है। इस तथ्य की बाइबिल के द्वारा भी पुष्टि होती है। नये नियम में लूका रचित सुसमाचार के प्रथम अध्याय के 39 से 44वें पदों में यह पुष्टिकरण हमें प्राप्त होता है जहां इस प्रकार वर्णन है कि बच्चा “पेट में उछल पड़ा।” अर्थात् उसमें मानवीय संवेदनाएं विद्यमान हैं।
यीशु मसीह का जीवन इस तथ्य की पुष्टि करता है, पवित्र आत्मा के द्वारा वह मरियम के गर्भ में आया, बालक से युवा हुआ, बढ़ता गया पर वह सदैव एक सा था।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि भ्रूण में भी मानवीय संवेदनाएं होती हैं। लिंग निर्धारित हो जाता है। स्वभाव तक नियत हो जाता है।
स्वीडिश फोटोग्राफर लेनर्ड नेल्सन ने इस तथ्य की पुष्टि में अपनी पुस्तक में भ्रूण की विभिन्न अवस्थाओं के चित्र लिये हैं जो कि यह बताते हैं कि भ्रूण भी एक मानव जीवन है क्योंकि;
--- 3 सप्ताह में बच्चे का दिल धड़कने लगता है।
--- 4 सप्ताह में 1/4 इंच आकार होते हुए भी सिर/धड़ दिखाई देने लगता है।
--- 6 सप्ताह में मस्तिष्क का कार्य करना शुरू हो जाता है।
--- 8 हफ्ते में उंगलियां और हथेली तक बन जाती है।
--- 10 से 12 हफ्ते में बच्चा हाथ हिला सकता है, अंगूठा मुंह तक लाकर चूस सकता है।
--- 13 हफ्ते में शरीर का हर भाग पूर्णत: स्पष्ट हो जाता है। यहां तक कि हाथ की लकीरें और फिंगर प्रिंट्स (उंगलियों के निशान) तक उभर आते हैं।
--- 3 माह में हिलना-डुलना, घबराना, अंधेरे, उजाले का अहसास करना, खुशी का अहसास होना शुरू कर देता है।
--- 4 माह में आंख स्पष्ट, भौंह, बाल उग आते हैं, रोने की क्षमता आ जाती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1959 में यह प्रस्ताव पारित किया कि संसार के हर भाग में बच्चे पैदा होने के पहले और बाद में पूरी तरह देखरेख और सुरक्षा की जावेगी।
निष्कर्ष :- बच्चा जो गर्भ में विकसित हो रहा है, जो अबोध है उसकी रक्षा होनी चाहिये। जो बोल नहीं सकता, चिल्ला नहीं सकता, जीवन की भीख नहीं मांग सकता, हत्या करने को आगे बढ़ते औज़ार और हाथों को रोक नहीं सकता, उसके जीवन की रक्षा की जाना उसका अधिकार होता है, उसका अधिकार होना चाहिए। अत: गर्भपात जान बूझकर किया गया योजनाबद्ध हत्या का कार्य है।
डॉ. रैमसे के अनुसार किन्हीं परिस्थितियों में गर्भपात को उचित माना जा सकता है और ये परिस्थिति केवल एक है, यदि माता के जीवन को खतरा है।
परन्तु माता के जीवन के खतरे की संभावना, मां बनने वाली छह हज़ार स्त्रियों में से अनुमानत: मात्र एक को ही होती है; यदि वह उचित आयु में गर्भ धारण करती है।
अत: गर्भ में बालक की हत्या मानव की हत्या के बराबर है। यदि हम कहें कि हमारे सामने आने वाली कठिनाई के कारण हमारा बच्चे की हत्या गर्भ में ही करना कानूनन जायज़ है, उचित है तो फिर हर एक समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति की हत्या करना भी जायज़ है, वैधानिक है। यदि इस तर्क को संसार में वैधानिक मान्यता दे दी जाये जिस आधार पर गर्भपात को वैधानिक मान्यता प्रदान की गई है तो फिर इस आधार पर सहारा लेकर हत्या करना ग़ैर कानूनी नहीं रह जायेगा। आप स्वयं सोच सकते हैं कि तब संसार का क्या हाल होगा? अत: यह दोहरा मापदण्ड क्यों?
अब प्रश्न यह उठता है कि हमें क्या करना है?
1. अपनी उस प्रतिक्रिया के प्रति हमें पश्चात्ताप करना है जिसके द्वारा हमने गर्भपात को बहुत आसानी से स्वीकार कर लिया है। यदि हमने अपने परिवार में ऐसा किया है या ऐसा होने दिया है।
2. सरकार से बाइबिल के आधार पर निवेदन करना चाहिये कि भारत में गर्भपात को ग़ैर कानूनी करार दिया जाये। हमें गर्भपात को कानूनी मान्यता प्रदान करने वाली इस व्यवस्था के प्रति विरोध प्रगट करना चाहिए जो कि परमेश्वर की व्यवस्था का खुला विरोध कर रही है। हम सोचें कि हम जो उसके लोग हैं, उसकी प्रजा हैं, क्या कर रहे हैं?
3. यीशु मसीह की वास्तविकता को हमें खुद जानना है, दूसरों को बताना है। मनुष्यों को यह बताना है कि परमेश्वर की दृष्टि में मानव का क्या मूल्य है कि उसने हमें बचाने के लिये अपने पुत्र को इस संसार में भेजा, बलिदान कर दिया। और हम तो मानव तभी निर्धारित हो जाते हैं जब हम अपनी माता के गर्भ में आ जाते हैं।
परमेश्वर ने मुझे और आपको माता के गर्भ में रचा, अपने आत्मा का श्वास हमारे जीवन में फूंका। हमें गर्भ से ही बढ़ाया, इस संसार में लाया और इतना प्रेम किया कि हमारे लिये अपने पुत्र को बलिदान कर दिया। तो हम क्यों और किस अधिकार से परमेश्वर की इस महानतम, अपूर्व रचना को गर्भ में ही समाप्त करते चले आ रहे हैं?