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मार्ग मैं हूं

संदर्भ : यूहन्ना 14:1-7

परिचय :- एक बार एक अन्धा मनुष्य जंगल में घूमते-घूमते एक गुफा में भटक गया। उस गुफा का सम्बन्ध किसी पुराने महल के तलघर से था। वह अन्धा व्यक्ति रास्ता ढूंढ़ते ढूंढ़ते उस पुराने किले के तलघर तक पहुंच गया। पहुंच कर उसने सोचा कि उसे रास्ता मिल गया; परन्तु अब तक वह एक ऐसी भूलभुलैया में फंस चुका था कि उसका वहां से निकलना असम्भव था क्योंकि उस तलघर में रास्ते तो अनेकों थे पर केवल एक ही ऐसा रास्ता था जो बाहर की ओर जाता था। बाकी सब रास्ते तो चौड़े थे मगर बाहर निकलने वाला सही रास्ता बहुत संकरा था। उस अन्धे मनुष्य ने सारे चौड़े रास्तों से बाहर निकलने की कोशिश की परन्तु हर बार उसने उस संकरे मार्ग की ओर ध्यान नहीं दिया और अन्त में वह उसी तलघर में फंस कर मर गया।
आज यदि हम देखें तो इस संसार की स्थिति उस तलघर के समान ही है और हम मनुष्यों की हालत भी उस अन्धे मनुष्य के जैसी ही है। आज संसार को देखें तो पाते हैं कि हर तरफ लोगों की दौड़ लगी है। हर कोई किसी दिशा की तरफ बढ़ने का प्रयास कर रहा है। हर कोई किसी मंज़िल की ओर जा रहा है परन्तु ऐसा लगता है कि जैसे ये राहें हमें और भटका रही हैं। हमें किसी ऐसे तलघर की ओर ले जा रही हैं, जहां भूल-भुलैया में फंसने के अलावा और कुछ नहीं है। जहां एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें कोई राह मिलना सम्भव नहीं है। इस तलघर के समान संसार में ऐसे मार्ग हैं जहां चाहे जितना भी चलें मगर जिनकी कोई मंज़िल नहीं है।
सभी लोग जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास तो करते हैं मगर मंज़िल नहीं आती। चिलचिलाती हुई धूप में दूर कहीं पानी दिखाई तो पड़ता है पर वहां पहुँच कर सिर्फ़ रेत ही प्राप्त होती है। मृगतृष्णा के इस भ्रम में मनुष्य अक्सर अतृप्त, असन्तुष्ट और प्यासे ही रह जाते हैं।
आज संसार में कहीं प्रतिष्ठा हासिल करने की दौड़ है तो कहीं पद पाने की, तो कहीं दूसरों को गिरा कर आगे बढ़ जाने की। कहीं कोई स्वार्थवश ग़लत तरीके से धन कमाने की दौड़ में शामिल है। परन्तु यदि वास्तविकता देखें तो इस दौड़ में अन्याय, पराजय, भटकाव, असन्तोष और आत्मग्लानि के सिवा और कुछ हासिल नहीं होता। उलझनें और अधिक बढ़ जाती हैं।
जीवन में हम बहुत से मार्ग बदलना चाहते हैं, नये मार्गों पर चलना चाहते हैं परन्तु सत्य तो यह है कि मानव द्वारा बनाये गये इन सांसारिक मार्गों की न कोई मंज़िल है, न इनमें कोई आशा है और न ही कोई आनन्द और संतृप्ति है। खुद के बनाये इन मार्गों पर चल कर अन्त में मनुष्य ख़ाली हाथ ही रह जाता है।
बाइबिल के यूहन्ना रचित सुसमाचार के 14 वें अध्याय के छठवें पद में प्रभु यीशु कहते हैं “मार्ग, सत्य और जीवन मैं ही हूं।” प्रश्न उठता है कि प्रभु कैसे मार्ग की बात कर रहे हैं। वह मार्ग कौन सा है और कौन हैं वे लोग जो उस मार्ग पर चलते हैं? हम इस पर विचार करें।

1. सबसे पहले हम उन लोगों को देखें जिन्होंने इस मार्ग पर चलना स्वीकार किया :-
(1) एक महसूल लेने वाला व्यक्ति था, जिसका नाम मत्ती था; वह बहुत धनवान व्यक्ति था, समाज में उसका एक प्रमुख स्थान था। इस घटना का वर्णन हम मत्ती रचित सुसमाचार में पाते हैं, जहां लिखा है;
“वहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठकर उसके पीछे हो लिया और जब वह घर में भोजन करने के लिए बैठा तो बहुतेरे महसूल लेनेवाले और पापी आकर यीशु और उसके चेलों के साथ खाने बैठे। यह देखकर फरीसियों ने उसके चेलों से कहा; तुम्हारा गुरु महसूल लेनेवालों और पापियों के साथ क्यों खाता है? उस ने यह सुनकर उन से कहा, वैद्य भले चंगों को नहीं परन्तु बीमारों को अवश्य है। सो तुम जाकर इस का अर्थ सीख लो, कि मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूं; क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को बुलाने आया हूं।” (मत्ती 9:9-13)
प्रभु यीशु ने मत्ती से कहा, मेरे पीछे हो ले और वह सब कुछ छोड़कर प्रभु के पीछे चल दिया। मत्ती अपनी प्रतिष्ठा, धन-सम्पत्ति के मार्ग पर चला जा रहा था। परन्तु जब उसने प्रभु को देखा, उसकी शिक्षाओं को सुना और उसके मार्ग को पहचाना तो उसे यह अहसास हो गया कि प्रभु का यह मार्ग है जो प्रतिष्ठा के मार्ग से बहुत बढ़कर है। यह इस संसार में ही समाप्त नहीं हो जाता। यह वह मार्ग है जो मृत्यु के भी पार एक अनन्त जीवन की ओर ले जाता है और इस मार्ग पर चलने के लिए मत्ती ने बाकी सारे मार्गों को छोड़ दिया।
(2) कुछ मछुवारे थे, जो अपने व्यापार में लगे रहते थे। नाव में चढ़कर मछलियां पकड़ते और इस प्रकार अपना जीवन यापन करते थे। परन्तु जब उन्होंने प्रभु और उसकी सामर्थ्य को देखा तो सब कुछ छोड़ दिया। उन्होंने अपना घर, व्यवसाय, जाल और अपनी नावों को छोड़कर प्रभु के मार्ग को अपना लिया और उसके चेले बन गये।
(3) एक पापिनी स्त्री थी, भोग-विलास के मार्ग पर चल रही थी। पापों से उसका जीवन भरा था और नरक की गर्त के समान उसका जीवन हो गया था। वह सांसारिक मार्गों पर भटक रही थी; परन्तु जब उसने प्रभु यीशु को देखा, उसकी शिक्षाओं को सुना, उसे पहचाना तो उसने सांसारिक मार्ग को छोड़ दिया और प्रभु के मार्ग, अनन्त जीवन के मार्ग पर चलने लगी।
(4) एक डाकू था जो अपने जीवन भर विनाश के मार्ग पर चला। हत्याएं, लूटपाट, चोरियां, बलात्कार सभी कुछ किये। अन्त में उसे पकड़ा गया और अपने अपराधों की सज़ा पाने के लिए उसे क्रूस पर चढ़ाया गया। वहां उसने अपने साथ निर्दोष प्रभु यीशु मसीह को भी क्रूस पर पाया। उस डाकू ने उसकी वाणियों को सुना और उस अन्तिम समय में उसने प्रभु के मार्ग पर चलने की इच्छा प्रगट की। उसने कहा;
“हे यीशु जब तू अपने राज्य में आए तो मेरी सुधि लेना।” (लूका 24:42)

2. दूसरी बात कि इन सब लोगों को उस मार्ग पर चलकर क्या मिला? :-
उस महसूल लेने वाले को, मछली पकड़ने वालों, पापिनी स्त्री और उस डाकू को क्या मिला? उन लोगों को पापों की क्षमा और हृदय की शान्ति मिली। उन्होंने प्रेम से भरा हुआ जीवन पाया। उन्होंने पाई सच्चाई की आत्मा और इन सबसे बढ़कर उन्हें अनन्त जीवन का उपहार मिला।
ऐसा अद्भुत मार्ग है प्रभु का, जो इस संसार के मार्गों से कहीं ऊंचे स्थानों पर ले जाता है; यह मार्ग ऐसे द्वार खोलता है जिन्हें मृत्यु भी बंद नहीं कर सकती। यह ऐसा मार्ग है जो इस जीवन से होकर अनन्त जीवन तक जाता है। यह मार्ग इस संसार से निकालकर परमेश्वर की उपस्थिति में ले जाता है।
इन लोगों ने अपने सांसारिक जीवन में जो कुछ छोड़ा वह बहुत कम था परन्तु उसके बदले में उन्होंने जो पाया, वह तो अमूल्य था।
मत्ती ने अपना पद, प्रतिष्ठा और अपने धन को छोड़ा मगर उसने अनन्त जीवन पाया। न सिर्फ़ उसने अनन्त जीवन पाया बल्कि उसने प्रभु यीशु की जीवनी लिखी और जिससे हज़ारों और लाखों लोगों ने उद्धार का मार्ग पाया। यह हमारे पास आज भी बाइबिल में नये नियम की प्रथम पुस्तक के रूप में मौजूद है। आज भी मत्ती की लेखनी हमें प्रेरणा दे रही है और भटके हुओं को राह दिखा रही है।
चेलों ने अपना व्यवसाय और सम्पत्ति को छोड़ा परन्तु उन्हें स्वर्ग का राज्य मिल गया। वे स्वर्ग राज्य के अधिकारी हो गये और उनके जीवनों, उनकी लेखनी और मृत्यु की गवाही ने अनगिनत लोगों को स्वर्ग की राह दिखाई।
पापिनी स्त्री ने अपना पापमय जीवन छोड़ा और उसने उद्धार व आशा से भरा अनन्त जीवन पाया। डाकू ने अपनी लूटपाट, हिंसा और अपराध की ज़िंदगी छोड़ी। उसने अपने पापों पर पश्चात्ताप किया और प्रभु के मार्ग पर चलकर वह स्वर्गलोक में जा पहुंचा।
निष्कर्ष :- आज प्रमुख प्रश्न यही है कि आप किस मार्ग पर चल रहे हैं? हो सकता है आप भी सांसारिकता के उन चौड़े मार्गों पर चल रहे हों, जिनकी कोई मंज़िल नहीं है। हो सकता है कि आपने कई मार्गों को बदलकर जीवन में कुछ पाने की आशा की हो और बदले में कुछ भी न मिला हो। हो सकता है कि आपको ऐसे मार्ग की खोज हो जो सच्चा है, जो अनन्त की ओर ले जाता है, जिसमें मंज़िल है और जिसमें जीवन है।
यदि आप ऐसे मार्ग की खोज में हैं तो वह मार्ग प्रभु यीशु है। आज ही अपने आपको उसे समर्पित करें और उसके मार्ग पर चलने का प्रयास करें। अभी समय है कि ठहर जाएं, छोड़ दें उन पुराने रास्तों को जो खण्डहरों की ओर जाते हैं, अंधेरों में ले जाते हैं। ज्योति में चलें, प्रभु के मार्ग पर चलें।