संदर्भ : 2 कुरिन्थियों 8:7-9 परिचय :- परमेश्वर देने वाला परमेश्वर है और हर वह चीज़ जिसे परमेश्वर ने बनाया है, वह देती है। सूर्य रोशनी देता है, चंद्रमा चांदनी देता है, बादल जल और छाया देते हैं। वायु श्वास देती है, भूमि उपज देती है और पेड़ पौधे जल देते हैं। परमेश्वर ने इन सब चीज़ों को हमारे लिए बनाया और ये हमें किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ देते हैं परन्तु त्रासदी यह है कि परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य लेना अधिक जानता है और देना कम। शायद यही कारण है कि जब जीवन में बहुत सी समस्याएं आती हैं तो हम उनसे लड़ते हुए आत्मिकता में उठ नहीं पाते, आशीषों में आगे बढ़ नहीं पाते क्योंकि हमने सिर्फ़ मांगना ही सीखा है, देने के समय हमारे हाथ खुल नहीं पाते। परमेश्वर ने अपनी आशीष स्वरूप धन प्रदान किया। धन स्वयं में बुरा नहीं है परन्तु जिस तरह से मनुष्य उसे इस्तेमाल करता है; उस आधार पर यह निश्चित होता है कि वह उसके लिए आशीष का कारण है या उसके जीवन को हानि पहुंचाने वाला घातक हथियार। बाइबिल में अनेकों धनी व्यक्तियों का वर्णन पाया जाता है जैसे इब्राहीम, इसहाक, याकूब, यूसुफ, दाऊद और सुलैमान और अरिमतियाह का यूसुफ, बर्नबास और कुरनेलियुस। वे बहुत धनी थे और उन्होंने अपने धन को परमेश्वर की महिमा के लिए इस्तेमाल किया तथा परमेश्वर ने उन्हें आशीषित किया। दूसरी ओर हनन्याह और सफीरा का वर्णन है जिनके लिए धन घातक साबित हुआ। धन के लोभ में यहूदा इस्करियोती ने यीशु को तीस चांदी के सिक्कों में पकड़वा दिया और स्वयं आत्महत्या कर ली। “परमेश्वर कहता है कि चांदी तो मेरी है और सोना भी मेरा ही है।”(हाग्गै 2:8 के अनुसार) परमेश्वर ही हमें धन अर्जित करने की सामर्थ्य देता है क्योंकि लिखा है; “तू अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण रखना, क्योंकि वही तुमको सम्पत्ति प्राप्त करने सामर्थ्य देता है।”(व्यवस्थाविवरण 8:18) नीति वचन का लेखक परमेश्वर की इस आशीष को दूसरों को बांटने और देने के विषय में लिखता है; “उदार हृदय वाला आशीषित होगा, क्योंकि वह कंगाल को अपने भोजन में से देता है।”(नीतिवचन 22:9) यद्यपि नये नियम में दसवांश को देने से जुड़ा कोई सिद्धान्त नहीं दिया गया है परन्तु नये नियम में दसवांश देने से भी बढ़कर करने की बात की गई है। दान देने के सम्बन्ध में नये नियम में जो मार्ग दर्शन दिया गया है, उसमें से पांच प्रमुख बातों को हम देखें। 1. तुम परमेश्वर को दो तो वह भी तुम्हें देगा :- नया नियम बताता है कि हम परमेश्वर को देंगे तो वह भी हमें देगा क्योंकि हमारा दान परमेश्वर के पास बचत के रूप में जमा है। प्रभु यीशु ने कहा; “दिया करो तो तुम्हें भी दिया जाएगा, वे तुम्हारी गोद में पूरा-पूरा नाप, दबा-दबाकर, हिला-हिलाकर उभरता हुआ डालेंगे। क्योंकि जिस नाप से तुम दूसरों के लिए नापते हो, उसी नाप से तुम्हारे लिए भी नापा जाएगा।”(लूका 8:38) पौलुस लिखता है; “अब मैं यह कहता हूं कि जो थोड़ा बोएगा वह थोड़ा ही काटेगा, और जो अधिक बोएगा वह अधिक काटेगा।”(2 कुरिन्थियों 9:6) परन्तु हमारे पास कमी है और शायद इसलिये क्योंकि हमने देना नहीं सीखा। नीति वचन में लिखा है; “जो निर्धन पर दया दिखाता है वह यहोवा को उधार देता है, और यहोवा उसके इस भले कार्य का प्रतिफल देगा।”(नीतिवचन 19:17) दान हमारा विश्वास दर्शाता है कि क्या बैंक से ज़्यादा हमें परमेश्वर पर विश्वास है कि वह हमारे दान का, हमारी बचत का प्रतिफल हमें देगा? दान इस बात को दर्शाता है कि हमारा मन कहां है? इस संसार में अथवा स्वर्ग की ओर, इनमें से किस ओर हमारा मन लगा है? इसी कारण प्रभु यीशु ने कहा; “अपने लिए पृथ्वी पर धन संचय मत करो, जहां पर कीड़ा और जंग नष्ट करते हैं और जहां चोर सेंध लगाकर चोरी करते हैं। परन्तु अपने लिए स्वर्ग में धन संचय करो, जहां न कीड़ा और न जंग नष्ट करते हैं और न ही चोर सेंध लगाकर चोरी करते हैं, क्योंकि जहां तेरा धन है वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।”(मत्ती 6:19-21) दान देना यह दर्शाता है कि हमारी प्राथमिकताएं कहां हैं? हम जैसे खर्च करते हैं, वह ढंग हमारा चरित्र, स्वभाव, और हमारी प्राथमिकताएं दर्शाता है। “यीशु ने उससे कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है तो जा, अपनी सम्पत्ति बेचकर कंगालों को दे और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा। तब आकर मेरे पीछे चल। पर जब नवयुवक ने यह सुना तो शोकित होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।” (मत्ती 19:21-22) यीशु के पास वह धनी युवा प्रशासक इस इच्छा के साथ आया था कि वह यीशु के पीछे चलना चाहता था। यीशु ने उससे कहा कि सब कुछ बेच दे। तो क्या मसीही होने के लिए सब कुछ बेचना ज़रूरी है? नहीं। परन्तु धन को परमेश्वर का स्थान नहीं देना चाहिये क्योंकि वचन में लिखा है; “कोई तो उदारता से बिखेरता है तौभी उन्नति करता जाता है और कोई जितना उसे देना चाहिये उतना नहीं देता है, फिर भी इससे उसकी घटी ही होती है।”(नीतिवचन 11:24) 2. दान त्याग सहित होना चाहिए :- दान के संबंध में दूसरी प्रमुख बात यह है कि हमारा दान त्याग के साथ होना चाहिए। मरकुस रचित सुसमाचार में निर्धन विधवा का वर्णन है; मरकुस ने लिखा है; “यीशु मंदिर के खजाने के सामने बैठ गया और देखने लगा कि लोग किस प्रकार मंदिर के कोष में पैसे डाल रहे थे; और बहुत से धनवान बड़ी-बड़ी रकम डाल रहे थे। इतने में एक कंगाल विधवा ने आकर तांबे के दो छोटे-छोटे सिक्के डाले जिनका मूल्य लगभग एक पैसे के बराबर होता है। तब यीशु ने अपने चेलों को पास बुलाकर उनसे कहा, मैं तुमसे सच-सच कहता हूं, कि कोष में डालने वालों में से इस कंगाल विधवा ने सबसे बढ़कर डाला है; क्योंकि अन्य सबने अपनी बहुतायत में से डाला है, परन्तु इसने अपनी दरिद्रता में से जो कुछ उसका था अर्थात् अपनी सारी जीविका डाल दी है।”(मरकुस 12:41-44) विधवा का दान परमेश्वर को स्वीकार्य था क्योंकि उसने त्याग सहित अपनी सारी जीविका कोष में डाल दी थी, परमेश्वर को अर्पित कर दी थी। इब्रानियों की पत्री का लेखक लिखता है; “भलाई करना और उदारता दिखाना न भूलो, क्योंकि ऐसे बलिदानों से परमेश्वर प्रसन्न होता है।”(13:16) प्रेरितों के काम में वर्णित प्रारम्भिक कलीसिया में यह बात विद्यमान थी कि उनके दान में त्याग समाहित था, उनके विषय में लिखा है; “उनमें से कोई भी गरीब नहीं था। वे सब लोग जो भूमि या घरों के स्वामी थे अपनी भूमि या घरों को बेच-बेचकर उनका मूल्य लाते तथा उन्हें प्रेरितों के चरणों में रख देते। तब जैसी उनकी आवश्यकता होती थी, उसके अनुसार उन्हें बांट देते थे।”(प्रेरितों के काम 4:34,35 के अनुसार) हम दान भय के कारण नहीं देते, हम प्रेम के कारण दान देते हैं। हमारे दान में त्याग होना आवश्यक है। 3. दान का इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं कि हमारे पास कितना है :- यीशु ने कहा; “जो थोड़े में से सच्चा है वह बहुत में भी सच्चा है और जो थोड़े में अधर्मी है वह बहुत में भी अधर्मी है।”(लूका 16:10) यदि जितना आपके पास है, उसमें से आप नहीं दे सकते तो जब आपके पास बहुत होगा; तब भी आप नहीं देंगे। एक घटना है कि एक पास्टर एक किसान के पास गया जो कि बहुत धनी था। चर्च भवन के निर्माण का कार्य चल रहा था और उसमें एक लाख रुपये की ज़रूरत थी। पास्टर इस किसान के पास इस कार्य के लिए कुछ दान लेने के लिए गया था। वह किसान बोला कि “यदि मेरे पास दो लाख रुपये होते तो मैं निश्चित रूप से उसमें से एक लाख रुपये तुम्हें दे देता।” उसकी बात सुनकर पास्टर बोला “यदि तुम्हारे पास दो हाथी होते तो क्या करते?” किसान बोला “उसमें से एक हाथी तुम्हें दे देता।” पास्टर ने फिर पूछा “यदि तुम्हारे पास दो घोड़े होते तो क्या करते।” “उसमें से एक घोड़ा तुम्हें दे देता।” “और यदि तुम्हारे पास दो गायें होती तब?” पास्टर ने फिर पूछा। परन्तु वह किसान उसका यह प्रश्न सुनकर नाराज़ हो गया और उसने कहा “तुम्हें मालूम है कि मेरे पास दो गायें हैं, परन्तु मैं उनमें से एक भी तुम्हें नहीं दे सकता हूं।” पौलुस ने कुरिन्थियों की कलीसिया को लिखे गये अपने दूसरे पत्र के आठवें अध्याय में मकिदुनिया की कलीसिया के विषय में लिखा है कि क्लेश की बड़ी परीक्षा और कंगालपन के बढ़ जाने से उसकी उदारता बढ़ गई। कंगालपन के बढ़ने से उनकी उदारता इस कारण बढ़ गई क्योंकि उन्होंने स्वयं को परमेश्वर को दे दिया था। देना हमारे हृदय की स्थिति को दर्शाता है। हमारे पास जो है, हम जैसी भी स्थिति में हैं वैसे में ही हमें देना है। यीशु ने इसीलिये कहा; “जब तुम अधर्म के धन में सच्चे न ठहरे तो सच्चा तुम्हें कौन सौंपेगा और यदि तुम पराये धन में सच्चे न ठहरे तो जो तुम्हारा है, उसे तुम्हें कौन देगा।”(लूका 16:11,12) 4. हमें यह स्वयं निर्धारित करना है कि हमें कितना दान देना है :- पौलुस लिखता है; “हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे, न कुढ़-कुढ़ कर और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।”(2 कुरिन्थियों 9:7) जक्कई का जीवन जब यीशु ने परिवर्तित किया तो उसकी सारी मानसिकता बदल गई। एक निर्दयी महसूल लेने वाले से वह एक उदार हृदय से देने वाला व्यक्ति बन गया। लूका रचित सुसमाचार के उन्नीसवें अध्याय में यह घटना वर्णित है, जक्कई ने कहा मैं अपनी आधी संपत्ति कंगालों को देता हूं और जिस किसी का अन्याय करके लिया उसे चौगुना फेर देता हूं। व्यवस्था में जब दसवांश देने की बात की गई तो यह एक अच्छा प्रारम्भ था, परन्तु धीरे-धीरे देने वाले दसवांश में भी गड़बड़ी करने लगे। दसवांश देना तो आवश्यक था परन्तु दसवांश दिया जाए; ये स्वयं ग़लत ढंग से निर्धारित करने लगे और परमेश्वर ने कहा “क्या मनुष्य परमेश्वर को लूट सकता है? फिर भी तुम मुझे लूटते हो! परन्तु तुम पूछते हो, हमने किस बात में तुझे लूटा है? दसवांश और भेंटों में। तुम पर भारी शाप पड़ा है, क्योंकि तुम मुझे लूटते हो; वरन् सारी जाति ऐसा करती है।”(मलाकी 3:8,9) मेरे एक प्रचारक मित्र हैं, वह अपनी आय का 50 प्रतिशत मिशन कार्य के लिये देते हैं। शेष आय का 90 प्रतिशत भी चर्च को दे देते हैं और शेष 10 प्रतिशत में अपना जीवन यापन करते हैं। हमें यह स्वयं निर्धारित करना है कि हम अधिक से अधिक कितना दे सकते हैं। पौलुस लिखता है; “तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिये कंगाल बन गया ताकि उसके कंगाल हो जाने से तुम धनी हो जाओ।”(2 कुरिन्थियों 8:9) प्रभु ने अपने आपको हमारे लिए दे दिया, हम उसे क्या और कितना देते हैं? 5. हमें निरन्तर देना है :- हमारे दान में निरन्तरता बनी रहनी चाहिये। पौलुस इस विषय में लिखता है; “पवित्र लोगों के लिए दान एकत्रित करने के सम्बन्ध में जो निर्देश मैंने गलातिया की कलीसियाओं को दिया है उसे तुम भी मानो। सप्ताह के पहिले दिन तुम में से प्रत्येक अपनी आय के अनुसार अपने पास कुछ रख छोड़े कि मेरे आने पर दान एकत्रित न करना पड़े।”(1 कुरिन्थियों 16:1,2) पौलुस ने यह निर्देश कुरिन्थ की कलीसिया को दिया था परन्तु आज हम सब के लिए भी यह उतना ही प्रासंगिक है। हम में से हर एक को एक व्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर निरंतर दान देते रहना है। हमें अपनी कलीसिया की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विशेष दान देना चाहिये। प्रेरितों के काम के दूसरे अध्याय में पिन्तेकुस्त के दिन घटी घटना के बाद विश्वासियों की संगति का वर्णन है। ये लोग मिल जुलकर रहते थे और; “अपनी संपत्ति व सामान बेचकर जैसी जिसकी आवश्यकता होती थी सब को बांट दिया करते थे।”(प्रेरितों के काम 2:45) हमें भी निरंतरता के साथ देना है और यदि किसी को आवश्यकता है तो उसकी पूर्ति भी करना है। अन्ताकिया की कलीसिया के लोगों को जब अगबुस की भविष्यवाणी द्वारा पता चला कि यहूदिया में भयंकर अकाल पड़ेगा तो उन्होंने मिलकर कुछ दान एकत्र किया ताकि यहूदिया के सन्तों को अकाल के इस भीषण समय में समस्याओं का सामना करना न पड़े। (प्रेरितों के काम 11:27-30 के अनुसार)\ प्रभु यीशु ने शास्त्रियों और फरीसियों की तथाकथित धार्मिकता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा; “हे पाखण्डी शास्त्रियों, फरीसियों तुम पर हाय! तुम पोदीने, सौंफ और जीरे का दसवां अंश तो देते हो, परन्तु व्यवस्था की गम्भीर बातों अर्थात् न्याय, दया और विश्वास की उपेक्षा करते हो।”(मत्ती 23:23) परन्तु साथ ही साथ उसने अपने पीछे चलने वालों के सामने भी यह चुनौती रखी कि; “जब तक तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो तो तुम परमेश्वर के राज्य में कभी प्रवेश न कर पाओगे।” (मत्ती 5:20) शास्त्री और फरीसी अपनी धार्मिकता के लिए बहुत विख्यात थे मगर हमारी धार्मिकता उनसे भी बढ़कर होना है। निष्कर्ष :- आज हम विचार करें कि जिस अनुपात में हम परमेश्वर को देते हैं अगर उसी अनुपात में परमेश्वर हमें दे तो हम जी नहीं पाएंगे। सूरज की रोशनी, बादलों की बारिश और सांस के लिये वायु; सब ही यदि हमें उसी अनुपात में मिलें जो अनुपात हमारे दान का है तो हमारा क्या होगा? यदि विश्वास से बढ़ेंगे तो हम परमेश्वर का आश्चर्यकर्म देखेंगे। पानी पर तभी चल सकेंगे जब यीशु के निमंत्रण पर नाव से बाहर पानी पर कदम रखेंगे। हमें अपनी नौकाओं से बाहर निकलना होगा। यदि परमेश्वर की असीमित आशीषों को हासिल करना है तो अपने हाथों को खोलना होगा, परमेश्वर को अपना सब कुछ समर्पित करना होगा, जैसे इस्राएलियों ने दिया और फिर लिखा है; “मूसा ने आज्ञा निकाली, उसका प्रचार समस्त छावनी में यह कहकर करवाया कोई पुरुष या स्त्री पवित्र स्थान के लिए और भेंट न लाए। इस प्रकार लोग भेंट लाने से रोके गये। क्योंकि जितनी सामग्री उनके पास आ चुकी थी वह निर्माण के सब कार्यों के लिए पर्याप्त थी वरन् उससे कहीं अधिक थी।”(निर्गमन 36:6,7) परमेश्वर हमें अपने ज्ञान से परिपूर्ण करे ताकि हम उसको दी जाने वाली भेटों के विषय में जागरूक हो सकें। - हमें परमेश्वर को देना है। - हमारा दान त्याग सहित हो। - दान से हम अपनी विश्वासयोग्यता प्रगट करते हैं। - हमें स्वयं निर्धारित करना है कि हम कितना दें। - हम निरंतर दें।