सन्दर्भ : 1 कुरिन्थियों 11:23-26 परिचय :- ऐसे लोग जो महान होते हैं, जो अनुकरणीय होते हैं, कोई मिसाल क़ायम करते हैं; सदियों तक उन्हें याद किया जाता है। उनकी स्मृति में भवन बनाये जाते हैं। पार्क बनाये जाते हैं। प्रतिमा बनाकर चौराहों और सार्वजनिक स्थानों पर लगाई जाती है। विशेष अवसरों पर लोग दूर-दूर से यात्रा करके, उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने आते हैं। दिल्ली में इण्डिया गेट पर अमर जवान ज्योति है जो कि एक बहुत बड़ा स्मारक है। इस पर उन योद्धाओं के नाम लिखे हुए हैं जो दूसरे महायुद्ध में मारे गये। लोग उन देशभक्तों को स्मरण करते हैं, इस इण्डिया गेट को देखकर; अमर जवान ज्योति, जो बुझती नहीं, यह उन शहीदों की याद का प्रतीक है। शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की स्मृति में ताजमहल बनवाया। एक भव्य स्मारक जो देश-विदेश के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है, दुनिया के सात महान आश्चर्यों में से एक है। परन्तु, समय के साथ ऐसे स्मारक धुंधले पड़ जाते हैं, उनमें दरारें पड़ जाती हैं। उनकी चमक समाप्त हो जाती है और समय और काल के चक्र में वे टूटकर खण्डहर हो जाते हैं, वीरान हो जाते हैं। पुरातत्त्व संग्रहालय या पुरातत्त्व विभाग की अमानत बन कर रह जाते हैं। परन्तु प्रभु यीशु मसीह ने संसार से जाने के पहले ऐसा एक स्मारक छोड़ा - - जो संसार के अन्त तक रहेगा। - जो सब जगह उपलब्ध है। - जो आम आदमी के जीवन से जुड़ा है। - जिसके लिए कोई यात्रा नहीं करनी पड़ेगी। - जो गरीबों-अमीरों, सबके लिए समानता से उपलब्ध है। - जो कभी धुंधला नहीं होगा और जिसकी चमक फीकी नहीं पड़ेगी। - जो कभी टूटकर बिखरेगा नहीं, जो कभी ख़त्म नहीं होगा। और वह स्मारक है, प्रभु भोज। स्मारक बनाये जाने के लिए बहुत ध्यान से पत्थर चुने जाते हैं, बाहर के देशों के पत्थर और निर्माण का सामान मंगवाया जाता है। ऐसी चीज़ें चुनी जाती हैं जो सामान्यत: वहां दुर्लभ हों। परन्तु, इस स्मारक के लिए प्रभु यीशु मसीह ने दो ऐसी वस्तुएं चुनीं जो संसार के सब देशों में पाई जाती हैं और जो बहुत सरलता से उपलब्ध हैं और वे हैं रोटी तथा अंगूर का रस। प्रभु भोज के इस स्मारक को अर्थ को पूरी रीति से समझने के लिये हम चार बातों पर ग़ौर करेंगे। 1. प्रभु भोज की स्थापना :- प्रभु भोज के लिए यहूदियों के फसह के पर्व का समय प्रभु यीशु ने चुना। उसके जीवन काल का यह अन्तिम पर्व था और उसकी लालसा थी कि वह इसे सब चेलों के साथ मनाए। लूका 22:24, मत्ती 26:27,28 में वर्णन है कि प्रभु यीशु ने रोटी ली, तोड़कर चेलों को दी, उसके बाद कटोरा लिया। फसह के पर्व में इस बात को स्मरण करने के लिए कि, परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र देश की ग़ुलामी से छुटकारा दिलाया, यहूदी लोग 7 दिनों तक अखमीरी रोटी खाते थे। यहूदी लोगों के फसह का पर्व मनाने का क्या कारण है, इसे जानने के लिए निर्गमन 12:41,42 देखें, जहां पर लिखा है; “और उन चार सौ तीस वर्षों के बीतने पर, ठीक उसी दिन, यहोवा की सारी सेना मिस्र देश से निकल गई। यहोवा इस्राएलियों को मिस्र देश से निकाल लाया, इस कारण वह रात उसके निमित्त मानने के अति योग्य है; यह यहोवा की वही रात है जिसका पीढ़ी पीढ़ी में मानना इस्राएलियों के लिये अति अवश्य है।” अत: यहूदियों के इस पर्व के समय प्रभु यीशु ने प्रभु भोज की स्थापना की। 2. प्रभु भोज के नाम :- प्रभु भोज के कई नाम हैं; प्रारम्भिक कलीसिया की आराधना के वर्णन में इसे रोटी तोड़ना कहा गया। लिखा है; “सप्ताह के पहिले दिन जब हम रोटी तोड़ने के लिये इकट्ठे हुए, तो पौलुस ने जो दूसरे दिन चले जाने पर था, उन से बातें कीं, और आधी रात तक बातें करता रहा।” (प्रेरितों के काम 20:7) प्रभु भोज अर्थात् वह भोज जो प्रभु ने ठहराया। उसे ही स्मरण करने के लिए प्रभु ने यह नाम दिया। वर्णन है प्रभु की ब्यारी का, ब्यारी, जिसका अर्थ होता है, शाम का भोजन। 3. समय (कब लिया जाना चाहिए) :- प्रभु भोज लेने के समय के सम्बन्ध में कई मतभेद हैं, अलग-अलग कलीसियाओं में फर्क-फर्क मत हैं। परन्तु, इसके बारे में मानव द्वारा बनाया गया नियम नहीं, वरन् प्रभु के द्वारा बनाया हुआ नियम देखें। प्रभु यीशु द्वारा इस सम्बन्ध में कोई लिखित निर्देश नहीं दिया गया। परन्तु यदि प्रभु की शिक्षानुसार देखें तो, उसके कहने के अनुरूप चेलों और आरम्भिक कलीसिया ने इसे लगातार किया। प्रेरितों के काम 2:42 के अनुसार “करने में लौलीन रहे” शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है “लगे रहे”। ग्रीक भाषा में प्रयोग के किये गये शब्द का अर्थ है “निरंतर करते रहे”। प्रेरितों के काम 2:46 के अनुसार प्रतीत होता है कि वे प्रभु भोज प्रतिदिन लेते थे। 20 वें अध्याय के 7 वें पद के अनुसार वे प्रभु भोज सप्ताह के पहले दिन लेते थे, जहां लिखा है; “सप्ताह के पहिले दिन जब हम रोटी तोड़ने के लिये इकट्ठे हुए।” कलीसिया के इतिहास में “चर्च फादर्स” का वर्णन है, ये लोग प्रेरितों (चेलों) के बाद कलीसिया के अगुवे हुए। उन्हीं में से एक है “जस्टिन मार्टर” जो कि यीशु से 120 वर्ष बाद हुए अर्थात् सन् 150 ई. में। ये प्रारम्भिक फादर जस्टिन, पोलीकार्प के शिष्य थे जो कि यूहन्ना का चेला था और जो कई वर्ष उसके साथ रहा और उससे सीखा। जस्टिन मार्टर ने उन दिनों की आराधना का वर्णन करते हुए लिखा है; “सब शहर और गांव के मसीही एक स्थान पर अपने क्षेत्र में जमा होते हैं, ऐसा हर रविवार की सुबह होता है, इस समय प्रति रविवार पवित्र शास्त्र में से पठन होता है। शास्त्र पठन के बाद प्रार्थनाएं की जाती हैं और उसके बाद रोटी तोड़ी जाती है तथा दाखरस प्रभु यीशु की स्मृति में लिया जाता है और उसके बाद घरों को जाते हैं।” इतिहासकार रॉबर्ट मिलिगन की पुस्तक “उद्धार की योजना” के अनुसार सारे विश्व की कलीसियाओं में पहले दो सौ वर्षों तक प्रभु प्रति रविवार होता रहा और यूनान की कलीसियाओं में सात सौ वर्षों तक निरन्तर प्रति सप्ताह प्रभु भोज होता रहा। 4. हमारे जीवन में इसका महत्व :- हमारे जीवन में इसका अत्यन्त प्रमुख महत्व है। क्योंकि; (अ) हमारा सबसे प्रमुख स्मारक है जो परमेश्वर के प्रेम का स्मरण दिलाता है: प्रभु भोज परमेश्वर के प्रेम का स्मरण दिलाता है। - स्मरण दिलाता है यीशु के बलिदान का। - स्मरण दिलाता है कि उद्धार हम स्वयं अर्जित नहीं कर सकते, यह परमेश्वर का अनुग्रह है। जब परमेश्वर ने मूसा को तम्बू बनाने को कहा और उसका नक्शा दिया तब तम्बू के आगे वाला भाग “पवित्रता का भाग” कहा गया। इस पवित्रता के भाग में तीन चीज़ें होती थीं :- (1) सोने का बना हुआ चिरागदान रहता था, जो कि काफी ऊंचा होता था तथा प्रकाश के लिए इस में चिराग जलाया जाता था। इसका अर्थ यह था कि पवित्र होना है तो परमेश्वर के वचन के प्रकाश में रहो। (2) सोने की वेदी होती थी, इसका अर्थ यह था कि पवित्र बनना है तो परमेश्वर को त्याग सहित भेंट चढ़ाओ, बलिदान करो। (3) सोने की मेज़ होती थी जिस पर हमेशा अखमीरी रोटी रखी जाती थी और हर सप्ताह अखमीरी रोटी रखी जाती थी, जिसे “मौजूदगी की रोटी” कहा जाता था, जिसका अर्थ था कि, लोग स्मरण रखें कि, परमेश्वर हमारे साथ मौजूद है। अत: प्रभु भोज स्मारक है क्योंकि; “उस का अनुग्रह हम पर हुआ है और वह हमारे साथ-साथ है। उसकी दया हम पर हुई है, उद्धार सम्भव है।” (रोमियों 12:1) प्रभु भोज परमेश्वर के प्रेम का स्मारक है। उसने हमारे लिए अपना पुत्र दिया है और प्रभु भोज के द्वारा हम दर्शाते हैं कि हमने उसे स्वीकार किया है। (ब) प्रभु भोज प्रचार है, गवाही है: 1 कुरिन्थियों 11:26 में लिखा है; “क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो।” प्रभु भोज न केवल परमेश्वर के प्रेम का स्मारक है, वरन् जब हम इस प्रभु भोज में शामिल होते हैं, तो हम उसका प्रचार करते हैं, और इस प्रकार प्रभु भोज इस बात का प्रचार है, गवाही है कि हमारी परमेश्वर के साथ सहभागिता है। (स) प्रभु भोज परमेश्वर और हमारे मिलन का केन्द्र बिन्दु है: 1 कुरिन्थियों 10:16 में लिखा है; “वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या मसीह के लोहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह की देह की सहभागिता नहीं?” यह किस प्रकार की सहभागिता है? यह बहुत गहरी, बड़ी अन्तरंग सहभागिता है कि हम उसके घर में उसके साथ बैठकर उसकी मेज़ में सहभागी होते हैं। अक्सर किसी व्यक्ति से हमारी सहभागिता, हमारी अन्तरंगता एवं सम्बन्ध इस बात से प्रकट होता है कि, हम उसके यहां उसके बुलाने पर भोजन हेतु गये या हमारे यहां वे लोग आए। (द) प्रभु भोज हमारी शिष्यता की पहचान है: प्रभु भोज स्मारक है, परमेश्वर के प्रेम का। यह गवाही है, यह हमारी सहभागिता है एवं यह हमारी शिष्यता की पहचान है। प्रचार है कि उसके पवित्र लोहू की छाप हम पर लगाई गई है। जो लोग प्रभु भोज नहीं लेते, जो मसीही होने के बावजूद प्रभु भोज में शामिल नहीं होते तो प्रगट होता है कि, उनका समर्पण अधूरा है, वे अपूर्ण हैं और उन्हें उद्धार की निश्चयता नहीं है। उनका प्रभु भोज न लेना इस बात को भी दर्शाता है कि उन्होंने स्वयं उसके आमंत्रण को ठुकरा दिया। परमेश्वर से उनका उथला और झूठा सम्बन्ध है। वे यीशु के सच्चे चेले नहीं हैं और उसके पवित्र लोहू की छाप उन पर लगाई नहीं गई। यदि किसी कारण से हम यह सोचते हैं कि हम प्रभु भोज लेने के योग्य नहीं, तो प्रभु भोज न लेकर सन्तोष नहीं करना है। स्मरण रखिये ऐसा करके हम हर सप्ताह उसे ठुकरा रहे हैं, हर सप्ताह उसके प्रेम का तिरस्कार कर रहे हैं। वह हमें बार-बार बुला रहा है परन्तु हम नहीं जा रहे और यह दर्शाता है कि हम क्रूस के विरोधी हैं, हम परमेश्वर के राज्य में शामिल नहीं हैं, उसकी हर बुलाहट में हम निकम्मे ठहरते हैं। (घ) अन्तिम और सबसे प्रमुख बात जो है वह यह कि, प्रभु भोज हमारी परख है, हमारी जांच है: वचन में लिखा है; “तुम प्रभु के कटोरे और दुष्टात्माओं के कटोरे में से नहीं पी सकते और तुम प्रभु की मेज़ और दुष्टात्माओं की मेज़ दोनों के साक्षी नहीं हो सकते।”(1 कुरिन्थियों 10:21) आज हमें यही जांचना है कि, हम किसके कटोरे में से पीते हैं और किसकी मेज़ में सहभागी होते हैं, क्योंकि लिखा है; “इस लिये जो कोई अनुचित रीति से प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लोहू का अपराधी ठहरेगा। इसलिये मनुष्य अपने आप को जांच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। क्योंकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहिचाने, वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है।” (1 कुरिन्थियों 11:27-29) निष्कर्ष : आज हम ने विश्व के सबसे महानतम् स्मारक के बारे में जाना है। प्रभु की स्थापना कब हुई, इसके क्या नाम हैं बाइबिल इसको लिये जाने के समय के बारे में क्या बताती है, हमने इन बातों को जाना। प्रभु भोज हमारे लिए बहुत प्रमुख है क्योंकि प्रभु भोज; - एक पवित्र भोज है। - यह एक महानतम् स्मारक है। - यह प्रचार है, हमारी गवाही है। - यह एक सहभागिता है। - यह हमारी शिष्यता की पहचान है, और - यह एक परख है, हमारी जांच है। आइये, हम अपने हृदय को पवित्र करें; हृदय से बुराई, द्वेष, कपट निकालें और प्रभु की मेज़ में सहभागी हों।