2 कुरिन्थियों 5:1-7 में पौलुस एक बड़ी स्पष्ट सी बात कहता है। वह कहता है कि सच दो प्रकार का होता है, एक ऐसा सच जो दिखाई देता है और एक ऐसा सच जो दिखाई नहीं देता। वह कहता है कि हम तो अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं अर्थात् हम तो अनदेखे सच को देखते रहते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि देखी हुई वस्तुएं नाशवान हैं परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदैव बनी रहती हैं। हमारे साथ जो मूलभूत समस्या है वह यह कि हमारा ध्यान, हमारा चिन्तन, हमारी प्राथमिकताएं, हमारे जीवन का उद्देश्य मात्र देखी हुई वस्तुओं तक केन्द्रित रहता है। हम देखते हैं कि हमारे शरीर के लिए लाभदायक क्या है, आनन्ददायक क्या है, आरामदायक क्या है, सुखद क्या है? इसी की ओर हमारा ध्यान केन्द्रित रहता है। आज जिस संसार के आकर्षण, जिस टेलीविजन और कम्प्यूटर युग में हम जी रहे हैं वह हमें इस प्रकार से मजबूर करता है कि हमें देखे हुए सच की ओर दौड़ में ले जाए। परन्तु पौलुस कहता है कि सच दो प्रकार का होता है। एक सच जो दिखाई देता है और एक सच जो दिखाई नहीं देता। एक शरीर का सच है जो दिखाई देता है, एक आत्मा का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक फूल का सच है जो दिखाई देता है, एक फूल की सुगन्ध का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक पानी की बूंदों का सच है जो दिखाई देता है, एक हवा के बहने का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक इमारत का सच है, जो दिखाई देता हे, एक इमारत की बुनियाद का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक आंसुओं का सच है, जो दिखाई देता है, एक मां की ममता का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक मुस्कराहट का सच है, जो दिखाई देता है, एक हृदय की उमंगों का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक सांसारिकता का सच है, जो दिखाई देता है, एक आत्मिकता का सच है जो दिखाई नहीं देता। एक इस संसार का सच है, जो दिखाई देता है, एक अनन्त जीवन का सच है जो आंखों से ओझल हो जाता है। थोड़ी देर के लिए हम इस देखे हुए सच पर विचार करेंगे और उसके बाद हम अनदेखे सच की ओर आगे बढ़ेंगे। अ. सबसे पहले हम देखे हुए सच के सम्बन्ध में तीन-चार बातें देखेंगे। 1. परमेश्वर का वचन कहता है कि देखा हुआ सच बीत जाने वाला है :- फिलिप्पियों 3:13-14 में लिखा है - ''हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं : परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूलकर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ। निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है''। पौलुस कहना चाहता है कि जो बीत गया है, जो संसार का सच है, जिसमें मैं लिप्त रहा अब उसको पीछे छोड़ देता हूं। स्तिफनुस के वध के सच में मैं लिप्त रहा परन्तु उसको मैं पीछे छोड़ देता हूं और अनदेखे सच की ओर जो प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन का पारितोषिक है; उसकी ओर मैं आगे बढ़ता जाता हूं। कभी आपने सोचा है कि परमेश्वर के वचन में जीवन की तुलना किन-किन चीज़ों से की गई है। परमेश्वर के वचन में हमारे इस जीवन की तुलना घास से की गई है। घास की नाईं मनुष्य का जीवन होता है जो कुछ देर रहता है और फिर मुरझा जाता है। हम देखते हैं कि जीवन की तुलना छाया से की गई है। जिस प्रकार से छाया ढल जाती है उसी प्रकार से छाया के समान हमारा जीवन होता है, जो ढल जाता है। वचन के अनुसार हमारा जीवन तिनके के समान है। ओस की बूंदों से हमारे जीवन की तुलना की गई है, जो थोड़ी देर को दिखाई देती है फिर लुप्त हो जाती है। कल्पना कीजिए कि यदि आज से 100 वर्षों के बाद, और यदि तब तक प्रभु यीशु मसीह का दूसरा आगमन नहीं होता, तो हम चाहे कितने भी धनवान रहे हों, कितनी भी उपलब्धियां हमने हासिल की हों। हमारे परिवार में ही कितने लोग होंगे जो हमें याद रखेंगे। मैं दमोह की कलीसिया का पासबान भी हूं और पिछले 17-18 वर्षों में लगभग 200 से ज़्यादा फ्यूनरल मैंने दिए हैं। जब मैं किसी का फ्यूनरल देने के लिए जाता हूं तो वापिस लौटते समय मैं अक्सर ध्यान देता हूं कि लोग क्या बात करते हैं। लोग कहते हैं आज बाज़ार में प्याज़ का क्या भाव है? लोग चर्चा करते हैं कि आज शाम को कौन सा सीरियल टेलीविज़न पर आएगा? नया कैसेट कौन सा निकला है? आदि- आदि। इन सब बातों की चर्चा होती है। हमारे जीवन की बहुमूल्यता इसमें नहीं कि मनुष्य हमारे लिए क्या सोचते हैं। परन्तु हमारे जीवन की बहुमूल्यता इसमें है कि परमेश्वर हमारे विषय में क्या सोचता है? वह परमेश्वर जिसने हमसे इतना प्रेम किया, जिसके प्रेम की कोई सीमा नहीं। जिसने माता के गर्भ में हमको रचा। एक ऐसा परमेश्वर जो संसार में हमें आगे बढ़ाता है। एक ऐसा परमेश्वर जिसने अपने पुत्र को मेरे और आपके लिए बलिदान कर दिया। एक ऐसा परमेश्वर जो अपनी हथेलियों पर हमारा चित्र खोदकर रखता है। यूहन्ना 6:24-27 में प्रभु यीशु मसीह कहता है कि तुम जो मेरे पीछे आए हो, मैं जानता हूं कि वह इसलिए नहीं कि परमेश्वर की सामर्थ्य तुमने मुझ में देखी परन्तु इसलिए कि रोटियां खाकर तुम तृप्त हुए हो। जो देखा हुआ सच है वह बीत जाने वाला है। 2. देखा हुआ सच परीक्षा का द्वार है :- उत्पत्ति 3:6 में हम देखते हैं कि स्त्री ने देखा कि वृक्ष का फल खाने में अच्छा और देखने में मनभाऊ है, तब उसने खाया और अपने पति को भी खिलाया। उस फल के देखे हुए सच को तो हव्वा ने देख लिया परन्तु उस अनदेखे सच को जो परमेश्वर की आज्ञा थी, जो परमेश्वर का प्रेम था, जो परमेश्वर की योजना थी, जो परमेश्वर का वचन था उसे हव्वा भूल गई। हव्वा की नज़र मात्र देखे हएु सच तक सीमित थी परन्तु परमेश्वर के अनदेखे सच को वह भूल गई। उत्पत्ति 25:29-34 पदों में एसाव का वर्णन है। एसाव मैदान से थका हुआ आया और उसने देखा कि उसका छोटा भाई याकूब भोजन पका रहा है। एसाव ने कहा, मुझे भोजन दे क्योंकि मुझे भूख लगी है। याकूब ने कहा पहले मुझे पहिलौठेपन का अधिकार बेच दे और तब एसाव ने रोटी और मसूर की दाल के बदले पहिलौठेपन का अधिकार बेच दिया। उसके बाद इब्रानियों 12:16-17 में लिखा हुआ है - ''ऐसा न हो, कि कोई जन व्यभिचारी, या एसाव की नाईं अधर्मी हो, जिस ने एक बार के भोजन के बदले अपने पहिलौठे होने का पद बेच डाला। तुम जानते हो, कि बाद को जब उस ने आशीष पानी चाही, तो अयोग्य गिना गया, और आंसू बहा-बहाकर खोजने पर भी मन फिराव का अवसर उसे न मिला''। एसाव ने अपने पहिलौठेपन का अधिकार थोड़ी सी मसूर की दाल और रोटी के लिए बेच दिया। हमारे जीवन में कितनी बार ऐसा होता है कि थोड़े से सांसारिक लाभ के लिए हम अपने अनन्त जीवन को बेच देते हैं। हमें यह स्मरण रखना है कि देखा हुआ सच परीक्षा का द्वार है। 3. देखा हुआ सच हमारे और परमेश्वर के बीच में एक दीवार है :- हम पाते हैं कि यहूदा के लिए 30 चांदी के सिक्के प्रमुख हो जाते हैं। अगर यहूदा हमें मिलता तो शायद हम उससे कहते कि अरे यहूदा! तुमने तो प्रभु यीशु मसीह को देखा था। तुमने तो उसके साथ रोटी खाई थी। तुम तो उसके साथ चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते थे। अरे यहूदा! तुमने तो देखा था कि कैसे प्रभु यीशु मसीह ने 5 रोटी और 2 मछलियों से हज़ारों लोगों को भोजन कराया था। तुमने तो देखा था कि कैसे पतरस पानी पर चलकर आया था। अरे यहूदा! तुमने तो देखा था कि जब प्रभु यीशु मसीह ने लाजर को पुकारा था तो चार दिनों का मुर्दा लाजर क़ब्र में से कैसे बाहर आ गया था। अरे यहूदा! तुमने कैसे 30 चांदी के सिक्कों में प्रभु यीशु मसीह को बेच दिया? इस बात का जो सबसे अच्छा उदाहरण हमें मिलता है वह यूहन्ना 19:23 में पाया जाता है। मैं चाहता हूं कि इस उदाहरण को, इस चित्र को आप गहराई से देखें। क्रूस पर प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का मेमना बनकर लटके हुए हैं। कलवरी से उसके रक्त की धार बह रही है और क्रूस की छाया में कुछ सिपाही बैठे हैं जो चिट्ठियां डाल रहे हैं कि प्रभु यीशु मसीह के कपड़े किसको मिलेंगे। परमेश्वर का मेमना इस संसार के पापों को उठाने के लिए बलिदान हो रहा है। संसार के इतिहास की सबसे प्रमुख घटना घटित हो रही है और वे लोग क्रूस की छाया में बैठकर, कलवरी से बहते रुधिर के झरने के पास बैठकर चिन्दियों के लिए चिट्ठियां डाल रहे हैं कि कपड़े किसको मिल जाएं। कितने अभागे हैं वे सिपाही। शायद मेरे और आपके साथ भी अक्सर ऐसा ही होता है। हम जो क्रूस की निकटता में रहते हैं, बचपन से मसीही परिवारों में बढ़ते हैं, गिरजाघरों में आते हैं, आराधनाओं में भाग लेते हैं किन्तु हमारा सारा ध्यान सांसारिकता में लिप्त हो जाता है। हमारा सारा ध्यान उन चिन्दियों को बटोरने में, उन लॉटरियों को खोलने में, उन चिट्ठियों को डालने में ही लग जाता है और कलवरी से जो रक्त बह रहा है, उसकी ओर हमारी नज़र नहीं आती। यदि हम देखे हुए सच की ओर दृष्टि लगाएंगे तो अपने और परमेश्वर के बीच में एक दीवार बना लेंगे। ब. अब हम अनदेखे हुए सच के विषय में कुछ बातों को देखेंगे। हमने देखा कि देखा हुआ सच बीत जाने वाला है। देखा हुआ सच विनाश के रास्ते पर ले जाता है। देखा हुआ सच हमारे और परमेश्वर के बीच में दीवार है। परन्तु एक और सच है जो अनदेखा सच है। इस अनदेखे सच की ओर विचार करें तो हम पाएंगे कि - 1. यह अनदेखा सच स्थायी है :- यह सच कभी बदलने वाला नहीं है। इसीलिए पौलुस कहता है कि हम तो अनदेखी वस्तुओं की ओर देखते रहते हैं क्योंकि अनदेखी वस्तुएं सदा की हैं। परमेश्वर के प्रेम का सच हमेशा का है, परमेश्वर के अनुग्रह का सच हमेशा का है, परमेश्वर की क्षमा का सच हमेशा का है, परमेश्वर की दया का सच हमेशा का है। इसीलिए मत्ती 16:26 में लिखा हुआ है कि ''यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त करे, और अपने प्राण की हानि उठाए तो उसे क्या लाभ होगा?'' अगर हम अंक गणित का उदाहरण लेकर देखें तो हमारा वर्तमान जीवन अनन्त जीवन की तुलना में शायद .000000001 प्रतिशत भी नहीं है। अनन्त के जीवन की हमारे इस जीवन से कोई तुलना नहीं। यह एक ऐसा जीवन है जिसका कोई अन्त नहीं। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्त कर ले, यदि मनुष्य सम्पूर्ण जगत का शासक हो जाए, किसी देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हो जाए, उसके पास सारे अधिकार हो जाएं परन्तु वह अपनी आत्मा की हानि उठाए तो यह एक बेकार का सौदा होगा, यह मूर्खता का सौदा होगा। एक पास्टर ने अपनी पुस्तक में अपने जीवन की कुछ घटनाओं को लिखा है। यह पास्टर अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में रहते थे। एक दिन वह सबवे ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। उस ट्रेन में बहुत भीड़ थी और काफी लोग खड़े होकर सफर कर रहे थे। उन्होंने देखा कि एक युवती बैठी हुई है, जो सिसक-सिसक कर रो रही है। उसके चेहरे पर निराशा के भाव हैं। उस पासबान से रहा नहीं गया और उन्होंने उस युवती से पूछा कि बेटी क्या बात है? उस युवती ने कुछ जवाब नहीं दिया। तब पास्टर ने दूसरी बार उससे पूछा और उसने कहा कि मैं अपने जीवन से थक चुकी हूं, मैं अपने जीवन से हार चुकी हूं। मेरे जीवन में इतने धोखे हुए हैं कि अब मैं और सह नहीं सकती। मैं जा रही हूं कि अपने जीवन को नाश कर लूं। पासबान उसकी ओर देखकर मुस्कराया और कहा - बेटी, क्या तुमने कभी प्रभु यीशु मसीह के बारे में सुना है? उस युवती ने उस पासबान की तरफ अजीब सी निगाहों से देखा और कहा कि पास्टर साहब, क्या आप बता सकते हैं कि आपका प्रभु यीशु मसीह ऐसी कौन सी चीज़ दे सकता है जो दुनिया में और कोई नहीं दे सकता। जिसे दुनिया में कोई खरीद नहीं सकता, जिसे दुनिया में कोई अर्जित नहीं कर सकता? ऐसी कौन सी चीज़ है दुनिया में, जिसे प्रभु यीशु मसीह दे सकता है? पास्टर ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा - मैं तुमको बताता हूं कि प्रभु यीशु मसीह हमें ऐसी कौन सी चीज़ देता है; जो इस संसार और कोई नहीं दे सकता और वह है पापों की क्षमा और अनन्त जीवन। तब वह युवती प्रभु यीशु मसीह के पास आई, उसके दिल से उसकी अपराध भावना का बोझ अलग हो गया। स्वतंत्र हृदय से उसने प्रभु यीशु मसीह को अपना जीवन दिया और उसके बाद वह प्रभु यीशु मसीह की गवाही देने लगी। 2 कुरिन्थियों 4:17-18 पद में पौलुस कहता है - ''क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं''। 2. अनेदखा सच हमारे जीवन में सबसे बड़ी सामर्थ्य देता है :- अनदेखा सच हमारे जीवन को सामर्थ्य से भरता है। जब हम निराश होते हैं, जब हम दुखी होते हैं, तो इससे हमें सांत्वना मिलती है। जब हम टूटे हुए होते हैं तो हमको दृढ़ता मिलती है। 2 राजा 6:8-23 में एक घटना का वर्णन है। जब आराम के राजा ने एलीशा को पकड़वाकर मार डालने की योजना बनाई तब लिखा हुआ है कि एक रात एलीशा दोतान नगर में अपने सेवक के साथ ठहरा हुआ था। और आराम के राजा को पता चला कि एलीशा अपने सेवक के साथ दोतान नगर में ठहरा है। आराम के राजा ने उस घर को चारों तरफ से अपनी सेना, अपने सिपाहियों, अपने घुड़सवारों और प्यादों से घिरवा दिया। सुबह एलीशा का दास जब बाहर देखता है तो घबरा जाता है और कहता है कि हम तो मारे जाएंगे। वह घबराया हुआ सा एलीशा के पास आता है और तब एक बड़ी अजीब सी बात वहां पर लिखी हुई है। एलीशा प्रार्थना करता है कि हे यहोवा इसकी आंखें खोल दे कि वह देख सके। तब परमेश्वर ने उसके टहलुए की आंखें खोल दीं और तब वह देखता है कि एक और सेना है, जो उस सेना के पीछे है, जो परमेश्वर की सेना है और जो आराम के राजा की सेना से कहीं अधिक शक्तिशाली है। जो परमेश्वर के लोग होते हैं, और उसकी सामर्थ्य पर विश्वास करते हैं; परमेश्वर अपने दूतों के द्वारा उनकी रक्षा करता है। डॉ. बिली ग्राहम ने स्वर्गदूतों के विषय में एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम 'एंजल्स' है। उन्होंने लिखा है कि एक समय था, जब स्वर्ग के दूत परमेश्वर के वचन को प्रगट करते थे। उसके वचन की उदघोषणा करते थे। परन्तु आज दूतों का रोल बदल गया है, उनकी भूमिका बदल गई है। वे परमेश्वर के लोगों की रक्षा कर रहे हैं। इसीलिए वचन में लिखा है कि धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है। प्रार्थना के प्रभाव के सम्बन्ध में एक बहुत प्रभावशाली सन्दर्भ बाइबिल में 2 राजा 20:1-7 में पाया जाता है। इस सन्दर्भ में हिजक्य्यिाह राजा का वर्णन है। हम पाते हैं कि हिजक्य्यिाह राजा ऐसा रोगी हुआ कि वह मरने पर था। तब यशायाह भविष्यवक्ता के पास परमेश्वर का वचन पहुंचा कि जा और हिजक्य्यिाह राजा से कह दे कि तेरा समय पूरा हो गया है। तेरी मृत्यु निकट है। जब यशायाह हिजक्य्यिाह को यह सूचना देता है तो लिखा हुआ है कि हिजक्य्यिाह घुटनों पर चला जाता है। वह रोता है, प्रार्थना करता है और गिड़गिड़ाता है, तब परमेश्वर उसकी प्रार्थना को सुनता है। जब हिजक्य्यिाह राजा दिल को खोलकर, अपनी आत्मा को उण्डेलकर, आंसुओं के साथ प्रार्थना करता है तो उसके आंसुओं की प्रार्थना से परमेश्वर की योजना बदल जाती है। परमेश्वर की चेतावनी हिजक्य्यिाह राजा को सुनाने के बाद यशायाह राजा के पास से चला जाता है परन्तु इससे पहले कि वह नगर की सीमा के बाहर पहुंचता, परमेश्वर का वचन उसके पास पहुंचता है कि जा, हिजक्य्यिाह से कह दे कि मैंने तेरी प्रार्थना सुनी है, मैंने तेरे आंसुओं को देखा है और मैं तेरी उम्र 15 वर्ष बढ़ा दूंगा। मैं तेरे राज्य को आशीषित करूंगा। मैं तेरे शत्रुओं को कमज़ोर करूंगा और तुझे बलवान बनाऊंगा। आंसुओं की प्रार्थना से, हृदय की प्रार्थना से, परमेश्वर की योजना बदल जाती है। यह अनदेखा सच है जो हमारे जीवन में हमारे साथ होता है, जब हम उस अनदेखे सच की ओर देखते हैं, उस पर विश्वास करते हैं। 3. अनदेखे सच के विषय में तीसरी बात यह है कि इसे मृत्यु भी समाप्त नहीं कर सकती :- शरीर तो समाप्त हो जाता है परन्तु आत्मा कोई समाप्त नहीं कर सकता। प्रेरितों के काम में स्तिफनुस के वध का वर्णन है। स्तिफनुस कलीसिया का पहला सेवक था, उस पर पत्थरवाह किया गया, चारों तरफ से लोगों ने उसको घेर लिया। उसके प्रचार से वे क्रोधित हो गए और उस पर पत्थरवाह किया गया। लिखा हुआ है कि जब उसको मारा जा रहा था तब वह अपनी आंखें उठाकर स्वर्ग की ओर देखता है, और देखता है कि स्वर्ग का द्वार खुला हुआ है। वह परमेश्वर को सिंहासन पर बैठे हुए देखता है और लिखा हुआ है कि परमेश्वर के दाहिने हाथ प्रभु यीशु मसीह खड़ा था। बाइबिल में सिर्फ़ इस स्थान के अलावा और कहीं नहीं लिखा गया कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर के दाहिनी ओर खड़ा है। ऐसा लगता है कि जैसे स्तिफनुस की आत्मा को स्वीकार करने के लिए, उसकी आत्मा के आदर में प्रभु यीशु मसीह उसको सम्मान देने के लिए खड़ा हो गया। इसीलिए 1 कुरिन्थियों 15:19 में लिखा हुआ है - ''यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं।'' लूका 12:15 में लिखा है - ''चौकस रहो, और हर प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो : क्योंकि किसी का जीवन उस की सम्पत्तिा की बहुतायत से नहीं होता।'' प्रभु यीशु मसीह में क्षमता थी कि वह अनदेखे सच को देख सकता था। उसने मछुओं को देखा और उसने देखा एक अनदेखे सच को। उसने देखा कि ये मात्र मछुए नहीं हैं परन्तु मनुष्यों को पकड़ने की इनमें सम्भावना है। एक अन्धे को देखकर यीशु के चेले उससे पूछने लगे कि इसने पाप किया था या इसके माता-पिता ने कि यह अन्धा जन्मा। प्रभु यीशु मसीह जवाब देता है कि यह अन्धा इसलिए जन्मा कि इसमें परमेश्वर की सामर्थ्य प्रगट हो। उस अंधत्व में महिमा प्रकट करने के लिए प्रभु यीशु मसीह के पास दृष्टि थी। जब हम क्रूस को देखते हैं तो हम पाते हैं कि यह परमेश्वर की अर्न्तदृष्टि थी, कि क्रूस के द्वारा, क्रूस की कथा के प्रचार के द्वारा, हमारी आत्माओं को बचाया जा सके। उस क्रूस के द्वारा हमारे लिए अनन्त जीवन का द्वार खोला जा सके। संसार का नज़रिया भिन्न है। जो लोग वनस्पति शास्त्र पढ़ते हैं, वे एक फूल लेते हैं, फूल में से उसकी पंखुड़ियों को निकाल देते हैं और कुछ भाग को करेक्स और किसी को करोला लिखते हैं। फूल चला जाता है, उसकी सुगन्ध समाप्त हो जाती है और वह मात्र एक सूत्र बन जाता है। वैज्ञानिक मनुष्य के शरीर के लिए लिखते हैं कि मनुष्य क्या है। वे कहते हैं कि इसमें कुछ मात्रा में एच 2 ओ, कुछ कैल्शियम है, सोडियम है, हार्डड्रोक्लोरिक ऐसिड है, फास्फोरस है, पोटेशियम है और भी न जाने इसमें कौन कौन सी चीज़ें हैं जिनसे मनुष्य का शरीर बना है। वे शरीर को कुछ कैमिकल्स का एक संयोजन मात्र मानते हैं। मैं टेलीविजन पर एक पैरवी देख रहा था। यह दुनिया के बहुत भयंकर हत्या कांड की अदालती कार्यवाही थी। हत्यारा अपनी पहली सुनवाई में बच गया था और दूसरी सुनवाई हायर कोर्ट में चल रही थी। हत्यारे के वकील का तर्क था कि इसने अगर हत्या की है तो इसको क्षमा कर दिया जाना चाहिए क्योंकि इसके शरीर की जो क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं होती हैं, इसके जो जीन्स हैं उनमें समस्या है। इसका पिता व्यभिचारी थे, इसके दादा ने चोरी की थी। इसके दादा के पिता ने डकैती डाली थी और अब इसने हत्या की है। यह तो इसके जीन्स की खराबी है। यह तो इसके शरीर की रासायनिक क्रियाओं का असंतुलन है। संसार और विज्ञान की दृष्टि में, बड़े-बड़े वैज्ञानिक की दृष्टि में मनुष्य मात्र कुछ रासायनिक तत्वों का मिश्रण है। परन्तु उनकी नज़र इस बात पर नहीं जाती कि मनुष्य परमेश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति है। परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी समानता में रचा है। परमेश्वर ने अपना आत्मा मनुष्य को दिया है। अपने पुत्र को मनुष्य के खातिर बलिदान कर दिया। और इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारी देह पवित्र आत्मा का मन्दिर है। मत्ती 5:29-30 में लिखा है - ''यदि तेरी दाहिनी आंख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकाल कर अपने पास से फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में डाला जाए। और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उस को काटकर अपने पास से फेंक दे, क्योंकि तेरे लिये यही भला है, कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए''। इस सन्दर्भ की बहुत सी व्याख्याएं हो सकती हैं परन्तु जो प्रमुख बात है, जो प्रभु यीशु मसीह कहना चाहते हैं वह यह कि तुम्हारी आत्मा तुम्हारे शरीर से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि तुम्हारी आत्मा स्वर्ग में जाती तो तुम इस संसार में अपंग या अपाहिज होकर जी लो तो वह बेहतर है। आज हमारे लिए बड़ी त्रासदी की बात है कि जब चंगाई के नाम पर सभाएं लगती हैं तो लाखों लोग जमा हो जाते हैं क्योंकि शारीरिक चंगाई चाहिए। परन्तु जब वचन का प्रचार किया जाता और आत्मा की चंगाई की बात होती है तो आज हमारे देश में उनके लिए उतना आकर्षण नहीं है। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं कि शारीरिक चंगाई नहीं होती और जो लोग चंगाई देते हैं उनके लिए मैं कोई नकारात्मक बात भी नहीं कह रहा हूं। परन्तु हमारे लिए आज हमारी आत्मा की चंगाई की बात आवश्यक नहीं रह गई। दिन भर में हम कितना समय अपने शरीर के लिए, अपनी सुख-सुविधाओं के लिए, रोटी पाने के लिए बिताते हैं और कितना समय हम अपनी आत्मा के लिए बिताते हैं। यदि मैं आपसे पूछूं कि दिन भर के 24 घण्टों में क्या आप सिर्फ़ 10 मिनिट भी खामोशी के साथ परमेश्वर की निकटता में बिताते हैं? क्या अपनी आत्मा की चिन्ता के लिए, उसके वचन के अध्ययन और प्रार्थना के द्वारा उससे सम्पर्क करने के लिए समय बिताते हैं तो जवाब शायद नहीं में होगा। आज 10 मिनिट का भी समय हमारे पास नहीं है क्योंकि हमारा सारा ध्यान देखे हुए सच की ओर ही केन्द्रित है। इसीलिए प्रभु यीशु मसीह कहते हैं कि पहले उसके धर्म और राज्य की खोज करो तो ये सब वस्तुएं तुम्हें मिल जाएंगी। जब पण्डित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई तो उनके पलंग के निकट एक पुस्तक खुली हुई पड़ी थी जो इंग्लैण्ड के प्रमुख कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट की पुस्तक थी। उस पुस्तक के उस खुले हुए पन्ने पर जो कविता लिखी हुई थी उसका किसी ने हिन्दी अनुवाद इन शब्दों में किया है - बुलाता यह सुन्दर सघन वन सुहाना, मुझे किन्तु वादे बहुत से निभाना। और सोने से पहले बहुत दूर जाना, और सोने से पहले बहुत दूर जाना॥ यह संसार हमको आकर्षित तो करता है। यह सघन वन बहुत सुहाना है जो हमको आकर्षित करता है परन्तु यह देखा हुआ सच ही सब कुछ नहीं है। यह सघन वन सुहाना ही सब कुछ नहीं है। यह संसार का आकर्षण ही सब कुछ नहीं है किन्तु मुझे वादे बहुत से निभाना है। कुछ वायदे हैं, जीवन के कुछ संकल्प हैं, कुछ नियम हैं, कुछ सिध्दान्त हैं, आत्मा की कुछ बातें हैं। यह अनदेखा हुआ सच है जिसकी ओर मुझे बढ़ते जाना है और सोने से पहले बहुत दूर जाना, और सोने से पहले बहुत दूर जाना है। जब हम क्रूस की ओर देखते हैं। जब हम क्रूस के आसपास के लोगों की ओर देखते हैं तो हम देखें कि काश! हमारा जीवन उन लोगों के समान न हो, जो क्रूस की छाया में थे, जो क्रूस की निकटता में थे, जो कलवरी से बहते हुए रक्त की धार के पास बैठे थे परन्तु जिनका ध्यान उन चिन्दियों में था, उन कपड़ों में था और उनके लिए वे चिट्ठियां डाल रहे थे। काश! हमारा ध्यान उस कलवरी की ओर हो, काश! हमारा ध्यान उस प्रभु परमेश्वर की ओर हो जिसने हमारे लिए, हमारी आत्मा को बचाने के लिए अपना सब कुछ इस संसार में दे दिया। जब हम उस क्रूस की ओर दृष्टि लगाएंगे और हम अनदेखे सच को निहारेंगे तभी हमारा जीवन इस संसार से पार होकर अनन्त जीवन में विलीन हो सकेगा। परमेश्वर आपको आशीष दे।