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असफलता की राह से

संदर्भ: यूहन्ना 21ः15-19

“भोजन करने के बाद यीशु ने शमौन पतरस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू इन से बढ़कर मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उस से कहा, हां, प्रभु, तू तो जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: उस ने उस से कहा, मेरे मेमनों को चरा। उस ने फिर दूसरी बार उस से कहा, हे शमौन यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रेम रखता है? उस ने उस से कहा, हां, प्रभु तू जानता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: उस ने उस से कहा, मेरी भेड़ों की रखवाली कर। उस ने तीसरी बार उस से कहा, हे शमौन, यूहन्ना के पुत्र, क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? पतरस उदास हुआ, कि उस ने तीसरी बार ऐसा कहा; कि क्या तू मुझ से प्रीति रखता है? और उस से कहा, हे प्रभु, तू तो सब कुछ जानता है: तू यह जानता है कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं: यीशु ने उस से कहा, मेरी भेड़ों को चरा। मैं तुझ से सच सच कहता हूं, जब तू जवान था, तो अपनी कमर बान्धकर जहां चाहता था, वहां फिरता था; परन्तु जब तू बूढ़ा होगा, तो अपने हाथ लम्बे करेगा, और दूसरा तेरी कमर बान्धकर जहां तू न चाहेगा वहां तुझे ले जाएगा। उस ने इन बातों से पता दिया कि पतरस कैसी मृत्यु से परमेश्वर की महिमा करेगाऋ और यह कहकर, उस से कहा, मेरे पीछे हो ले” (यूहन्ना 21ः15-19)।

इस घटना से पहले हम पतरस को असफल और कमज़ोर व्यक्ति के रूप में पाते हैं। वह पतरस जो प्रभु यीशु के साथ जीने और मरने के वायदे करता था, जिसके लिए प्रभु यीशु ने कहा था कि इस चट्टान पर, इस विश्वास पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊंगा; वही पतरस प्रभु यीशु को पहचानने से इन्कार कर देता है। हम पाते हैं कि पतरस अपने जीवन में असफलता के दौर से गुज़रता है।

इन दिनों बच्चों के परीक्षाफल आ रहे हैं। बच्चे अपने रिज़ल्ट्स का इन्तज़ार कर रहे हैं। सबके दिलों में एक बेचैनी है, एक घबराहट है, उत्साह है। जब रिज़ल्ट आता है तो खुशी भी होती है और कुछ ग़म भी होता है। कोई पास होता है तो कोई फेल। किसी को जितने अंकों की अपेक्षा थी उससे ज्य़ादा मिल जाते हैं वहीं अधिकांश को अपेक्षा से कम अंक मिलते हैं। तब लगता है कि यह क्या हो गया? यह असफलता कैसे आई? यह सन्देश, इसी बात से सम्बन्धित है कि जब जीवन में असफलता आती है तो उसका सामना कैसे किया जाए।

यह असफलता और परीक्षाफल की बात सिर्फ़ बच्चों और जवानों के साथ ही नहीं है। यह बात हम सब के जीवनों से जुड़ी हुई है। हम में से हर एक किसी न किसी रूप में, कहीं न कहीं, कभी न कभी असफल हुआ है। जीवन में ऐसा हो नहीं सकता कि हर मुकाम पर, हर कदम पर, हर स्थान पर हमें सफलता मिले। हमें असफलता का सामना करना ही पड़ता है। हम चाहे मानें या न मानें, अपने जीवन में हम कहीं न कहीं असफल रहे हैं। हो सकता है कि हमारा परीक्षा का रिज़ल्ट तो अच्छा रहा, परन्तु हम अपने कार्य में असफल हो गए हों। हो सकता है हम अपने सम्बन्धों का निर्वाह करने में असफल हो गए हों। हो सकता है हम अपने जीवन के सही निर्णय करने में असफल हो गए हों। हो सकता है अपने जीवन में जो वायदे हमने किए हों, उनका निर्वाह करने में असफल हो गए हों। हो सकता है कि अच्छाई को स्वीकार करने और बुराई को नकारने में हम असफल हो गए हों। अच्छे पिता बनने में, अच्छे पति बनने में असफल हो गए हों। इन सबसे बढ़कर सम्भव बात यह है कि प्रभु यीशु के साथ जीवन बिताने में, उसके साथ-साथ चलने में, उसकी आज्ञाओं को मानने में, उसके वचन का पालन करने में निश्चित रूप से कहीं न कहीं हम असफल रहे हैं।

जीवन में असफलता को स्वीकार करना या उसे अंगीकार करना कठिन होता है। जीवन में असफलता आने पर हमारी कई प्रतिक्रियाएं होती हैं। एक प्रतिक्रिया यह हो सकती है कि हम निराश हो जाएं, परमेश्वर से दूर चले जाएं। हम यह जानते हैं कि कई लोग असफल हो जाने के बाद आत्महत्या कर लेते हैं। विश्व में होने वाली आत्महत्याओं में से 40 प्रतिशत आत्महत्याएं भारत में होती हैं। आत्महत्या की दर विश्व में सबसे ज्य़ादा भारत में है। बहुत-सी महिलाएं विवाह के प्रथम वर्ष में आत्महत्या कर लेती हैं, इसके कई कारण हो सकते हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर आत्महत्या करने वालों की संख्या उन युवाओं की है जो परीक्षाओं के परिणाम आने के बाद, इन्टरव्यू के रिज़ल्ट खुलने के बाद आत्महत्या कर लेते हैं। यह प्रतिक्रिया का एक अन्तिम छोर है, दूसरा छोर यह है कि बहुत से लोगों के जीवन में असफलता आने पर उन पर कोई असर नहीं पड़ता। उनके जीवनों में कोई बदलाव नहीं आता और वे वैसे ही आगे बढ़ते जाते हैं।

बहुत से ऐसे लोगों का वर्णन हम पाते हैं जो अपनी कक्षाओं में, जीवन के बहुत सारे क्षेत्रों में असफल रहे परन्तु अन्त में, एक सफल व्यक्ति के रूप में जाने गए।

स्टीफन पाइल ने एक पुस्तक लिखी है - जिसका नाम है - ‘असफलताओं की अपूर्ण पुस्तक’ (The incomplete book of failures)। इस लेखक का यह मानना है कि असफल लोगों की दास्तान तो बनी रहेगी, यह श्रृंखला तो अपूर्ण है। अपनी इस पुस्तक में स्टीफन पाइल ने कुछ असफल लोगों की सफलता के विषय में लिखा है।

प्रमुख वैज्ञानिक थाॅमस एडीसन के विषय में स्टीफन ने लिखा है कि एडीसन के शिक्षक ने उनके माता-पिता को एक कमेन्ट लिखकर भेजा था जिसमें उसने लिखा था - आपका बच्चा बेदिमाग है और उसमें सीखने की क्षमता नहीं है (Your son is too stupid to learn.) अल्बर्ट आइन्स्टीन के शिक्षक ने उनकी काॅपी पर लिख दिया था कि यह मानसिक रूप से मन्द बुद्धि के हैं, लोगों के साथ उन्हें मिलना-जुलना आता नहीं और ऐसा लगता है कि वह अपने जीवन के बेवकूफी भरे स्वप्नों में खोए रहते हैं। इस प्रकार का छात्र अध्ययन करने के योग्य नहीं है। (He is mentally slow - unsociable and is dçZy with his foolish dreams.) परन्तु हम जानते हैं कि अल्बर्ट आइन्स्टीन ने जो खोज की, उसका लाभ आज भी हम उठा रहे हैं।

वाॅल्ट डिज़्नी ने जब अपना कार्य प्रारम्भ किया तो वह एक न्यूज़ पेपर में काम करते थे। चार माह के बाद अख़बार का सम्पादक उनसे नाराज़ हो गया, उसने उन पर जो आक्षेप लगाए तथा कार्य से निकाले जाने की जो वजह लिखी, उस पत्र में लिखा था - डिज़्नी, तुम्हारे पास कोई नया विचार नहीं है कि तुम न्यूज़ पेपर के साथ काम कर सको। (No new ideas to work with our newspaper)। उसके बाद डिज़्नी ने वह कर दिखाया जो किसी से छिपा नहीं। बच्चों के मनोरंजन के लिए सुन्दर फिल्मों का निर्माण किया और उनके द्वारा बनाये गए वल्र्ड आॅफ डिज़्नी म्यूज़ियम पार्क की सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठा है।

अब्राहम लिंकन के कानूनी सलाहकार टाॅमस ने उन्हें सलाह दी थी कि नगरपालिका से लेकर सीनेट तक तुमने 8 चुनाव लड़ लिये, इन सारे चुनावों में तुमने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। तुम आठ बार चुनाव हार चुके हो, इसलिए अब चुनाव लड़ना छोड़ दो। परन्तु 8 चुनावों में हार के बाद अब्राहम लिंकन अमेरिका के सबसे विख्यात और सफल राष्ट्रपति के रूप में साबित हुए।

बाइबिल में परमेश्वर के जितने महान लोग हुए हैं उनको कहीं न कहीं असफलता का सामना करना पड़ा है। ये सभी अपने जीवन में असफलता के दौर से गुज़रे। इब्राहीम को विश्वास का पिता कहा जाता है, जो परमेश्वर के प्रति इतना आज्ञाकारी था कि अपने एकलौते पुत्र को बलिदान करने के लिए तैयार हो गया। परन्तु उत्पत्ति 12ः12-16 में हम पाते हैं कि यही इब्राहीम अपनी सुरक्षा के लिए, अपने लाभ के लिए झूठ बोलता है। वह अपनी पत्नी को बहन बना लेता है। उसकी पत्नी सारा बहुत सुन्दर थी और जब उसे राजा ने अपने राजमहल में बुलाकर रख लिया तो उसके बदले में इब्राहीम को बहुत-सा लाभ मिला, उसे जानवर और बहुत-सा धन मिला। इब्राहीम ने झूठ बोला और परमेश्वर की दृष्टि में वह उस स्थान पर असफल हो गया।

मूसा ने संसार के सबसे बड़े स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की, लाल समुद्र को पार किया। जिसने इस्राएलियों को मिस्र की बन्धुवाई से छुड़ाया, वह क्रोध करता है, परमेश्वर की आज्ञा की अवहेलना करता है।

उसके बाद व्यवस्थाविरण 34ः4 में लिखा है - “तब यहोवा ने उस से कहा, जिस देश के विषय में मैं ने इब्राहीम, इसहाक और याकूब से शपथ खाकर कहा था, कि मैं इसे तेरे वंश को दूंगा वह यही है। मैं ने इसको तुझे साक्षात् दिखला दिया है, परन्तु तू पार होकर वहां जाने न पाएगा”। परमेश्वर मूसा से कहता है कि तूने फिरौन के सामने जाकर कहा तो है कि मेरे लोगों को जाने दे। बीस लाख लोगों को तूने बन्धुवाई से निकाला है, तूने लाल समुद्र को भी पार किया है। परन्तु तू उस प्रतिज्ञा किए हुए देश में न जाने पाएगा क्योंकि तूने क्रोध किया है, तूने मेरी आज्ञाओं की अवहेलना की है और मूसा उस देश में जाने से वंचित हो जाता है। वह सांसारिक दृष्टि से असफल हो जाता है।

यदि यूसुफ के विषय में देखें तो सांसारिक नज़रिये से उसने अनेक बार असफलता का अहसास किया होगा। भाइयों ने उसे गड़हे में डाल दिया। उसे बन्धुवाई में ले जाया गया। उसको दास बनाकर दो बार बेच दिया गया। उस पर झूठे आरोप लगाए गए और उसे कै़द में डाल दिया गया।

संसार की नज़रों में, यूसुफ, एक ऐसा व्यक्ति है जिसे गुलाम बनाकर बेचा गया, जिसके साथ धोखा हुआ, जिसे कै़द में डाल दिया गया। सांसारिक मापदण्डों के आधार पर देखें तो यूसुुफ एक असफल व्यक्ति था।

दानिय्येल एक धर्मी युवा था, परमेश्वर की आज्ञाओं को मानने वाला था, परमेश्वर का भय रखने वाला व्यक्ति था। परन्तु उसे बन्धुवाई में ले जाया। परमेश्वर की आज्ञा पर चलने के लिए राजा की आज्ञा को ठुकराने पर उसे सिंहों की मांद में डाल दिया गया। दानिय्येल को लगता होगा कि शायद मेरा जीवन असफल हो गया।

यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की उम्र उस समय लगभग 30 वर्ष की रही होगी जब उसका सिर काट कर थाल में सजा कर राजा के सामने पेश किया गया। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला सांसारिक दृष्टि से एक असफल व्यक्ति के रूप में सामने आता है।

किसी ने कहा है कि प्रभु यीशु ने भी किसी हद तक असफलता का अहसास किया। मरकुस 6ः4-6 में उनकी असफलता का वर्णन मिलता है - “यीशु ने उन से कहा, कि भविष्यद्वक्ता अपने देश और अपने कुटुम्ब और अपने घर को छोड़ और कहीं भी निरादर नहीं होता। और वह वहां कोई सामर्थ्य का काम न कर सका, केवल थोड़े बीमारों पर हाथ रखकर उन्हें चंगा किया। और उस ने उन के अविश्वास पर आश्चर्य किया और चारों ओर के गांवों में उपदेश करता फिरा”।

प्रभु यीशु उस स्थान में सामथ्र्य के कार्य न कर सका और उसे किसी हद तक इस असफलता का अहसास हुआ होगा। किसी टीकाकार ने लिखा है कि प्रभु यीशु उस धनी युवा प्रशासक के जीवन का परिवर्तन करने में असफल रहा, जो उसके पास आया था क्योंकि लिखा है - “परन्तु वह जवान यह बात सुन उदास होकर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था” (मत्ती 19ः22)।

जब असफलता हमारे जीवन में आती है तो हमें क्या करना है? असफलता को हमें कैसे स्वीकार करना है, असफलता के प्रति हमारी प्रतिक्रिया क्या होना चाहिए?

1. हमें पीछे मुड़कर देखते हुए अपनी ग़लतियों को स्वीकार करना है:- प्रभु यीशु के पुनरुत्थान के पश्चात् पतरस उसके सामने खड़ा है और प्रभु यीशु उससे पूछते हैं कि हे पतरस क्या तू मुझसे प्रेम रखता है? इन सारी बातों से, इस नाव से, इस जाल से, अपने धंधे से, अपने मित्रों से बढ़कर क्या तू मुझसे प्रेम रखता है? पतरस कहता है कि प्रभु तू तो जानता है कि मैं तुझसे कैसी प्रीति रखता हूं। जब पतरस ने इस बात को कहा कि प्रभु तू तो जानता है तो उसने अपने अतीत को स्मरण किया होगा कि वह किस प्रकार प्रभु यीशु के सामने असफल हो गया? किस प्रकार उसने प्रभु यीशु को पहिचानने से इन्कार कर दिया?

जब तक हम मानेंगे नहीं कि हम बीमार हैं, तब तक हमारा इलाज कैसे होगा? जब तक हम स्वीकार नहीं करेंगे कि हम अस्वस्थ हैं, तब तक हम दवा कैसे लेंगे? जब तक हम पश्चात्ताप नहीं करेंगे, तब तक हमें उद्धार कैसे मिलेगा? जब तक हम अपने पापों को अंगीकार नहीं करेंगे, हमको अनन्त जीवन मिलेगा नहीं।

घमण्ड से भरा हुआ एक युवा अपने पिता के पास जाता है और उससे कहता है कि मुझे अपनी सम्पत्ति का हिस्सा दे दे ताकि मैं अपनी इच्छा के अनुसार उस धन का उपयोग कर सकूं, उपभोग कर सकूं। दूर देश जाकर वह अपनी सारी सम्पत्ति उड़ा देता है। उसके बाद वह अपने आप को सुअरों के बीच निकृष्टतम दशा में पाता है। उसे अपनी पापमय दशा का अहसास होता है और वह कहता है - “मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है। अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मज़दूर की नाईं रख ले” (लूका 15ः18-19)।

जब हम असफल होते हैं तो हम पीछे मुड़कर देखें और अपनी कमज़ोरियों को, अपनी ग़लतियों को स्वीकार करें। यह बात आसान नहीं है क्योंकि हमारा घमण्ड, हमारा अहं अवरोध बन जाता है कि हम अपनी ग़लती कैसे स्वीकार करें, हम अपनी कमज़ोरी कैसे स्वीकार करें और इसीलिए हम अपने जीवन में असफलता से ऊपर नहीं उठ पाते, अपने जीवन में परमेश्वर की आशीष प्राप्त नहीं कर पाते। अपने जीवन में परमेश्वर के लिए कुछ सकारात्मक नहीं कर पाते। हमारा घमण्ड, हमारा पद, हमारी प्रतिष्ठा हमारे लिए प्रमुख हो जाती है और इस कारण हम यह स्वीकार नहीं करना चाहते कि हम असफल हो गए हैं।

भजन संहिता 51ः3-4,9,17 में लिखा है - “मैं तो अपने अपराधों को जानता हूं, और मेरा पाप निरन्तर मेरी दृष्टि में रहता है। मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है, ताकि तू बोलने में धर्मी और न्याय करने में निष्कलंक ठहरे। अपना मुख मेरे पापों की ओर से फेर ले, और मेरे सारे अधर्म के कामों को मिटा डाल। टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता”।

विलापगीत 5ः16-17 में लिखा है - “हमारे सिर पर का मुकुट गिर पड़ा है; हम पर हाय, क्योंकि हम ने पाप किया है ! इस कारण हमारा हृदय निर्बल हो गया है, इन्हीं बातों से हमारी आंखें धुंधली पड़ गई हैं”।

प्रभु यीशु फरीसियों और शास्त्रियों के जीवन को देखकर कहते हैं कि इनसे पहले तो वेश्याएं और महसूल लेने वाले स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेंगे क्योंकि वे टूटे हुए हैं, कुचले हुए हैं और उन्हें अपने पापों का अहसास है। जबकि ये शास्त्री और फरीसी अपने घमण्ड और अपनी धार्मिकता में फूले हुए हैं।

असफलता को स्वीकार करने की दिशा में न सिर्फ़ हमें पीछे मुड़कर अपनी ग़लतियों को स्वीकारना है वरन्;

2. हमें ऊपर देखना है और परमेश्वर से मार्गदर्शन मांगना है:- पतरस अपने जीवन में टूटा हुआ तो है परन्तु वह प्रभु यीशु की ओर अपनी दृष्टि लगाता है और उससे कहता है कि हे प्रभु तू तो जानता है कि मैं तुझसे कैसी प्रीति रखता हूं। वह तीन बार यह बात कहता है।

यूहन्ना के 21 वें अध्याय में हम पाते हैं कि प्रभु यीशु का पुनरुत्थान हो चुका है। चेले मछली पकड़ने के अपने धन्धे में वापस लौट गए हैं। उसके बाद लिखा है कि पूरी रात उन्होंने प्रयास किया परन्तु वे मछलियां पकड़ने में असफल रहे। उसके बाद वहां प्रभु यीशु आते हैं और उनसे कहते हैं कि इस स्थान पर जाल डालो। वे प्रभु यीशु की आज्ञा मानकर जाल डालते हैं और तब इतनी मछलियां आ जाती हैं कि जाल फटने लगता है। इसके बाद एक बहुत प्रमुख बात वहां सामने आती है, जिस पर अक्सर हम ध्यान नहीं देते। हम पाते हैं कि प्रभु यीशु ने उनके लिए नाश्ता तैयार किया और तब यूहन्ना 21ः12 में लिखा है कि उसने उनसे कहा - “आओ भोजन करो”।

यह बहुत महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण बात है। यहूदी संस्कृति के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी को भोजन का न्योता देता था, उसे अपने घर बुलाता था, उसके लिए भोजन की मेज़ लगाता था तो इसका अर्थ यह होता था कि उसने उस व्यक्ति को क्षमा कर दिया। यदि कोई दुश्मन रहा हो और उसे न्योता जाए कि मेरे घर आज भोजन करने आना तो उस न्योते में यह सन्देश होता था कि मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया।

यहूदी संस्कृति के अनुसार कभी भी ऐसे व्यक्ति को भोजन पर नहीं बुलाया जाता था, जिसे क्षमा न किया गया हो। पुनरुत्थान के बाद प्रभु यीशु अपने चेलों से मिलते हैं, उनके लिए मेज़ लगाते हैं और उनसे कहते हैं - “आओ भोजन करो”। दूसरे शब्दों में प्रभु यीशु उनसे कह रहे हैं कि मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया। मैं तुम्हें अपनी मेज़ में शामिल होने के लिए बुला रहा हूं क्योंकि मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया है। पतरस इस बात को समझता है और इसीलिए अपने टूटे हुए हृदय को लेकर वह प्रभु से कहता है, हे प्रभु तू तो जानता है कि मैं तुझसे कैसी प्रीति रखता हूं।

किसी ने लिखा है कि किसी विश्वासी के लिए असफलता के 3 सकारात्मक परिणाम हो सकते हैं।

(1) जब कोई विश्वासी असफल होता है तो उससे उसकी निर्भरता परमेश्वर पर बढ़ती है। हमें इस बात का अहसास होता है कि हम सर्वशक्तिमान नहीं हैं, हम कमज़ोर हैं।

(2) असफलता हमारे घमण्ड को तोड़ती है, यह हमारे हृदय को घमण्ड के भयंकर पाप से बचाती है क्योंकि यह ऐसा पाप है जो स्वर्गदूत को शैतान बना देता है।

(3) जीवन को नई दिशा में परिवर्तन का अवसर मिलता है।

भजन संहिता 51ः1-2 में लिखा है - “हे परमेश्वर, अपनी करुणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे। मुझे भली-भांति धोकर मेरा अधर्म दूर कर, और मेरा पाप छुड़ाकर मुझे शुद्ध कर”।

सिर्फ़ इतना पर्याप्त नहीं है कि अपनी ग़लतियों का अहसास हो जाए और हम उन ग़लतियों को स्वीकार कर लें। परन्तु उसके बाद परमेश्वर की ओर देखना है और उससे दिशा निर्देश मांगना है, निवेदन करना है कि हे परमेश्वर, मेरे अपराधों को मिटा दे, मेरे जीवन को एक नई दिशा दे।

2 इतिहास 7ः14-15 में लिखा है कि - “तब यदि मेरी प्रजा के लोग जो मेरे कहलाते हैं, दीन होकर प्रार्थना करें और मेरे दर्शन के खोजी होकर अपनी बुरी चाल से फिरें, तो मैं स्वर्ग में से सुनकर उनका पाप क्षमा करूंगा और उनके देश को ज्यों का त्यों कर दूंगा। अब से जो प्रार्थना इस स्थान में की जाएगी, उस पर मेरी आंखें खुली और मेरे कान लगे रहेंगे”।

न सिर्फ़ हमें पीछे मुड़कर अपनी ग़लतियों को स्वीकार करना है, न सिर्फ़ हमें परमेश्वर से दिशा निर्देश लेना है। परन्तु;

3. हमें आगे बढ़कर चुनौतियों को स्वीकार करना है:- असफलता को पीछे छोड़ना ज़रूरी है। असफलता के साथ जीवन जीना सम्भव नहीं है। असफलता के साथ जिएंगे तो उसी मानसिकता में ढल जाएंगे। असफलता को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाना और जीवन में चुनौतियों को स्वीकार करना ज़रूरी है।

पतरस से प्रभु यीशु से यह नहीं कहा कि तूने क्यों मेरा इन्कार किया। पतरस! तू तो मेरे साथ-साथ चला फिर तूने ऐसा क्यों किया? तूने तो मेरे आश्चर्यकर्मों को देखा था, तुझे तो याद होगा कि जब तू पानी में डूबा जा रहा था, तब मैंने हाथ पकड़कर तुझे उठा लिया था, मैं पानी पर चलकर तेरे पास आया था। पतरस, जब तूने मलखुस का कान काट दिया था तो मैंने वहां भी आश्चर्यकर्म किया था। प्रभु यीशु ने पतरस को ये सब बातें याद नहीं दिलाईं परन्तु उससे कहा, जा, मेरी भेड़ों को चरा। अतीत को छोड़ और भविष्य की ओर आगे बढ़ जा। अपनी असफलता को छोड़कर चुनौतियों को स्वीकार कर। उसके बाद यीशु ने उस से कहा - जहां तू जाना न चाहे, वहां तुझे ले जाया जाएगा। तेरी इच्छा के अनुसार नहीं परन्तु परमेश्वर की इच्छा के अनुसार तेरा जीवन होगा और तेरी मृत्यु होगी। आगे बढ़ - चुनौती को स्वीकार कर - मेरी भेड़ों को चरा।

नीतिवचन 24ः16 में लिखा है - “क्योंकि धर्मी चाहे सात बार गिरे तौभी उठ खड़ा होता है; परन्तु दुष्ट लोग विपत्ति में गिरकर पड़े ही रहते हैं”। एक दुष्ट और एक धर्मी में अन्तर होता है क्योंकि धर्मी जन उठकर खड़ा होता है और जब वह परमेश्वर की ओर देखता है तो परमेश्वर उसके घुटनों में बल देता है। परन्तु दुष्ट लोग विपत्ति में गिरकर पड़े ही रहते हैं।

फिलिप्पियों 3ः13-14 में पौलुस लिखता है - “हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ। निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है”।

पौलुस कहता है कि एक काम मैं करता हूं कि जो बातें पीछे रह गई हैं, उन्हें छोड़कर निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं। मैंने स्तिफनुस के वध को पीछे छोड़ दिया है, मसीहियों को मैंने जो सताया था, कलीसियाओं को प्रताड़ित किया था; उन सब बातों को मैंने पीछे छोड़ दिया है और मैं आगे बढ़ गया हूं। मैंने अपनी असफलता को पीछे छोड़ दिया है क्योंकि परमेश्वर ने मुझे आगे बढ़ने के लिए बुलाया है, संघर्ष करने के लिए बुलाया है, चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए बुलाया है।

सबसे प्रमुख बात यह है कि जब हम असफलताओं को पीछे छोड़ देते हैं तो परमेश्वर हमारे जीवनों से महान कार्य करता है। पतरस ने तीन बार प्रभु यीशु मसीह का इन्कार तो किया परन्तु फिर उसने उसकी ओर देखा, उससे क्षमा प्राप्त की और आगे बढ़ गया। उसके बाद जब उसने पिन्तेकुस्त के दिन सन्देश दिया तो 3000 लोगों का बपतिस्मा हुआ, कलीसिया की स्थापना हुई। हज़ारों लोगों ने प्रभु यीशु को स्वीकार किया। पौलुस जब अपनी असफलता से आगे बढ़ गया तो उसने पांच देशों की यात्रा की और वहां कलीसियाओं की स्थापना की।

जब योना से कहा गया कि नीनवे को जाकर प्रचार कर कि लोग मन फिराएं तो वह तर्शीश की ओर चला गया। उसके बाद उसके साथ घटी घटनाओं को हम जानते हैं परन्तु जब वह मछली के पेट में था तब परमेश्वर का वचन फिर से योना के पास पहुंचा कि उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा। तब योना अपनी असफलता को पीछे छोड़ देता है, उसने परमेश्वर की आज्ञा को जब ठुकराया था, उस घटना को पीछे छोड़ देता है और नीनवे नगर में जाकर प्रचार करता है। उसके बाद योना 4ः11 में लिखा है कि - 1 लाख 20 हज़ार लोगों ने मन फिराया। जब योना असफलता से आगे बढ़ गया तो 1 लाख 20 हज़ार लोगों का उद्धार हुआ।

स्काॅटलैण्ड के एक बुजुर्ग प्रचारक अपने जीवन के अन्तिम दिनों में सन्देश दे रहे थे। प्रचार के दौरान उन्होंने कहा - - हम गिरते हैं, फिर उठ जाते हैं, हम गिरते हैं, फिर उठ जाते हैं, और यही रास्ता है जो स्वर्ग की ओर ले जाता है। We fall down - we get up We fall down - we get up We fall down - we get up All the way to Heaven हमें उठना है, असफलताओं को स्वीकारना है, आगे बढ़ना है, चुनौतियों को स्वीकारना है, समस्याओं से पार आगे बढ़ते जाना है। यही सफलता का रास्ता है जो असफलता के द्वार से होकर जाता है। यही सफलता का धाम है जो असफलता के गांव से होकर जाता है।

यही सफलता का रास्ता है, यही परमेश्वर का रास्ता है जो स्वर्ग की ओर ले जाता है। हम गिरते हैं और उठते हैं, हम गिरते हैं और उठते हैं और उस मन्ज़िल तक पहुंचते हैं जो परमेश्वर ने हमारे लिए ठहराई है।

असफलता से आगे निकलना है क्योंकि परमेश्वर की योजना हमारे लिए यही है कि हम असफलताओं को स्वीकारें, परमेश्वर से दिशा निर्देश लें और आगे बढ़कर चुनौतियों का सामना करें।

परमेश्वर आपको आशीष दे।