कलीसिया यीशु की देह है, जिसके लिए यीशु ने अपने प्राण दिए। कलीसिया की इकाई मसीही परिवार है। आज शैतान का प्रहार परिवार पर है। क्योंकि यदि परिवार टूटता है तो कलीसिया पर भी असर पड़ता है। यदि शरीर के एक भाग में कैंसर है तो सारा शरीर प्रभावित होता है। यदि एक परिवार में कोई नकारात्मक बात होती है तो सारे समाज की बदनामी होती है। आज शैतान का प्रहार हर परिवार पर किसी न किसी रूप में है। शैतान का प्रहार भीतरी समस्याओं के माध्यम से है, कभी-कभी उनका ज़िक्र भी नहीं किया जा सकता। बाहरी ग़लत आदर्शों के प्रस्तुतिकरण से परिवार पर शैतान का प्रहार है। टीवी, इंटरनेट जीवन के ग़लत उद्देश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। नायक और खलनायक में अन्तर नहीं है। नायिका और खलनायिका में अन्तर नहीं है। यह आवश्यक है कि कलीसिया में इन बातों की चर्चा की जाए। यदि कलीसिया में सही बातें नहीं बताई जाएंगी तो टेलीविजन, समाज और आसपास के परिवेश से हम प्रभावित होंगे, उन्हीं को अपना लेंगे। आज ऐसे माता-पिता की आवश्यकता है जो बच्चों को ईश्वर के मार्ग पर चला सकें। हम अक्सर चर्चा करते हैं कि बच्चे को क्या बनाएंगे - डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर? पर क्या हमारा उद्देश्य है कि बच्चे को सबसे पहले परमेश्वर की राह पर चलने वाला बनाना है? श्रीमती रूथ ग्राहम लिखती हैं, ''आज कलीसिया की सबसे प्रमुख ज़रूरत है - ऐसे माता-पिता की, जो बच्चों को ईश्वर के मार्ग पर चलाने के लिए प्रतिबध्द हों''। ''लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उसको चलना चाहिये, और वह बुढ़ापे में भी उस से न हटेगा।''(नीतिवचन 22:6) कई बार हम सोचते हैं कि हमारी कलीसिया बहुत अच्छी है, हमारे यहां बहुत अच्छा सण्डे स्कूल संचालित होता है परन्तु फिर क्यों आज कलीसियाओं के जवानों में, परिवारों में समस्या है? शराब, ड्रग्स, अश्लील चलचित्र, माता-पिता की आज्ञा का उल्लघंन, ग़ैर मसीहियों से विवाह की समस्या क्यों है? वास्तव में हमें अच्छी कलीसिया, अच्छे सण्डे स्कूल शिक्षक, अच्छे सन्देशों, अच्छे अगुवों के अलावा ऐसे माता-पिता की भी आवश्यकता है जिनकी प्राथमिकता बच्चों को परमेश्वर के मार्ग पर बढ़ाना हो। एक सर्वेक्षण के अनुसार मसीही परिवार का एक बच्चा या युवा एक सप्ताह में 2 घण्टे चर्च में, 1 ½ घण्टे सण्डे स्कूल में, 1 ½ घण्टे जवानों की सभा में, 40 घण्टे स्कूल अथवा कॉलेज में, 21 घण्टे मित्रों के साथ या घर से बाहर बिताता है। वह अपने सप्ताह के कुल 168 घण्टों में से शेष 102 घण्टे घर में बिताता है। माता-पिता को बच्चों को नियंत्रित करना आना चाहिए। मैं बाइबिल पर आधारित ऐसे 3 सिध्दान्तों की चर्चा करूंगा कि कैसे हम अपने बच्चों को, जवानों, नाती-पोतों को परमेश्वर के मार्ग पर चलाने के लिए तैयार कर सकते हैं। न सिर्फ़ माता-पिता वरन् जवान भी सीख सकते हैं कि कैसे वे सही तरीके से ईश्वरीय राह पर आगे बढ़ सकते हैं। ये बातें नई पीढ़ी के हित के लिए, हमारी कलीसिया, हमारे समाज, हमारे राष्ट्र के हित के लिए आधारभूत हैं। 1. हमें समझना है कि मनुष्य का स्वभाव पापमय होता है :- ''मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?''(यिर्मयाह 17:9) ''लड़के के मन में मूढ़ता बन्धी रहती है, परन्तु छड़ी की ताड़ना के द्वारा वह उस से दूर की जाती है''(नीतिवचन 22:15)। ''क्योंकि मैं जानता हूं, कि मुझ में अर्थात् मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते'' (रोमियों 7:18)। आदम के पाप का प्रभाव बच्चों के जीवन पर भी होता है और उसे नियंत्रित करना अनिवार्य है। बच्चों में स्वार्थ होता है, बच्चे आत्मकेन्द्रित होते हैं, उनमें क्रोध-जलन की भावना होती है। प्रसिध्द बाल मनोवैज्ञानिक डॉ. सीगल का कहना है कि यदि बच्चों को नियंत्रित न किया जाए, उनकी सीमाएं निर्धारित न की जाएं तो 20 वर्ष की आयु में वे एक खतरनाक अपराधी बन सकते हैं। अक्सर हम नियंत्रित नहीं कर सकते क्योंकि हम ही नियंत्रण में नहीं हैं। हम सीमाएं निर्धारित नहीं कर सकते क्योंकि हमारी ही सीमाएं नहीं हैं। हम अनुशासित नहीं कर सकते क्योंकि हम में ही अनुशासन नहीं है। हम कहते हैं, झूठ मत बोलो परन्तु अपने स्वार्थ के लिए हम स्वयं झूठ बोलते हैं। जो हम बच्चों से चाहते हैं उन्हें हम ही पूरा नहीं कर सकते। हम बच्चों से प्रेम-एकता की बातें करते हैं, उनसे अपेक्षा करते हैं, परन्तु स्वयं ही हम अपने जीवन साथी से झगड़ते हैं और ये बातें बच्चों के जीवनों को बर्बाद कर देती हैं। बच्चे में दोनों बातें निहित हैं, वह परमेश्वर की समानता में सृजा गया है, इसलिए उसमें बहुत सी सम्भावनाएं हैं अच्छाई की; परन्तु उस पर आदम के पाप का भी प्रभाव पड़ा है और उसमें बहुत सी सम्भावनाएं हैं बुराई की भी। हमें अच्छाई को प्रोत्साहित करना है, बढ़ावा देना है और बुराई को नियंत्रित कर उसे रोकना है। हमारे भीतर दोनों प्रकार की सम्भावनाएं हैं, दोनों ही प्रकार के व्यवहार हैं। प्रमुख बात यह है कि हम किस बात पर ज़्यादा ध्यान देते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि परिवार में अच्छी संगति पर ज़ोर हो। बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए सण्डे स्कूल और चर्च आराधना में भाग लेने की प्राथमिकता हो। पारिवारिक प्रार्थना की प्रमुखता हो और स्वयं के जीवन का अच्छा उदाहरण हो। इसके साथ टीवी के रिमोट कंट्रोल पर भी हमारा नियंत्रण हो। वचन में लिखा है - ''लड़के की ताड़ना न छोड़ना; क्योंकि यदि तू उसको छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा। तू उसको छड़ी से मारकर उसका प्राण अधोलोक से बचाएगा।''(नीतिवचन 23:13-14) ''छड़ी और डांट से बुध्दि प्राप्त होती है परन्तु जो लड़का यों ही छोड़ा जाता है वह अपनी माता की लज्जा का कारण होता है।''(नीतिवचन 29:15) 2. दूसरा सिध्दान्त यह है कि आदर करने वाले व्यवहार की अनिवार्यता आवश्यक है :- आज का संसार अनादर करना सिखाता है। टेलीविजन के सीरियल्स और मूवीज़ में बच्चा पिता का मज़ाक उड़ाता है और मां भी उसमें आनन्दित होती है, छात्र शिक्षक का अपमान करता है और सबके बीच में लोकप्रिय बन जाता है। शिक्षक या पिता को जोकर के समान प्रस्तुत किया जाता है। मानसिक रूप से इस बात की शिक्षा का प्रभाव डाला जाता है कि यह मेरा जीवन है, मैं चाहे जो करूं। परन्तु हमें समझना है कि यह हमारा अपना नहीं है, इसे ईश्वर ने दिया है, यीशु ने जिसके लिए रक्त बहाया है। टेलीविजन और मूवीज़ का नायक बच्चों के मन में आदर्श बन जाता है। बच्चा उसी के समान कपड़े पहनता है, उसी अन्दाज़ में बात करता है और फिर अगर नायक शराब या सिगरेट पीता है तो चूंकि वह व्यक्ति आदर्श है इस कारण उसका व्यवहार भी आदर्श बन जाता है। जो वह करता है वह उचित बन जाता है, उसकी बुराइयां भी अच्छाई बन जाती हैं। हृदय से माता-पिता का आदर समाप्त हो जाता है। प्रसिध्द मनोवैज्ञानिक डॉ. जेम्स डॉबसन लिखते हैं, ''यदि बच्चा माता-पिता का आदर नहीं करता तो सम्भावना यह है कि वह परमेश्वर का आदर भी नहीं करेगा।'' इसके आगे वह लिखते हैं, ''यदि बच्चा आपका आदर नहीं करता तो वह आपसे प्यार भी नहीं करेगा।'' फिर माता-पिता के लिए भी चुनौती है कि - क्या हम आदर के पात्र हैं, क्या हम आदर के योग्य हैं? पिताओं के लिए चुनौती है कि क्या हम घर में शराब पीकर आते हैं, पत्नी को मारते हैं, घूस लेते हैं, अपशब्द कहते हैं? बच्चा यदि माता-पिता का आदर नहीं करेगा तो वह परमेश्वर का भी आदर नहीं करेगा। वह शिक्षक का, पासबान का, अगुवों का भी आदर नहीं करेगा। इसलिए इफिसियों 6:1-4 में लिखा है - ''हे बालको, प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनो, क्योंकि वह उचित है। अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहिली आज्ञा है, जिस के साथ प्रतिज्ञा भी है)। कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे। और हे बच्चेवालों अपने बच्चों को रिस न दिलाओ परन्तु प्रभु की षिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन-पोषण करो।'' 1 तीमुथियुस 3:4-5 में लिखा है - ''अपने घर का अच्छा प्रबन्ध करता हो, और लड़केवालों को सारी गम्भीरता से आधीन रखता हो। (जब कोई अपने घर ही का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया की रखवाली क्योंकर करेगा)''। रोमियों 13:1-2 में लिखा है - ''हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के आधीन रहे; क्योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो; और जो अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की विधि का साम्हना करता है, और साम्हना करनेवाले दण्ड पाएंगे।'' बाइबिल आदर करनेवाले व्यवहार की अनिवार्यता की प्रमुखता को बताती है। इस कारण माता-पिता के रूप में हमें स्वयं को सन्तानों के आदर योग्य बनाना है और सन्तानों के रूप में हमें अपने से बड़ों का आदर करना सीखना है। 3. इस सन्दर्भ में तीसरा सिध्दान्त यह है कि बिना सम्बन्ध के आदर और प्रेम सम्भव नहीं है :- व्यवस्थाविवरण 6:6-8 में परमेश्वर कहता है - ''और ये आज्ञाएं जो मैं आज तुझ को सुनाता हूं वे तेरे मन में बनी रहें; और तू इन्हें अपने बालबच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते, उनकी चर्चा किया करना। और उन्हें अपने हाथ पर चिन्हानी करके बान्धना, और ये तेरी आंखों के बीच टीके का काम दें''। यह माता-पिता के लिए एक चुनौती है। यदि हम आदर और प्रेम चाहें और हमारा स्वयं बच्चों से सही सम्बन्ध न हो - तो आदर और प्रेम मिलेगा नहीं। हम कितना समय उनके साथ बिताते हैं। हम उनका कितना ध्यान रखते हैं? क्या हमें मालूम है कि उनके मित्र कौन हैं, क्या हमें मालूम है कि वे कैसे गीत सुनते हैं, किन टेलीविजन कार्यक्रमों को देखते हैं? हम उनकी आवश्यकताओं का कितना ध्यान रखते हैं? साथ मिलकर कितना समय बिताते हैं, कितना खेलते हैं? उन्हें कितनी ज़िम्मेदारियां सौंपते हैं? उनके विशेष समय में उनके साथ कितना रहते हैं? मेरी छोटी बेटी लाशी जिसका विवाह अभी हाल ही में सम्पन्न हुआ, वह कहती है कि - मुझे वह समय अभी भी याद है, जब मैं बीमार थी और आप मुझे गोद में उठाकर हॉस्पिटल में सीढ़ी पर दो मंज़िल तक ले गए थे। आवश्यकताएं पूर्ण करने से सम्बन्ध नहीं बनते - सम्बन्ध प्यार देने से बनते हैं। ''परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया।'' होशे 6:6 में परमेश्वर कहता है - ''मैं बलिदान से नहीं वरन् स्थिर प्रेम से प्रसन्न होता हूं।'' अपने बच्चों के प्रति इस बड़ी ज़िम्मेदारी की जवाबदेही हमारी है। हमें परमेश्वर को इसका लेखा देना होगा। हम इस ज़िम्मेदारी से हाथ नहीं धो सकते। व्यवस्थाविवरण 21:18-21 में लिखा है - ''यदि किसी के हठीला और दंगैत बेटा हो, जो अपने माता-पिता की बात न माने, किन्तु ताड़ना देने पर भी उनकी न सुने, तो उसके माता-पिता उसे पकड़ कर अपने नगर से बाहर फाटक के निकट नगर के सियानों के पास ले जाएं, और वे नगर के सियानों से कहें, कि हमारा यह बेटा हठीला और दंगैत है, यह हमारी नहीं सुनता; यह उड़ाऊ और पियक्कड़ है। तब उस नगर के सब पुरुष उसको पत्थरवाह करके मार डालें, यों तू अपने मध्य में से ऐसी बुराई को दूर करना, तब सारे इस्राएली सुनकर भय खाएंगे।'' बच्चे परमेश्वर का दान हैं। हमसे परमेश्वर लेखा लेगा। क्या हम अच्छे पालक हैं? यदि हां, तो परमेश्वर आशीषित करेगा। और यदि नहीं तो एक और मौका है आज से। अपने बच्चों के साथ मिलकर प्रार्थना करें। अपनी ग़लतियों को स्वीकार करें, सीमाओं का निर्धारण करें, बच्चों के साथ समय बिताएं, अपने अच्छे व्यवहार का आदर्श प्रस्तुत करें। हमारे लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना महत्वपूर्ण है क्योंकि उपस्थिति कम नहीं होनी चाहिए। बच्चा बीमार है तो डॉक्टर के पास ले जाना ज़रूरी है परन्तु चर्च में उपस्थिति, सण्डे स्कूल में उपस्थिति के प्रति हम ऐसी जागरूकता नहीं रखते। इसकी महत्ता को भी हमें स्वीकार करना है और बच्चों को इस ओर प्रेरित करना है। जवानों से यह कहना चाहूंगा कि सबसे बढ़कर आपसे आपके माता-पिता प्यार करते हैं, आपके मित्र छोड़ सकते हैं परन्तु माता-पिता नहीं छोड़ते। उड़ाऊ पुत्र का उदाहरण हमारे सामने है। मसीही जीवन में सदैव एक नए प्रारम्भ का अवसर है परन्तु स्मरण रहे कि एक दिन यह अवसर उपलब्ध नहीं होगा। माता और पिता आज अपने जीवन में इस बात का विचार करें, इस बात को पक्का कर लें कि एक दिन जब आपका बेटा या बेटी आपको अपने हाथों से मिट्टी दे तो उसकी आंख में आंसुओं के साथ आपके प्रति सम्मान भी हो।