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अनोखा यीशु

यीशु इस संसार के इतिहास का केन्द्र है। समय का विभाजन भी यीशु के आगमन पर आधारित है। यीशु के आगमन के पूर्व का समय ईस्वी पूर्व (बी.सी.) तथा बाद का ईस्वी सन् (ए.डी.) कहलाता है। विश्व के प्रमुख तथ्यों व मानव इतिहास के महान पुरुषों का वर्णन करने वाले ग्रंथ 'एन्सायक्लोपीडिया ब्रिटानिका' में अरस्तू, सिकन्दर महान, प्लेटो आदि महान पुरुषों के बारे में मात्र एक-एक पृष्ठ किन्तु प्रभु यीशु मसीह के बारे में 40 पृष्ठ लिखे गए हैं। आखिर ऐसी क्या अनोखी बात है यीशु में, जो उसे सब लोगों से अलग करती है?
क्यों यीशु
• सबसे अलग है ?
• सबसे विशिष्ट है ?
• सबसे महान है ?
• सबसे प्रमुख है ?
• सबसे अनोखा है ?
यीशु अनोखा क्यों है ? बेमिसाल क्यों है ? जबकि वह एक छोटे से गांव के गौशाले में पैदा हुआ। उसकी माता एक साधारण परिवार की महिला थी। लोग जिसे उसका पिता कहते थे वह एक बढ़ई मात्र था। जीवन के प्रथम 30 साल उसने एक गांव में गुज़ारे। वहां उसने अपने पिता की कार्यशाला में काम किया। जीवन के अन्तिम तीन साल वह एक प्रचारक रहा। उसने कभी कोई पुस्तक नहीं लिखी। वह कभी कॉलेज नहीं गया। उसका न तो कोई परिवार था न ही कोई मकान। वह कभी किसी बड़े शहर में नहीं रहा। अपने गांव की सीमा से 125 मील से अधिक दूर उसने कभी यात्रा नहीं की। उसका कोई कार्यालय नहीं था। उसने कभी कोई इमारत नहीं बनवायी। उसके प्रचार और उसकी बातों से जनता उसके खिलाफ हो गयी। उसके मित्रों ने उसका साथ छोड़ दिया। उसे अदालत ले जाया गया। उस पर झूठा मुकद्दमा चलाया गया। उसे दो कुकर्मियों के बीच क्रूस पर मृत्युदण्ड दे दिया गया। उसकी यदि कोई जायदाद थी तो वह थी वस्त्र की मात्र एक जोड़ी जिसे क्रूस के नीचे सिपाहियों ने चिट्ठी डालकर बांट लिया। मृत्यु के बाद उसे रखा भी गया तो किसी दूसरे व्यक्ति की क़ब्र में.....।

फिर करीब 2000 वर्ष आए और चले गए। किन्तु आज भी यह व्यक्ति यीशु मानव इतिहास का केन्द्र बना हुआ है।
• जितनी सेनाओं ने आज तक युध्द किए,
• जितने राजाओं ने अब तक राज्य किए,
• जितने संसद के सत्र आज तक संसार में हुए,
• जितने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अब तक हुए,
• उन सबसे कहीं बढ़कर इस अकेले व्यक्ति यीशु ने संसार के लोगों को सबसे अधिक प्रभावित किया है।
• आज संसार में सबसे अधिक लोग उसके अनुयायी हैं।

आखिर क्यों यीशु अनोखा है ?

1. यीशु अनोखा है उसके वचनों (कथनों) के कारण यीशु की लोकप्रियता बढ़ रही थी। लोग उसके पीछे चलने लगे थे, उसकी बातें सुनने को बड़ी भीड़ जमा होने लगी थी। जगह-जगह उसकी चर्चा थी। इससे फरीसी व महायाजक चिन्तित व घबराए हुए थे। उन्होंने मन्दिर के सिपाहियों को पूरे अधिकार व हथियारों से पूर्ण सुसज्जित कर यीशु को पकड़ने भेजा। सिपाही खाली हाथ लौटे। उन्होंने बताया कि यीशु के वचन अनोखे थे। ''आज तक ऐसी बातें किसी ने कभी नहीं कहीं जैसी वह कहता है।'' (यूहन्ना 7:46) प्रभु यीशु की बातों में, उसके शब्दों में, बात कहने के उसके तरीके में ऐसा अधिकार था कि हथियारबन्द व अधिकार सम्पन्न ये सिपाही उसे पकड़े बिना खाली हाथ लौट आए। यीशु की बातें दुनिया की बातों से भिन्न थीं। उसने कहा, ''जो अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, परन्तु जो ........ अपना प्राण खोता है, वह उसे बचाएगा।'' (मरकुस 8:35) ''यदि कोई मर भी जाए फिर भी जीएगा।'' (यूहन्ना 11:25) ''जो प्रधान होना चाहे, वह सबका दास बने।'' (मरकुस 10:44) यीशु ने इस संसार से बिलकुल भिन्न बातें कहीं। लोगों ने ऐसी बातें कभी नहीं सुनी थीं। यीशु की बातें पवित्र बाइबिल में पायी जाती हैं। एक बार गलील की झील में तूफान आया। प्रचण्ड वायु चली, नौका डगमगाई। तब यीशु आया। उसने आंधी को डांटा। पानी को शान्त किया। उसने कहा ''शान्त रह। थम जा।'' (मरकुस 4:39) लोगों ने अचरज से कहा ''यह कौन है कि आंधी और पानी भी उसकी आज्ञा मानते हैं।'' (मत्ती 8:27) जब यीशु बोलता है तो सृष्टि भी सुनती व मानती है। एक सूखे अंग वाला व्यक्ति जो कभी चला नहीं। यीशु ने उससे कहा, ''उठ अपनी खाट उठाकर चल फिर'' (यूहन्ना 5:8) और वह चलने लगा। यीशु के वचन मात्र से अंधे देखने लगते हैं। कह देने ही से लंगड़े चलने लगते हैं। शब्द उच्चारण मात्र से कोढ़ी शुध्द हो जाते हैं। चार दिनों के मुर्दा लाज़र को यीशु ने पुकारा, 'हे लाज़र निकल आ' (यूहन्ना 11:43) और वह क़ब्र में से निकल आया। यीशु ने ''हे लाज़र'' इसलिये कहा क्योंकि यदि वह केवल ''निकल आ'' कहता तो सारे संसार की सारी क़ब्रें खुल जातीं और सारे मृतक निकल आते। इतना अधिकार है यीशु के वचनों में। यह सच है कि हमारी बोली हमारा भेद खोल देती है। प्रभु यीशु मसीह के बोलने में, उसके वचनों में अधिकार है। उसकी बोली उसका भेद खोल देती है कि वास्तव में - यीशु सृष्टिकर्ता है। यीशु मुक्तिदाता है। यीशु स्वयं परमेश्वर है।

2. यीशु अनोखा है: उसके व्यवहार के कारण ''उसने गाली सुनते हुए गाली नहीं दी, दु:ख सहते हुए भी धमकियां नहीं दी।''(1 पतरस 2:23) प्रभु यीशु मसीह ने पापियों को नाश नहीं किया परन्तु उन्हें क्षमा किया। एक महिला व्यभिचार करते हुए पकड़ी गई। व्यवस्था के अनुसार उस पर पथराव होना चाहिए था परन्तु यीशु ने कहा कि व्यवस्था का पालन करने के लिए तुम उस पर पथराव तो करो लेकिन पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो। इस प्रकार प्रभु ने उसे बचा लिया। यीशु इस संसार में आया, पापियों को बचाने के लिए, उध्दार देने के लिए। उसका सन्देश था कि जो जैसा है, जहां है, जिस दशा में है, यदि मन फिरा ले तो परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा। पापिनी स्त्री, व्यभिचारिणी महिला, सामरी स्त्री, हेरा-फेरी करने वाला, चोर, डाकू, हत्यारा इत्यादि सबको यीशु ने स्वीकारा, क्षमा किया। यीशु का सन्देश था कि तुम्हें पापमय जीवन जीना नहीं है। पापों का बोझ उठाना नहीं है। मैं तुम्हारे लिये एक बेहतर जीवन लाया हूं। उसने पापियों को क्षमा किया। यहां तक कि जिन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया था, उसे मारा था, क्रूस पर अपनी मृत्यु से पूर्व असहनीय पीड़ा सहते हुए भी उसने उनके लिये प्रार्थना की ''हे पिता, इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।'' (लूका 23:24) प्रभु यीशु मसीह आज भी संसार के सब लोगों को बुला रहा है कि उनके पापों को क्षमा करे, उन्हें मुक्ति दे, अनन्त जीवन प्रदान करे। आज संसार में केवल प्रभु यीशु मसीह ही सच्ची शान्ति, प्रेम और क्षमा दे सकता है।

3. यीशु अनोखा है: उसके पाप रहित होने के कारण प्रभु यीशु मसीह कुंवारी मरियम के गर्भ से जन्मा। पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से मरियम गर्भवती हुई थी और यीशु का जन्म एक पाप रहित प्रक्रिया से हुआ। वह 33 साल इस संसार में रहा। इन 33 सालों में उसने कभी कोई पाप नहीं किया। पाप रहित जन्म, पाप रहित जीवन था यीशु का। लोगों ने उसके विरुध्द षड़यंत्र रचा, राजनैतिक नेताओं, धार्मिक अगुवों और न्यायपालिका के प्रमुखों ने उसे फंसाना चाहा। उसमें अपराध ढूंढ़ना चाहा परन्तु कोई उसमें किसी प्रकार का पाप न ढूंढ़ सके। यहां तक कि उसके विरोधी भी उसमें कोई दोष ढूंढ़ न पाए। पीलातुस ने अदालत में कहा ''मैं इसमें कोई दोष नहीं पाता।''(लूका 23:14) रोमी सूबेदार ने उसकी मृत्यु को देखकर कहा ''यह निश्चय ही परमेश्वर का पुत्र था।'' (मत्ती 27:54) उसके साथ क्रूस पर सज़ा पा रहा डाकू कहता है, ''इस मनुष्य ने कोई अपराध नहीं किया।'' (लूका 23:4) यहूदा इस्करियोती (जिसने उसे धोखा देकर पकड़वाया था) ने कहा, ''मैंने निर्दोष का लहू बहाया है।''(मत्ती 27:4) प्रभु यीशु पाप रहित था, वह स्वयं परमेश्वर था, वह खोए हुओं को बचाने और पापियों का उध्दार करने आया था। एक टीकाकार ने कहा है ''यदि आप यीशु के पीछे चलते हैं तो न केवल पाप रहित हो जाते हैं लेकिन पाप से रिक्त होते जाते हैं।'' आज आपकी आवश्यकता है कि लोगों को नहीं किन्तु यीशु को देखें। यदि हम लोगों को देखेंगे तो बहुत सम्भव है कि ठोकर खा जाएं। किन्तु प्रभु यीशु को देखेंगे तो हर परिस्थिति में हर समय में हमें एक आदर्श दिखाई देगा। हर परिस्थिति से गुज़रने की शक्ति वह हमें देगा। तब ही हम उसके मार्ग पर चल सकेंगे। हम लोगों से बढ़कर यीशु मसीह को देखें। वह पवित्र है। आदर्श है। परिपूर्ण है। पाप रहित है।

4. यीशु अनोखा है: परिवर्तन लाने के कारण यीशु लोगों को बदल देता है। एक व्यक्ति था शाऊल जो मसीहियों को सताता था। कलीसिया पर सताव लाता था, मसीही अगुवों की हत्या में शामिल होता था। उसने प्रभु यीशु की आवाज़ सुनी। उसे स्वीकार किया और उसका जीवन बदल गया। वह मसीहियों को जोड़ने वाला, कलीसियाओं को स्थापित करने वाला बन गया। एक पापिनी स्त्री थी जो व्यभिचार में लिप्त थी, समाज में घृणा की पात्र थी। वह प्रभु यीशु से एक छोटी मुलाकात ही में पूरी तरह बदल गयी। उसकी प्रचारिका बन गयी। क्रूस पर एक डाकू लटका हुआ था। महज़ तीन घंटे यीशु के सम्पर्क में आकर उसका हृदय परिवर्तन हो गया। वह अनन्त जीवन का वारिस बन गया। कुछ साधारण मछुआरे थे। वे प्रभु की पुकार सुनकर उसके पीछे चले और संसार में उलट-फेर कर गए। यीशु की शिक्षाओं से विश्व को नयी दिशा देने वाले अगुवे बन गए। एक महसूल (चुंगी कर) लेने वाला व्यक्ति था। प्रभु यीशु उसके घर गया, उसके साथ भोजन किया और वह लेने वाला नहीं किन्तु देने वाला बन गया। शोषण की जगह उदारता ने ले ली। न केवल लोग किन्तु परिस्थितियां भी बदल जाती हैं। एक बार यीशु अतिथि बन कर विवाह भोज में गया। उसने पत्थर के मटकों में पानी भरवाकर प्रार्थना की। पानी दाखरस में बदल गया। यीशु नाईन नगर को गया। वहां उसने एक युवक की अर्थी निकलते देखी। उसकी विधवा माता के आंसुओं पर तरस आया और मृतक युवक को जीवित कर दिया। शव-यात्रा बदल गई जीवन के उत्सव में। जहां दु:ख और निराशा का अंधकार था वहां जीवन और आनन्द का प्रकाश छा गया। आज भी ऐसे असंख्य लोग हैं संसार के कोने-कोने में, जो इस बात के गवाह हैं कि कैसे यीशु ने उनके जीवन को प्रभावित किया और बदला है। कैसे जीवन की जटिल परिस्थितियों को सरल किया। आज परमेश्वर का वचन आपको चुनौती देता है चाहे आप कैसी भी समस्या में क्यों न हों, चाहें आप कैसी भी पापमय दशा में क्यों न हों। यीशु आपको स्वीकार करने के लिए, आपके जीवन में नयी राह बनाने के लिए, आपको अपनी शक्ति से भरपूर करने के लिए बुलाता है। वह आपके जीवन को बदल सकता है। वह आपकी परिस्थितियों को बदल सकता है।

5. यीशु अनोखा है: उसकी मृत्यु और फिर जी उठने के कारण बाइबिल में यीशु की मृत्यु के विषय में अनेक भविष्यवाणियां पाई जाती हैं। स्वयं प्रभु यीशु ने अपने जीवन काल में अपनी मृत्यु और पुन: जीवित हो जाने के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की थी। जब क्रूस पर प्रभु यीशु की मृत्यु हुई तो बड़ा भूकम्प आया। सारी सृष्टि उसकी मृत्यु की पीड़ा के अनुभव से गुज़री। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि स्वयं सृष्टिकर्ता अपनी सृष्टि को बचाने के लिये अपने प्राण न्योछावर कर रहा था। क्रूस की मृत्यु द्वारा यीशु ने सारी मानव जाति के लिये पापों की क़ीमत चुका दी। जो निष्पाप था उसने सारे संसार के पापियों के प्रायश्चित के लिये अपना बलिदान कर दिया। हमारे लिये उध्दार और अनन्त जीवन का मार्ग खोल दिया। मृत्यु अब हमारी नियति नहीं रह गयी। मृत्यु अब हमारा अन्त नहीं किन्तु अनन्त जीवन का द्वार बन गई। यीशु की मृत्यु में मृत्यु की मृत्यु हो गई। मृत्यु पर विजय प्राप्त कर यीशु तीसरे दिन फिर जीवित हो गया फिर कभी न मरने के लिये। दुनिया में ऐसा न कोई हुआ है, न कभी होगा जिसने मौत को सदैव के लिये पराजित कर दिया है। इसलिए यीशु कहता है, ''क्योंकि मैं जीवित हूं, तुम भी जीवित रहोगे।'' (यूहन्ना 14:19) इसलिये हमें भी अनन्त जीवन की आशा है।
क्या आप अनन्त जीवन व अनन्त शान्ति पाना चाहते हैं ?
जो आज ही प्रभु यीशु मसीह को अपने दिल में जगह दें। उस पर विश्वास करें। निश्चय जान लें कि उसने आपके पापों की क़ीमत चुका दी है। जो कोई प्रभु यीशु मसीह को ग्रहण करता है उसे आज भी पापों की पूरी क्षमा, पूरी शान्ति और अनन्त - जीवन प्रदान करता है। क्या आप तैयार हैं ? आइए, प्रभु यीशु मसीह को अपने हृदय में ग्रहण कर परमेश्वर के अनोखे प्रेम एवं उसकी असीम शान्ति का अनुभव कीजिए।